Saturday 6 June 2009

लघुकथा-लेखन में राजस्थान का योगदान

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महेन्द्र सिंह महलान
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(मई 2009 से आगे का अंश)
एकल लघुकथा-संग्रह
न 1966 में सुगनचंद्र मुक्तेश का लघुकथा-संग्रह स्वाति बूँद प्रकाशित हुआ। इसकी अधिकांश रचनाएँ उपदेशात्मक हैं। सन 1979 में दुर्गेश की पचास लघुकथाओं का संग्रह कालपात्र प्रकाशित हुआ, जिसका मुख्य-स्वर व्यंग्य है। वर्ष 1963 में प्रकाशित अनमोल सीपियाँ नाम से कृष्णा भटनागर का संग्रह प्रकाशित हुआ जिसकी अधिकांश लघुकथाएँ उपदेशात्मक हैं। 1984 में पुष्पलता कश्यप की 62 चुनिंदा लघुकथाओं का संग्रह अहसासों के बीच प्रकाश में आया। इनकी लघुकथाएँ इस विधा को सही दिशा देने में सक्षम हैं। 1985 में योगेन्द्र दवे की लघुकथाओं का संग्रह विषमता आया तथा इसी वर्ष मुकेश जे रावल का संग्रह मुट्ठी भर आक्रोश भी प्रकाश में आया। अंजना अनिल का लघुकथा-संग्रह साक्षात्कार 1986 में प्रकाशित हुआ। इसके उपरांत डॉ राम कुमार घोटड़ का पहला लघुकथा-संग्रह तिनके-तिनके सन 1989 में व दूसरा लघुकथा-संग्रह क्रमश: वर्ष 2000 में प्रकाशित हुआ। वर्ष 1993 में महेन्द्र सिंह महलान की लघुकथाओं का संग्रह सिलसिला प्रकाशित हुआ जिसमें 69 लघुकथाएँ हैं। आम-आदमी से जुड़ी ये लघुकथाएँ विसंगतियों पर प्रहार करती हैं। वर्ष 1996 में तीन महत्वपूर्ण लघुकथा-संग्रह प्रकाश में आए। ये हैं गोविंद गौड़ का प्रहार, रत्नकुमार साँभरिया का बाँग और अन्य लघुकथाएँ तथा भगीरथ का पेट सबके हैं। 1998 में माधव नागदा का लघुकथा-संग्रह आग प्रकाशित हुआ।
इस तरह राजस्थान के लघुकथाकार लघुकथा-साहित्य को निरन्तर समृद्ध करते आ रहे हैं।
संपादित लघुकथा-संकलन
सन 1974 में भगीरथ व रमेश जैन के संयुक्त संपादन में गुफाओं से मैदान की ओर लघुकथा-संकलन प्रकाश में आया। इसमें 31 कथाकारों की 42 लघुकथाएँ तथा भूमिका लघुकथा:गुफाओं से मैदान की ओर के अलावा लघुकथापरक 5 टिप्पणियाँ भी संकलित हैं। इस संकलन ने लघुकथा को अँधेरे दायरों से निकालकर जन-साधारण के संघर्ष, त्रासदी, भीषण यथार्थ को भोगने की यातनापूर्ण विडम्बना आदि के बहुआयामी धरातल से जोड़ा है। इसमें कैलाश जायसवाल की पुल बोलते हैं एक अनूठी लघुकथा है। गुफाओं से मैदान की ओर को देश में समकालीन हिन्दी लघुकथा-आन्दोलन का पहला संकलन होने का गौरव प्राप्त है।
वर्ष 1983 में आदर्श भारतीय साहित्यकार परिषद, जयपुर द्वारा आयोजित अखिल भरतीय लघुकथा प्रतियोगिता की पुरस्कृत लघुकथाओं का संकलन प्रेरणा(संपादक: नंदकिशोर नंद) प्रकाशित हुआ। इसमें श्रीराम ठाकुर दादा की लघुकथा सुरसा की विजय, कमलेश भारतीय की लघुकथा पूछताछ, रामनिवास मानव की एक ही रास्ता, महेन्द्र सिंह महलान की कटखना भय, विक्रम सोनी की बनैले सुअर तथा मधुकांत की इंटरव्यू श्रेष्ठ रचनाएँ हैं।
सन 1984 में महेन्द्र सिंह महलान और मोहन योगी के संपादन में युवा रचनाकार सोसाइटी, फेफाना द्वारा वर्ष 1981, 1982 व 1983 में आयोजित अखिलभारतीय लघुकथा प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत 31 लघुकथाओं के साथ अन्य श्रेष्ठ रचनाओं को शामिल कर कुल 94 लघुकथाओं का संकलन सबूत-दर-सबूत प्रकाशित हुआ। मानवीय मूल्यों को स्थापित करने की दिशा में इस संग्रह को एक सार्थक प्रयास माना गया। इसमें जेबकतरा, अंधी दौड़, सब राजी-खुशी, प्रश्नहीन, ईद मुबारक, पहचान, भूख, धर्मयुद्ध, पागल, सच्ची गवाही आदि प्रथम श्रेणी की लघुअकथाओं के साथ डॉ पांडुरंग भोपले, पारस दासोत, सतीशराज पुष्करणा, सत्यवीर मानव, मदन मोहन उपेन्द्र, निहाल हाश्मी, शराफत अली खान, बलराम अग्रवाल, विक्रम सोनी, विष्णु प्रभाकर तथा महेन्द्र सिंह महलान की रचनाएँ विशेषत: सराही गईं।
1985 में महेश संतुष्ट, ओम पुरोहित कागद, राजेश चड्ढा, नरेश विद्यार्थी के संपादन में मरुधरा साहित्य परिषद, हनुमानगढ़ संगम का काव्य व लघुकथा-संकलन मरुधरा छपा। इसी वर्ष वकील साहेब(स्नेह इन्द्र गोयल), प्रमोद कुमार शर्मा, संदीप डूमरा गंभीर, गुरमीत सोहल के संपादन में युवा लेखक संघ, हनुमानगढ़ का काव्य एवं लघुकथा-संकलन साहित्य प्रसव प्रकाशित हुआ। नन्दकिशोर नन्द पारीक द्वारा संपादित अंजलिभर धूप में भी कविताएँ और लघुकथाएँ संकलित हैं।
वर्ष 1986 में माधव नागदा के संपादन में पहचान लघुकथा-संकलन संबोधन प्रकाशन, कांकरोली से प्रकाशित हुआ। इसमें संकलित लघुकथाएँ अपने कथ्य एवं शिल्प के ताजेपन के कारण अपनी सशक्त पहचान बनाती हैं। ये लघुकथाएँ मनुष्य के सुखद भविष्य के प्रति तो आश्वस्त करती ही हैं, उन षड्यंत्रों को भी बेनकाब करती हैं जो लगातार आदमी के खिलाफ किए जा रहे हैं। डॉ वेद प्रकाश अमिताभ, कमल चोपड़ा, बलराम अग्रवाल, यश खन्ना नीर और पारस दासोत के महतवपूर्ण लेख इस संग्रह में उपलब्ध हैं।
वर्ष 1987 में पूरे देश में कुल ग्यारह लघुकथा-संकलन प्रकाशित हुए। विद्वान समीक्षकों की राय में इनमें महेन्द्र सिंह महलान व अंजना अनिल द्वारा संपादित संघर्ष के अतिरिक्त कोई अन्य संकलन ऐसा नहीं है, जिसे उल्लेखनीय कहा जा सके। इस दृष्टिकोण से 1987 का वर्ष पूर्णत: राजस्थान के खाते में दर्ज होता है। इस संग्रह की लघुकथाओं में तकनीक को लेकर सजगता का भान स्पष्ट दिखाई देता है। राजकुमार सिंह की कुत्ता पाठ-एक में फैंटेसी का उपयोग हुआ है तो डॉ शंकर पुणतांबेकर की अवैध संतान में प्रतीकात्मकता मुखर है। सुशील राजेश की अलगाव में अभिप्राय को सिर्फ संवादों के माध्यम से कहा गया है। सुकेश साहनी की वापसी में पूर्वदीप्ति का इस्तेमाल सार्थक ढंग से हुआ है। आनन्द बिल्थरे की इनसे कहना में मिथक को आधुनिक रूप दिया गया है। अशोक मिश्र की आँखें में व्यंग्य का प्रभाव रेज़र की छुअन जैसा है। इस प्रकार इस संग्रह की लघुकथाओं में शिल्पगत सुन्दरता एवं वैविध्य पर्याप्त मात्रा में है और ये रचनाएँ पाठकों को वैचारिक खुराक देकर बहुत-से मुद्दों पर सोचने-विचारने की प्रेरणा देने के लिहाज-से बहुत महत्वपूर्ण हैं।
पुस्तक में लघुकथा के सफल एवं चर्चित हस्ताक्षर कमल चोपड़ा से अंजना अनिल द्वारा लिया गया साक्षात्कार है जिसमें लघुकथा पर उठ रहे विभिन्न प्रकार के प्रश्नों के समुचित उत्तर दिए गए हैं। महेन्द्र सिंह महलान ने अपने लेख लघुकथा प्रतियोगिताएँ : दशा एवं दिशा में प्रतियोगिताओं के आयोजन के कारणों पर प्रकाश डालते हुए इस कार्य की विस्तृत समीक्षा की है। भविष्य में प्रतियोगिता आयोजित करने वाले महानुभावों के लिए यह लेख एक मार्गदर्शक का कार्य कर सकता है। मुद्रण, साज-सज्जा व कागज के दृष्टिकोण से यह पुस्तक अत्यंत सुन्दर है। जालंधर दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रम में इसे स्क्रीन पर दिखाया गया। हालातहस्ताक्षर की भाँति यह पुस्तक व्यापक स्तर पर अत्यन्त चर्चित हुई।
मोहन सोनी अनन्त सागर के सम्पादन एवं प्रकाश पंकज के संयोजन में गुलजस्ता रचना मंच, लोढ़सर द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में पुरस्कृत तथा अन्य विशिष्ट लघुकथाओं को लेकर वर्ष 1988 में यथार्थ नामक संकलन आकर्षक साज-सज्जा के साथ छपा। संपादकीय, संयोजकीय एवं निर्णायकीय(विक्रम सोनी व लतीफ घोंघी) की औपचारिकता के बाद प्रतियोगी लघुकथाएँ साभार ली गई हैं। तरुण जैन, डॉ सतीशराज पुष्करणा, डॉ उषा माहेश्वरी, माधव नागदा, सतीश राठी, कर्मेन्द मणि भारतीय तथा धीरेन्द्र शर्मा के लेख हैं जो अपने-अपने स्थान पर उपयोगी हैं। यह पुस्तक युवा संपादकों के परिश्रम की एक सफल कोशिश है।
वर्ष 1989 में व 1990 में मार्च तक देश में कुल 18 संपादित लघुकथा-संकलन प्रकाशित हुए। समीक्षकों की राय में इनमें मात्र 5 ऐसे संकलन थे जो लघुकथा की यात्रा को विकास देते हैं। इनमें महेन्द्र सिंह महलान व अंजना अनिल द्वारा संपादित वर्ष 1989 में प्रकाशित लघुकथा-संकलन मंथन का एक महत्वपूर्ण स्थान है। मुद्रण, साज-सज्जा व कागज के दृष्टिकोण से यह पुस्तक संघर्ष की तरह अत्यंत सुन्दर बन पड़ी है। इसमें एकल लघुकथा-संग्रहों पर देश में पहली बार एक अद्भुत कार्य हुआ है। संग्रह में डॉ सतीशराज पुष्करणा, मधुकांत, कमलेश भारतीय, डॉ किशोर काबरा, पूरन मुद्गल, डॉ सुरेन्द्र मंथन, पुष्कर द्विवेदी, मुकेश जैन पारस, अमरनाथ चौधरी अब्ज, चन्द्रभूषण सिंह चन्द्र, डॉ राजेन्द्र भारती, बृजेन्द्र सिंह वैरागी, अतुल मोहन प्रसाद, पारस दासोत, सिन्हा वीरेन्द्र, डॉ राम निवास मानव, अंजना अनिल, लखन स्वर्णिक, कृष्णा भटनागर, डॉ सतीश दुबे के निजी लघुकथा-संग्रहों की विस्तृत समिक्षाएँ की गई हैं तथा इनकी दो से छह तक चुनिंदा लघुकथाओं को लेकर 89 लघुकथाएँ संकलन में संजोई गई हैं। इसमें महेन्द्र सिंह महलान का एक लेख एकल लघुकथा संग्रह:स्थिति और मूल्यांकन है जो पुस्तक को अतिरिक्त गरिमा प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त अंजना अनिल द्वारा डॉ सतीश दुबे से लिया गया साक्षात्कार है जो लघुकथा को एक दिशा प्रदान करता है। वर्ष 1989 में ही डॉ स्नेह इन्द्र गोयल द्वारा संपादित संकलन दर्पण श्रीगंगानगर से प्रकाशित हुआ।
राजस्थान शिक्षा विभाग सन 1967 से लगातार महत्वपूर्ण संकलन देश के ख्यातिलब्ध साहित्यकारों के संपादन में प्रकाशित कराता आ रहा है। इन संकलनों में साहित्य की अन्य विधाओं के साथ लघुकथाओं को पर्याप्त सम्मान के साथ स्थान दिया जाता रहा है। इसमें राजस्थानी भाषा के संग्रह भी सम्मिलित हैं। शिक्षा विभाग, राजस्थान, बीकानेर का यह देश में पहला और अनूठा प्रयोग है। शिक्षक दिवस, माह सितम्बर में प्रकाशित इन संग्रहों में कुछेक के नाम इस प्रकार हैंप्रयास(सं शिवानी) वर्ष 1980, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे(सं मृणाल पाण्डे) वर्ष 1982, कूँपल(सं कल्याण सिंह शेखावत) वर्ष 1982, हिबरैड़ो उजास(सं श्रीलाल नथमल जोशी) वर्ष 1983, रास्ते अपने-अपने(सं राजेन्द्र अवस्थी) वर्ष 1985, प्रतिभा के पंख(सं क्षेमचन्द्र सुमन, पद्मश्री) वर्ष 1992, सुनो कहानी(सं स्वयं प्रकाश) वर्ष 1993, महकते अक्षरों का आकाश(सं डॉ मदन केवलिया) वर्ष 1995 इत्यादि।
वर्ष 1994 में बलराम के संपादन में थार की धार लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हुआ। इसमें सिंध, गुजरात और राजस्थान की लघुकथाएँ दी गई हैं। संपादकीय में बलराम ने राजस्थान के लघुकथा परिदृश्य पर संक्षिप्त किन्तु सटीक प्रकाश डाला है। इस संग्रह में विजयदान देथा, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र, सांवर दइया, हरदर्शन सहगल, मोहरसिंह यादव, योगेन्द्र दवे, हसन जमाल, भगीरथ, अंजना अनिल, उषा महेश्वरी, मालचंद तिवाड़ी, शकुंतला किरण तथा विभा रश्मि की कई चुनिंदा लघुकथाएँ इसमे संकलित हैं। विश्व लघुकथा कोश के अंतर्गत बलराम द्वारा किए कार्यों में यह पुस्तक काफी महत्वपूर्ण है।(समाप्त)

2 comments:

संदीप said...

लघुकथा पर केंद्रित अच्‍छा ब्‍लॉग है। इसमें प्रसिद्ध लघुकथाएं, लेखकों के परिचय, लघुकथाओं की समीक्षा आदि भी दें। देश ही नहीं दुनियाभर की लघुकथाओं का संकलन करें और यथासंभव सामग्री देने का प्रयास करें।
यदि फासीवाद पर केंद्रित कुछ लघुकथाएं मेरे ब्‍लॉग 'बर्बरता के विरुद्ध' के लिए उपलब्‍ध करा सकें तो आपका आभारी रहूंगा

बलराम अग्रवाल said...

प्रिय भाई, 'जनगाथा' का समर्थन करने के लिए आभार। मैं आपका आदेश शीघ्र पूरा करने का प्रयास करूँगा।