Thursday 27 December 2007

अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में लघुकथा/ बलराम अग्रवाल

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अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में लघुकथा सिर्फ़ लघुकथा नहीं है। उसके कुछ और भी नाम हैं, जैसे- आशुकथा( Sudden Fiction ), अणुकथा ( Micro Fiction* or Micro Story ), पोस्टकार्डकथा ( Postcard Fiction ), हथेलीकथा या पामस्टोरी( Palm Story ),छोटी कहानी अथवा लघुकहानी ( Short short story ) तथा कौंधकथा ( Flash Fiction ) इनमें कौधकथा की शुरुआत १९९२ में प्रकाशित अंग्रेजी लेखकों जेम्स थॉमस, डेनिस थॉमस और टॉम हजूका के कथा-संग्रहों से मानी जाती है। इन लेखकों के अनुसार, ७५० शब्दों के लगभग अथवा आमने-सामने के दो पृष्ठों में जाने वाली कथाकृति को "कौंधकथा" कहा जा सकता है इस दृष्टि से देखें तो अंग्रेजी में १९९२ में शुरू होने वाली "कौंधकथा" कुछेक आंतरिक असमानताओं के बावजूद १९७१ में शुरू होने वाली "हिंदी लघुकथा" की अनुगामी ही है, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह १९८२ में शुरू होने वाली चीनी-लघुकथा कुछेक असमानताओं के बावजूद उसकी अनुगामी सिद्ध होती है।
अंग्रेजी में प्रचलित कौंधकथा के मुख्यत: तीन प्रकार प्रचलित हैं-
. निमिषकथा या ५५वाली ( Nano** Fiction or 55er ) : यह ठीक ५५ शब्दों में कम से कम एक पात्र तत्संबंधी कथानक वाली पूर्ण कथा है
. झीनीकथा (Drabble or 100er ) : शीर्षक के अतिरिक्त ठीक १०० शब्दों की कथा को झीनीकथा कहते हैं।
. ६९वाली ( 69er ) : जैसाकि नाम से ही स्पष्ट है, इसमें शीर्षक के अलावा ठीक ६९ शब्द होते हैं। कनाडा की एक साहित्यिक पत्रिका का यह नियमित स्तम्भ रही है। कथाकार ब्रूस हॉलैंड रोजर्स ने एक ही शीर्षक तले ३६५ ६९वालियाँ लिखी हैं और विषयवस्तु की समानता वाली तीन अलग-अलग शीर्षकों की ६९वालियाँ भी उन्होंने लिखी हैं। अगर शब्द संख्या का बंधन त्याग दें तो हिंदी में "ईश्वर की कहानियाँ"(विष्णु नागर) तथा "शाहआलम कैम्प की रूहें"(असगर वजाहत) जैसी एक ही शीर्षक तले लिखी गई लघुकथाएँ हिंदी में भी उपलब्ध हैं।
कौंधकथा के पैरोकार अपने समर्थन में अर्नेस्ट हेमिंग्वे की मात्र शब्दों वाली इस रचना को प्रस्तुत करते हैं :-
" बिकाऊ हैं, बेबी शूज, अन-पहने "

* माइक्रो(Micro): पदार्थ की सबसे छोटी इकाई के दस लाखवें हिस्से को कहते हैं
**
नैनो (Nano): पदार्थ की सबसे छोटी इकाई के एक अरबवें हिस्से को कहते हैं

संपादक की ओर से-
समकालीन लघुकथा से जुडे दुनियाभर के कलमकारों के सामनेजनगाथाको एक बार पुनः प्रस्तुत करते हुए असीम प्रसन्नता और संतोष का अनुभव हो रहा है। क्योंकि ब्लाग-प्रस्तुति की योजना आनन-फानन में बनी इसलिए इस पहले अंक में कुछ कम रचनाएं जा पा रही हैं। आगामी अंक में निःसंदेह रचनाओं की संख्या तो अधिक होगी ही, तत्संबंधी लेखों के प्रकाशन को भी वरीयता दी जाएगी, इसलिए लघुकथा की समकालीन स्थिति पर नजर रखने वाले समस्त आलोचकों से लेख सादर आमंत्रित हैं।
आने वाला वर्ष आप सब के चिन्तन एवं रचनाशीलता को नए आयाम प्रदान करे, भरपूर सामाजिक साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान करने वाला सिद्ध हो, इन शुभकामनाओं के साथ हीजनगाथाके पुनर्जन्म वाले इस शुभ सत्ताईस दिसम्बर को जन्मे जाने-अनजाने सभी स्नेहियों स्नेहशीलों को जन्मदिन की भरपूर बधाइयों के साथ आइएजनगाथाके साथ पदार्पण करते हैं हिंदी-ब्लाग्स की उस दुनिया में जो साहित्य-प्रस्तुति के माध्यम से सकारात्मकता रचनात्मकता को बचाने में प्राणपण से जुटी हुई है।
अनुरोध-
"जनगाथा" के इस प्रवेशांक पर अपनी प्रतिक्रिया/टिप्पणी दें ताकि इसके अगले अंकों को संजाने-संवारने में मदद मिल सके और इसे और बेहतर बनाया जा सके।

समकालीन लघुकथाएं

रिश्ते
अशोक भाटिया

वह आम सड़क थी और सरूप सिंह आम ड्राइवर था। सवारियों ने सोचा था कि भीड़-भाड़ से बाहर आकर बस तेज हो जाएगी। पर ऐसा नहीं हुआ। सरूप सिंह के हाथ आज सख्त ही नहीं, मुलायम भी थे। भारी ही नहीं, हल्के भी थे। उसका दिल आज बहुत पिघल रहा था। वह कभी बस को, कभी सवारियों को और कभी बाहर पेड़ों को देखने लगता, जैसे वहाँ कुछ खास बात हो। कंडक्टर इस राज को जानता था। लेकिन सवारियाँ धीमी गति से परेशान हो उठीं।
ड्राइवर साहब, जरा तेज चलाओ, आगे भी जाना है...” एक ने तीखेपन से कहा।
सरूप सिंह ने मिठास घोलते हुए कहा, “आज तक मेरी बस का एक्सीडेंट नहीं हुआ।"
इस पर सवारियाँ और उत्तेजित हो गयीं। दो चार ने आगे-पीछे कहा, “इसका मतलब यह नहीं कि बीस-तीस पे ढीचम-ढीचम चलाओ।"
कोशिश करके भी सरूप सिंह बस तेज नहीं कर पा रहा था। उसने बढ़ते हुए शोर में बस रोक दी। अपना छलकता चेहरा घुमाकर बोला, “सच बात यह है कि इस रास्ते से मेरा तीस सालों का रिश्ता है। आज मैं यह आखिरी बार बस चला रहा हूँ। बस के मुकाम पर पहुँचते ही मैं रिटायर हो जाऊँगा, इसलिए..." कहते हुए उसने एक्सीलेटर पर अपने पैर का दबाव बढ़ा दिया।

आधेअधूरे
सुकेश साहनी

आप ही हैं विजय बाबू! नमस्कार! आपके बारे में बहुत कुछ सुना है। मुझे पहचाना नहीं आपने? कमाल है! आप तो भू-जल वैज्ञानिक हैं और पत्र-पत्रिकाओं में गांवों के कुओं और नहरों के बारे में बहुत कुछ लिखा करते हैं। आप शायद मेरे शरीर के आधे संगमरमरी भाग और आधे पीले जर्जर भाग को देखकर भ्रमित हो रहे हैं, अब तो पहचान गए होंगे आप...मैं इस देश के गांव का एक अभागा कुआं हूँ... , अब तो पहचान गए होंगे आप, अब यह मत पूछियेगा कि मेरे गांव, प्रदेश का क्या नाम है? मेरी यह हालत कैसे हुई? सुनना चाहते हैं?... तो सुनिये...

मेरे गांव में भी भारत के दूसरे गांवों की तरह दो किस्म के लोग रहते हैं... ऊँची जाति के और नीची जाति के। मेरा निर्माण नीची जाति वालों ने मिलकर करवाया था।
इसीलिए ऊँची जातिवाले मेरी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते थे, लेकिन इस भंयकर सूखे से स्थिति बिल्कुल बदल गई है। मेरी भू-गर्भीय स्थिति के कारण मेरा पानी कभी नहीं सूखता, जबकि गांव के अन्य सभी कुओं का पानी सूख जाता है।
मेरी यह विशेषता मेरी परेशानी का कारण बन गई। इस भंयकर सूखे की शुरूआत में ही ऊँची जाति वालों के सारे कुएं सूख गए थे और उनको पानी बहुत देर से लाना पड़ता था। तभी जाने कैसे उन लोगों में जागृति की लहर दौड़ गई। उन्होंने मेरे समीप एक सभा आयोजित की। नारा दिया– ‘हम सब एक हैं... छुआछूत ढकोसला है।' मिठाई भी बंटी। उसी दिन से ऊँची जातिवाले भी मुझसे पानी लेने लगे।
तब मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मुझे पूरे गांव की सेवा कर अपार खुशी का अनुभव हो रहा था, पर मेरी यह खुशी भी दो दिन की थी। मैं दो भागों में बंट गया। एक भाग से ऊँची जाति के लोग पानी भरते हैं और दूसरे भाग से नीची जाति के। ऊँची जाति वालों ने मेरे आधे भाग को संगमरमर के पत्थरों से सजा दिया और शेष आधे भाग को ठोकरें मारमार कर जर्जर बना दिया है। मेरा यह भाग लहूलुहान हो गया है और इसीलिए इससे पीली जर्जर ईंटें बाहर झांक रही हैं।
विजय बाबू आप सुन रहे हैं ! मेरी व्यथा का अंत यहीं नहीं है। आजकल मेरे चारों ओर अजीब खौफनाक सन्नाटा रहता है। ऊँची जाति वालों के सामने कोई दूसरा मुझे प्रयोग में नहीं ला सकता। कुछ हरिजन नवयुवकों ने मेरे इस बंटवारे को लेकर आवाज़ें उठानी शुरू कर दी हैं। आप इनकी आवाज़ को ईमानदारी से बुलंद करेंगे?

सब्र
महेश दर्पण

वह सबसे पिछली सीट पर कंडक्टर के साथ बैठा हुआ था। बस रुकने को हुई तो कुछ लोगों के साथ वह भी उठ खड़ा हुआ।
राजधानी में बस जिस तरह रुकती है, ठीक वैसे ही रुकी और लोग एक के बाद एक, एक-दूसरे को धकियाते हुए उतरे लगे।
उतरने की कोशिश में मैंने उसे भी देखा तो हैरान रह गया। कोहनी से ऊपर उसके दोनों हाथ कटे हुए थे। उन पर पट्टी बंधी थी। दाएं कंधे पर थैले की बद्दी टंगी थी। कपड़े के उस थैले से उसके कुछ अस्पताली कागज झांक रहे थे। लुंगी और हवाई चप्पल में अपनी कहानी वह खुद बयान कर रहा था।
जब तक वह एक कदम बढ़ाने को होता, पीछे से अचानक उसे धकियाता हुआ कोई आगे निकल जाता। आखिरकार बस चल दी। उसे रास्ता देने के चक्कर में मैं भी नहीं उतर पाया। आवेश में मेरे मुँह से निकला, ‘‘बड़े शहर के बेहद छोटे लोग हैं ये। इतना भी नहीं हुआ इनसे कि एक मुसीबतज़दा इंसान को पहले उतर लेने देते।"
जाने यह सुन कर क्या हुआ कि उसने एक बार मुड़कर मेरी तरफ देखा और फिर कटे हाथ से एक सीट का सहारा लेते हुए बैठ गया। ऐसे जैसे कुछ खास हुआ ही हो, “कोई बात नईं जी, अगले स्टैंड पे उतर जाऊंगा।"
एक और कस्बा
सुभाष नीरव

देहतोड़ मेहनत के बाद, रात की नद से सुबह जब रहमत मियां की आँख खुली तो उनका मन पूरे मूड में था। छुट्टी का दिन था और कल ही उन्हें पगार मिली थी। सो, आज वे पूरा दिन घर में रहकर आराम फरमाना और परिवार के साथ बैठकर कुछ उम्दा खाना खाना चाहते थे। उन्होंने बेगम को अपनी इस ख्वाहिश से रू--रू करवाया। तय हुआ कि घर में आज गोश्त पकाया जाए। रहमत मियां का मूड अभी बिस्तर छोड़ने का था, लिहाजा गोश्त लाने के लिए अपने बेटे सुक्खन को बाजार भेजना मुनासिब समझा और खुद चादर ओढ़कर फिर लेट गये।
सुक्खन थैला और पैसे लेकर जब बाजार पहुँचा, सुबह के दस बज रहे थे। कस्बे की गलियों-बाजारों में चहल-पहल थी। गोश्त लेकर जब सुक्खन लौट रहा था, उसकी नज़र ऊपर आकाश में तैरती एक कटी पतंग पर पड़ी। पीछे-पीछे, लग्गी और बांस लिये लौंडों की भीड़ शोर मचाती भागती रही थी। ज़मीन की ओर आते-आते पतंग ठीक सुक्खन के सिर के ऊपर चक्कर काटने लगी। उसने उछलकर उसे पकड़ने की कोशिश की, पर नाकामयाब रहा। देखते ही देखते, पतंग आगे बढ़ गयी और कलाबाजियाँ खाती हुई मंदिर की बाहरी दीवार पर जा अटकी। सुक्खन दीवार के बहुत नज़दीक था। उसने हाथ में पकड़ा थैला वह सीढि़यों पर पटका और फुर्ती से दीवार पर चढ़ गया। पतंग की डोर हाथ में आते ही जाने कहाँ से उसमें गज़ब की फुर्ती आयी कि वह लौंडों की भीड़ को चीरता हुआ-सा बहुत दूर निकल गया, चेहरे पर विजय-भाव लिये !
काफी देर बाद, जब उसे अपने थैले का ख़याल आया तो वह मंदिर की ओर भागा। वहाँ पर कुहराम मचा था। लोगों की भीड़ लगी थी। पंडित जी चीख-चिल्ला रहे थे। गोश्त की बोटियाँ मंदिर की सीढ़ियों पर बिखरी पड़ी थ। उन्हें हथियाने के लिए आसपास के आवारा कुत्ते अपनी-अपनी ताकत के अनुरूप एक-दूसरे से उलझ रहे थे।
सुक्खन आगे बढ़ने की हिम्मत कर सका। घर लौटने पर गोश्त का यह हश्र हुआ जानकर यकीकन उसे मार पड़ती। लेकिन वहाँ खड़े रहने का खौफ भी उसे भीतर तक थर्रा गयाकहीं किसी ने उसे गोश्त का थैला मंदिर की सीढि़यों पर पटकते देख लिया हो ! सुक्खन ने घर में ही पनाह लेना बेहतर समझा। गलियों-बाजारों में से होता हुआ जब वह अपने घर की ओर तेजी से बढ़ रहा था, उसने देखा हर तरफ अफरा-तफरी सी मची थी, दुकानों के शटर फटाफट गिरने लगे थे, लोग-बाग इस तरह भाग रहे थे मानो कस्बे में कोई खूंखार दैत्य घुस आया हो!
वस्तुस्थिति
रूपसिंह चन्देल

घर पहुँचकर मोहनी ने जैसे ही दरवाजा खोला, रघु से उसका सामना हो गया। कुर्सी पर पसरा रघु उसे कुछ अधिक ही गंभीर दिख रहा था। वह रघु की ओर देखे बिना पर्दा उठाकर जैसे ही अन्दर जाने लगी कि उसे रघु की आवाज़ सुनाई पड़ी, “इतनी देर तक कहाँ रही?”
रास्ते में बस खराब हो गयी थी।" रुककर उसने जवाब दिया।
झूठ बोलते शर्म नहीं आती?”
इसमें झूठ क्या है?”
यह क्यों नहीं कहती कि आज फिर गौतम के साथ... मैंने अपनी आँखों से तुम्हें उसके स्कूटर से उतरते देखा था... मेरे रोकने के बावजूद...आखिर तुम चाहती क्या हो?”
मैं क्या चाहती हूँ, यह आज तक आप नहीं समझ पाये इन तीन वर्षों में।" मुड़कर वह बोली। उसका चेहरा तमतमा रहा था।
यह मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं है। आज वस्तुस्थिति स्पष्ट किए बिना तुम अन्दर नहीं जा सकती।" रघु दहाड़ा।
ओह... यह बात है... तो सुनो।" व्यंग्यात्मकता के साथ वह बोली, “आपको मुझसे जो कुछ चाहिए था, वह आपको हर महीने की आखिरी तारीख को मेरे वेतन के रूप में मिल जाता है...आपने मुझसे नहीं, मेरी नौकरी से शादी की थी... क्या यह सच नहीं है?... लेकिन जो कुछ मुझे आपसे मिलना चाहिए था, वह कितना दे सकें हैं आप?... फिर यह ईर्ष्या, यह जलन क्यों?”
उसने रघु के चेहरे पर दृष्टि डाली। उसका चेहरा सफेद पड़ा हुआ था। रघु की प्रतिक्रिया जानने की प्रतीक्षा किए बिना ही पर्दा उठाकर वह अन्दर चली गयी।
उस रात की बात
बलराम अग्रवाल

"कभी सोचा नहीं था ऐसे दिनों के बारे में..." चारपाई पर लेटे बेरोज़गार पोते के सिर को सहलाते हुए दादी बुदबुदाई।
पोता आँखें मूँदे पड़ा रहा, कुछ बोला।
"उस रात परधानमन्तरी ने घोसना करी थी हमारा पहला काम नौजवानों को रोजगार दिलाना होगा।" दादी कुछ याद करती हुई-सी बोली, "ये सुनना था पूरा का पूरा देस तालियों की गड़गड़ाहट से भर उठा।"
"पूरे देश ने तो वह बात सुनी भी नहीं होगी दादी।" पोते ने आँखे मूँदे-मूँदे ही तर्क किया।
"ताली बजाने के लिए बात सुनने के लिए बात सुनने की क्या जरूरत है?" दादी बोली, "हमारे देस में ताली की एक आवाज कान में पड़ी नहीं दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवाँ.....हर आदमी खुद--खुद तालियाँ बजा उठता है। बन्दा सोचता ही नहीं है वो ताली आखिर बजा क्यों रहा है!"
"अच्छा,....फ़िर?" पोते ने आगे की बात जानने की गरज से पूछा।
"फिर क्या, उनके तो जैसे फार्मूला ही हाथ लग गया सोने की कोठरी में बने रहने का।" दादी बोली," इधर तालियों की गड़गड़ाहट ढीली महसूस की, उधर अगले चुनाव की तैयारियाँ शुरू। नए सिरे से घोसनाएँ और नए सिरे से तालियाँचलन ही बन गया मरा...!"
"क्या कहती हो?" इस बात को सुनकर पोता रोमांचित होकर सीधा बैठ गया।
"पहले चुनाव से यह खेल देख रही हूँ बेटा।" दादी हताश आवाज में बोली, "बैठ क्यों गया?"
"यानी कि…" पोता पुन: लेटता हुआ बोला, "अफीम सिर्फ़ धार्मिक ही नहीं चटाते...!"
"क्या बोला?" उसकी बात के मर्म से अनजान दादी ने पूछा।
"रात बहुत घिर आई है, तुम अब आराम करो..." अपने सिर पर से उतारकर दादी के हाथ को दोनों हाथों में दबाकर वह बोला, "सोना मुझे भी चाहिए..."

ऊँचाई
रामेश्वर काम्बोजहिमांशु

पिताजी के अचानक धमकने से पत्नी तमतमा उठी, “लगता है, बूढ़े को पैसों की ज़रूरत पड़ी है, वर्ना यहाँ कौन आनेवाला था! अपने पेट का गड्ढ़ा भरता नहीं, घरवालों का कहाँ से भरोगे?” मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखने लगा। पिताजी नल पर हाथ-मुँह धोकर सफ़र की थकान दूर कर रहे थे। इस बार मेरा हा्थ कुछ ज्यादा ही तंग हो गया। बड़े बेटे का जूता मुँह बा चुका है। वह स्कूल जाते वक्त रोज भुनभुनाता है। पत्नी के इलाज के लिए पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं। बाबूजी को भी अभी आना था।
घर में बोझिल चुप्पी पसरी हुई थी। खाना खा चुकने पर पिताजी ने मुझे पास बैठने का इशारा किया। मैं शंकित था कि कोई आर्थिक समस्या लेकर आये होंगे। पिताजी कुर्सी पर उकड़ू बैठ गए। एकदम बेफिक्र।सुनोकहकर उन्होंने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। मैं सांस रोकर उनके मुँह की ओर देखने लगा। रोम-रोम कान बनकर अगला वाक्य सुनने के लिए चौकन्ना था।
वे बोले, “खेती के काम में घड़ी भर भी फुर्सत नहीं मिलती। इस बखत काम का जोर है। रात की गाड़ी से वापस जाऊँगा। तीन महीने से तुम्हारी कोई चिट्ठी तक नहीं मिली। जब तुम परेशान होते हो, तभी ऐसा करते हो।"
उन्होंने जेब से सौ-सौ के दस नोट निकालकर मेरी तरफ बढ़ा दिए, “रख लो। तुम्हारे काम आएंगे। धान की फसल अच्छी हो गई थी। घर में कोई दिक्कत नहीं है। तुम बहुत कमजोर लग रहे हो। ढंग से खाया-पिया करो। बहू का भी ध्यान रखो।"
मैं कुछ नहीं बाल पाया। शब्द जैसे मेरे हलक में फंसकर रह गये हों। मैं कुछ कहता इससे पूर्व ही पिताजी ने प्यार से डांटा, “ले लो। बहुत बड़े हो गये हो क्या?”
नहीं तो।" मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने नोट मेरी हथेली पर रख दिए। बरसों पहले पिताजी मुझे स्कूल भेजने के लिए इसी तरह हथेली पर अठन्नी टिका देते थे, पर तब मेरी नज़रें आज की तरह झुकी नहीं होती थीं।

10 comments:

सुभाष नीरव said...

भाई बलराम, यह तुमने अच्छा काम किया। बहुत सुन्दर! बधाई हो। उम्मीद है, यह लघुकथा की यात्रा में अपनी सकारात्मक भूमिका निभायेगा। इसे हर हाल में जारी रखो।

रूपसिंह चन्देल said...

Priya Balram,

Jangatha ke liye badhai. Bhubsurat ank hai. Sabhi laghu kahaniyan achhi hain.

Yaar inhe lughu katha n kahkar lughu kahaniyan kyon nahi kahate ? Iske spashtikaran ke liye meri blog magazine ka aagami ank dekhna.

Punah badhai.

Chandel

Anonymous said...

बहुत सुन्दर ब्लाग है। ब्लाग पर भी अच्छा साहित्य पढ़ने को मिल सकता है, यह देखकर खुशी होती है।

मीनाक्षी said...

आपने सात सितारों जैसी सात कथाओं से अपने ब्लॉग को सजा लिया.. हर कहानी अपने आप में पूर्ण. सजीव चित्र आँखों के सामने आ जाता है.
आशा है नए वर्ष में नए नए विषयों पर पढने का मौका मिलेगा.
नए वर्ष की शुभकामनाएँ

अविनाश वाचस्पति said...

कथा की विभिन्न किस्म देख कर मन में भर गया जोश
लिखने की कोशिश खूब करी लिख न पाया उड़ गए होश
एक से उम्दा एक गाथा प्रत्येक जिनकी गिनती बने ठोस
संबंधों के विरूद्ध मन ने महसूस किया बाहर निकला रोष

अविनाश वाचस्पति said...

जनगाथा बने मनगाथा
लघुकथा लगाए ठहाका
हर पन्ना महका महका
दीप दिलों का चहका चहका
चले निरंतर न उठे कोई सवाल
चला रहे हैं इसे बलराम अग्रवाल

प्रदीप मिश्र said...

लघुकथा को इतनी समर्थता के साथ एक साथ देखने का अवसर मिला - बधाई। इसे यूँ ही जमाए रखें भविष्य में लघुकथाएँ कथा की सबसे लोकप्रिय स्वरूप होंगी।

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

बलरामजी, आप हिन्दी में लघुकथा विचार के संस्थापक हैं. बकिया बात तो बहस की है.
अगर आप चाहें तो हिन्दी में लघुकथा की बात फंसाई जा सकती है. पहले आपको यह साफ करना होगा कि दोस्तोयवस्की या गोर्की की लम्बी कहानियां भी किसी ज़माने में short stories कही जाती थीं; उपन्यास नहीं./ और आज हिन्दी के कितने ऐसे लेखक हैं जो शार्ट स्टोरीज को उपन्यास की शक्ल में छपा चुके हैं. तब लघुकथा का यह मूल विचार ही हिन्दी में खतरे में पड़ा दिखाई देता है.

बलराम अग्रवाल said...

priya bhai,
ham 'bat ko phsane' me nahi, banane me yakin karte hai. 'short story' ka istemal hindi-kshetr me 'kahani' ke arth me hota hai, 'laghukatha' ke arth me nahi, bilkul vaise jaise 'lambi kahani' ko kahi bhi 'upnyas' nahi kaha jata. kuchh videshi sites 'laghukatha' ke liye 'short short story' ya 'flash fiction' shabdo ko istemal karane lage hai. ise vistar se aap 'jangatha' ke December 2007 ank me dekh-padh sakate hai.

Kanta Roy said...

आज मैने यहाँ लघुकथाओं को पढते हुए स्वंय को समृद्ध पाया । अनुपम कथाओं का संयोजन है यहाँ । आभार आप सभी को उपलब्धता को सहज बनाने हेतु । सादर