Monday, 17 October 2011

‘सरस्वती सुमन’ व ‘सादर इंडिया’ के लघुकथा विशेषांक, लघुकथा संग्रह ‘परिवर्तन’ तथा संकलन ‘विगत दशक की पंजाबी लघुकथाएँ’

पत्रिका:सरस्वती सुमन(लघुकथा विशेषांक, सितम्बर 2011), संपादक:कुँवर विक्रमादित्य सिंह, अतिथि संपादक:कृष्ण कुमार यादव, पत्राचार कार्यालय : सारस्वतम्, 1-छिब्बर मार्ग(आर्यनगर), देहरादून-248001(उत्तराखंड)  अंक पर मूल्य अंकित नहीं है।

सरस्वती सुमन के प्रस्तुत लघुकथा विशेषांक में अतिथि संपादक की कलम से… लिखा गया है कि—‘इस अंक हेतु कुल 482 लोगों ने लघुकथाएँ/लेख भिजवाए, पर सभी को शामिल करना हमारे लिए संभव भी न था। इस स्नेह और विश्वास के लिए उन सभी का आभार अवश्य व्यक्त करना चाहूँगा। फिलहाल, 126 लघुकथाओं और 10 सारगर्भित लेखों को समेटे इस अंक में स्थापित एवं नवोदित लघुकथाकारों दोनों को समान रूप से स्थान दिया गया है, आखिर आज के नवोदित ही तो कल के स्थापित होंगे।
तथ्य यह है कि अंक में 126 लघुकथाएँ नहीं, लघुकथाकार(न कि लघु-कथाकार) सम्मिलित हैं और लघुकथाओं की कुल संख्या है276। जब संपादकीय के प्रूफ का यह हाल है तो अंदर की सामग्री के प्रूफ का हाल बताने की आवश्यकता नहीं रह जाती है।
रचनाकारों को उनके नामों के अनुरूप अकारादि क्रम में स्थान दिया गया है। रचना की स्तरीयता और रचनाकार की वरिष्टतादोनों के दम्भ से बचने का संपादक के पास यह सरलतम अस्त्र है।
रचनाओं और रचनाकारों की गणनात्मक प्रस्तुति के कारण ही नहीं बृहद आकार और ध्यानाकर्षक वज़न के कारण भी इस अंक को लघुकथा महाविशेषांक की संज्ञा दी जा सकती है।
विशेषांक के आवरण पर कलासिद्ध संदीप राशिनकर की कृति का उपयोग किया है। क्या ही अच्छा होता कि उनसे पर्यावरण की बजाय लघुकथा की थीम पर ही चित्र बनवाया जाता।


Tuesday, 9 August 2011

चार कश्मीरी लघुकथाएँ

-->दोस्तो, अपरिहार्य कारणों से जनगाथा के मई, जून व जुलाई 2011 अंक पोस्ट नहीं किये जा सके। कारण दिनांक 7 अगस्त, 2011 को पोस्ट अपने ब्लॉग अपना दौर(http://apnadaur.blogspot.com) में व्यक्त कर चुका हूँ अत: यहाँ भी उसे दोहराने का औचित्य नहीं है। इस बीच कुछ पत्रिकाओं के लघुकथा विशेषांक तथा कुछ कथाकारों के लघुकथा संग्रह भी प्राप्त हुए हैं। संबंधित संपादकों व लेखकों से क्षमाप्रार्थी हूँ कि उन पत्रिकाओं-संग्रहों पर अभी तक मैं कुछ नहीं लिख सका। दरअसल, मैं उन्हें पढ़ने का समय न निकाल सका।
आज अपने प्रिय दोस्त डॉ॰ भ॰ प्र॰ निदारिया से मिलने नई दिल्ली के रामाकृष्णापुरम गया था। बाइत्तेफाक़ लंच के समय पहुँचा और वे अपनी सीट पर नहीं मिले। कुछ समय उनके कार्यालय में पड़ी कुर्सियों में से एक में बैठकर इंतजार किया तत्पश्चात बाहर निकल आया। घूमता-घामता पुरानी किताबों की एक दुकान पर जा पहुँचा। वहाँ मेरी नजर भाई जसबीर चावला का लघुकथा संग्रह आतंकवादी(2006), कृष्ण लता यादव  का लघुकथा संग्रह भोर होने तक(2005), युगल के लघुकथा संग्रह गर्म रेत तथा फूलों वाली दूब पर पड़ी। इनमें से प्रथम दो को मैं खरीद लाया, शेष दो मेरे पास पहले से थे। तभी मुझे कश्मीरी की प्रतिनिधि कहानियाँ(सं॰ शिब्बनकृष्ण रैना, संस्करण 1990) भी दिखाई पड़ी। पन्ने पलटे तो उसमें कुछ लघुकथाएँ भी संकलित मिलीं। 45 रुपये छपे मूल्य वाली उस पुस्तक को मैं 25 रुपये देकर खरीद लाया, केवल उन कश्मीरी लघुकथाओं को आप तक पहुँचाने की खातिर। बहुत संभव है कि इन सबको या इनमें से कुछ को किन्हीं सज्जन ने पहले भी कहीं पढ़ रखा हो, लेकिन मेरा साक्षात्कार इनसे पहली बार हुआ है इसलिए इन्हें जनगाथा के माध्यम से आपके समक्ष प्रस्तुत करने का लोभ संवरण कर नहीं पा रहा हूँ। ये लघुकथाएँ जिनसे मिलने जाने के कारण मिल पाई हैं, जनगाथा का यह अंक उन डॉ॰ निदारिया को ही समर्पित है। प्रस्तुत हैं कश्मीरी भाषा की 4 लघुकथाएँ

॥1॥ राम का नाम/ हरिकृष्ण कौल
                                                  फोटो: आदित्य अग्रवाल
      इन्जेक्शन लग जाने पर उसकी पीड़ा कुछ कम हुई और उसने दाएँ-बाएँ नजर डाली। सभी के चेहरे लटक गये थे।
      पति ने उसके सिर पर हाथ फेरकर कहा—“अब तू भगवान की स्मरण कर, राम का नाम ले।
      पत्नी बिलख पड़ी—“लगता है डॉक्टर ने जवाब दे दिया है। तुम सब शायद मेरे मरने की प्रतीक्षा कर रहे हो।
      पाँच मिनट के लिए मान लो वही बात है। एक-न-एक दिन मरना तो सबको है। और फिर, तुमने अपनी सारी जिम्मेदारियाँ भी तो पूरी कर ली हैं। तुम्हें तो भगवद्भजन से अपार आनन्द मिलता था। याद है, रोज़ दो घण्टे तक कीर्तन-भजन किया करती थीं।
      राम का नाम मैं नहीं लूँगी। मैं मरना नहीं चाहती। और वह सिर पटकने लगी।

Wednesday, 27 April 2011

कालीचरण प्रेमी की तीन लघुकथाएँ

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॥1॥ पैदाइशी दीवार
फोटो:आदित्य अग्रवाल
ठाकुर साहब के घर औरतों का जमघट था।  ढोलकी की थाप पर लोकगीत गूँज रहे थे। ठाकुर साहब के घर में पहली बार लड़का पैदा हुआ था। अत: हर तरफ हर्षोल्लास का आलम था। पास ही से गुजरती गंगादेई ने यह-सब देखा तो चौखट के अन्दर धँसते हुए पूछा—“अरी चमेली! क्या हुआ है री ठकुराइन को?
फोटो:आदित्य अग्रवाल
अरी कुँअर साहब आए हैं, चमेली खिलकर बोली,बोत सोणी सकल-सूरत है…बिल्कुल ठाकुर साहब पर गए हैं…सपूत हैं एकदम सपूत…
सहसा गंगादेई को ध्यान आया।
अरी, और कुछ सुना है…हरिया चमार की बहू के छोरा पैदा हुआ है या छोरी?
होता क्या, कलुआ हुआ है, हाथ नचाते हुए चमेली बोली,उस करमजले के मारे हरिया फूला फिर रहा है।
अब वे दोनों नाक सिकोड़ने लगी थीं।     
(रूपसिंह चन्देल द्वारा संपादित लघुकथा-संकलन प्रकारांतर(1991) से)

'प्रेमी' हृदय ही बने रहे ‘काली’चरण नहीं बन पाए वह/बलराम अग्रवाल

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मौत को धता बताते हुए कैंसर वार्ड में भी लिखते-पढ़ते रहे प्रेमी जी
फोटो:बलराम अग्रवाल
15 जुलाई, 1962 को गाजियाबाद(उ॰प्र॰) के गाँव मोरटा के एक निर्धन दलित परिवार में जन्मे कालीचरण ने बेरोजगारी के दिनों में, सम्भवत: बी॰ए॰ पास करने के तुरन्त बाद सन् 1978 में क्रेडिट एंड थ्रिफ्ट किस्म की किसी प्राइवेट कम्पनी में ज्वाइन कर लिया था। उक्त कम्पनी ने उन्हें अपने बुलन्दशहर कार्यालय का प्रभारी बनाया। वस्तुत: तो कार्यालय नामधारी छोटी-सी वह अंधेरी कोठरी ही उनकी शरणस्थली भी थी। सिवा इस तसल्ली के कि वह नौकरी पा गये थे, कोई अन्य सुख बुलन्दशहर में रहते हुए उन्हें नहीं था। यह नौकरी उन्हें कुछ ही माह खपा पाई, बहुत जल्द छूट गई। स्वभाव से कालीचरण अपने अन्तस तक मृदुल थे और सम्भवत: इसी कारण अपना उपनाम उन्होंने प्रेमी चुना जो उनकी प्रकृति से शतश: मेल खाता था। मैं उन दिनों प्रधान डाकघर, बुलन्दशहर में कार्यरत था। कालीचरण ने किसी दिन शायद वहीं पर मुझसे भेंट की और अपना परिचय दिया। मुझे लगता है कि उन्हीं दिनों उन्होंने लघुकथाएँ लिखना भी प्रारम्भ कर दिया था। ऐसा मैं इसलिए कह सकता हूँ कि उनकी एक प्रारम्भिक लघुकथा पर मैंने भीष्म साहनी की एक कहानी मेड इन इटली की छाया महसूस की थी। मेरे यह बताने का मन्तव्य न समझकर जगदीश कश्यप ने मिनीयुग के किसी अंक में उनका जिक्र इसी आधार पर चोर लेखक के रूप में कर दिया था। बाद में, बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि यह किस्सा बी॰ ए॰ की कक्षा लेते हुए उनके अध्यापक डॉ॰ कुँअर बेचैन ने किसी दिन सुनाया था जिसे उन्होंने लघुकथा का रूप देकर एक पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेज दिया, उन्हें इस किस्से की वास्तविकता का पता नहीं था। कालीचरण प्रेमी की स्पष्टवादिता और स्वीकारोक्ति का यह एक ही प्रसंग नहीं है, अनेक अन्य भी हैं।

Monday, 21 March 2011

लघुकथा में समसामयिक चिंतन को आयाम देते संग्रह व संकलन

दोस्तो, पश्चिम बंगाल के सलुवा जिले से प्रकाशित होने वाले हिंदी मासिक पत्र नई दिशा ने मार्च 2011 के अंक67 को अपने पहले लघुकथा-अंक के रूप में प्रकाशित किया है। साप्ताहिक आकार के 12 पृष्ठीय इस पत्र में देशभर के 25 कथाकारों की 30 लघुकथाएँ और लघुकथा:इतिहास के झरोखे से शीर्षक एक लेख को स्थान दिया गया है। लघुकथाओं में बेचैनी(हीरालाल मिश्र), अमानुषता(विकास रोहिल्ला प्रीत), सुसमाचार(माला वर्मा), तूतारी(मुरलीधर वैष्णव), कोख का जाया, सम्बन्ध(डॉ॰ सुधाकर आशावादी), रसीद(प्रभात दुबे), जिंदा मछली(डॉ॰ पंकज साहा), झूठी हँसी(महेन्द्र महतो), चिरंजीवी(खदीजा खान), हाजिरी(अनिल शर्मा अनिल’), हाड़-मांस की सीढ़ी(आनंद बिल्थरे) को उल्लेखनीय  माना जा सकता है।

Monday, 28 February 2011

सुनील गज्जाणी की चार लघुकथाएँ

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॥1॥ यथार्थ
'' माँ! कितना अच्छा होता कि हम भी धनी होते। हमारे भी यूँ ही नौकर-चाकर होते। ऐशो-आराम होता।''
'' सब किस्मत की बात है। चल फटाफट बर्तन साफ़ कर। और भी बहुत-सा काम अभी करने को पड़ा है! ''
'' माँ ! इस घर की सेठानी थुलथुली कितनी है!  और बहुओं  को देखोहर समय बनी-ठनी घूमती रहती हैं। पतला रहने के लिए कसरतें करती हैं…!! भला घर की साफ-सफाई करें,  रसोई का काम करें, बर्तन-भाँड़े माँझे, रगड़-रगड़ कर कपड़े धोयें तो कसरत करने की ज़रूरत ही ना पड़े… है ना माँ ?
''बात तो तेरी ठीक है बेटी।  लेकिन, हमें भूखों मरना पड़ जाएगा बस।"

॥2॥ रोग
''साहब! मैंने ऐसा क्या कर दिया जो आपने मुझे बर्खास्त कर दिया?''  साहब के कमरे में जाकर वृद्ध चपरासी ने परेशान स्वर में पूछा।
"तुमने कर्तव्य-पालन को रोग बना लिया है न रामदीन, इसलिए।''  अधिकारी बोला।
'' कर्तव्य-पालन को रोग…? साहब! मैं समझा नहीं!''
'' देखो रामदीन! ना तुम कई दिनों से भीगकर ख़राब हो रहे ऑफिस-फर्नीचर को बारिश से बचाकर सुरक्षित जगह पर रखते और ना ही नया फर्नीचर खरीदने की सरकारी-स्वीकृति निरस्त होती। अधिकारी ने शान्त-स्वर में कहा और अपने काम में लगा रहा।

॥3॥ नई कास्‍टयूम
सभागार में मौजूद भीड़ में बेहद उत्‍सुकता थी। भीड़ में चर्चा का विषय थाचर्चित फैशन डिजाइनर की आज नई फीमेल कास्‍टयूम का प्रर्दशन होना। हाई सोसायटी वाली महिलाएँ अपने बदन-दिखाऊ भड़कीले कपड़े पहने ज्‍यादा उत्‍साहित थीं। कुछ समय पश्चात् अपनी नई डिजाइन्ड कास्‍टयूम पहनाई महिला मॉडल के साथ कैटवॉक करता डिजाइनर मंच पर आ गया। पूरा सभागार भौंचक रह गया। तालियाँ आघी-अधूरी बजकर रह गईं। कैमरों की फ्‍लैशें एक बारगी थम-सी गईं। सभागार में कानाफूसियाँ होने लगीं। ये क्‍या नई कास्‍टयूम है, ऐसी क्‍या हमारी सोसायटी में पहनते है, क्‍या इसकी बुद्धि सठिया गई है? पब पार्टियों में क्‍या ये कास्‍टयूम पहनकर जाएँगे हम लोग? वे महिलाएं आपस में बड़बड़ाती हुई सभागार से बाहर निकलने लगीं।
पारम्‍परिक कॉस्‍ट्‌यूमसलवार सूट पहने, चुन्‍नी से माथा ढके, नजरें नीची किए मॉडल के साथ डिजाइनर अभिवादन मुद्रा में गेट पर खड़ा था।

॥4॥ चुनाव

गृहमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में एक कुख्‍यात अपराधी-गुट और पुलिस-दल के बीच जबरदस्‍त गोलीबारी हुई। इस गोलीबारी में गुट के कुछ साथियों के साथ गुट का सरगना व कुछ पुलिसवाले भी मारे गए। टी.वी. पर खबर देख गृहमन्‍त्री बेहद व्‍यथित हो गए, खाना बीच में छोड़ दिया।

‘‘क्‍या हुआ अचानक आपको, जो निवाला भी छोड़ दिया? राज्‍य में आज से पहले भी ऐसी कई बार घटनाएँ हुई हैं, जिन्हें कभी आपने इतने मन से नहीं लिया।''  पत्‍नी बोली।
‘‘ऐसी घटना भी तो मेरे साथ पहली बार हुई है।''
‘‘मैं समझी नहीं।''
‘‘जो सरगना मरा है, उसी के दम पे तो अब तक मैं चुनाव जीतता आया हूँ।''  गृहमन्‍त्री जी हाथ धोते बोले।
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Friday, 28 January 2011

भारत व मॉरीशस का हिंदी लघुकथा संसार


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दोस्तो! गत दिनों तीन लघुकथा संग्रह—'घाव करे गम्भीर'(कथाकार : राज हीरामन), 'बूँद से समुद्र तक'(कथाकर : सतीश दुबे) तथा 'मेरी मानवेतर लघुकथाएँ'(कथाकार : पारस दासोत) व एक आलोचना पुस्तक 'भारत का हिंदी लघुकथा संसार('संपादक : डॉ॰ रामकुमार घोटड़) प्राप्त हुई है। प्रस्तुत है चारों पुस्तकों का संक्षिप्त परिचय व लघुकथाएँ

॥1॥ भारत का हिंदी लघुकथा संसार(संस्करण : 2011)
डॉ॰ रामकुमार घोटड़ द्वारा संपादित भारत का हिंदी लघुकथा संसार को शोधोपयोगी पुस्तक कहा जा सकता है। इसमें कुल 16 लेख हैं जो भारत के राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, हिमाचलप्रदेश, पंजाब, गुजरात तथा महाराष्ट्र में प्रारम्भ से लेकर आज तक हुए हिंदी लघुकथा लेखन, शोध, आलोचना, प्रकाशन, सम्मेलन, मंचन आदि समस्त कार्यों व गतिविधियों का लेखा प्रस्तुत करते हैं। नि:संदेह इन लेखों को डॉ॰ रामकुमार घोटड़, सतीशराज पुष्करणा, रामयतन यादव, मालती बसंत, प्रो॰ रूप देवगुण, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, हरनाम शर्मा, डॉ॰ राजेन्द्र सोनी, डॉ॰ अमरनाथ चौधरी अब्ज़, रतनचन्द रत्नेश, श्याम सुन्दर अग्रवाल, प्रो॰ मुकेश रावल ने परिश्रमपूर्वक लिखा है। हिंदी लघुकथा पर शोध करने वालों के लिए जहाँ यह अनेक तथ्य प्रदान करने वाली उपयोगी पुस्तक है, वहीं इसमें वर्णित कुछ तथ्य शोध की माँग करते-से लगते हैं। डॉ॰ घोटड़ ने लघुकथा शब्द-मात्र को ही लघुकथा मानकर अपने लेख भारतीय हिन्दी लघुकथा साहित्य में शोधकार्य के अन्तर्गत कुछ उन शोधों को भी गिना दिया लगता है जिनमें लघुकथा शब्द से तात्पर्य सम्भवत: कहानी है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि केन्द्र व अनेक राज्यों के हिंदी अनुवादक आज भी कहानी के लिए प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द शॉर्ट स्टोरी का अनुवाद लघुकथा कर रहे हैं। केन्द्रीय सचिवालय ग्रंथागार, नई दिल्ली में आज भी कहानी से संबंधित समस्त हिन्दी पुस्तकों को लघुकथा श्रेणी में चिह्नित किया हुआ है। कन्नड़ लघुकथाएँ शीर्षक से साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने अब से चार दशक पहले कहानी संकलन प्रकाशित किया था।

॥2॥ मेरी मानवेतर लघुकथाएँ(प्रथम संस्करण : 2011)
यह वरिष्ठ चित्रकार, मूर्तिकार, हाइकूकार व कथाकार पारस दासोत की 146 लघुकथाओं का संग्रह है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इसमें उनके द्वारा रचित मानवेतर पात्रों वाली लघुकथाएँ ही संग्रहीत हैं। ये सभी लघुकथाएँ सन् 1982 से सन् 2010 तक के 28 वर्ष लम्बे लेखन-काल में लिखित हैं। हिंदी में पारस दासोत लघुकथा कहने की गद्यगीत शैली के सम्भवत: अकेले ही प्रस्तोता हैं। इनकी लघुकथाओं पर शोधस्वरूप दो शोधार्थियों को पी-एच॰डी॰ तथा छ: शोधार्थियों को एम॰फिल॰ की उपाधि मिल चुकी है। यहाँ प्रस्तुत है उक्त संग्रह से एक लघुकथा:
इंकलाब ज़िन्दाबाद
पन्द्रह अगस्त की सुबह,
पिंजरे में बैठी चिड़िया, अपने चूजों को जगाती हुई बोली
उठो मेरे बेटो, उठो! आज पन्द्रह अगस्त है!
मम्मी, हम तो परतन्त्र हैं!
चूजा अपनी करवट बदलते हुए बोला।
पन्द्रह अगस्त, काहे का पन्द्रह अगस्त!
दूसरे ने अपनी आँखें मलीं।
मम्मी! क्या आज स्वतन्त्रता दिवस है?
तीसरे ने अपने नन्हे-नन्हे पंख फड़फड़ा जिज्ञासा जताई।
अब
इससे पहले, चिड़िया अपने प्यारे चूजे को उत्तर में हाँ बोलती, चूजे ने पिंजरे के फाटक को टोंच-टोंच कर, अपने को लहूलुहान कर लिया।
चिड़िया बोली—“महात्मा गाँधी! जिंदाबाद!
पहला चूजा बोला—“भगतसिंह, जिंदाबाद!
दूसरा बोला—“सुभाषचन्द्र बोस, जिंदाबाद!
फाटक के पास पड़ा घायल चूजा अपनी अन्तिम साँस लेकर बोला
इंकलाब!
सभी मिल बोले—“जिंदाबाद!

॥3॥ बूँद से समुद्र तक(संस्करण : 2011)
हिंदी लघुकथा में डॉ॰ सतीश दुबे गत 45 वर्षों से निरन्तर रचनारत हैं; न केवल रचनारत बल्कि विचाररत भी। प्रस्तुत संग्रह को उन्होंने हिंदी लघुकथा के शोधार्थियों की सुविधा के मद्देनजर संपादित/प्रकाशित किया है। इसमें उन्होंने विगत तीन वर्षों अर्थात् सन् 2008, 2009 व 2010 में रचित अपनी 104 लघुकथाओं के साथ-साथ फरवरी 1974 में प्रकाशित अपने लघुकथा संग्रह 'सिसकता उजास'से अठारह प्रतिनिधि लघुकथाएँ उसके मुखपृष्ठ की प्रतिकृति सहित, 'सरिता' आदि पत्रिकाओं में 1965-66 में प्रकाशित बारह लघुकथाएँ तथा प्रकाशित लघुकथा संग्रहों सिसकता उजास, भीड़ में खोया आदमी, राजा भी लाचार है, प्रेक्षागृह तथा समकालीन सौ लघुकथाओं में प्रकाशित रचनाओं पर डॉ॰ कमल किशोर गोयनका, डॉ॰ श्रीराम परिहार, डॉ॰ पुरुषोत्तम दुबे, बसंत निरगुणे, श्याम सुन्दर अग्रवाल, प्रतापसिंह सोढ़ी, मधुदीप, रामयतन यादव, खुदेजा खान, श्याम गोविंद के आलोचनात्मक लेख तथा कथाकार व शोधार्थी जितेन्द्र जीतू द्वारा लिया हुआ प्रश्न-साक्षात्कार को सम्मिलित किया है। इस संग्रह से न केवल सतीश दुबे की रचनाशीलता बल्कि  उनके द्वारा लघुकथा-विधा को उत्तरोत्तर उत्कृष्ट करते जाने पर भी यथेष्ट प्रकाश पड़ता है। प्रस्तुत है बूँद से समुद्र तक’ लघुकथा-संग्रह से सतीश दुबे की एक लघुकथा:

थके पाँवों का सफर
दाएँ कन्धे से बाईं ओर लटकाए शोल्डर-बैग तथा तीन-चार फीट का डंडा थामे वृद्ध को सहारा देकर बस में चढ़ाने वाला अधेड़ व्यक्ति टिकट पर सीट का नम्बर देखते हुए सत्येन्द्र के निकट पहुँचकर बोला—“भाईसाहब, आपके पासवाली सीट का नम्बर हमें मिला है, क्या आप चाचाजी को विंडो-सीट दे सकते हैं, इन्हें उस तरफ आराम रहेगा…। सत्येन्द्र बिना कुछ बोले खड़ा हो गया और चाचाजी के व्यवस्थित हो जाने पर दाईं ओर बैठ गया।
वृद्ध चाचाजी के साथ आया व्यक्ति उनसे विदा लेकर सत्येन्द्र से आग्रह कर गया कि वह अपने हमसफर का ध्यान रखे।
पाँच-दस मिनट मौन रहने के बाद सत्येन्द्र ने चाचाजी को मुखर करने की दृष्टि से पूछा—“चाचाजी, ये जो बैठाने आए थे, आपके भतीजे थे?
घर के पास रहते हैं, टाइम-बेटाइम मदद कर देते हैं।
आपके बेटे नहीं हैं क्या?
ऐसा मत बोलो, भगवान के दिए चार बेटे हैं, चारों होनहार…अच्छी और बड़ी नौकरी वाले…
बहुएँ कैसी हैं?
बड़े और सम्पन्न घर की बेटियाँ हैं, बेटों से दस गुना होनहार।
इधर कहाँ तक जाएँगे आप?
जौनपुर।
किस बेटे के पास?
नहीं, निकट के रिश्तेदार के घर, बड़े प्रेम से बुलाया है, बस पर लिवाने को आ जाएँगे। कहकर चाचाजी चुप हो गए। उनकी सूनी आँखें और निस्तेज चेहरे की ओर गौर से देखते हुए सत्येन्द्र कुछ-और प्रश्न करे, उससे पूर्व ही चाचाजी अस्फुट शब्दों में बोले—“अब और-कुछ पूछना मत, ज्यादह बोलने से मुझे तकलीफ होती है…
सत्येन्द्र ने देखायह कहते हुए चाचाजी ने पैर लम्बे तथा सिर सीट के सहारे लगाकर बूँदे टपकाने का प्रयास कर रही छोटी-छोटी आँखों को जोरों से भींच लिया।  

॥4॥ …घाव करे गम्भीर(संस्करण : 2009)
हिंदी पत्रकारिता एवं संपादन से जुड़े मॉरीशसवासी राज हीरामन मूलत: कवि हैं और लघुकथा की विधा को उन्होंने बहुत बाद में यानी इस सदी के पहले दशक में अपनाया है। …घाव करे गम्भीर उनकी 140 लघुकथाओं का दूसरा संग्रह है। पहला लघुकथा संग्रह कथा संवाद सन् 2008 में प्रकाशित हुआ था। इस संग्रह की भूमिका रामदेव धुरंधर ने लिखी है जो स्वयं भी सिद्धहस्त लघुकथा-लेखक हैं और जिनकी लघुकथाओं का संग्रह गत सदी के अंतिम दशक में प्रकाशित हो चुका है। लघुकथा-लेखन को अपनाने पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए राज हीरामन ने लिखा है—‘मूलत: मैं कवि हूँ, पर बाद में मैंने लघुकथा विधा अपनाई। लघुकथा लिखने में क्या मज़ा आता है। वाह! ये छोटी-छोटी, बौनी-बौनी-सी तो रहती हैं। फैलाव तनिक भी नहीं, पर लम्बे वाक्य का प्रावधान छोड़ देती हैं। आदमी को हिला देने और झकझोर देने की ताकत भी रखती हैं। लघुकथा-लेखन मुझे भी ताकतवर बना देता है। संग्रह की लघुकथाओं का यदि भाषा-संपादन करा लिया जाता तो आम हिंदी पाठक के लिए वे अधिक ग्राह्य बन सकती थीं। आइए पढ़ते हैं राज हीरामन की एक उत्कृष्ट लघुकथा:

गिरजाघर की व्यस्तता
यहाँ के गिरजाघर में प्रत्येक रविवार को प्रार्थना के लिए ठेला-ठेली रहती है। सुबह चार बजे से शाम छह बजे तक पादरी एसेम्ली लगाते-लगाते, बोलते-बोलते थक जाते हैं। पर हब्शी किश्च्यन, गोरे क्रिश्च्यन तथा चीनी क्रिश्च्यनों की प्रार्थना-सभाएँ अलग-अलग क्यों लगती थींयह हब्शियों की समझ से बाहर की बात थी। फिर भी सब इसे रंगभेद ही मानते थे। गोरे सवेरे तड़के चार बजे की प्रार्थना-सभा में ही आते। तब आते हब्शी भक्त और शाम में चीनी आते।
पादरी को इस प्रश्न का उत्तर सूझता ही नहीं था, क्योंकि पादरी भी गोरा था, ने समझाया
गोरों के पास कारें हैं इसलिए वे सवेरे तड़के ही आ जाते हैं। आप लोग बस से सफर करके आते हैं और बसों के चलने का तो समय होता है! हमारे चीनी भाई दिनभर अपनी दुकान में काम करते हैं फिर जब आधे दिन दुकानें बंद होती हैं, तो वे तैयार होकर आते हैं!


Tuesday, 28 December 2010

‘मेरी श्रेष्ठ लघुकथाएँ’, अन्धा मोड़’ तथा ‘कबूतरों से भी खतरा है’

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कबूतरों से भी ख़तरा है
एन॰ उन्नी हिन्दी लघुकथा के वरिष्ठ और सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी रचनाओं से पहला परिचय बलराम द्वारा संपादित लघुकथा कोशों के माध्यम से 1997 में हुआ। उन दिनों मेरे द्वारा संपादित लघुकथा संकलन मलयालम की चर्चित लघुकथाएँ की पांडुलिपि लगभग तैयार थी। मैंने तब एन॰ उन्नी की रचनाओं को उसमें शामिल करने के बारे में बलराम को बताया। उन्होंने कहा कि उन्नी मलयालम भाषी जरूर हैं, मलयालम लेखक नहीं। बावजूद इस सचाई को जान लेने के उनकी लघुकथाओं को मैंने मलयालम की चर्चित लघुकथाएँ की पांडुलिपि में शामिल किया, इस नीयत से कि मलयालम संसार यह जाने कि उसने हिन्दी को कितना बड़ा लघुकथाकार अनजाने ही दे रखा है। अभी हाल में, संभवत: बलराम के ही सद्प्रयास से उनका लघुकथा संग्रह कबूतरों से भी ख़तरा है प्रकाश में आया है जिसमें उनकी 59 रचनाएँ संग्रहीत हैं। आईने का फ़न में बदलना शीर्षक से संग्रह की भूमिका सनत कुमार ने लिखी है। उन्नी जी ने कथ्य के चुनाव में अपने समय को वरीयता दी है तथा अधिकांशत: कहानी-शैली को अपनाया है इसलिए उनकी लघुकथाओं में समकालीन कथारस की अनुभूति सहज ही होती है तथापि संग्रह की खोज, पर्याय, जन्मदिन, साजिश, चूहा, स्वप्न-भंग, बदलते मुहावरे, काँटों की दीवार, सूँड, बदला, ग़ुलाम, चुनौती, खबरदार तथा वचन रक्षक को आकार की दृष्टि से लघुकथा स्वीकार पाना कठिन प्रतीत होता है।
प्रकाशक : मित्तल एण्ड सन्स, सी-32, आर्यानगर सोसायटी, दिल्ली-110092

अन्धा मोड़
हिन्दी लघुकथा के एक-और चर्चित व वरिष्ठ कथाकार हैं कालीचरण प्रेमी। दुर्दैव से वह लगातार जूझते रहे हैं लेकिन अपनी रचनात्मक गुणवत्ता के ग्राफ को उन्होंने नीचे नहीं आने दिया। एकल लघुकथा-संग्रह कीलें(2002) तथा संपादित कहानी संकलन युगकथा के बाद कवयित्री व कथाकार सुश्री पुष्पा रघु के साथ मिलकर उन्होंने लघुकथा संकलन अन्धा मोड़(2010) संपादित किया है। 280 पृष्ठीय इस संकलन में देशभर के 93 कथाकारों की कुल 282 लघुकथाएँ संकलित हैं। सम्पादकीय(कालीचरण प्रेमी) तथा भूमिका (पुष्पा रघु) के अलावा इसमें लघुकथा जीवन की आलोचना है(कमल किशोर गोयनका) तथा लघुकथा लेखन:मेरी दृष्टि में(सूर्यकांत नागर) शीर्षक दो उपयोगी लेख भी हैं।
प्रकाशक : अमित प्रकाशन, के॰बी॰ 97, कविनगर, ग़ाज़ियाबाद-201002

मेरी श्रेष्ठ लघुकथाएँ
विभिन्न विषयों को केन्द्र में रखकर हिन्दी में लघुकथा के संकलन संपादित करने में गत 4-5 वर्षों से डॉ॰ रामकुमार घोटड़ अग्रिम पंक्ति में हैं। चार हिन्दी तथा एकराजस्थानी लघुकथा संग्रहों के अलावा उनका एक व्यंग्य संग्रह व दो मौलिक कहानी संग्रह भी सन् 1989 से 2006 तक प्रकाशित हो चुके हैं। सन् 2006 से 2010 तक दो राजस्थानी की तथा 9 हिन्दी की पुस्तकें सम्पादित कर चुके हैं और 9 अन्य पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।
प्रस्तुत पुस्तक को रचनात्मक व समीक्षात्मकदो खण्डों में विभाजित किया गया है। रचनात्मक खण्ड में डॉ॰ घोटड़ ने अपनी 33 पूर्व-प्रकाशित तथा 25 अप्रकाशितकुल 58 लघुकथाएँ संग्रहीत की हैं और समीक्षात्मक खण्ड में उन्होंने स्वयं की लघुकथाओं व सम्पादित पुस्तकों पर प्राप्त कुल 25 पत्रों, समीक्षाओं, रिपोर्टों आदि को संकलित किया है।
प्रकाशक: अनामय प्रकाशन, ई-776/7, लाल कोठी योजना, जयपुर-302015

नववर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनाएँ देने के साथ-साथ यह बताते हुए अति प्रसन्नता हो रही है कि आप सब के सहयोग और स्वीकार के चलते ही जनगाथा अपने प्रकाशन के चौथे वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इस अंक में प्रस्तुत है उपर्युक्त लघुकथा संग्रह व संकलनों से एक-एक लघुकथाबलराम अग्रवाल


लघुकथाएँ

बुझते चिराग़/डॉ॰ रामकुमार घोटड़
आपकी पुस्तक तो पिछले वर्ष ही आने वाली थी, क्या रहा?
नहीं आ पाई।
क्यों?
प्रकाशक को प्रकाशन-खर्च का एक चौथाई तो पांडुलिपि के साथ ही भेज दिया था। बाकी सहयोग राशि छ: महीने बाद भेजनी थी।
फिर…?
एक रात श्रीमती जी को पेट में तेज़ दर्द हुआ। जाँच करने पर डॉक्टर ने पित्त की थैली में पथरियाँ बताईं जिसका इलाज़ ऑपरेशन ही था। अत: जमापूँजी खर्च हो गई।
और इस साल?
इस साल घरेलू खर्च में कटौतियाँ करके कुछ रकम इकट्ठी की। ससुराल से बड़ी बेटी आ गई। सामाजिक परम्परा के अनुसार पहला जापा पीहर में ही होना चाहिए। डॉक्टरनी नॉर्मल डिलीवरी नहीं करवा पाई, सीजेरियन करना पड़ा।
और अब? 
प्रकाशक महोदय के पत्र आते हैं कि अनुबंध की शर्तों के अनुसार अवधि पार हो गई है। पूर्व मे भेजी गई राशि को आई-गई मानकर क्यों न पांडुलिपि को रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाय!                               (मेरी श्रेष्ठ लघुकथाएँ से)

सरस्वती-पुत्र/जगदीश कश्यप
क्या तुम मेरी लड़की को सुखी रख सकोगे?
यह बात आप अपनी लड़की से पूछो। और लेखक ने अपने मुरझाए चेहरे की दाढ़ी पर हाथ फेरा।
मैं तुमसे अत्यन्त घृणा करता हूँ… प्रेमिका के पापा ने उसे घूरते हुए कहा। उसके बटन-टूटे कुर्ते में सीने से बाहर झाँक रहे बालों को देख, वह और-भी उबल पड़ा,तुम लीचड़ आदमी! शादी वाली बात सोच कैसे सके!
क्या यही कहने के लिए बुलाया था आपने मुझे?
इतने में प्रेमिका दो कप चाय लाई और मेज पर रखकर मुड़ चली। जाते-जाते उसने मुस्कराते हुए कनखियों से प्रेमी को घूरा लेकिन वह मुँह नीचा किए बैठा रहा जबकि प्रेमिका का पापा तीव्र गुस्से से उस फटेहाल युवा कवि को घूर रहा था गोया कि उसे कच्चा चबा जायगा।
अच्छा लो, चाय उठाओ। पता नहीं क्यों, सुन्दर लड़की का बाप ठंडा पड़ गया था! अपमानित युवा लेखक ने चाय का कप उठाया और धीरे-धीरे सिप करने लगा। इसी बीच जवान लड़की के बाप ने कई महत्वपूर्ण निर्णय ले लिए थे अत: वह अचानक बोल पड़ा,कहो तो तुम्हारी सर्विस के लिए ट्राई करूँ?
इस पर पोस्ट-ग्रेजुएट बेरोज़गार चौंक पड़ा।
लेकिन, तुन्हें मेरी लड़की को भूलना होगा।
शर्त वाली बात पर कवि चुप रह गया और नमस्कार करके चला आया।
उसके जाते ही बी॰ए॰ में पढ़ रही लड़की का पापा बराबर सोच रहा था कि आखिर उस कमजोर युवक में ऐसा क्या था कि उसकी सुन्दर लड़की ने ज़हर खाने की धमकी दे दी! ज़ाहिर था कि वह उसकी क़लम पर मर-मिटी थी।
हूँ… लड़की के बाप ने खुद से कहा,भगवान भी कैसे-कैसे लीचड़ों को लिखने की ताक़त दे देता है!
उधर लेखक सारी रात खुद को समझाता रहा कि वह शर्त वाली नौकरी कभी स्वीकार नहीं करेगा और आत्मनिर्भर होने तक उस लड़की से शादी नहीं करेगा।                                                (अन्धा मोड़ से)


औकात/एन॰ उन्नी
कबाड़ की माँग बढ़ रही है। कबाड़ की कीमत बढ़ रही है। कबाड़ से नए-नए सामान बनाकर मंडी पहुँच रहे हैं। कुल मिलाकर कबाड़ की इज्ज़त बढ़ गयी है।
इस ज्ञान के साथ, घर का अतिसूक्ष्म निरीक्षण किया तो पाया कि कमरे कबाड़ से भरे पड़े हैं। एक-साथ दे नहीं सकते क्योंकि कॉलोनी में एक ही कबाड़ी आता है। कबाड़ ले जाने के लिए एक ही ठेला है उसके पास। मैंने कबाड़ को इकट्ठा किया। भाव करके किश्तों में कई बार ठेला भर दिया। कबाड़ी की खुशी देखते ही बनती थी। आखिर में, जब घर खाली हुआ और मुझे खाने को दौड़ा तो कबाड़ की अन्तिम किश्त के रूप में मैं स्वयं ठेलागाड़ी पर आसीन हो गया। मज़ाक समझकर कबाड़ी हँस दिया और कहने लगा,कबाड़ की कीमत आप जानते ही हैं; और अपनी भी। आप कृपया उतर जाइये।
मैं उतर गया और वह चला गया। जाते हुए उस निर्दयी कबाड़ी की चाल मैं देखता रहा। सोचता रहा किआखिर मेरी औकात क्या है?
(कबूतरों से भी खतरा है से)

Sunday, 28 November 2010

सुभाष नीरव की लघुकथाएँ

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सुभाष नीरव नौवें दशक के प्रतिभासंपन्न लघुकथाकार हैं। रूपसिंह चंदेल हीरालाल नागर के साथ उनकी लघुकथाओं का एक संकलन कथाबिंदुसन् 1997 में चुका है। लेखन, अनुवाद, आलोचना संपादन आदि लघुकथा की बहुआयामी सेवा के मद्देनजर लघुकथा के लिए पूर्णतः समर्पित पंजाब की साहित्यिक संस्था मिन्नी द्वारा सन् 1992 में उन्हें प्रतिष्ठित माता शरबती देवी पुरस्कारसे सम्मानित किया जा चुका है। उनकी लघुकथाओं को पढ़कर निःसंकोच कहा जा सकता है कि अपने समकालीनों की तुलना में भले ही उन्होंने कम और कभी-कभार लेखन किया है लेकिन जितना भी किया है वह अनेक दृष्टि से उल्लेखनीय है। सबसे बड़ी बात यह है कि लघुकथा के प्रति समर्पित भाव उनमें लगातार बना रहा है। उनके इस जुड़ाव के कारण ही पंजाबी का लघुकथा-संसार हिन्दी क्षेत्र के संपर्क में बहुलता से आना प्रारम्भ हुआ जिसे सौभाग्य से श्याम सुन्दर अग्रवाल सरीखे अन्य अनुवादकों का भी संबल हाथों-हाथ मिला। सुभाष की लघुकथाएं लघुकथा-लेखन के अनेक आयाम प्रस्तुत करती हैं और हिन्दी लघुकथा-साहित्य की सकारात्मक धारा को पुष्टि प्रदान करती हैं।बलराम अग्रवाल
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॥1॥ कबाड़
बेटे को तीन कमरों का फ्लैट आवंटित हुआ था। मजदूरों के संग मजदूर बने किशन बाबू खुशी-खुशी सामान को ट्रक से उतरवा रहे थे। सारी उम्र किराये के मकानों में गला दी। कुछ भी हो, खुद तंगी में रहकर बेटे को ऊँची तालीम दिलाने का फल ईश्वर ने उन्हें दे दिया था। बेटा सीधा अफसर लगा और लगते ही कम्पनी की ओर से रहने के लिए इतना बड़ा फ्लैट उसे मिल गया।
            बेटा सीधे आफिस चला गया था। किशन बाबू और उनकी बहू दो मजदूरों की मदद से सारा सामान फ्लैट में लगवाते रहे।
            दोपहर को लंच के समय बेटा आया तो देखकर दंग रह गया। सारा सामान करीने से सजा-सँवारकर रखा गया था। एक बैडरूम, दूसरा ड्राइंगरूम और तीसरा पिताजी और मेहमानों के लिए। वाह!
            बेटे ने पूरे फ्लैट का मुआयना किया। बड़ा-सा किचन, किचन के साथ बड़ा-सा एक स्टोर, जिसमें फालतू का काठ-कबाड़ भरा पड़ा था। उसने गौर से देखा और सोचने लगा। उसने तुरन्त पत्नी को एक ओर ले जाकर समझाया,“देखो, स्टोर से सारा काठ-कबाड़ बाहर फिंकवाओ। वहाँ तो एक चारपाई बड़े आराम से आ सकती है। ऐसा करो, उसकी अच्छी तरह सफाई करवाकर पिताजी की चारपाई वहीं लगवा दो। तीसरे कमरे को मैं अपना रीडिंगरूम बनाऊँगा।
            रात को स्टोर में बिछी चारपाई पर लेटते हुए किशन बाबू को अपने बूढ़े शरीर से पहली बार कबाड़-सी दुर्गन्ध आ रही थी।

॥2॥ चोर
मि. नायर ने जल्दी से पैग अपने गले से नीचे उतारा और खाली गिलास मेज पर रख बैठक में आ गये।
            सोफे पर बैठा व्यक्ति उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर उठ खड़ा हुआ।
            “रामदीन तुम? यहाँ क्या करने आये हो?” मि. नायर उसे देखते ही क्रोधित हो उठे।
            “साहब, मुझे माफ कर दो, गलती हो गयी साहब... मुझे बचा लो साहब... मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं... मैं बरबाद हो जाऊँगा साहब।रामदीन गिड़गिड़ाने लगा।
            “मुझे यह सब पसन्द नहीं है। तुम जाओ।मि. नायर सोफे में धंस-से गये और सिगरेट सुलगाकर धुआँ छोड़ते हुए बोले,”तुम्हारे केस में मैं कुछ नहीं कर सकता। सुबूत तुम्हारे खिलाफ हैं। तुम आफिस का सामान चुराकर बाहर बेचते रहे, सरकार की आँखों में धूल झोंकते रहे। तुम्हें कोई नहीं बचा सकता।
            “ऐसा मत कहिये साहब... आपके हाथ में सब-कुछ है।रामदीन फिर गिड़गिड़ाने लगा,“आप ही बचा सकते हैं साहब, यकीन दिलाता हूँ, अब ऐसी गलती कभी नहीं करुँगा, मैं बरबाद हो जाऊँगा साहब... मुझे बचा लीजिए... मैं आपके पाँव पड़ता हूँ, सर।  कहते-कहते रामदीन मि. नायर के पैरों में लेट गया।
            “अरे-अरे, क्या करते हो। ठीक से वहाँ बैठो।
            रामदीन को साहब का स्वर कुछ नरम प्रतीत हुआ। वह उठकर उनके सामने वाले सोफे पर सिर झुकाकर बैठ गया।
            “यह काम तुम कब से कर रहे थे ?”
            “साहब, कसम खाकर कहता हूँ, पहली बार किया और पकड़ा गया। बच्चों के स्कूल की फीस देनी थी, पैसे नहीं थे। बच्चों का नाम कट जाने के डर से मुझसे यह गलत काम हो गया।
            इस बीच मि. नायर के दोनों बच्चे दौड़ते हुए आये और एक रजिस्टर उनके आगे बढ़ाते हुए बोले,“पापा पापा, ये सम ऐसे ही होगा न ?”  मि. नायर का चेहरा एकदम तमतमा उठा। दोनों बच्चों को थप्पड़ लगाकर लगभग चीख उठे,“जाओ अपने कमरे में बैठकर पढ़ो। देखते नहीं, किसी से बात कर रहे हैं, नानसेंस !
            बच्चे रुआँसे होकर तुरन्त अपने कमरे में लौट गये।
            “रामदीन, तुम अब जाओ। दफ्तर में मिलना। कहकर मि. नायर उठ खड़े हुए। रामदीन के चले जाने के बाद मि. नायर बच्चों के कमरे में गये और उन्हें डाँटने-फटकारने लगे। मिसेज नायर भी वहाँ आ गयीं। बोलीं,“ये अचानक बच्चों के पीछे क्यों पड़ गये? सवाल पूछने ही तो गये थे।
            “और वह भी यह रजिस्टर उठाये, आफिस के उस आदमी के सामने जो...कहते-कहते वह रुक गये। मिसेज नायर ने रजिस्टर पर दृष्टि डाली और मुस्कराकर कहा, ”मैं अभी इस रजिस्टर पर जिल्द चढ़ा देती हूँ।
            मि. नायर अपने कमरे में गये। टी.वी. पर समाचार आ रहे थे। देष में करोड़ों रुपये के घोटाले से संबंधित समाचार पढ़ा जा रहा था। मि. नायर ने एक लार्ज पैग बनाया, एक साँस में गटका और मुँह बनाते हुए रिमोट लेकर चैनल बदलने लगे।

॥3॥ सहयात्री
बस रुकी तो एक बूढ़ी बस में चढ़ी। सीट खाली न पाकर वह आगे ही खड़ी हो गयी। बस झटके के साथ चली तो वह लड़खड़ाकर गिर पड़ी। सीटों पर बैठे लोगों ने उसे गिरते हुए देखा। जब तक कोई उठकर उसे उठाता, वह उठी और पास की एक सीट को कसकर पकड़कर खड़ी हो गई।
            जिस सीट के पास वह खड़ी थी, उस पर बैठे पुरुष ने उसे बस में चढ़ते, अपने पास खड़ा होते और गिरते देखा था। लेकिन अन्य बैठी सवारियों की भाँति वह भी चुप्पी साधे बैठा रहा।
            अब बूढ़ी मन ही मन बड़बड़ा रही थी,‘कैसा जमाना आ गया है! बूढ़े लोगों पर भी लोग तरस नहीं खाते। इसे देखो, कैसे पसरकर बैठा है। शर्म नहीं आती! एक बूढ़ी-लाचार औरत पास में खड़ी है, लेकिन मजाल है कि कह दे, आओ माताजी, यहाँ बैठ जाओ...।
            तभी, उसके मन ने कहा,‘क्यों कुढ़ रही है ?... क्या मालूम यह बीमार हो? अपाहिज हो? इसका सीट पर बैठना ज़रूरी हो।इतना सोचते ही वह अपनी तकलीफ भूल गयी। लेकिन, मन था कि वह कुछ देर बाद फिर कुढ़ने लगी,‘क्या बस में बैठी सभी सवारियाँ बीमार-अपाहिज हैं?... दया-तरस नाम की तो कोई चीज रही ही नहीं।
            इधर जब से वह बूढ़ी बस में चढ़ी थी, पास में बैठे पुरुष के अन्दर भी घमासान मचा हुआ था। बूढ़ी पर उसे दया आ रही थी। वह उसे सीट देने की सोच रहा था, पर मन था कि वहाँ से दूसरी ही आवाज निकलती,‘क्यों उठ जाऊँ? सीट पाने के लिए तो वह एक स्टॉप पीछे से बस में चढ़ा है। सफर भी कोई छोटा नहीं है। पूरा सफर खड़े होकर यात्रा करना कितना कष्टप्रद है। और फिर, दूसरे भी तो देख रहे हैं, वे क्यों नहीं इस बूढ़ी को सीट दे देते?’
            इधर, बूढ़ी की कुढ़न जारी थी और उधर पुरुष के भीतर का द्वंद। उसके लिए सीट पर बैठना कठिन हो रहा था। क्या पता बेचारी बीमार हो?.. शरीर में तो जान ही दिखाई नहीं देती। हड्डियों का पिंजर। न जाने कहाँ तक जाना है बेचारी को ! तो क्या हुआ?.. , न ! तुझे सीट से उठने की कोई ज़रूरत नहीं।
            “माताजी, आप बैठो।आखिर वह उठ ही खड़ा हुआ। बूढ़ी ने पहले कुछ सोचा, फिर सीट पर सिकुड़कर बैठते हुए बोली, “तू भी आजा पुत्तर, बैठ जा मेरे संग। थक जाएगा खड़े-खड़े।
 
सुभाष नीरव : संक्षिप्त परिचय
सुभाष नीरव(बायें) कथाकार सूर्यकांत नागर के साथ चित्र:बलराम अग्रवाल
27 दिसम्बर, 1953 को मुरादनगर (उत्तर प्रदेश)  में जन्मे सुभाष नीरव का अपने लेखन के बारे में कहना है कि—‘न् 1976 के आसपास से हिन्दी लेखन प्रारंभ किया। कहानी, कविता और लघुकथा लेखन के साथ-साथ पंजाबी से हिन्दी में अनुवाद कार्य भी। अब तक तीन कहानी-संग्रह "दैत्य तथा अन्य कहानियाँ", "औरत होने का गुनाह" और "आख़िरी पड़ाव का दु:ख", दो कविता संग्रह "यत्किंचित" और "रोशनी की लकीर", एक बाल कहानी संग्रह "मेहनत की रोटी" प्रकाशित। इसके अलावा, लगभग एक दर्जन पुस्तकों का पंजाबी से हिन्दी में अनुवाद जिनमें "काला दौर", "कथा पंजाब-2" "कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ","पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं", "छांग्या रुक्ख"(दलित आत्मकथा)और "रेत" (उपन्यास-हरजीत अटवाल) प्रमुख हैं। अनियतकालीन पत्रिका "प्रयास" का आठ वर्षों तक संचालन/संपादन। इन दिनों नेट पर ब्लागिंग।
पुरस्कार/सम्मान : हिन्दी में लघुकथा लेखन के साथ-साथ पंजाबी-हिन्दी लघुकथाओं के श्रेष्ठ अनुवाद के लिए 'माता शरबती देवी स्मृति पुरस्कार, 1992' तथा 'मंच पुरस्कार, 2000' से सम्मानित।
निवास का पता : 372, टाइप-4, लक्ष्मी बाई नगर, नई दिल्ली-110023
दूरभाष : 09810534373(मोबाइल),011-24104912(निवास)
ई मेल subh_neerav@yahoo.com