Friday 22 October 2010

उन्नीसवें अन्तर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन, पंचकुला(हरियाणा) के अवसर पर विशेष

-->पंचकुला(हरियाणा) में आज 23 अक्टूबर, 2010 को लघुकथा सम्मेलन है। सम्मेलन के पहले सत्र में भाई भगीरथ परिहार का लेख लघुकथा के आईने में बालमन पढ़ा जाना है तथा डॉ अनूप सिंह मिन्नी कहानी(पंजाबी में लघुकथा के लिए यही नाम स्वीकार किया गया है) की पुख्तगी के बरक्स साऊ दिन शीर्षक अपनी पुस्तक पर आलेख पढ़ेंगे। इन दोनों ही लेखों पर डॉ अशोक भाटिया, सुभाष नीरव और डॉ मक्खन सिंह के साथ मुझे भी चर्चा करने वालों में शामिल किया गया था। मेरा दुर्भाग्य कि इन दिनों मुझे बंगलौर आना पड़ा और मैं सम्मेलन का हिस्सा न बन पाया। सम्मेलन के दूसरे सत्र में कुछ लघुकथाओं का पाठ उपस्थित लघुकथा-लेखकों द्वारा किया जाना है। इन लघुकथाओं का चुनाव पूर्व-प्रेषित सामग्री से श्रेष्ठता के आधार पर मिन्नी संस्था के कर्णधार श्रीयुत श्यामसुन्दर अग्रवाल व डॉ श्यामसुन्दर दीप्ति द्वारा हुआ है। भाई श्यामसुन्दर अग्रवाल ने बताया था कि इस सम्मेलन के जुए का कुछ बोझ भाई रतन चंद 'रत्नेश' के कन्धों पर भी टिकाया गया है, लघुकथाएँ उनके सौजन्य से भी प्राप्त हुई हैं। भाई श्यामसुन्दर अग्रवाल ने 14 लघुकथाएँ इस आशय के साथ मुझे अग्रिम मेल की थीं कि मैं उन्हें पढ़ लूँ और यथानुसार अपनी टिप्पणी उन पर तैयार कर लूँ। चयनित लघुकथा का पाठ मिन्नी की परम्परा के अनुसार उसके लेखक द्वारा ही किया जाना है। पढ़ी जाने वाली लघुकथाओं पर चर्चा के लिए प्रपत्र में डॉ अनूप सिंह, डॉ कुलदीप सिंह दीप, डॉ अशोक भाटिया, सुकेश साहनी, निरंजन बोहा के साथ मेरा भी नाम शामिल है। मैं सदेह पंचकुला सम्मेलन में अनुपस्थित रहूँगा लेकिन मेरी मानसिक उपस्थिति वहाँ बनी रहेगी। सम्मेलन की सफलता के साथ-साथ मैं भाई श्यामसुन्दर अग्रवाल द्वारा प्रेषित लघुकथाओं में से कुछ को अपनी टिप्पणी सहित जनगाथा के अक्टूबर 2010 अंक में दे रहा हूँ और इस तरह अपनी उपस्थिति वहाँ दर्ज़ कर रहा हूँ।
21 अक्टूबर की शाम एक एसएमएस इस आशय का आया था कि गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में 23 अक्तूबर 2010 को लघुकथा सम्मेलन है। इस बारे में किसी भी प्रकार की अन्य चर्चा न करके मैं उक्त सम्मेलन की भी सफलता की कामना हृदय से करता हूँ।सभी लघुकथाओं में जो अंश लाल रंग से दिखाए हैं, उसका अर्थ मूल लघुकथा से उन अंशों को हटाने की सलाह है तथा जो अंश हरे रंग से दिखाए हैं, उसका अर्थ उन अंशों को मूल लघुकथा में जोड़ने की सलाह हैबलराम अग्रवालबलराम अग्रवाल


॥लघुकथाएँ॥


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॥9॥ मालिक/राम कृष्ण ‘कांगड़िया’
होटल के जूठे बर्तनों को साफ करते-करते उसकी उँगलियाँ कड़कती ठंड में बेजान-सी होती जा रही थीं। वह चाहकर भी अपनी उँगलियों को गति नहीं दे पा रहा था।
मालिक ने गुर्राते हुए कहा, क्यों बे…क्या कर रहा है तू? रात के नौ बजने वाले हैं और अभी तक तुझसे बर्तन ही साफ नहीं हुए! चल जल्दी कर।
साहब! क्या करूँ, पानी इतना ठंडा है कि क्या बताऊँ! उंगलियाँ जाम हो गई हैं। गर्म पानी होता तो जल्दी हो जाता।
बड़ा आया गर्म पानी वाला! अगर इतनी ही ठंड लगती है तो घर में क्यों नहीं बैठता? नौकरी करने की क्या जरूरत है?”  इतना कह वह बड़बड़ाता हुआ अंगीठी की तपिश का आनंद लेने बैठ गया।-0-
संपर्क : गाँव व डाक: भूमती, तहसील: अर्की-173 221 (हि.प्र.)

टिप्पणी : पूँजी के क्रूर चरित्र को दर्शाती एक अच्छी लघुकथा। चरित्र-विकास की दृष्टि से भी यह सधी हुई रचना है। मालिक शीर्षक से भी दमनकर्ता, शोषक अथवा पूँजीपति ही अधिक ध्वनित होता है।


॥10॥ अनजाने में/अनिल कटोच
शाम हो आई थी। अंधेरा अपने पाँव पसारने लग पड़ा था। गाँव को जाने वाली अंतिम बस भी जा चुकी थी। बस स्टाप पर मैं था और एक नवयौवना थी। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। ऐसे में ऑटो वाले भी मुँह मांगा दाम लेते हैं।
इतने में एक युवक बाइक पर आया और बोला, मैडम! कहो तो मैं छोड़ आऊँ, जहाँ तुम्हें जाना है?
नवयौवना ने ‘न’ में सिर हिला दिया। बाद में न जाने कितने मनचले आए और कुछ न कुछ कह कर चल दिए।
मैं भी उस नवयौवना के नजदीक चला गया। थोड़े ही समय बाद एक और युवक आया। नवयौवना उस समय किसी से मोबाइल पर बात कर रही थी। युवक ने कहा, मैडम! कहाँ जाना है, मैं छोड़ आता हूँ।
नवयौवना ने मेरी ओर इशारा करते हुए कहा, ठीक है, पहले इन्हें छोड़ आएँ।
मैं भी बिना कोई देरी किए उस युवक के पीछे बैठ गया। रास्ते में देखा वह नवयौवना अपने पिता की बाइक पर बैठी मंद-मंद मुस्कराती हुई जा रही थी।-0-
              संपर्क : टी-2/46, जुगयाल, पठानकोट-145 029 (पंजाब)

टिप्पणी : यद्यपि कथाकार ने यह प्रयत्न किया है कि वह महिला पात्र के प्रति पुरुष पात्रों की मानसिकता को दर्शाए, लेकिन शैल्पिक दृष्टि से इसका निर्वाह कुशलतापूर्वक नहीं कर पाया है। मुख्य-पात्र को यह कैसे पता चला कि नवयौवना अपने पिता की ही बाइक पर बैठी जा रही है?

॥11॥ ससुराल/डॉ. पूनम गुप्त
दौरे से वापस आया तो बड़े भाई साहब का फोन मिला,तीन दिन हो गए नीरजा आई हुई है। 
आठ महीने पहले ही नीरजा की शादी हुई थी। नीरजा भाई साहब की इकलौती बेटी है। नाम के अनुरूप ही सुंदर और समझदार। पता नहीं वह ससुराल में क्यों खुश नहीं थी। जब भी उससे फोन पर बात करता, वह रो पड़ती।
भाई साहब के घर गया तो नीरजा मेरे गले लगकर रो पड़ी। वह काफी कमज़ोर लग रही थी। ‘मैने वापस नहीं जाना।’ एक ही रट लगा रखी थी उसने। मैने उसे समझाना चाहा तो बोली, सास बात-बात पर ताने देती रहती है। हर काम में टोकती है। मुझसे नहीं सहा जाता अब।
मैने उसे समझाया कि एक-दूसरे को समझने में वक्त लगता है, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।
वहाँ कुछ नहीँ सुधरेगा, चाचाजी! मैं ही चाहे…वह रो पड़ी।
उसका मन बहलाने के लिए मैं उसे बाहर लॉन में ले गया। टहलते हुए उसके साथ इधर-उधर की बातें करने लगा। तभी नीरजा का ध्यान कुछ मुरझाए हुए पौधों की ओर गया। वह बोली, माली काका! जो पौधे आप परसों रोप कर गये थे, वे तो मुरझाए जा रहे हैं। सूख जाएँगे तो बुरे लगेंगे। इन्हें उखाड़कर फेंक दो।
 “नहीं बिटिया, ये सूखेंगे नहीं। ये नर्सरी में पैदा हुए थे, इन्हें वहाँ से उखाड़कर यहाँ लगाया है। नई जगह है, जड़ें जमाने में थोड़ा समय तो लगेगा।
माली की बात सुन नीरजा किसी सोच में डूब गई। थोड़ी देर बाद ही वह ससुराल जाने की तैयारी करने लगी।-0-
संपर्क : 21-ए, रामबाग, पटियाला-147001 (पंजाब)

टिप्पणी : इस लघुकथा का शीर्षक अगर बेटियाँ हो तो कैसा रहे? यह सलाह है, टिप्पणी नहीं। यद्यपि ससुराल भी ठीक ही है, लेकिन सीमित अर्थ में, क्योंकि ससुराल सिर्फ लड़कियों का नहीं होता, लड़कों का भी होता है। जबकि रोपी सिर्फ बेटियाँ जाती हैं, बेटे नहीं।
कुल मिलाकर यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य को पुष्ट करती शिक्षाप्रद और सराहनीय लघुकथा है।

॥12॥ लक्ष्मी-पूजन/ अनन्त शर्मा ‘अनन्त’
वह हर दीपावली की रात को लक्ष्मी की मूर्ति के सामने देर तक पूजा करता, परंतु उसकी आर्थिक हालत बद से बदतर होती गई। वह गरीब से और गरीब होता गया। उसके बीवी-बच्चे त्यौहार के दिन भूखे थे। रात के दस बजे थे। लक्ष्मी के आने के स्वागत में लोगों ने घरों के दरवाजे खुले छोड़ रखे थे।
वह एक घर से दूसरे घर गया और उन घरों की सारी नकदी, जवाहरात इकट्ठे कर लाया। सबसे पहले उन्होंने जी-भर कर खाना खाया। फिर लक्ष्मी-पूजन किया। लक्ष्मी ने इस बार उन पर भरपूर कृपा की थी। घर आई लक्ष्मी को वे खोना नहीं चाहते थे, इसलिए घर के सारे दरवाजे उन्होंने बंद कर दिए। -0-
संपर्क : 1142-ए, सैक्टर 41-बी, चंडीगढ़

टिप्पणी : साधारण रचना। कोई टिप्पणी नहीं।


॥13॥ कर्जमुक्त/ अशोक दर्द
एक वक्त था, सेठ करोड़ीमल अपने बहुत बड़े व्यवसाय के कारण अपने बेटे अनूप को समय नहीं दे पाते थे। अतः बेटे को अच्छी शिक्षा भी मिल जाए और व्यवसाय में व्यवधान भी  उत्पन्न न हो, इसलिए उन्होंने बेटे को शहर के महंगे बोर्डिंग स्कूल में दाखिल करवा दिया था। साल बाद छुट्टियाँ पड़ती तो वह नौकर को भेज कर अनूप को घर बुला लेते थे। बेटा छुट्टियाँ बिताता, स्कूल खुलता तो उसे फिर वहीं छोड़ दिया जाता।
अनूप पढ़-लिख कर बहुत बड़ा व्यवसायी बन गया। सेठ करोड़ी मल बूढ़ा हो गया। बापू का अनूप पर बड़ा कर्ज था। उसे अच्छे स्कूल में जो पढ़ाया-लिखाया था। बापू का सारा कारोबार बेटे अनूप ने खूब बढ़ाया-फैलाया। कारोबार में अति व्यस्तता के कारण अब अनूप के पास भी बूढ़े बाप के लिए समय नहीँ था। वह भी बापू को शहर के बढ़िया वृद्धाश्रम में छोड़ आया। फुर्सत में बापू को घर ले जाने का वायदा कर वापिस अपने व्यवसाय में रम गया। वृद्धाश्रम का मोटा खर्च अदा कर वह अपने को कर्जमुक्त महसूस कर रहा था। -0-
संपर्क : प्रवास कुटीर, गाँव व डाकः बनीखेत, तहसील : डलहौजी, जिला : चम्बा-176303
(हि.प्र.)

टिप्पणी : स्तरीय लघुकथा। कहने को इस वस्तु को अनेक कथाकारों ने अपनी लघुकथा का कथानक पहले भी बनाया है लेकिन अशोक दर्द ने इसको प्रस्तुत करने में जिस धैर्य का परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। यह लघुकथा बिना किसी नारेबाजी के स्थिति के बयान भर के माध्यम से पाठक को आज के माता-पिता की भौतिक-दौड़ और उसके परिणामों की ओर देखने के लिए हमें विवश करती है और अपने उद्देश्य में सफल रहती है।



2 comments:

प्रदीप कांत said...

achchhi laghukataho ka chayana kiya hai

रतन चंद 'रत्नेश' said...

इसे कहते हैं लघुकथा के सही पारखी और यह है लघुकथा के प्रति समर्पण. गोष्ठी में कारण-विशेष से नहीं आ पाए पर इस ब्लॉग के ज़रिये अपनी उपस्थिति दर्शा दी.....बहुत सटीक टिपण्णी और लघुकथाकारों को दिशा-निर्देश भी...