Friday 10 July 2009

लघुकथा : कुछ भ्रम कुछ निवारण

इन्द्रप्रस्थ भारतीके जुलाई-दिसम्बर 2008 अंक में (राजकमल प्रकाशन से प्रकाश्य पुस्तकहिन्दी कहानी काइतिहसके एक अंश के रूप में) प्रकाशित डॉ गोपाल राय के लेख के कुछ अंश इस आशय से यहाँ प्रकाशित हैं किपाठक लघुकथा के मद्देनजर कृपया अपनी विस्तृत एवं निर्द्वंद्व राय इन पर प्रेषित करें। बलराम अग्रवाल


उपन्यास और कहानी की भेदक पहचान का एक आधार उनका आकार भी माना जाता है। उपन्यास का आकार ‘बड़ा’ और कहानी का आकार ‘छोटा’ होता है। पर ‘छोटा’ और ‘बड़ा’ शब्द सापेक्ष हैं और उनका कोई निश्चित मापदण्ड नहीं निर्धारित किया जा सकता। ‘छोटी कहानी’ या ‘शॉर्ट स्टोरी’ की एक क्लासिक परिभाषा यह है कि उसे एक बैठक में समाप्त हो जाना चाहिए। एडगर एलन पो के अनुसार कहानी मात्र इतनी लम्बी होनी चाहिए कि वह आधे घण्टे से लेकर दो घण्टे में समाप्त की जा सके। पर ‘एक बैठक’ या ‘आध घण्टे’ से लेकर दो घण्टे में ‘पढ़ जाना’ कहानी के आकार का कोई निश्चित मापदण्ड नहीं हो सकता। कुछ परिभाषाएँ इसकी अधिकतम शब्द संख्या 7500 निर्धारित करती हैं। सामान्य व्यवहार में ‘शॉर्ट स्टोरी’ पद वैसी कथा-रचनाओं को निर्देशित करता है, जिनमें अधिकतम 20000 और न्यूनतम 1000 शब्द हों। एक हजार से कम शब्दों वाली कहानियों को ‘फ्लैश फ़िक्शन’ विधा के अन्तर्गत रखा जाता है और 20000 शब्दों से अधिक आकार वाली कथाओं को ‘नॉवलेट’, ‘नॉवेला’ या ‘नॉवेल’ कहते हैं। यह आकार निर्धारण निर्विवाद हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता। हिन्दी में 150 शब्दों से लेकर 10000 शब्दों तक की कहानियों को ‘कहानी’(‘छोटी कहानी’ के अर्थ में) कहा गया है। इधर हिन्दी मेंलघुकथाऔरलम्बी कहानीपद का भी प्रयोग काफी अराजक रूप में होने लगा है। कहानी लेखकों और संपादकों के अनुसार इनकी आकार सीमा अक्सर बदलती रहती है। इस अराजकता को समाप्त करने के लिए कम से कम एक लचीला मानक तो होना ही चाहिए। इस प्रसंग मेंलघुकथाकी शब्द संख्या 150-300, कहानी की शब्द संख्या 1000-3000 और लम्बी कहानी की शब्द संख्या 4000-15000 प्रस्तावित की जा सकती है।लघुकथा’, ‘कहानी’, ‘लम्बी कहानी’, ‘उपन्यासिका’, ‘लघु उपन्यासऔरउपन्यासके बीच की दूरी इतनी लचीली रखी जा सकती है, जिसके बीच ये विधाएँ, आवश्यक होने पर, आवाजाही कर सकें। आकार की दृष्टि सेलघुकथाकोकहानीके क्षेत्र में, ‘कहानीकोलघुकथाऔरलम्बी कहानीके क्षेत्र में औरलम्बी कहानीकोकहानीके क्षेत्र में प्रवेश करने की थोड़ी-बहुत छूट होनी चाहिए। यहलघुकथा’, ‘कहानीऔरलम्बी कहानीजैसे पदों के प्रयोग में अराजकता दूर करने का एक काम-चलाऊ नुस्खा हो सकता है।
आकार कहानी की पहचान का एक आधार जरूर है, पर स्वतन्त्र विधा के रूप में उसकी पहचान की कसौटी उसके काव्य और संरचना में निहित होती है। इसे समझने के लिए अमेरिका और यूरोप में ‘छोटी कहानी’ की अवधारणा और नयी विधा के रूप में उसके विकास के इतिहास पर उड़न-दृष्टि डाल लेना अपेक्षित है।
जिस समय(1929 के आसपास) रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ के प्रथम संस्करण में ‘छोटी कहानी’ और उसके पर्याय के रूप में ‘कहानी’ और ‘आधुनिक कहानी’ पदों का प्रयोग किया, उस समय तक अमेरिका और यूरोप में ‘छोटी कहानी’ अपने विकास की कई मंजिलें पार कर चुकी थी। हिन्दी में अभी ‘कथा’ तथाकथित ‘छोटी कहानी’ में रूपान्तरित होने की प्रक्रिया से गुजर रही थी। मूल प्रश्न यह है कि ‘छोटी कहानी’ है क्या? वस्तुत: ‘छोटी कहानी’ को किसी बने-बनाए साँचे में ढली हुई परिभाषा में बाँधना सम्भव नहीं है। …
अधिकतर तो कहानी में दो-एक पात्र ही होते हैं; यदि कथ्य की अनिवार्यता के कारण कुछ अधिक पात्र आते भी हैं तो उनकी कोई स्वतन्त्र भूमिका नहीं होती। ‘कहानी’ के केन्द्रीय पात्र का भी पूरा चरित्र कहानी का विषय नहीं बनता; उसके चरित्र का कोई मार्मिक अंश, कोई करारा संकट, कोई अप्रत्याशित स्थिति, कोई मनोवैज्ञानिक द्वन्द्व ही कहानी का विषय बनता है। प्रो सत्यकाम के अनुसार, ‘कहानी’ में यथार्थ की स्थिति बिजली की चमक की तरह होती है, जहाँ यथार्थ का कोई क्षण उद्भासित हो जाता है।…एडगर एलन पो के अनुसार, ‘कहानी’ अपने को किसी लाजवाब या एकल प्रभाव पर केन्द्रित रखती है और प्रभाव की समता ही उसका प्रमुख लक्ष्य होता है। पो का मानना था कि ‘शॉर्ट स्टोरी’ की निश्चित पहचान उसकी प्रभान्विति है।
पो के बाद यूरोप और अमेरिका में कहानी का जो विकास हुआ है, उसे देखते हुए कोई एकल दृश्य, उपकथा, अनुभव, घटना कार्य, किसी पात्र के चरित्र का अंश-विशेष, किसी दिन की कोई मार्मिक घटना, कोई बैठक, कोई वार्तालाप, कोई मन:कल्पना, कोई मनोवैज्ञानिक क्षण…कुछ भी कहानी का विषय बन सकता है। पर अच्छी कहानी के लिए यह आवश्यक है कि उसमें संवेदना का कोई बिन्दु या क्षण ही प्रस्तुत किया जाए। यदि किसी कहानी में ऐसा नहीं होता तो उसके प्रभाव के बिखर जाने की आशंका होती है।

फुट नोट:(यह भी उक्त लेख का ही हिस्सा है)
कथालोचन के लगभग छह पद बहुप्रचलित हैं—उपन्यास, लघु उपन्यास, उपन्यासिका, लम्बी कहानी, कहानी औरलघुकथा। पर अब तक इन पदों का सुनिश्चित अर्थनिर्धारण नहीं हो सका है। आकार और प्रकृति दोनों ही दृष्टियों सेइनका सटीक अर्थनिर्धारण बहुत जरूरी है, क्योंकि इसके बिना आलोचना पतवारहीन हो जाती है। पहले उपन्यासपद को ही लें। अक्सर किसी भी पुस्तक रूप में प्रकाशित एकल कथा को, चाहे वह ‘छोटी’ हो या ‘बड़ी’, ‘उपन्यास’ नाम दे देने का रिवाज हो गया है। व्यावसायिक दृष्टि से यह कदाचित लाभप्रद है, इसलिए प्रकाशक ही नहीं, लेखकभी ‘उपन्यास’ पद का दुरुपयोग करने में नहीं हिचकते। इसका इतिहास भी बहुत पुराना है।…यह प्रवृत्ति आज भीजारी है। …पर इससे पाठक ठगे जाते हैं और आलोचक भटक जाते हैं।
उपन्यास का लघुतम आकार क्या हो, इस पर आज तक कोई एक राय नहीं हो पाई है, और कदाचित हो भी नहींसकती। आकार-निर्धारण का सबसे सही माप शब्द-संख्या हो सकती है, पर शब्द-संख्या कहाँ रखी जाए, इसकानिश्चय करना बहुत कठिन है। ई एम फोर्स्टर ने (उपन्यास के लिए) पचास हजार शब्दों का एक विकल्प दिया था, जिसे स्वीकार कर लेने में कोई कठिनाई नहीं जान पड़ती। इसका यह अर्थ नहीं कि इस शब्द-संख्या का अतिक्रमणहो ही नहीं सकता, पर अतिक्रमण की सीमा एक हजार शब्दों के लगभग रहे तो अच्छा हो। आपवादिक स्थितियों मेंयह(पचास हजार शब्द) संख्या और भी कम हो सकती है,…।
…’लघु उपन्यास’ और ‘उपन्यासिका’ पदों का प्रयोग लगभग एक अर्थ में होता है। यह अनावश्यक औरभ्रमोत्पादक है। …’लघु उपन्यास’ उपन्यास की तुलना में कसा हुआ, सुसंबद्ध और एकल विषय या विजन से जुड़ाहुआ होता है। ‘लघु उपन्यास’ की निम्नतम (शब्द) सीमा 30000 निर्धारित की जा सकती है, यद्यपि इसमें भीनमनीयता के लिए स्थान होगा ही।
‘उपन्यासिका’ के लिए मैं अधिकतम शब्द-सीमा 30000 और निम्नतम शब्द-सीमा 20000 (नमनीयता केसाथ) निर्धारित करने का सुझाव दूँगा। प्रकृति की दृष्टि से ‘लघु उपन्यास’ और ‘उपन्यासिका’ में यह अन्तर कियाजा सकता है कि ‘उपन्यासिका’ की कहानी इकहरी होगी और उसमें काल का आयाम तो होगा, पर दिक् का फैलावप्राय: नहीं होगा। वर्णन-विरलता, पात्रों की सीमित संख्या, विचार और चिन्तन में मितव्ययिता तथा मनोवैज्ञानिकगहराई में प्रवेश करने की प्रवृत्ति इसकी पहचान है।
‘कहानी’ और ‘लम्बी कहानी’ की शिनाख्त करने का भी एक आसान नुस्खा निश्चित किया जा सकता है। आकार कीदृष्टि से ‘लम्बी कहानी’ की अधिकतम शब्द-संख्या 15000 और निम्नतम शब्द-संख्या 4000 के आसपास होसकती है। प्रकृति की दृष्टि से कहानी में कथा दिक् और काल के आयाम के विकास के लिए गुंजाइश नहीं होती। एकअच्छी ‘कहानी’ में संवेदना या तनाव का कोई एक क्षण ही चित्रणीय होता है, यद्यपि उसके इर्द-गिर्द किसी एक पात्रया अधिक-से-अधिक दो-तीन पात्रों के बाह्य और मानसिक कार्यकलाप नियोजित किए जा सकते हैं। ‘लम्बीकहानी’ में संवेदना या तनाव का क्षण विस्तारित हो सकता है, कुछ ज्यादा देर तक चल सकता है। यही चीज उसेकहानी’ से अलग करती है। ‘लम्बी कहानी’ में भी कथा का दिक् और काल में विकास सम्भव नहीं होता। आकारकी दृष्टि से कहानी का विस्तार 1000 से 3000 शब्दों के बीच रखा जा सकता है।
‘लघुकथा’ के जो उदाहरण अब तक उपलब्ध हैं, उनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि उनका आकार प्राय: 150 शब्दोंसे 300 शब्दों के बीच होता है। कदाचित 500 शब्दों तक भी इसकी सीमा जा सकती है। प्रकृति की दृष्टि सेलघुकथा’ में कोई एक प्रसंग होता है, जिसमें विरोधाभास या संवेदना का कोई मार्मिक क्षण व्यंजित होता है।
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1 comment:

Devi nangrani said...

श्याम सुन्दर अग्रवाल की लघुकथाएँ
बेहद मार्मिक, ह्रदय स्पर्शी रही, जिनमें साझा दर्द, आज के समाज की एक सही तस्वीर दिखला जाती है. जाने क्यों इस पीड़ी से उस पीड़ी तक का सफ़र तय करने में पाँव लड़खड़ा जाते हैं.
लघुकथा के माध्यम से कही छोटी छोटी बातें मन को छू लेती है, यही सफल प्रयास की यात्रा है, यही लघुकथा का उद्देश्य भी
देवी नागरानी