Tuesday 12 January 2010

कुमार नरेन्द्र की लघुकथाएँ

अपने सभी पाठकों को 2010 के आगमन पर हार्दिक शुभकामनाओं के साथ इस बार ‘जनगाथा’ में प्रस्तुत हैं—कुमार नरेन्द्र की लघुकथाएँ। कुमार नरेन्द्र वरिष्ठ हिन्दी लघुकथा लेखक हैं। इनकी लघुकथाएँ आम तौर पर निम्न मध्यवर्गीय संत्रास झेलते पात्रों की व्यथा को सधी हुई प्रतीकात्मकता के साथ व्यक्त करती हैं। —बलराम अग्रवाल

अमृतपर्व
अधेड़-से सुकेश के पिता अवस्था के पिचहत्तर वर्ष पूरा करने के समीप हैं। उनके मित्र भगवान से प्रार्थनाएँ कर रहे हैं कि वह शुभ दिन जल्द-से-जल्द आए और धूमधाम से अमृतपर्व का जश्न मनाएँ। इसके विपरीत सुकेश गत एक दशक से इसी प्रतीक्षा में है कि कब उसके पिता स्वर्ग सिधारें और सम्पत्ति का हस्तांतरण उसके नाम हो।
अभी, पिछले श्राद्धों में ही, उसके पिता गम्भीर रूप से बीमार हो गए थे। एक दिन तो गले की आवाज ही चली गई। होठों पर झाग तक आ गए। सुकेश के चेहरे पर प्रसन्नता की रेखाएँ उभर आईं। उसे लगा—पिता का अब निश्चित रूप से अंतिम समय आ गया है। …किन्तु संध्या-समय डॉक्टर ने बतलाया कि अब वे खतरे से बाहर हैं, चिन्ता की कोई बात नहीं। सुकेश की सारी आशाओं पर पानी फिर गया। जीवनभर सुकेश ने कोई खास कमाई नहीं की थी, बस दार्शनिक-सा बना घूमता रहा। यूँ वह बहुत ईमानदार है, संवेदनशील है। दूसरों को कर्म की महिमा का उपदेश देता रहा, किन्तु स्वयं कुछ न कर पाया। केवल पिता की दौलत पर नजर रही कि वे कब मरें और रुपये-पैसे का वह स्वेच्छापूर्वक उपभोग कर सके।
अब वह धीरे-धीरे अवसाद से भरता जा रहा है और विचित्र-सा व्यवहार करने लगा है। उसे यह भी मालूम है कि पिता की मृत्यु की प्रतीक्षा करते-करते वह स्वयं मृत्यु की ओर बढ़ रहा है और यह भी सोचता है कि यह आदर्श स्थिति नहीं होगी।
मस्तिष्क में इन्हीं सब विचारों के चलते मध्यरात्रि का समय हो चुका है लेकिन उसे नींद नहीं आ रही है। पत्नी भी करवटें बदल रही है, वह भी बेचैन है। बराबरवाले कमरे में पिताजी लेटे हुए हैं, बार-बार पलंग से कराहने की आती हुई आवाज से लग रहा है कि वे भी सोए नहीं हैं। प्रतीत होता है कि उन्हें सहारे की आवश्यकता है।–यही विचार करते हुए वह उठकर पिता के कमरे की ओर चल देता है और पायँते बैठते हुए धीरे-धीरे उनके पाँव दबाने लगता है। कोई दस मिनट के बाद सुकेश को लगा कि पिताजी सिसकियाँ भर रहे हैं। वह पूछता है—“पिताजी! क्या बात है, मुझे तो बताओ”
“इधर आ, मेरी छाती से लग जा…” वे बोले।
सुकेश उठा और जब समीप पहुँचा तो पिता ने उसे अपनी बाँहों में कस लिया। दोनों का रुदन जारी था। मन निर्मल हो गए।
प्रभात की बेला में एक और पिता ने जन्म ले लिया; सुकेश के मस्तिष्क में अमृतपर्व की तैयारियाँ आकार लेने लगी थीं।


सॉफ्टी कॉर्नर
आखिरी शनिवार की शाम को जब वह कार्यालय से थका-हारा बाहर निकला, तो अभी भी तेज गर्म हवाएँ चल रही थीं। कुछ-कुछ आँधी का-सा वातावरण बना हुआ था। बड़ा अजीब-सा मौसम हो गया था। प्यास के मारे बुरा हाल, किन्तु पानी भी कितना पिया जाय! सिगरेट की तलब हुई। ऊपर की जेब से बची अन्तिम सिगरेट निकालते हुए उसकी तर्जनी उँगली पसीने से भीगे हुए दो के नोट को छू गई। इच्छा हुई—लालबत्तीवाले चौक पर चलकर सॉफ्टी खायी जाय। फिर तभी, सुबह गुड्डी के कहे हुए शब्द उसके कानों में गूँज गये,“पापा-पापा! शाम को हमारे लिए पॉपिंस जरूर लेके आना।”
और उसके पाँव बस स्टैण्ड की ओर मुड़ गये। अभी वह कुछ ही कदम चला था कि किसी ने उसे पीछे से आकर टक्कर मारी और वह अभी सँभल भी न पाया था कि पीठ पर एक धौल जमा दी। अपने को संतुलित करते हुए जब उसने उस व्यक्ति को पहचाना,“अरे रघु तुम! कब आये बम्बई से?” वह आश्चर्य से बोल उठा।
“परसों आये थे हम।” रघु ने सिगरेट 555 की राख झाड़ते हुए कहा।
“अच्छा, आओ एक-एक कप चाय पीते हैं।” उसने शिष्टाचार निभाते हुए कहा।
“छोड़ो यार, चाय और इस गर्मी में!” रघु ने नाखुश होते हुए कहा,“चलो, सॉफ्टी खाते हैं, उसी कॉर्नर वाली दुकान पर।”
“माफ करना रघु, दाढ़ में ठण्डी चीजें बहुत लगती हैं सो मैं तो नहीं खा पाऊँगा; लेकिन तुम…जरूर…।”
“अच्छा भाई, जैसी तुम्हारी मर्जी। हम तो अतिथि हैं।”
और उनके कदम उस ओर बढ़ गये।
अब, ज्यों-ज्यों सॉफ्टी कॉर्नर नजदीक आता जा रहा था, उसे लग रहा था कि उसकी दाढ़ का दर्द निरन्तर बढ़ता जा रहा है!


बिरादरी का दु:ख
मुद्दत से चल रहे अपने किराएदार बंसीराम पर दायर मुकदमा जीतने के बाद आज पंडित ज्योति प्रसाद निरे खुश थे।
सुबह से ही बधाई देने वालों का ताँता लगा हुआ था और पंडितजी हाथ जोड़े सबका स्वागत कर रहे थे। साथ ही साथ सभी को इस बार दीपावली पर अपने यहाँ आमंत्रित भी कर रहे थे।
दोपहर हुई। आसपास के सभी बुढ़ऊ यार-दोस्त खुशी-खुशी अपने-अपने घर लौट गए और पंडितजी अपने दूर के दोस्तों को पत्र लिखने बैठ गए।
…कुछ दिनों बाद उनके दोस्तों के जवाब आने शुरू हुए। एक विधुर दोस्त, जोकि हर वर्ष उनके यहाँ ही दीपावली-पर्व मनाता रहा है, ने लिखा—
प्रिय पंडितजी,
…अस्वस्थ होने के कारण सम्भवत:मैं इस बार तुम्हारे यहाँ दीपावली पर न आ पाऊँगा…।
तुम्हारा
रामसहाय
पंडितजी का यह दोस्त परदेश में किराएदार था।

अवमूल्यन

“ए भैया, पंजी की ये देना।” पाँच वर्षीय बालक ने गजक की ओर इशारा करते हुए जरा ऊँची आवाज़ में कहा।
दुकानदार का ध्यान एकदम बालक की ओर आकर्षित हुआ।
“पंजी की गजक नहीं मिलती।” दुकानदार ने खीजते हुए कहा।
“क्यों?” बालसुलभ बुद्धि ने प्रश्न किया।
“ज्यादा जुबान चलाता है बे…हैं…!” लाला ने भड़कते हुए कहा।
मासूम बालक बिना कुछ कहे धीर-धीरे घर की ओर चल दिया। रास्ते में उसने पाँच के उस सिक्के को कई बार उलट-पलटकर देखा। एक ओर छपा था—भारत; और दूसरी ओर—रुपए का बीसवाँ भाग!
अब, वह जब तंग गली में घुसा तो दायीं नाली भी अपना रंग दिखा रही थी। बालक ने तुरन्त निर्णय ले—पंजी जोर-से नाली में फेंक दी। बालक काफी देर तक खड़ा उस डूबती हुई पंजी को देखता, सुख का अनुभव करता रहा।


बैकुंठ लाभ
स्नानादि से निबटकर मैं नाश्ते के लिए रसोईघर में पटरे पर जा बैठा। अभी चाय का पहला ही घूँट भरा था कि मौसी ने आकर समाचार दिया—पड़ोसी पंडितजी को बैकुंठ-लाभ हो गया।
“कब?” अम्मा ने चौंककर प्रश्न किया।
“अभी, कुछ देर पहले।”
“ओह!”
अम्मा मौसी से अफसोस प्रकट करने लगी थीं। इस बीच तवे पर रोटी के जलने से उठी दुर्गंध रसोई में फैलने लगी। मैंने नाक-भौं सिकोड़ी।
“शोभा-यात्रा में कौन जाएगा?” मैंने अम्मा से पूछा।
“तुम ही हो आना।”
“मैं?…पिताजी हो आएँगे।” मैंने टाल देने का प्रयास किया।
“उनकी आधी दिहाड़ी टूट जायगी बेटे!” अम्मा पूर्ववत् रोटी बेल रही थीं।
“मुझे रोजगार-दफ्तर जाना है अम्मा।”
“हुँऽऽऽ…” अम्मा ने हुंकारी भरी और चकले पर से रोटी को उठाकर तवे पर झटके-से पटक दी और उनके होठों से अस्फुट-से स्वर निकलने लगे—“इस पंडित को आज ही मरना था, कल क्यों नहीं मर गया…!”
“ऐसा क्यों?” मैंने चौंकते हुए पूछा।
“रविवार जो था।” अम्मा हौले-से बोली।
तवे पर पड़ी रोटी जलने लगी थी, तभी मैं कराह उठा। बायीं ओर का मसूढ़ा दाढ़ों के मध्य बुरी तरह-से कुचल गया था।

डण्डा
“जीतेगा भई जीतेगा—तीरवाला जीतेगा…”
“जीतेगा भई जीतेगा—हाथवाला जीतेगा…”
“जीतेगा भई जीतेगा—सीढ़ीवाला जीतेगा…”
“जीतेगा भई जीतेगा—कमलवाला जीतेगा…”
देशभर में लोकतंत्रीय चुनावों का प्रचार जोरों पर है। थैलियाँ खुली हुई हैं। अवसरवादी प्रचारकों की पौ-बारह है। चारों ओर उत्सव और आनन्द का वातावरण छाया हुआ है; परन्तु जनता-जनार्दन हर प्रकार की मार से त्रस्त है।
सन्ध्या-समय बच्चों की एक टोली नारे लगाती हुई गली में से गुजरती है…
“जीतेगा भई जीतेगा—डण्डेवाला जीतेगा…”
“जीतेगा भई जीतेगा—डण्डेवाला जीतेगा…”
टोली जोश-ओ-खरोश के साथ आगे बढ़ रही है…
“लोकतंत्र में कौन बली?”
“डण्डा…भाइयो! केवल डण्डा…”
“हमारा चुनाव-निशान क्या है?”
“डण्डा…” सम्मिलित-स्वर का उद्घोष होता है।


वरदी और वरदी
…घने बीहड़ों में एक नामी डाकू और उसके गिरोह का पीछा करते हुए पुलिस-दल के तीन व्यक्ति उनकी गोलियों का शिकार हो गये। उनमें एक था इंस्पेक्टर, दूसरा सब-इंस्पेक्टर और तीसरा सिपाही। राज्य-सरकार ने इन तीनों को मरणोपरांत पुरस्कार देने की महती घोषणा की। समाचारपत्रों ने इस सरकारी घोषणा को खूब उछाला। पुलिस-दल की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
…अंतत: गणतंत्र-दिवस पर इंस्पेक्टर को 50,000 रुपये, सब-इंस्पेक्टर को 25,000 रुपये और सिपाही को 10,000 रुपये एक भव्य समारोह में उनकी विधवाओं को मुख्यमंत्री महोदय ने प्रदान किये। …समारोह सुख-शांतिपूर्वक सम्पन्न हुआ। मुख्यमंत्री जिस हेलीकॉप्टर से आये थे, पुन: उसी में जाकर घुस गये।
…अगले दिन वित्त-विभाग को हेलीकॉप्टर के भाड़े का मात्र 93,050 रुपये का बिल पास होने के लिए भेजा गया। …इसके अतिरिक्त और भी कई बिल थे जोकि स्थानीय नेताओं और अधिकारियों ने अपने-अपने ‘प्रभाव’ द्वारा व्यापारीवर्ग से लगभग पूरे करवा दिये थे।
पाठको! उपर्युक्त जैसे समारोह तो होते रहते हैं…बिल बनते रहते हैं…बिल पास होते रहते हैं। मूल राशि से अधिक अनाप-शनाप खर्चे होते रहते हैं, परन्तु अहम सवाल यह है कि एक ही अभियान में तीन व्यक्ति शहीद हुए। तीनों के बाल-बच्चे एक-जैसे, समस्याएँ एक जैसी, जान एक जैसी…फिर पुरस्कार की राशियों में अन्तर क्यों?
नि:सन्देह, उनकी वरदियों का कपड़ा एक-जैसा न था।


कुमार नरेन्द्र, संक्षिप्त परिचय:
जन्मतिथि—25 सितम्बर, 1954 को दिल्ली में
शिक्षा—(क) स्नातक, विशेष विषय इतिहास के साथ
(ख) तिब्बती भाषा और साहित्य उपाधिपत्र
(ग) विशारद उपाधिपत्र
लेखन—कहानी, लघुकथा, लेख आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं संकलनों में सम्मिलित
सम्पादित कार्य—(क) एक कदम और(कहानी संकलन, 1976)
(ख) बोलते हाशिए(लघुकथा संकलन, 1981)
(ग) साँझा हाशिया(लघुकथा संकलन, 1991)
(घ) कफ़न(प्रेमचंद की कहानी का प्रौढ़-शिक्षा के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट हेतु रूपांतरण, 2005)
सम्प्रति—पारुल प्रकाशन का संचालन
सम्पर्क—889/58, त्रिनगर, दिल्ली-110035
मोबाइल—09210043838
ई-मेल—prakashanparul@gmail.com

11 comments:

रावेंद्रकुमार रवि said...

कुमार नरेंद्र जी को बहुत-बहुत बधाई!
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ओंठों पर मधु-मुस्कान खिलाती, रंग-रँगीली शुभकामनाएँ!
नए वर्ष की नई सुबह में, महके हृदय तुम्हारा!
संयुक्ताक्षर "श्रृ" सही है या "शृ", मिलत, खिलत, लजियात ... ... .
संपादक : "सरस पायस"

Devi Nangrani said...

Kumar narendra ji ki laghukathayein man ke manthan se upji hai, gahrayi aur geerayi donon mein kho jata hai pathak

Udan Tashtari said...

कुमार नरेन्द्र जी की लघु कथाएँ सोचने को मजबूर करती हैं.बहुत बढ़िया शैली है. आपका आभार इन्हें प्रस्तुत करने का.

रूपसिंह चन्देल said...

प्रिय बलराम

कुमार एक चर्चित लघुकथाकार हैं. प्रारंभ से ही मैं उनकी लघुकथाओं का प्रशंसक रहा हूं लंबे समय के बाद उनकी लघुकथाएं पढ़कर अच्छा लगा.

पढ़वाने के लिए धन्यवाद

चन्देल

निर्मला कपिला said...

कुमार नरेन्द्र जी की सभी लघु कथायें बहुत सार्गर्भित हैं
समाज के आईने मे आदमी की संवेदनायें बहुत अच्छी तरह दिखाई हैं । आपसे एक गुजारिश है कि इतनी अधिक रचनायें एक ही बार मे देना रचना के साथ अन्याय है यहाँ ब्लाग पर कोई भी इतनी लम्बी पोस्ट नहीं पढ्ता मैं दावे से कह सकती हूँ सभी बस कमेन्ट दे कर ही चले जाते हैं। फिर इतनी रचनाओं मे किसी एक को भी इतने कम समय मे याद नहीं रखा जा सकता। ये मेरा अपना विचार है अगर गौर करें। यहाँ सभी पठक सम्र्पित साहितुअकार नहीं आम आदमी भी इन रचनाओं को प[ाढ सके इसके लिये जरूरी है कि पोस्ट छोट्टी हो। सब को कम समय मे पढने की सहुलियत रहे।आपको व परिवार को लोहडी की बहुत बहुत बधाई।

Dr. Sudha Om Dhingra said...

कुमार नरेन्द्र को बहुत दिनों बाद फिर पढ़ा,
एक -एक लघु कथा ने झकझोरा और सोचने पर मजबूर किया..
आभारी हूँ सार्थक अच्छी रचनाएँ पढ़वाने के लिए.

PRAN SHARMA said...

KUMAR NARENDRA KEE DO LAGHU KAHANIYAN VISHESH LAGEE HAIN.
" AMRIT PARV" NIMN MADHYAVARG
KAA YTHAARH CHITRAN HAI.
" AVMOOLYAN " PAISE KAA HEE NAHIN
MAANAV-JEEVAN SE JUDEE KAEE BAATON
KAA BHEE HAI.LEKHAK KEE TEJ-TARRAR LEKHNI KO SALAAM.

प्रदीप कांत said...

गम्भीर और तीखी मार करने वाली लघुकथाएँ। इन्हे प्रस्तुत करके आपने हमेशा की तरह के गम्भीर काम को फिर से सिद्ध किया है।

sunil gajjani said...

behtrin hai laghu kathe, kumar saab ko , dhero salam .. aage bhi umda rachnaye milti rahegi, ye khawashish hai..

महावीर said...

कुमार नरेंद्र जी की लघुकथाएं बहुत अच्छी लगीं. प्रभावशाली शैली में सुन्दर प्रस्तुति.
महावीर शर्मा

सुरेश यादव said...

कुमार नरेन्द्र की लघु कथाएं पठनीय हैं बधाई.बलराम अग्रवाल जी कोइनके. प्रकाशन के लिए धन्यवाद.