Tuesday 25 June 2013

औरत/युगल



 दोस्तो, युगल हिन्दी लघुकथा के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं। 'जनगाथा' के इस अंक में उनकी यह लघुकथा ससम्मान प्रस्तुत है। अपनी बेबाक टिप्पणी अवश्य दें:
                                    चित्र : बलराम अग्रवाल
वह उनकी शादी की रात थी। शादी क्या? औरत ने पहले पति का सिन्दूर धो डाला था और इस नये मर्द ने माँग भर दी थी। औरत चटाई पर दीवार का सहारा लिए बैठी थी। मटमैली साड़ी का आँचल सिर से सरककर गोद में पड़ा था। जो ब्लाउज़ उसने चार उसने चार दिनों पहले पहना था, आज भी पहने थी। लेकिन माँग में डाला गया सिन्दूर चमक रहा था। मर्द आया तो उसने आँख उठाकर उसे देखा। मर्द ने भी दीये की रोशनी में उसे देखा और उसकी भरी-पूरी छातियों पर उसकी नज़र टिक गयी। पास आकर बैठ गया और औरत को खींचकर अपने आग़ोश में कर लिया। मर्द ने ब्लाउज़ में हाथ दिया तो औरत बोली—“छोड़ दो, दु:ख रहा है। कमीने ने छातियों में काँटे चुभोये हैं और दरिन्दे की तरह मरोड़ा है। तुम्हारे लगाकर गालियाँ दी हैं। छातियाँ फूली हुई हैं।”
      मर्द का हाथ आप-ही-आप खिसक आया। जाने क्या सोचता रहा! फिर उसने उसकी जाँघ पर से कपड़े हटाये। पिंडलियों पर और जाँघों पर नीले फूले कई दाग़ उभरे थे। नंगी जाँघ पर जब मर्द का हाथ पड़ा तो वह दर्द से चिहुँक उठी। मर्द बोला—“वह मर्द है या कस्साई!…हरामी!!” यह गाली मर्द ने दूर अलक्ष्य में फेंकी थी—औरत के पहले पति की ओर। जाँघ पर कपड़ा बहुत ऊपर तक हट गया था और मर्द के भीतर कनकनाहट भर रही थी। फि न जाने क्या सोचकर उसने जाँघ ढँक दी।
      औरत ने मर्द को पसीजती नज़रों से देखा—“तुम्हारा मन है तो…”
      मर्द कुछ ठीक निर्णय  नहीं ले पा रहा था। तभी दरवाज़ा भड़भड़ा उठा—“खोल रे कुत्ते की औलाद! शेर का शिकार कुत्ता नहीं पाता!”
      भीतर से मर्द बोला—“तुमने तो मार-मार के इसे निकाल दिया है। अब यह मेरी औरत है। चुपचाप चला जा यहाँ से।” उसने दीया बुझा दिया। हाथ में कुदाल लेकर तैयार हो गया।
      बाहर वाला आदमी दरवाज़ा तोड़कर अन्दर आ गया। अन्दर अँधेरे में उसे कुछ दिखा नहीं। तभी कुदाल का एक भरपूर वार उसके कन्धे पर पड़ा। वह ‘हाय’ कर वहीं गिर गया।
      मर्द ने औरत का हाथ पकड़कर खींचा कि चलो, भाग चलें। औरत ने मर्द का हाथ झटक दिया—“हाय! यह तूने क्या कर दिया? यह तो मेरा ब्याहता था।”
      मर्द बोला—“अगर मैं नहीं करता तो यह मेरे साथ यही करता। उसके हाथ में कट्टा था।” और मर्द औरत को घसीटता हुआ ले गया। औरत रोती जाती थी। उसका एक ब्याहता आगे था और एक पीछे, जिस ओर वह बार-बार देख रही थी।
कथाकार का मूल नाम : युगल किशोर
जन्म : 1925 की दीपावली
प्रकाशित कृतियाँ : पाँच लघुकथा संग्रह, तीन उपन्यास, तीन कहानी संग्रह, तीन नाटक, दो निबंध संग्रह
संपर्क : मोहिउद्दीनपुर(समस्तीपुर), बिहार-848501 मो॰ : 09631361689

2 comments:

shobha rastogi shobha said...

AAD. YUGAL JI V AAD. BALRAM JI BAHUT ACHI KATHA HETU BADHAEE . AURAT KO SAMAN SAMAJHNE KI MANSIKTA PAR CHOT .. PRABHAVI KATHY V SHILP ME GADHI KATHA RONGTE KHADE KAR DETI HAI ..HRADAY VIDARAK DRASHY KA SAJIV VARNAN..PUN: BADHAEE ..

सुधाकल्प said...

वास्तविकता की परतें उधेड़ती हुई हृदय को छूने वाली अच्छी लघुकथा है ।