Saturday 2 May 2015

फ़ज़ल इमाम मल्लिक की लघुकथाएँ

फ़ज़ल इमाम मल्लिक
बिहार के शेख़पुरा जिले के चेवारा के निवासी फ़ज़ल इमाम मल्लिक हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ से जुड़े हैं। साहित्यिक पत्रिका ‘सनद’ और ‘ऋंखला’ का संपादन भी  कर रहे हैं। काव्य संग्रह ‘नवपलव’ और लघुकथा संग्रह  ‘मुखौटों से परे’ का संपादन भी कर चुके हैं। दूरदर्शन के उर्दू चैनल से उन पर एक ख़ास कार्यक्रम ‘सिपाही सहाफत के’ भी प्रसारित  हुआ है।  उन्हें दिल्ली में ही आयोजित एक समारोह में 'रोशनी दर्शन ' पत्रिका  अपने दस साल पूरे करने के मौके पर  ‘चित्रगुप्त सम्मान’ से नवाज चुकी है। हिन्दी लघुकथा आंदोलन से वे नवें दशक से ही जुड़े रहे हैं। यहाँ प्रस्तुत हैं  अभी-अभी मेल से प्राप्त उनकी तीन  लघुकथाएँ:
पाबंदी
उस मोहल्ले में वह अकेली रह रहीं थीं। उनका इस तरह अकेले रहना लोगों को रास नहीं आ रहा था। खासकर जिस तरीके से वे रहती थीं। लोगों को उनका बेपरदा रहना...मर्दों के साथ घूमना-फिरना अच्छा नहीं लगता था। आख़िर मज़हब भी कोई चीज़ होती है; और इस्लाम ने औरतों को परदे की हिदायत की है। मोहल्ले के लोगों ने इसकी शिकायत इमाम से की। लोगों का मानना था कि उनके रहन-सहन के तरीक़े से मोहल्ले की औरतों व लड़कियों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा.......।
          लोगों की शिकायत की वजह से उन्हें एक दिन इमाम की अदालत में पेश होना ही पड़ा। इमाम ने एक नज़र उन पर डाली और फिर बताया कि लोगों को उनके रहन-सहन के तरीक़े पर एतराज़ है। इसके बाद इमाम साहब ने उन्हें इस्लाम में औरतों के परदे को लेकर एक लंबा भाषण दे डाला। वे सारी बातें धैर्य से सुनती रहीं। इमाम साहब ने अंत में जब उन्हें नसीहत देने लगे तो उन्होंने सवाल किया.....‘इस्लाम क्या सिर्फ औरतों को ही परदा के लिए कहता है....?’
          इमाम साहब ने 'हां' में जवाब दिया।
          उन्होंने इमाम साहब से फिर पूछा.....‘इस्लाम में महरम और नामहरम की बात भी कही गई है’।
          इमाम साहब ने कहा...‘हां कही गई है’।
         ‘मैं आपके लिए महरम हूं या नामहरम?’  इमाम साहब से उनका अगला सवाल था।
         इमाम साहब तिलमिला उठे; पर धीरे से कहा....‘नामहरम’।
        ‘और यहां जो लोग खड़े हैं उनके लिए मैं महरम हूं या नामहरम?’
         इमाम साहब ने उसी तरह तिलमिलाते हुए जवाब दिया....‘नामहरम’
        ‘जब मैं आपके लिए नामहरम हूं तो आपको और इन तमाम लोगों को मुझसे परदा करना चाहिए था। इस्लाम ने यह भी साफ़ कहा है कि मरदों को उन औरतों से परदा करना चाहिए जो महरम नहीं हैं। क्या आप और इन तमाम लोगों ने ऐसा किया? जिस मज़हब की बुनियाद पर आप मुझे कठघरे में खड़ा कर रहे हैं उसी मजहब ने मरदों को भी परदा करने की हिदायत दे रखी है। इसलिए मुझसे सवाल-जवाब करने से पहले ख़ुद से और इन तमाम लोगों से सवाल करें तो बेहतर होगा।’
          फिर वे अपनी जगह से उठीं और बिना किसी से कुछ कहे वहां से निकल पड़ीं। इमाम साहब ख़ामोश थे और मजमा शर्मिंदा।

अवाम
सत्ता के शीर्ष पर जब वह पहुंचा तो हैरान रह गया...क़दम-क़दम पर बेईमानी...भ्रष्टाचार....।
आदर्श और मूल्य बस अब सिर्फ किताबों में सिमट कर रह गए हैं...उसे पहले डर भी लगा। किस-किस के खिलाफ़ वह हल्ला बोले....ऊपर से नीचे तक सब एक ही रंग में रंगे थे....लेकिन फिर उसने हिम्मत जुटाई...धीरे-धीरे सत्ता पर पकड़ बनाई। लोगों की आंखों से आंसू पोंछने के लिए वह लगातार कोशिश करता रहा....भ्रष्ट और बेईमानों की परेशानी बढ़ी....सत्ता में उसके सहयोगी उसके ख़िलाफ़ होने लगे तो पार्टी में उसके कामकाज के तरीक़े को लेकर फुसपुसाहट शुरू हो गई। लेकिन इन सबसे बेपरवाह लोगों के पक्ष में खड़ा होना उसने नहीं छोड़ा।
धीरे-धीरे विरोध बढ़ता गया। पार्टी और उसके सहयोगी उसे सत्ता से बेदखल करने के लिए लामबंद हुए...और फिर सबने एक सुर में उसे हटाने की मांग करने लगे....।
सारे विरोध के बावजूद वह अब भी सत्ता के शिखर पर बैठा हुआ है.....अवाम उसके साथ हैं....।

चुनाव
सत्ता के लिए पार्टी चाहिए और पार्टी चलाने के लिए पैसा...।
उसने पहले पार्टी बनाई....फिर पैसा और उसके बाद सत्ता हासिल की.....।
सब कुछ ठीक चल रहा था....सत्ता उसके पास थी और पैसा उस पर बरस रहा था....पैसा अब उसकी मजबूरी नहीं कमज़ोरी बन गई थी.....इस कमज़ोरी की वजह से उसकी परेशानी बढ़ती गई....उसके अपने साथी-संगी उसका साथ छोड़ने लगे....और एक दिन ऐसा आया कि उसे पैसा और लोगों में से किसी एक को चुनना था.....
उसने पैसे को चुना....अगले दिन लोगों ने उसे सत्ता से बेदख़ल कर दिया....।

1 comment:

प्रदीप कांत said...

अच्छी लघुकथाएँ हैं भाईसाहब