पृथ्वीराज अरोड़ा हिन्दी लघुकथा के वरिष्ठ हस्ताक्षर हैं। उनकी लघुकथाओं में मानवीय संवेदना के वे सूत्र छिपे होते हैं जो उन्हें अपने समकालीनों के बीच विशिष्ट दृष्टि संपन्न कथाकार सिद्ध करते है। जनगाथा के इस अंक में उनकी तीन ताजातरीन लघुकथाएँ प्रस्तुत हैं।
-->
संलग्न पेंटिंग सीमा विश्वास की है जिसे सम्माननीय मित्र शमशेर अहमद खान ने
-->
रंगों के पर्व होली की शुभकामनाओं के साथभेजाहै।
॥नागरिक॥
शायद वह किसी काम से थोड़ी देर के लिए बाहर गया था। मैंने सिर उठाकर शीशे में देखा। सिर के एक हिस्से के बाल कुछ बड़े थे और दूसरे के छोटे। मैंने हाथ लगाकर जाँचा भी। मैं पिछले कई वर्षों से उससे बाल कटवा रहा था, परंतु ऐसी असावधानी कभी नहीं हुई थी। जैसे ही वह लौटा, मैंने बताया,“एक तरफ के बाल थोड़े बड़े लगते हैं।”
उसने कैंची और कंघा उठाया और बड़े बालों को छोटा कर दिया। फिर धीरे-से बोला,“माफ करना बाबूजी, मैं जानता हूँ कि आप पहले भी आये थे। अब दोबारा आये हैं। मुझे पता है कि आप मेरे अलावा किसी-और से बाल नहीं कटवाते।” फिर उसने स्वयं ही बताया,“बाबूजी, मैं बहुत परेशान हूँ।”
“क्या हुआ?”
“मैं दोपहर को घर गया तो पता चला कि मेरे आठ वर्ष के बच्चे को दो आदमी बहला-फुसला कर ले गए। उसे आइसक्रीम खिलाकर घर के बारे में पूछते रहे। मेरी बेटी के स्कूल में जाकर उसे भी देख आये हैं। मैं…मैं…बहुत तनाव में हूँ…क्या करूँ?”
“बेटे से पूछा कि वे कौन लोग थे?”
“पत्नी से उसे इस हरकत के लिए पीट दिया। वह बुरी तरह-से डर गया है। कुछ बताता नहीं।”
“फिर?” अचानक मेरे मुँह से निकल गया।
वह काफी देर चुप रहा। फिर बोला,“पुलिस पर मुझे भरोसा नहीं। …और ये नेता लोग तो पहचानते तक नहीं। रिश्तेदार नजदीक तक नहीं फटकेंगे। दोस्त सलाह भर देकर पहलू झाड़ लेंगे। बेटी का सवाल है…इज्जत का…” वह पगलाया-सा यही रट लगाये जा रहा था।
॥भ्रष्ट॥
दिनभर खटने के बाद वे शाम को घूमने जाते थे। यह उनकी दिनचर्या का एक अंग था। उनके बीच राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक और अधिकतर दफ्तरी सरोकारों की बातें होती थीं।
आज रवि ने बात शुरु की,“सचमुच, बेईमानी हमारे रगों में समा गई है। जो भ्रष्ट नही होना चाहता, उसे मजबूर किया जाता है।” वह थोड़ा रुका। अपनी बात के प्रभाव को आँकने के लिए उसने अपने साथियों की ओर देखा और आगे कहा,“आज एक आदमी किसी काम के सिलसिले में आया था। वह कानूनन सही था, मैंने काम करने से इंकार कर दिया। उसने कुछ लेने-देने की बात की, परंतु मैं अपने उसूलों पर अड़ा रहा।”
शामलाल ने इस प्रसंग में जोड़ा,“मैं ऐसी सीट पर हूँ जहाँ आसानी से रुपए ऐंठे जा सकते हैं, आप जानतए ही हैं। मेरे साथ तो हर रोज यही घटता है पर, मैं हराम की कमाई पर विश्वास नहीं करता।”
प्रभुदयाल ने सीने पर हाथ रखते हुए कहा,“आज तो मेरे साथ हद हो गई। काम करवाने के लिए एक आदमी मेरे घर पहुँचा और मिठाई के डिब्बे में रुपए डालकर मु्झे देने लगा। मेरी आत्मा मानी नहीं। मैंने उसे हाथ जोड़ते हुए डिब्बा स्वीकार करने से इंकार कर दिया।”
एक आदमी, जो उनके पीछे-पीछे चल रहा था और ध्यान-से उनकी बातें सुन रहा था, बिल्कुल पास आकर उसने पूछा,“जब हम सभी ईमानदार हैं, कोई भी भ्रष्ट नहीं है, तो भ्रष्टाचार क्यों है? क्या आपने किसी को अपने-आप को भ्रष्ट कहते सुना है? अगर हाँ, तो उसे पेश कर सकते है?”
अचानक पूछे गये इस सवाल से हकबकाए हुए वे तीनों एक-दूसरे को टुकुर-टुकुर ताकने लगे।
॥पति॥
बु्री खबर थी।
पति ने बताया—रज्जू-चाचा नहीं रहे।
पत्नी अलसायी-सी पड़ी रही। पति ने फिर दोहराया। पत्नी धीरे-धीरे उठी। बिखरे बालों को समेटा। जम्हाई ली। अपने गाउन को ठीक किया। आईने के सामने जाकर अपना चेहरा देखा। गुसलखाने गई। मुँह पर छींटे मारे। तौलिये से पौंछा। पानी धीरे-धीरे पिया, खाने की तरह। ब्रश लिया। पेस्ट लगाया। हौले-हौले, इत्मीनान से, ब्रश करती रही। पति कुर्ता-पाजामा पहने तैयार होकर आया और पत्नी को ब्रश करते देख किचन में घुसकर चाय बना लाया। पत्नी ने पति के हाथों बनायी चाय चुस्कियाँ ले पी और थोड़ी देर बाद फिर गुसलखाने में घुस गई। लौटकर आयी और आईने के सामने खड़ी हो साड़ी लपेटने लगी। पति ने घर के सभी दरवाज़े बंद किये और बाहर के दरवाज़े पर ताला टाँग घर से बाहर हो गया।
स्कूटर गली की सड़क पर खड़ा करके उसे स्टार्ट किया। फिर बंद कर दिया। फिर स्टार्ट किया और जोर-जोर से हॉर्न बजाई। फिर स्कूटर बंद कर दिया। मकान के अंदर जाकर देखा—पत्नी बालों को सँवार रही थी।
“जल्दी करो।” उसने कहा। कहकर वह फिर बाहर आ गया। स्कूटर स्टार्ट किया। फिर बंद कर दिया। फिर स्टार्ट किया। तेज-तेज हॉर्न बजाई। एक पड़ोसी ने झाँककर उसकी ओर देखा। जब पत्नी स्कूटर के पास आयी तो पति बोला—“वक्त की नजाकत को समझा करो।”
पत्नी केवल मुस्कराई। उसकी मुस्कराहट से मर्माहत उसे ढोने की बेबसी लिए वह स्कूटर का गियर बदलने लगा।
पृथ्वीराज अरोड़ा: संक्षिप्त परिचय
जन्म: 10 अक्टूबर, 1939 को बुचेकी(ननकाना साहिब, पाकिस्तान में)
प्रकाशित कृतियाँ: तीन न तेरह(लघुकथा संग्रह), प्यासे पंछी(उपन्यास), पूजा(कहानी संग्रह), आओ इंसान बनाएँ(कहानी संग्रह)
सम्पर्क : द्वारा डॉ सीमा दुआ, 854-3, शहीद विक्रम मार्ग, सुभाष कॉलोनी, करनाल-132001 (हरियाणा)
अपने सभी पाठकों को 2010 के आगमन पर हार्दिक शुभकामनाओं के साथ इस बार ‘जनगाथा’ में प्रस्तुत हैं—कुमार नरेन्द्र की लघुकथाएँ। कुमार नरेन्द्र वरिष्ठ हिन्दी लघुकथा लेखक हैं। इनकी लघुकथाएँ आम तौर पर निम्न मध्यवर्गीय संत्रास झेलते पात्रों की व्यथा को सधी हुई प्रतीकात्मकता के साथ व्यक्त करती हैं। —बलराम अग्रवाल
अमृतपर्व
अधेड़-से सुकेश के पिता अवस्था के पिचहत्तर वर्ष पूरा करने के समीप हैं। उनके मित्र भगवान से प्रार्थनाएँ कर रहे हैं कि वह शुभ दिन जल्द-से-जल्द आए और धूमधाम से अमृतपर्व का जश्न मनाएँ। इसके विपरीत सुकेश गत एक दशक से इसी प्रतीक्षा में है कि कब उसके पिता स्वर्ग सिधारें और सम्पत्ति का हस्तांतरण उसके नाम हो।
अभी, पिछले श्राद्धों में ही, उसके पिता गम्भीर रूप से बीमार हो गए थे। एक दिन तो गले की आवाज ही चली गई। होठों पर झाग तक आ गए। सुकेश के चेहरे पर प्रसन्नता की रेखाएँ उभर आईं। उसे लगा—पिता का अब निश्चित रूप से अंतिम समय आ गया है। …किन्तु संध्या-समय डॉक्टर ने बतलाया कि अब वे खतरे से बाहर हैं, चिन्ता की कोई बात नहीं। सुकेश की सारी आशाओं पर पानी फिर गया। जीवनभर सुकेश ने कोई खास कमाई नहीं की थी, बस दार्शनिक-सा बना घूमता रहा। यूँ वह बहुत ईमानदार है, संवेदनशील है। दूसरों को कर्म की महिमा का उपदेश देता रहा, किन्तु स्वयं कुछ न कर पाया। केवल पिता की दौलत पर नजर रही कि वे कब मरें और रुपये-पैसे का वह स्वेच्छापूर्वक उपभोग कर सके।
अब वह धीरे-धीरे अवसाद से भरता जा रहा है और विचित्र-सा व्यवहार करने लगा है। उसे यह भी मालूम है कि पिता की मृत्यु की प्रतीक्षा करते-करते वह स्वयं मृत्यु की ओर बढ़ रहा है और यह भी सोचता है कि यह आदर्श स्थिति नहीं होगी।
मस्तिष्क में इन्हीं सब विचारों के चलते मध्यरात्रि का समय हो चुका है लेकिन उसे नींद नहीं आ रही है। पत्नी भी करवटें बदल रही है, वह भी बेचैन है। बराबरवाले कमरे में पिताजी लेटे हुए हैं, बार-बार पलंग से कराहने की आती हुई आवाज से लग रहा है कि वे भी सोए नहीं हैं। प्रतीत होता है कि उन्हें सहारे की आवश्यकता है।–यही विचार करते हुए वह उठकर पिता के कमरे की ओर चल देता है और पायँते बैठते हुए धीरे-धीरे उनके पाँव दबाने लगता है। कोई दस मिनट के बाद सुकेश को लगा कि पिताजी सिसकियाँ भर रहे हैं। वह पूछता है—“पिताजी! क्या बात है, मुझे तो बताओ”
“इधर आ, मेरी छाती से लग जा…” वे बोले।
सुकेश उठा और जब समीप पहुँचा तो पिता ने उसे अपनी बाँहों में कस लिया। दोनों का रुदन जारी था। मन निर्मल हो गए।
प्रभात की बेला में एक और पिता ने जन्म ले लिया; सुकेश के मस्तिष्क में अमृतपर्व की तैयारियाँ आकार लेने लगी थीं।
सॉफ्टी कॉर्नर
आखिरी शनिवार की शाम को जब वह कार्यालय से थका-हारा बाहर निकला, तो अभी भी तेज गर्म हवाएँ चल रही थीं। कुछ-कुछ आँधी का-सा वातावरण बना हुआ था। बड़ा अजीब-सा मौसम हो गया था। प्यास के मारे बुरा हाल, किन्तु पानी भी कितना पिया जाय! सिगरेट की तलब हुई। ऊपर की जेब से बची अन्तिम सिगरेट निकालते हुए उसकी तर्जनी उँगली पसीने से भीगे हुए दो के नोट को छू गई। इच्छा हुई—लालबत्तीवाले चौक पर चलकर सॉफ्टी खायी जाय। फिर तभी, सुबह गुड्डी के कहे हुए शब्द उसके कानों में गूँज गये,“पापा-पापा! शाम को हमारे लिए पॉपिंस जरूर लेके आना।”
और उसके पाँव बस स्टैण्ड की ओर मुड़ गये। अभी वह कुछ ही कदम चला था कि किसी ने उसे पीछे से आकर टक्कर मारी और वह अभी सँभल भी न पाया था कि पीठ पर एक धौल जमा दी। अपने को संतुलित करते हुए जब उसने उस व्यक्ति को पहचाना,“अरे रघु तुम! कब आये बम्बई से?” वह आश्चर्य से बोल उठा।
“परसों आये थे हम।” रघु ने सिगरेट 555 की राख झाड़ते हुए कहा।
“अच्छा, आओ एक-एक कप चाय पीते हैं।” उसने शिष्टाचार निभाते हुए कहा।
“छोड़ो यार, चाय और इस गर्मी में!” रघु ने नाखुश होते हुए कहा,“चलो, सॉफ्टी खाते हैं, उसी कॉर्नर वाली दुकान पर।”
“माफ करना रघु, दाढ़ में ठण्डी चीजें बहुत लगती हैं सो मैं तो नहीं खा पाऊँगा; लेकिन तुम…जरूर…।”
“अच्छा भाई, जैसी तुम्हारी मर्जी। हम तो अतिथि हैं।”
और उनके कदम उस ओर बढ़ गये।
अब, ज्यों-ज्यों सॉफ्टी कॉर्नर नजदीक आता जा रहा था, उसे लग रहा था कि उसकी दाढ़ का दर्द निरन्तर बढ़ता जा रहा है!
बिरादरी का दु:ख
मुद्दत से चल रहे अपने किराएदार बंसीराम पर दायर मुकदमा जीतने के बाद आज पंडित ज्योति प्रसाद निरे खुश थे।
सुबह से ही बधाई देने वालों का ताँता लगा हुआ था और पंडितजी हाथ जोड़े सबका स्वागत कर रहे थे। साथ ही साथ सभी को इस बार दीपावली पर अपने यहाँ आमंत्रित भी कर रहे थे।
दोपहर हुई। आसपास के सभी बुढ़ऊ यार-दोस्त खुशी-खुशी अपने-अपने घर लौट गए और पंडितजी अपने दूर के दोस्तों को पत्र लिखने बैठ गए।
…कुछ दिनों बाद उनके दोस्तों के जवाब आने शुरू हुए। एक विधुर दोस्त, जोकि हर वर्ष उनके यहाँ ही दीपावली-पर्व मनाता रहा है, ने लिखा—
प्रिय पंडितजी,
…अस्वस्थ होने के कारण सम्भवत:मैं इस बार तुम्हारे यहाँ दीपावली पर न आ पाऊँगा…।
तुम्हारा
रामसहाय
पंडितजी का यह दोस्त परदेश में किराएदार था।
अवमूल्यन
“ए भैया, पंजी की ये देना।” पाँच वर्षीय बालक ने गजक की ओर इशारा करते हुए जरा ऊँची आवाज़ में कहा।
दुकानदार का ध्यान एकदम बालक की ओर आकर्षित हुआ।
“पंजी की गजक नहीं मिलती।” दुकानदार ने खीजते हुए कहा।
“क्यों?” बालसुलभ बुद्धि ने प्रश्न किया।
“ज्यादा जुबान चलाता है बे…हैं…!” लाला ने भड़कते हुए कहा।
मासूम बालक बिना कुछ कहे धीर-धीरे घर की ओर चल दिया। रास्ते में उसने पाँच के उस सिक्के को कई बार उलट-पलटकर देखा। एक ओर छपा था—भारत; और दूसरी ओर—रुपए का बीसवाँ भाग!
अब, वह जब तंग गली में घुसा तो दायीं नाली भी अपना रंग दिखा रही थी। बालक ने तुरन्त निर्णय ले—पंजी जोर-से नाली में फेंक दी। बालक काफी देर तक खड़ा उस डूबती हुई पंजी को देखता, सुख का अनुभव करता रहा।
बैकुंठ लाभ
स्नानादि से निबटकर मैं नाश्ते के लिए रसोईघर में पटरे पर जा बैठा। अभी चाय का पहला ही घूँट भरा था कि मौसी ने आकर समाचार दिया—पड़ोसी पंडितजी को बैकुंठ-लाभ हो गया।
“कब?” अम्मा ने चौंककर प्रश्न किया।
“अभी, कुछ देर पहले।”
“ओह!”
अम्मा मौसी से अफसोस प्रकट करने लगी थीं। इस बीच तवे पर रोटी के जलने से उठी दुर्गंध रसोई में फैलने लगी। मैंने नाक-भौं सिकोड़ी।
“शोभा-यात्रा में कौन जाएगा?” मैंने अम्मा से पूछा।
“तुम ही हो आना।”
“मैं?…पिताजी हो आएँगे।” मैंने टाल देने का प्रयास किया।
“उनकी आधी दिहाड़ी टूट जायगी बेटे!” अम्मा पूर्ववत् रोटी बेल रही थीं।
“मुझे रोजगार-दफ्तर जाना है अम्मा।”
“हुँऽऽऽ…” अम्मा ने हुंकारी भरी और चकले पर से रोटी को उठाकर तवे पर झटके-से पटक दी और उनके होठों से अस्फुट-से स्वर निकलने लगे—“इस पंडित को आज ही मरना था, कल क्यों नहीं मर गया…!”
“ऐसा क्यों?” मैंने चौंकते हुए पूछा।
“रविवार जो था।” अम्मा हौले-से बोली।
तवे पर पड़ी रोटी जलने लगी थी, तभी मैं कराह उठा। बायीं ओर का मसूढ़ा दाढ़ों के मध्य बुरी तरह-से कुचल गया था।
डण्डा
“जीतेगा भई जीतेगा—तीरवाला जीतेगा…”
“जीतेगा भई जीतेगा—हाथवाला जीतेगा…”
“जीतेगा भई जीतेगा—सीढ़ीवाला जीतेगा…”
“जीतेगा भई जीतेगा—कमलवाला जीतेगा…”
देशभर में लोकतंत्रीय चुनावों का प्रचार जोरों पर है। थैलियाँ खुली हुई हैं। अवसरवादी प्रचारकों की पौ-बारह है। चारों ओर उत्सव और आनन्द का वातावरण छाया हुआ है; परन्तु जनता-जनार्दन हर प्रकार की मार से त्रस्त है।
सन्ध्या-समय बच्चों की एक टोली नारे लगाती हुई गली में से गुजरती है…
“जीतेगा भई जीतेगा—डण्डेवाला जीतेगा…”
“जीतेगा भई जीतेगा—डण्डेवाला जीतेगा…”
टोली जोश-ओ-खरोश के साथ आगे बढ़ रही है…
“लोकतंत्र में कौन बली?”
“डण्डा…भाइयो! केवल डण्डा…”
“हमारा चुनाव-निशान क्या है?”
“डण्डा…” सम्मिलित-स्वर का उद्घोष होता है।
वरदी और वरदी
…घने बीहड़ों में एक नामी डाकू और उसके गिरोह का पीछा करते हुए पुलिस-दल के तीन व्यक्ति उनकी गोलियों का शिकार हो गये। उनमें एक था इंस्पेक्टर, दूसरा सब-इंस्पेक्टर और तीसरा सिपाही। राज्य-सरकार ने इन तीनों को मरणोपरांत पुरस्कार देने की महती घोषणा की। समाचारपत्रों ने इस सरकारी घोषणा को खूब उछाला। पुलिस-दल की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
…अंतत: गणतंत्र-दिवस पर इंस्पेक्टर को 50,000 रुपये, सब-इंस्पेक्टर को 25,000 रुपये और सिपाही को 10,000 रुपये एक भव्य समारोह में उनकी विधवाओं को मुख्यमंत्री महोदय ने प्रदान किये। …समारोह सुख-शांतिपूर्वक सम्पन्न हुआ। मुख्यमंत्री जिस हेलीकॉप्टर से आये थे, पुन: उसी में जाकर घुस गये।
…अगले दिन वित्त-विभाग को हेलीकॉप्टर के भाड़े का मात्र 93,050 रुपये का बिल पास होने के लिए भेजा गया। …इसके अतिरिक्त और भी कई बिल थे जोकि स्थानीय नेताओं और अधिकारियों ने अपने-अपने ‘प्रभाव’ द्वारा व्यापारीवर्ग से लगभग पूरे करवा दिये थे।
पाठको! उपर्युक्त जैसे समारोह तो होते रहते हैं…बिल बनते रहते हैं…बिल पास होते रहते हैं। मूल राशि से अधिक अनाप-शनाप खर्चे होते रहते हैं, परन्तु अहम सवाल यह है कि एक ही अभियान में तीन व्यक्ति शहीद हुए। तीनों के बाल-बच्चे एक-जैसे, समस्याएँ एक जैसी, जान एक जैसी…फिर पुरस्कार की राशियों में अन्तर क्यों?
नि:सन्देह, उनकी वरदियों का कपड़ा एक-जैसा न था।
कुमार नरेन्द्र, संक्षिप्त परिचय: जन्मतिथि—25 सितम्बर, 1954 को दिल्ली में शिक्षा—(क) स्नातक, विशेष विषय इतिहास के साथ
(ख) तिब्बती भाषा और साहित्य उपाधिपत्र
(ग) विशारद उपाधिपत्र लेखन—कहानी, लघुकथा, लेख आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं संकलनों में सम्मिलित सम्पादित कार्य—(क) एक कदम और(कहानी संकलन, 1976)
(ख) बोलते हाशिए(लघुकथा संकलन, 1981)
(ग) साँझा हाशिया(लघुकथा संकलन, 1991)
(घ) कफ़न(प्रेमचंद की कहानी का प्रौढ़-शिक्षा के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट हेतु रूपांतरण, 2005) सम्प्रति—पारुल प्रकाशन का संचालन सम्पर्क—889/58, त्रिनगर, दिल्ली-110035 मोबाइल—09210043838 ई-मेल—prakashanparul@gmail.com
चुरु(राजस्थान) से भाई डॉ रामकुमार घोटड़ का अनुरोध आया कि तेलुगु-लघुकथाओं के उपरान्त इस माह मलयालम की लघुकथाओं को ‘जनगाथा’ पर दिया जाय। उनके आदेश का पालन करते हुए, स्वयं द्वारा संपादित लघुकथा-संकलन ‘मलयालम की चर्चित लघुकथाएँ’ से चुनकर प्रस्तुत कर रहा हूँ ये लघुकथाएँ—
-->
पितृ-आत्माओ सावधान!
किलिरूर राधाकृष्णन
बच्चा भीगी धोती पहनकर तर्पण करने बैठा। उसके पिता की मृत्यु हुई थी।
“झारी के आगे जल छिड़ककर हाथ धोकर पवित्री पहनो।” पंडितजी बोले।
बच्चे ने स्तब्ध-भाव से माता की ओर देखा। माता ने उसे अनूदित कर दिया—“ड्रोप सम वॉटर देअर ऑन द फ्लोर, पुट दैट रिंग-लाइक थिंग ऑन युअर फिंगर।”
इतने समय तक पंडितजी स्वयं मुँह खोलकर स्तब्ध-से बैठे रहे और तुरन्त ही चैतन्य होकर अगला उपदेश जारी किया—“मरे हुए व्यक्ति का नाम और जन्म-नक्षत्र विचारकर, इस धारणा के साथ कि—आत्मा को दे रहा हूँ—तिल, फूल, चन्दन और जल मिलाकर…”
‘मम्मी’ के ‘ट्रांसलेशन’ के लिए उठी हुई आँखों और उस बैठे बच्चे को मैंने सहानुभूति के साथ देखा।
मरे हुए उस बेचारे की आत्मा शायद अब किसी अंग्रेजी माध्यम के एल के जी में प्रवेश पाने को भटक रही होगी।
धन्धा
अबुल्लिस ओलिप्पुड़ा
कमलाक्षी कल रात को कमाए हुए पैसे गिन रही थी। तभी उसने देखा कि आँगन में दो युवक खड़े हैं। एक के हाथ में एक कैमरा भी है।
एक ने कहा—“हम पत्रकार हैं…आप-जैसे लोगों के बारे में हम एक फीचर तैयार कर रहे हैं। अगर आपको एतराज़ न हो तो आपकी एक फोटो और…कुछ जानकारी भी दे सकें तो…अच्छा रहेगा।”
कमलाक्षी मुस्कराई। उसने युवकों को आवश्यक जानकारी दी। दोनों सन्तुष्ट होकर वापस चले गए।
उसी दिन, रात को उन युवकों में से एक, पुन: कमलाक्षी के कुटीर के सामने दिखाई पड़ा।
कमलाक्षी ने पूछा—“अब क्या जानना बाकी है?”
उसने जवाब दिए बिना पचास रुपए का नोट निकालकर कमलाक्षी की ओर बढ़ाया। फिर कमलाक्षी की कमर पकड़कर अन्दर घुस गया।
तब कमलाक्षी ने कहा—“आपने पूछा था न कि हम लोग यह धन्धा बन्द क्यों नहीं करतीं? बाबूजी,…आप-जैसे लोग जब तक इस दुनिया में हैं, हम यह धन्धा बन्द नहीं कर सकतीं।”
आघात
सजीवन कल्लाच्ची
“मास्सा…ऽ…ब, ये लोग हमें खेलने नहीं दे रहे…गड्ढों में भरा पानी हमारे ऊपर उलीच रहे हैं बार-बार!” प्ले-ग्राउण्ड से आवाज़ आई।
यह बारिश के दिनों की एक दोपहर थी। पानी पड़ना हालाँकि रुक गया था, लेकिन स्कूल के मैदान में यहाँ-वहाँ जमा हो गया था।
“हे…ऽ…अबे…ऽ…कौन है वहाँ…?” आवाज़ सुनकर मास्टरजी की नींद उचट गयी और वे चिल्ला उठे।
“दूसरी कक्षा के छात्र हैं मास्सा…ऽ…ब, एक हिन्दू और एक…” बच्चों के बीच से पहली कक्षा की सफिया उनकी आवाज़ के जवाब में बोली।
उसका जवाब सुनते ही मास्टरजी की रही-सही नींद भी जाती रही। विस्फारित नेत्रों से उन्होंने लड़की की ओर देखा—क्या बोला इसने!!
उनकी आँखों से दोपहर की क्या, जिन्दगीभर की नींद गायब हो गयी।
कुत्ते
मणंबूर राजनबाबू
मुझे कलक्टर साहब से मिलना था। पता चला कि वे अपने निवास पर नहीं, रेस्ट-हाउस पर हैं। घूमता-फिरता अंतत: मैं वहीं जा पहुँचा। मैंने पाया कि रेस्ट-हाउस के पूरे प्रांगण में कुत्ते घूम रहे थे। कलक्टर साहब के प्रिय कुत्ते।
अब, कलक्टर साहब से मिल पाने की दो ही सूरत हैं—बाहर खड़ा मैं सोचने लगा—पहली यह कि इन कुत्तों के घेरे को तोड़कर उन तक पहुँचा जाए; और दूसरी यह कि इनके मुँह में हाथ डालकर इनके हलक से कलक्टर साहब को बाहर खींच लिया जाए।
ये दोनों ही तरकीबें मेरे-जैसे आदमी की ताकत से बाहर थीं; लेकिन साहब से मिलना बड़ा जरूरी था, सो मैं सोचता रहा।
तभी, रेस्ट-हाउस के वॉचमैन ने संकेत से मुझे बुलाया—“क्या चाहिए?”
“मुझे साहब से मिलना है, लेकिन…।” मैंने कुत्तों की ओर इशारा करके अपनी शंका उस पर जाहिर की।
“तुम्हारे साथ यह कौन है?”
“बेटी है मेरी।”
“ठीक है।” वह मूँछें मरोड़ते हुए सीना फुलाकर बोला—“इस निवाले को इधर ही छोड़ जाओ और अन्दर जाकर साहब से मिल लो।”
उसके इस कथन से मुझे थोड़ी राहत-सी मिली और मैं भीतर घुस गया, लेकिन उसकी दरियादिली का मतलब बहुत देर बाद मेरी समझ में तब आया—जब कलक्टर साहब से मुलाकात के बाद मैं बाहर आया।
कुत्ते उस अबोध की बोटियाँ नोंच-खसोट चुके थे।
ज्वालामुखी
सी वी बालकृष्णन
सीढ़ियाँ उतरती हुई पत्नी नीचे कमरे में आयी। आवाज़ सुनते ही वह सोफे पर उठ बैठा। कमरा एक अनोखी खुशबू से महक उठा। अतीव आश्चर्य के साथ उसने पत्नी की ओर देखा।
बेशक मेरी पत्नी चन्द्रमुखी है। इतनी सुन्दर श्रीमती के साथ जीते इतने साल हो गये! पहनी हुई यह रेशमी साड़ी मैंने शादी के दिन इसे ‘प्रेजेन्ट’ की थी।–वह उसे देखता ही रह गया।
पत्नी एक मुस्कराहट के साथ उसके करीब आ बैठी।
“आप मुझे ऐसे क्या देख रहे हैं, जैसे पहले कभी न देखा हो।”
“नहीं तो…” सुनते ही उसके मुँह से निकला।
“सोफे में बैठे-बैठे ही सोने का इरादा है क्या?” पत्नी दोबारा मुस्करायी।
“नहीं तो।” वह फिर बोला।
“अभी सो जाने का समय नहीं हुआ है। मैं आपके लिए पान लगा लाऊँ?”
पत्नी की बातें सुनकर उसे बहुत ही खुशी हुई। श्रीमती पान का डिब्बा ले आयी, समीप बैठी और पान बनाने लगी। चाँदी का डिब्बा था। पान बनाते वक्त उसने देखा कि श्रीमती की उँगलियाँ बहुत ही सुन्दर थीं। उसने श्रीमती से कहा,“बहुत दिन बाद इतने प्यार से पान लगा रही हो।”
पत्नी कुछ बोली नहीं, सिर्फ मुस्कराती रही। फिर बोली,“आगे से मैं आपको हमेशा इसी तरह पान खिलाती रहूँगी।”
वह और भी खुश हुआ। मन में श्रीमती के प्रति प्रेम बढ़ा। उसने प्यार से पत्नी के बालों में हाथ फेरा। श्रीमती ने पान का बीड़ा देने के लिए हाथ उसकी ओर बढ़ाया। उसने लेने से इन्कार किया।
प्यार से पत्नी ने अपने हाथों से उसके मुँह में पान रखा। वह पान चबाने लगा। पान खाने में मस्त रहा। पान की सुगन्धित और स्वादभरी पीक से उसका मुँह भर गया।
“आप यहाँ क्या कर रहे हैं? नींद आ रही है तो बैडरूम में जाकर नहीं सो सकते क्या?” अचानक श्रीमती की दोपहर के सूरज-सी तीखी आवाज़ सुनते ही वह चौंककर उठ बैठा।
पत्नी ने तीखी नजरों से उसकी ओर देखा।
“मैं एक बहुत ही सुन्दर सपना देख रहा था।” वह धीरे-से बोला। बिना कुछ बोले मुँह बिचकाकर वह रसोई की ओर चलती चली गयी। जैसे-ही वह रसोईघर तक पहुँची, उसने पीछे से उसे आवाज़ दी—“सपना सुनोगी?”
“अपना पागलपन अपने पास रखो।” वह बोली और रसोई में घुस गयी।
उपनयन
कण्णन मेनन
उपनयन-कर्म और दोपहर का भोजन करने के बाद, लम्बी बोरी में दक्षिणा के रूप में मिले हुए नयी धोती, चावल और नारियल आदि को भरते हुए तन्त्रि के पास सुब्रह्मण्यम जा खड़ा हुआ। तन्त्रि हँसा, साथ में वह भी।
“कल पिताजी ने बताया था कि स्वामी एक बड़े पण्डित हैं।”
उसने गर्व से सिर हिलाया।
“मुझे एक शंका है।”
“क्या है?”
“हम क्यों यह पवित्र-धागा धारण करते हैं?” सुब्रह्मण्यम ने जनेऊ को छूकर पूछा।
“तू ब्राह्मण है, इसलिए यह पवित्र-धागा धारण करना है।”
“मेरा शरीर खुजला रहा है। मैं इसे उतारने जा रहा हूँ।”
“अरे-अरे, ऐसा नहीं करना। बड़ा पाप है।”
“पाप? पाप यानी क्या है स्वामी?”
तन्त्रि को गुस्सा आया। बोला,“जो नहीं करना चाहिए उसे करना पाप है।”
बच्चे को हँसी आयी। पूछा,“तो स्वामी ने कल रात जो सिगार पिया था?”
बच्चा मुझे कष्ट देने के भाव से ही आया है—यह उसे पता चल गया।
“वह तो मजाक में पिया था।”
“तो मजाक में पाप कर सकते है?”
वह कुछ नहीं बोला। बच्चे ने फिर शुरू किया—“कल पिताजी जो बोतल लाये थे, वह खाली कर दिया, है न?”
उसने घूरकर उसे देखा।
बच्चे ने छोड़ा नहीं—“स्वामी, ब्राह्मण लोगों के लिए मद्यपान पाप है न?”
तन्त्रि दुबक-सा गया। यह कोई सुन रहा है क्या?—इसे देखने के लिए उसने चारों ओर नजरें घुमायीं। सत्यानाश! यह शरारती न जाने अब क्या-क्या पूछने वाला है?
“शरीर ठीक नहीं था। सारा बदन दर्द कर रहा था। पिताजी ने कहा था कि थोड़ा पीने से कम हो जायगा…इसलिए…एक घूँट…।”
“यानी, कल ही तुमने दो पाप किया था, है न?”
उस छोकरे के मुँह पर एक थप्पड़ मारने का मन हुआ। इसी बीच तन्त्रि द्वारा पहनाए गए पवित्र धागे को उतारकर बच्चे ने धीरे-धीरे उसे अपने निकर के पॉकेट में रख लिया था।
“जाकर कुर्ता पहनो। जनेऊ के बिना देखेगा तो कोई क्या सोचेगा?” पीछे से पिता ने बच्चे को धिक्कारा।
बच्चे के भीतर जाने का वह क्षण देखकर अपने दोस्तों से बातचीत कर रहे उसके पिताजी को उसने अपने पास बुला लिया।
“जल्दी ही उसे किसी डॉक्टर के पास ले जाओ। कुछ गड़बड़ है। क्या-क्या बेमतलब के सवाल उसने मुझसे पूछे? मैं एकदम हड़बड़ा गया!”
पिताजी हँसे,“मैंने सब सुन लिया। तुम इतने मूर्ख हो, यह मैं नहीं जानता था।”
बराबरी
मुंडूर कृष्णन कुट्टी
यह जमीन-जायदाद खरीदने-बेचने की जगह है। हम रजिस्ट्रार कार्यालय के कर्मचारी हैं।
घूस इतनी मिलती है कि शाम तक हमारी तिजौरी भर जायेगी। छोटे और बड़े ओहदों के अन्तर को भूलकर दिन ढलते ही हम रिश्वत की रकम को बाँट लेते हैं। उसमें बराबरी है। इसके अलावा और किसी भी ममले में हम न्याय नहीं करते।
कर्मचारियों में से करीब आधे सत्तारूढ़ दल के अनुयायी हैं और बाकी विपक्षी दल के। परस्पर विमर्श के द्वारा हम ही तय करते हैं कि किस कर्मचारी को किस यूनियन का सदस्य बनना है।
कल एक नया आदमी सर्विस में आया। उसे हमने अभी-अभी गठित ‘गौरी अम्मा यूनियन’ का सदस्य बनाया। इस तरह उस पार्टी की भी एक शाखा कार्यालय में खड़ी हो गयी।
‘जनगाथा’ के इस अंक में प्रस्तुत हैं मूल तेलुगु से श्रीमती पारनन्दि निर्मला द्वारा हिन्दी में अनूदित कुछ लघुकथाएँ। इनका भाषा संपादन मेरे द्वारा किया गया है और ये शीघ्र प्रकाश्य लघुकथा-संकलन से उद्धृत हैं—बलराम अग्रवाल
दासी/सरे राममोहन राय मा
-->लिक ने उसे बाजार से खरीदा था। खरीदकर लाती हुई उसने अपने मालिक को बड़े प्रेम से… ममता से देखा था। घर आने के बाद उसके तीन लड़कों और लड़कियों को, बहुओं को, पोते-पोतियों को, अड़ोस-पड़ोस के लोगों को बड़े आदर-भाव से देखा था उस दासी ने।
उसके बाद वह उन लोगों की विश्वासपात्र बन गई।
षडरस भोजन करने का मन होने पर उसने कभी मुँह नहीं खोला। दोनों वक्त मालिक द्वारा दिए गए दो मुट्ठी भात को ही वह बड़े चाव से खाती थी। पीने को पानी न मिलने पर, उस परिवार के सदस्यों के स्नान करने के बाद बचे हुए पानी को कटोरे में डालकर देने से, उसे वह अमृत समझकर पीती थी। उस घर के सदस्यों को देखकर वह खुशी से चहक-चहक उठती थी।
दिन बीतते गए। मकर-संक्रान्ति का त्यौहार आया। मालिक ने पितरों की तुष्टि के लिए पूजा का अनुष्ठान किया। ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा भी दी। यह देख वह दासी बहुत ही आनन्दित हुई।
दूसरे दिन ‘कनुवा’* नामक पर्व मनाते हैं। मालिक ने उसे अपने हाथों में उठा लिया। यह देख, फौरन उसकी समझ में आ गया कि वे अब क्या करने जा रहे हैं! अपनी बोली में उसने गिड़गिड़ाना-रोना शुरू किया। अब तक अपने दासी होने के दुर्भाग्य पर भी संतोष था उसे, लेकिन…। मालिक को न तो उसकी भाषा ही समझ में आई और न ही उसके रोने-गिड़गिड़ाने पर उसने कोई ध्यान दिया। और तो और, घर के बाकी सब लोगों की आँखें भी मालिक द्वारा उसे हाथों में उठा लिए जाने से चमक उठी थीं।
पूजा वाली जगह पर लाकर एक तेज और बारीक धार वाले चाकू ने ‘सर्र’ से उसका गला काट डाला। ‘फस्स’ की आवाज के साथ खून का फव्वारा उसके शेष शरीर से फूट पड़ा और जमीन पर फैल गया। अलग हुई गरदन और बाकी शरीर, दोनों ही, थोड़ी देर जमीन पर फड़फड़ाकर शान्त हो गए।
बेचारी दासी!
मांसाहारी इस पर्व पर मुर्गी की बलि देकर प्रसाद-रूप में उसका मांस खाते है।
यह है प्रजातन्त्र/श्रीचरण मित्रा
दोनों बेटों को केवल चार दिनों के अन्तराल में घर वापस आया देख माँ अन्नपूर्णा घबरा उठी। वे कोई छोटे बच्चे न थे, उन्हें वोट का हक मिले पाँच-छ: साल बीत गए थे।
“माँ…अम्मा…इस लाल कमीज को हमारे प्रेसीडेन्ट साहब ने दिया है। मैंने उनसे कहा था कि पहनने को एक कमीज दें, तो यह कमीज उन्होंने मुझे दी। इसे देकर उन्होंने कहा—देख रे, तू इसे पहनकर बिल्कुल देशभक्त लग रहा है। सब तुझे कामरेड कहेंगे। इसे पहनकर मैं मालिक के काम से उनके गाँव जा रहा था…।”
तब लाल कामरेड की तरह गए और बुझी लकड़ी की तरह वापस लौटे अपने बेटे से माँ ने पूछा—“फिर क्या हुआ?”
“मैं अपनी राह अकेला बढ़ा जा रहा था तब एक पुलिस-बाबू मुझे पकड़कर बोला—क्यों रे! कहाँ जा रहा है? नक्सलाइट है क्या? कोई खबर कहीं पहुँचाने जा रहा है?…मेरे बार-बार मना करने पर भी वह मुझे लाठी से पीटने लगा। बोला—अगर तुझको कुछ भी नहीं मालूम है तो कम्यूनिस्टों वाला यह लाल कमीज क्यों पहना है?…यों कहते हुए अपने बूट से उसने मेरे बगल में जोर का ठोकर मारा। उसके पैर पकड़कर प्रार्थना करने, गिड़गिड़ाने पर बड़ी मुश्किल से उसने मेरा पीछा छोड़ा…।”
गरीब माँ का हृदय अपने जवान बेटे की इस बेबस हालत को देखकर पानी से बाहर पड़ी मछली-सा तड़प उठा।
मारे दर्द के, दो दिनों तक वह खाना नहीं खा सका। तीसरे दिन, रिक्शा लेकर दूसरा भाई घर से निकला ही था कि चार लोग मारपीट करके जबरन उसे उठाकर ले जाने लगे। उन्हें ऐसा करते देखकर माँ का हृदय फट पड़ा।
“क्या हुआ बाबू…क्या हुआ रे?” पूछने पर उन चारों में से एक ने उत्तर दिया—“कया कहूँ अम्मा! विजयवाड़ा के लिए सत्याग्रह करते हमारे एक नेता को किसी ने चाकू घोंपकर मार डाला है। चश्मदीदों का कहना है कि मारने वाले ने पीला कमीज पहना था। यह भी पीला कमीज पहने है, इसलिए…”
“हाय राम! यह कैसा अंधेर है भगवान!! लाल कमीज पहनने से पुलिस वाले मरम्मत करते हैं और पीली कमीज पहनने से जनता पीटने लगती है। इससे तो अच्छे ये घर में पड़ी फटी-पुरानी कमीजें पहनकर ही रह रहे थे…।” कहती हुई बुढ़िया छाती पीट-पीटकर रोने लगी।
और उसके बाद फिर एक दिन—
बताए गए काम को करने में गधे की तरह लग जाने वाले उन दोनों भाइयों को चुनाव में खड़े होने वाले एक उम्मीदवार ने उनके लाख मना करने पर भी खद्दर की कमीजें सिलवाकर जबर्दस्ती पहना दीं। अब उनकी क्या हालत होने वाली है—यह तो श्रीराम प्रभु ही बता सकते हैं।
चोट खाया गणित/दार्ल तिरुपति राव
“बिटिया! कहाँ तक पढ़ी हो?”
“बी ए।”
“केवल बी ए पढ़ने से क्या होता है? बी एड भी कर लिया होता तो अच्छा होता।…कौन-सी श्रेणी में पास किया है?”
“फर्स्ट क्लास।”
“इससे क्या? असल चीज तो दिमाग है। किसी बैंक में नौकरी पाने के लिए दिमाग चाहिए, दिमाग।”
“छुट्टी के दिनों में संगीत भी सीखा है हमारी बिटिया ने।” लड़की के पिता ने कहा,“थोड़ा-बहुत ललित संगीत भी आता है इसे।”
“रेडियो-स्टेशन पर गाती है?”
“नहीं जी, रेडियो में गाने लायक नहीं आता।”
“फिर क्या फायदा? अरे, गुनगुना तो मैं भी लेता हूँ एकाध गाना। रेडियो में गाना आता हो तो नाम भी मिलता है और पैसा भी।”
“फुरसत के समय में साहित्यिक पुस्तकें या पत्रिकाएँ पढ़ने का शौक है इसको। बिना मतलब सैर-सपाटे पर निकल जाना या सिनेमा-हाल में घुस बैठना पसन्द नहीं है इसको।”
“सिर्फ पढ़ती ही है या कहानी-वहानी कुछ लिख भी लेती है?” एक ठहाका लगाते हुए उन्होंने पूछा।
“नहीं-नहीं, लिखने की आदत नहीं है जी।”
“हूँ…ऽ…लिखने की आदत नहीं है! अभी कहानियाँ लिख रही होती तो आगे उपन्यास भी लिख सकती थी। निर्माता लोग उपन्यासों के आधार पर ही फिल्में बनाते हैं। अरे हाँ, एक बात पूछना तो मैं भूल ही गया। उम्र कितनी है इसकी?”
“पच्चीस पूरे कर चुकी है…”
“इसका मतलब कि सेन्ट्रल गवर्नमेंट, बैंक आदि में आवेदन करने की तो इसकी उम्र निकल गई। अब तो ज्यादा-से-ज्यादा किसी जगह पर ‘सेल्स गर्ल’ का काम ही कर सकती है। ठीक है, मैं अब चलता हूँ। देख तो लिया ही है न, निर्णय की सूचना हम आपको पत्र द्वारा दे देंगे।”
लड़की का पिता अभी कुछ-और बातें करना चाहता था, लेकिन वे सज्जन उठ खड़े हुए और बाहर निकल गए।
कुछ ही दिन बाद वह लड़की एक राष्ट्रीयकृत बैंक में प्रोबेशनल ऑफीसर के पद पर चुन ली गई। उड़ते-उड़ते यह बात उन लोगों तक भी जा पहुँची। एक दिन, लड़की बताने वाले बिचौलिए से रास्ते में उनकी भेंट हो गई। उसे बीच में ही रोककर उन्होंने पूछा,“अरे हाँ, उस लड़की का रिश्ता कहीं हुआ या नहीं?”
“किस लड़की का?” बिचौलिए ने पूछा, हालाँकि वह समझ चुका था कि वे किस लड़की के बारे में पूछ रहे हैं। वे भी इस बात को भाँप चुके थे, फिर भी शर्म को ताक पर रखकर उन्होंने अपनी बात स्पष्ट कर दी।
“जहाँ तक मुझे मालूम है, उसका विवाह अभी तक नहीं हुआ है।” बिचौलिए ने उन्हें बताया।
“क्यों?” अनजान बनते हुए उन्होंने पूछा, फिर आगे बोले,“उस लड़की की जन्मपत्रिका से मेरे बेटे की जन्मपत्रिका शत-प्रतिशत मिलती है। उसने न जाने कितनी लड़कियाँ देखीं, लेकिन उसे बस यही लड़की पसंद है…पता नहीं क्यों?”
“लेकिन वह लड़की तो फिलहाल विवाह नहीं करना चाहती है।” बिचौलिए ने कहा।
“क्यों भला? शादी-ब्याह से विरक्ति हो गई है क्या?”
“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।” बिचौलिया बोला,“उसके स्वयंवर में अनेक राजकुमार उसके कदमों पर आ झुके हैं। अपने योग्य ही लड़का मिलने तक वह रुके रहना चाहती है, बस।” यह कहते हुए बिचौलिया बिना उनसे विदा लिए आगे बढ़ गया।
स्पर्श/कान्ड्रेगुल श्रीनिवास राव
धीमी गति से चलती उस लॉरी के पीछे दौड़ते हुए शेषगिरि ने ड्राइवर से पूछा,“यह तगरपुवलसा जाएगी?”
“तीन रुपए लगेंगे।” उसके स्थान पर क्लीनर ने कहा।
शेषगिरि ने आगा-पीछा न देखा। एक पल भी व्यर्थ किए बिना वह लॉरी में चढ़ गया। लॉरी तेज गति से दौड़ने लगी। चलते-चलते वह अक्किवेड्डिपालेम को पार कर गण्डगुण्डा के समीप पहुँच रही थी। सफेद साड़ी पहने हाथ में टोकरी लिए एक युवती को लॉरी रोकने का इशारा करते देख ड्राइवर ने लॉरी को सड़क के किनारे खड़ा कर दिया।
“कहाँ जाना है?” क्लीनर ने दरवाजा खोलते हुए पूछा।
“चिट्ठीवलसा जाना है।” गाड़ी पर चढ़ने का उद्यम करते हुए युवती बोली।
उसे अपनी सीट की ओर आता भाँपकर शेषगिरि थोड़ा सिकुड़कर बैठ गया। वह बोनट पर बैठ गई। लॉरी चल दी। शेषगिरि की एक ही कमजोरी थी—स्त्री के सौन्दर्य को आँखों से पी जाना।
ड्राइविंग में निमग्न ड्राइवर, खिड़की के बाहर झाँकता क्लीनर और कन्धे से खिसककर बार-बार नीचे गिरता उस युवती का आँचल—सभी शेषगिरि के लिए सहायक सिद्ध हुए। वह उसके उन्नत वक्षस्थल को देखता हुआ भरपूर आनन्द का उपभोग कर रहा था। लगातार उसे देखते रहने से उसके मन में कामेच्छा उत्पन्न हो गई। उसे आलिंगनबद्ध कर उसके स्तनों का भरपूर स्पर्श करने की अपनी भावना को उसने बड़ी मुश्किल से दबाया। युवती का ध्यान उसकी ओर था ही नहीं। उसकी दृष्टि-चेष्टाओं से अनजान वह सामने से क्रॉस करती अन्य गाड़ियों को देखने में मग्न थी।
शेषगिरि की मानसिक हालत लगातार बिगड़ रही थी। कामेच्छा बलपूर्वक उस पर अधिकार जमा लेना चाहती थी। लॉरी जितनी तेजी से दौड़ रही थी, उतनी ही तेजी से शेषगिरि के भावनाएँ भी भड़क रही थीं। अचानक सड़क के मोड़ पर अत्यन्त तेजी से आती एक अन्य लॉरी को देखकर ड्राइवर ने जोरों से ब्रेक को दबाया, लेकिन वह दुर्घटना को टाल नहीं पाया। टायर ‘की…ऽ…च-की…ऽ…च’ की आवाज में चिल्ला उठे। दोनों वाहन टकरा गए। यह सब पल-भर में ही हो गया। जनता के हाथों पिटाई होने के डर से दोनों लॉरियों के ड्राइवर और क्लीनर लॉरियाँ छोड़कर भाग खड़े हुए। टूटे काँच के टुकड़ों से शेषगिरि को काफी गम्भीर चोटें लगीं। माथे से खून धारा-प्रवाह बहने लगा था। अचेतावस्था हावी होने के कारण उसकी पलकें झपकी जा रहीं थीं।
बोनट पर बैठी उस युवती को भी चोटें आई थीं, लेकिन अपनी चोटों पर ध्यान न देकर उसने शेषगिरि को थाम लिया। उसके माथे से बहते खून को अपने आँचल से पोंछकर उसने घाव को हथेली से दबा लिया। धीरज और साँत्वना देते हुए उसने उसके सिर को अपनी छाती में दबा लिया।
उसके कोमल स्पर्श को पाकर शेषगिरि ने बलपूर्वक अपनी आँखें खोलीं। माँ की छाती पर सिर रखकर थकान मिटाने-जैसा सुख उसने महसूस किया और बालकों-जैसी दृष्टि से आभारपूर्वक उसे निहारते हुए सहसा अचेत हो गया।
आम आदमी/वेलचेटि सुब्रह्मण्यम
उन्होंने ऐसा क्यों किया?
-->
विश्वास कीजिए, भरे हॉल में हर व्यक्ति स्तब्ध रह गया था। दरअसल, उनके इस कृत्य पर विश्वास किया ही नहीं जा सकता था। अगर किसी सामान्य व्यक्ति ने ऐसा काम किया होता तो अलग बात थी, लेकिन यह तो साक्षात् महामहोपाध्याय द्विवेदुल संगमेश्वर शास्त्री गारू ने किया था। इसीलिए तो यह आश्चर्य का विषय बन गया था।
वास्तव में हुआ यह कि एक प्रमुख साहित्यिक पत्रिका द्वारा आयोजित ‘बहुभाषा कहानी प्रतियोगिता’ में प्रथम पुरस्कृत शास्त्रीजी की कहानी को घोषित किया गया था। भारतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित शास्त्रीजी की रचना को इस पुरस्कार का मिलना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी। उल्टे, इस प्रतियोगिता के लिए शास्त्रीजी जैसे महान लेखक का रचना भेजना ही पत्रिका के लिए गरिमा की बात थी। पत्रिका द्वारा आयोजित पुरस्कार वितरण समारोह में उनके उपस्थित होने ने उसे भव्यता प्रदान कर दी थी। सारा कार्यक्रम ठीक-ठाक ही चला था, लेकिन शास्त्रीजी का वह अचानक व्यवहार किसी की समझ में नहीं आया।
पुरस्कार प्राप्त करने से पूर्व अपना वक्तव्य देते हुए उन्होंने घोषित किया—“सच कहा जाय तो इस सत्कार, सम्मान और पुरस्कार का अधिकारी मैं नहीं हूँ। इस कहानी को मैंने नहीं मेरे घर पर काम करने वाले एक युवक ने लिखा है। अत: मेरा अनुरोध है कि राज्यपाल महोदय के द्वारा ओढ़ाया जाने शाल, दिया जाने वाला सम्मान-पत्र और पुरस्कार की राशि का चेक—मुझे नहीं, मेरे साथ आए उस युवक को ही मिलने चाहिएँ। हुआ वस्तुत:यह था कि छ:-सात पत्रिकाओं ने इस सुन्दर कहानी को जब लौटा दिया तब इस साहित्यिक समाज पर इस सत्य को जतलाने के लिए ही मैंने अपने नाम से इस कहानी को इस प्रतियोगिता हेतु भेज दिया था।…”
इस वक्तव्य के रूप में अपनी बात कहकर वे अपने आसन पर जा बैठे थे। समारोह में उपस्थित इने-गिने संपादकों के सिवा कोई ऐसा नहीं था, जिसके मुँह से ‘वाह’ न निकल पड़ी हो।
असहनीय शोर/भामिडि पाटि रामगोपालम
एक मकान के मालिक से सुब्बाराम की भेंट हुई। वह किराए के लिए मकान लेने उसके घर गया था। मकान उसको पसंद आया और मालिक ने देना भी स्वीकार कर लिया। लेकिन
-->कहा,“एक बात पूछनी है—आपके यहाँ कुत्ता तो नहीं है ना?”
“नहीं…नहीं है।” सुब्बाराम ने कहा।
“रेडियो या टी वी है?”
“जी, नहीं।”
“ग्रामोफोन या स्टीरियो सेट?”
“वह भी नहीं है।”
“संगीत सीखने वाली बहनें या हारमोनियम जैसा कोई बाजा?”
“नहीं हैं।”
“अलार्म देने वाली घड़ी?”
“नहीं।”
“छोटी-छोटी बातों पर रो पड़ने वाले बच्चे?”
“नहीं, हमारे अभी बच्चे नहीं हुए हैं।”
“अच्छी बात है।” मकान-मालिक ने कहा,“मेरे कहने का मतलब यह नहीं था कि आप नि:संतान रहें। दरअसल बात यह है कि मुझे शोरगुल बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं है।…आप कल ही इस घर में शिफ्ट कर सकते हैं।”
उसकी रजामंदी पाकर सुब्बाराम गेट तक गया, फिर लौटकर बोला,“साहब, एक विनती है।”
“कहिए।”
“मेरे पास एक पेन है जो मेरे पिताजी ने मुझे दिया था। लिखते समय वह पेन बर्र-बर्र की आवाज करता है। दिन में तो कुछ पता नहीं चलता है, लेकिन रात में आवाज जरूर आती है।
-->मैं लिखने-पढ़ने वाला व्यक्ति हूँ। मैंने सोचा कि मुझे पहले ही यह बात आपको बता देनी चाहिए इसलिए…। आपको कोई एतराज तो नहीं है न?”
बस, सुब्बाराम को वह मकान किराए पर नहीं मिला।
टेस्ट/वाई के मूर्ति
श्रीराम की शादी हाल ही में हुई थी। उसने एलूर में पत्नी के साथ नया घर बसाया था।
-->
“बाप रे बाप! क्या गर्मी है!!” घर आते ही परेशान होते हुए उसने पंखे का स्विच ऑन किया और कुर्सी पर जा बैठा।
पंखे की हवा से मेज पर पड़ा अन्तर्देशीय पत्र उड़कर उसकी गोद में आ गिरा। उठाकर देखा तो उसे खुला पाया। पता चला कि वह आज की ही डाक से आया था। भेजने वाले की जगह पर ‘सुशीला’ लिखा हुआ था। बस, उसका पारा सातवें आसमान पर जा चढ़ा।
“सीता…ऽ…ओ सीता…!” वह जोर-से चिल्लाया।
पति की आवाज सुनकर सीता ने भाँप लिया कि वह गुस्से में है, लेकिन उसके गुस्से का कारण उसकी समझ में नहीं आया। वह लगभग दौड़ती हुई-सी आई और पति की ओर देखने लगी मानो पूछ रही हो कि क्या बात है?
“इस लिफाफे को किसने फाड़ा है?” श्रीराम बरसा।
“मैंने।” सिर झुकाए सीता ने धीमे-से उत्तर दिया।
“छि:-छि! मेनर्सलेस ब्रूट! क्या तुम्हारी अक्ल मारी गई है? तुमने इसे क्यों फाड़ा? तुम्हें यह भी पता नहीं है कि दूसरे का पत्र पढ़ना असभ्यता है? देखो, इन्सान के रूप में पैदा होना ही काफी नहीं है, मेनर्स को जानना और निभाना भी आना चाहिए। जो इन्हें निभाना नहीं जानता वह इन्सान नहीं, जानवर है जानवर।”
“बात यह है जी कि…मैंने सोचा था कि कहीं कोई अर्जेण्ट मैटर न हो…इसलिए…” आँसुओं को बरबस रोकती सीता ने भर्राए स्वर में कहा।
“क्यों झूठ बोलती हो? तुमने क्या खोलते समय यह नहीं देखा कि प्रेषक के स्थान पर ‘सुशीला’ लिखा हुआ है? तुमने सोचा होगा कि न जाने यह सुशीला कौन है! यही जानने के लिए तुमने इसे खोला। यही बात है न?”
सीता चुप रही।
“जानती हो, यह सुशीला कौन है? यह मेरी चचेरी बहन है। यहाँ से दूर अपरा में रहती है। अपना अच्छा-बुरा मुझे लिखकर अपना मन हल्का कर लेती है। तुम्हें क्या जरूरत आ पड़ी थी इसे खोलकर पढ़ने की? देखो, किसी का भी पत्र खोलकर पढ़ना मुझे कतई पसंद नहीं है। तुमको यही मेरी आखिरी चेतावनी है। जाओ।”
बिना चूँ-चाँ किए वहाँ से चली गई भारत देश की मध्यवर्गीय गृहिणी सीता! उसके चले जाने के बाद आराम से श्रीराम ने पत्र को पढ़ना शुरू किया।
एक दिन, दफ्तर की छुट्टी थी, अत: वह घर पर ही था। पत्नी अपनी बहन के घर विजयवाड़ा गई हुई थी। अभी दो दिन भी नहीं बीते थे। घर में उसका जी ऊब रहा था इसलिए वह मेटिनी शो देखने जाने के लिए तैयार होने लगा। इतने में ही ‘पोस्ट’ आवाज सुनाई दी। बाहर निकलकर उसने पोस्टमैन से चिट्ठी ली। चिट्ठी—सीता धर्मपत्नी श्रीराम के नाम थी, बाकी पता भी यहीं का था। भेजने वाले का नाम देखा—वासू लिखा था।
एकबारगी उसे झटका लगा। यह वासू कौन है? जहाँ तक मुझे मालूम है, सीता के रिश्तेदारों में वासू नाम का कोई व्यक्ति नहीं है। फिर, यह कौन है? सीता का कोई बॉय-फ्रेंड या कॉलेज-फेंड तो नहीं है? जरूर इसका सीता के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध रहा होगा, अन्यथा इतना साहस न करता कि सीधे घर के पते पर पत्र लिख भेजता। संयोग से घर पर हूँ इसलिए यह मेरे हाथ लग गया। पता नहीं कितने अरसे से यह चक्कर चल रहा है!—यों सोचते हुए एकबारगी गुस्से से पागल हो गया श्रीराम। अन्तत: लिफाफे के मुँह को फाड़कर उसने पढ़ना शुरू किया—
‘पतिदेव को नमस्कार! आप अपने उसूल के कितने पक्के हैं, यही देखने के लिए यह एक छोटा-सा टेस्ट था। लेकिन बेचारे! इस टेस्ट में पास न हो सके। दुखी न होइए। कम-से-कम अब-से अपने उसूल को निभाने का प्रयत्न कीजिए। आप अपने उसूलों के पक्के रहें, इसीलिए देवीमाता के मंदिर में आपके नाम से पूजा-अर्चना करवा रही हूँ। तो फिर छुट्टी लूँ? आपकी पत्नी
‘जनगाथा’के इस अंक में हिन्दी व पंजाबी लघुकथा-लेखन में समान रूप से सक्रिय डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की लघुकथाएँ प्रस्तुत है। ये लघुकथाएँ भाई श्याम सुन्दर अग्रवाल के सौजन्य से प्राप्त हुई है जो स्वयं भी हिन्दी व पंजाबी दोनों भाषाओं की लघुकथाओं के साथ लेखन, संपादन, आलोचना और अनुवाद सभी स्तरों पर जुड़े हुए हैं। श्याम सुन्दर अग्रवाल जी की लघुकथाओं को आप अगस्त 2009 के ‘जनगाथा’ में पढ़ चुके हैं। दीप्ति जी की लघुकथाओं में मानव-मन की गहरी गुफाओं के दर्शन होते हैं। ऐसी गुफाएँ जो पाठक में अपने और भीतर…और भीतर प्रविष्ट होने की जिज्ञासा उत्पन्न करती हैं और किसी भी बिन्दु पर उसे हताश नहीं होने देतीं। पंजाब के इन दोनों ही कथाकारों की लघुकथाओं से ‘लघुकथा कहने की (न कि लिखने की) कला’ को जाना जा सकता है। प्रयत्न रहेगा कि ‘जनगाथा’ के माध्यम से देश अन्य प्रांतों के लघुकथा-लेखन से पाठकों को परिचित कराया जाता रहे। -बलरामअग्रवाल
गुब्बारा
गली में से गुब्बारेवाला रोज गुजरता। वह बाहर खड़े बच्चों को गुब्बारा पकड़ा देता और बच्चा माँ-बाप को दिखाता। फिर बच्चा खुद ही पैसे दे आता, या उसके माँ-बाप। इसी तरह एक दिन मेरी बेटी से हुआ। मैं उठकर बाहर गया और गुब्बारे का एक रुपया दे आया। दूसरे दिन फिर बेटी ने वैसा ही किया। मैने कहा, “बेटे, क्या करना है गुब्बारा? रहने दे न!” पर वह कहाँ मानती थी, रुपया ले ही गई। तीसरे दिन जब रुपया दिया तो लगा कि भई रोज-रोज तो यह काम ठीक नहीं। एक रुपया रोज महज दस मिनट के लिए। अभी फट जाएगा।
मैने आराम से बैठकर बेटी को समझाया, “बेटे! गुब्बारा कोई खाने की चीज है? नहीं न! एक मिनट में ही फट जाता है। गुब्बारा अच्छा नहीं होता। अच्छे बच्चे गुब्बारा नहीं लेते। हम बाजार से कोई अच्छी चीज लेकर आएंगे।”
अगले दिन जब गुब्बारेवाले की आवाज गली से आई तो बेटी बाहर न निकली और मेरी तरफ देखकर कहने लगी, “गुब्बारा अच्छा नहीं होता। भैया रोज ही आ जाता है। मैं उसे कह आऊँ कि वह चला जाए।”
“वह आप ही चला जाएगा।” मैने कहा। वह बैठ गई।
उससे अगले दिन गुब्बारेवाले की आवाज सुनकर वह बाहर जाने लगी तो मुझे देख बोली, “मैं गुब्बारा नहीं लूँगी।” और वह वापस आई तो, “अच्छे बच्चे गुब्बारा नहीं लेते न? राजू तो अच्छा बच्चा नहीं है। गुब्बारा तो मिनट में फट जाता है।” कहती हुई अपनी मम्मी के पास रसोई में चली गई और उससे बोली, “मम्मी जी, मुझे गुब्बारा ले दो न!”
-0-
हद
एक अदालत में मुकदमा पेश हुआ।
“साहब, यह पाकिस्तानी है। हमारे देश में हद पार करता हुआ पकड़ा गया है।”
“तुम इस बारे में कुछ कहना चाहते हो?” मजिस्ट्रेट ने पूछा।
“मैने क्या कहना है, सरकार! मैं खेतों में पानी देकर बैठा था। ‘हीर’ के सुरीले बोल मेरे कानों में पड़े। मैं उन्हीं बोलों को सुनता चला आया। मुझे तो कोई हद नज़र नहीं आई।”
-0-
दूसरा किनारा
काफिला चला जा रहा था। शाम के वक्त एक जगह पर आराम करना था और भूख भी महसूस हो रही थी। एक जगह दो ढाबे दिखाई दिए। एक पर लिखा था–‘हिंदु ढाबा’ और दूसरे पर ‘मुस्लिम ढाबा’। दोनों ढाबों में से नौकर बाहर निकल कर आवाजें दे रहे थे। काफिले के लोग बँट गए। अंत में एक शख्स रह गया, जो कभी इस ओर, कभी उस ओर झांक रहा था। दोनों ओर के एक-एक आदमी ने, जो पीछे रह गए थे, पूछा, “किधर जाना है? हिंदु है या मुसलमान? क्या देख रहा है, रोटी नहीं खानी?”
वह हाथ मारता हुआ ऐं…ऐं…अं…आं करता हुआ वहीं खड़ा रहा। जैसे उसे कुछ समझ में न आया हो और पूछ रहा हो, ‘रोटी, हिंदु, मुसलमान।’
दोनों ओर के लोगों ने सोचा, वह कोई पागल है और उसे वहीं छोड़कर आगे बढ़ गए।
कुछ देर बाद दोनों ओर से एक-एक थाली रोटी की आई और उसके सामने रख दी गईं। वह हलका-सा मुस्काया। फिर दोनों थालियों में से रोटियां उठाकर अपने हाथ पर रखीं और दोनों कटोरियों में से सब्जी रोटियों पर उँडेल ली। फिर सड़क के दूसरे किनारे जाकर मुंह घुमाकर खाने लगा।
-0-
मुसीबत
शाम को बारिश शुरू हुई और सुबह तक रुकी ही नहीं। ठंड भी काफी बढ़ गई। नरेश का रजाई से बाहर निकलने को मन नहीं कर रहा था।
बच्ची उठ कर स्कूल के लिए तैयार हो गई थी। बारिश में भी आटो वाला आया और वह स्कूल चली गई।
“ अब आप उठ जाओ, तैयार नहीं होना?” आखिर पत्नी ने नरेश को टोक दिया।
“ बारिश तो रुके, चले जाएंगे। वहाँ भी क्या करना है।”
“ अच्छा, तैयारी तो करो ताकि बारिश रुकने पर जा सको।”
पत्नी ने नाश्ता बना कर माँ को दिया और फिर नरेश से बोली,“ आप भी नाश्ता कर लो, फिर जो मन में आए करना।”
नरेश ग्यारह बजे दफ्तर पहुँच सका। उस समय तक केवल अरोड़ा ही आया था।
“ इस सुहावने मौसम में आप क्या करने आ गए?” अरोड़ा बोला।
“ क्यों? ड्यूटी पर तो आना ही था।”
“ ड्यूटी कहीं भागी तो नहीं जा रही थी। आज तो घर में ठंड एंज्वाय करने का दिन था।”
“ तो फिर आप किस खुशी में आ गए?”
“ हमारी तो मजबूरी थी,” अरोड़ा ने ठंडी साँस ली, “ पत्नी प्राईवेट स्कूल में है। हमारी तरह सरकारी ऐश थोड़े ही है। अब देखो गर्ग साहब नहीं आए न, आएंगे भी नहीं। आप भी घर जाकर मजे करो। यहाँ मैं देख लूँगा।”
“ गर्ग साहब की बात छोड़,” नरेश बोला,“ अपने यहाँ भी मुसीबत है। माँ आई हुई है गाँव से।” नरेश ने गहरी साँस छोड़ते हुए कहा।
-0-
माँ की जरूरत
“ कर लो पता अपने काम का, साथ ही उन्हें चेयरमैन बनने की बधाई भी दे आओ, इस बहाने।”
पत्नी ने कहा तो भारती चला गया, वरना वह तो कह देता था,‘ देख,‘गर काम होना होगा तो सरदूल सिंह खुद ही सूचित कर देगा। हर चार-पाँच दिन के बाद मुलाकात हो ही जाती है।’
तबादलों की राजनीति वह समझता था। कैसे मंत्री ने विभाग संभालते ही सबसे पहले तबादलों का ही काम किया। बदली के आदेश हाथ में पहुँचते ही भारती ने अपनी हाज़िरी-रिपोर्ट दी और योजना बनाने लगा कि क्या किया जाए– वहाँ रहे, बच्चों को साथ ले जाए या फिर रोजाना आए-जाए। बच्चों की पढ़ाई के मद्देनज़र आख़िरी निर्णय यही हुआ कि अभी यहीं रहते हैं और ‘दंपति-केस’ के आधार पर एक अर्जी डाल देते हैं। और तो भारती के वश में कुछ था भी नहीं। फिर पत्नी के कहने पर एक अर्जी राजनीतिक साख वाले पड़ोसी सरदूल सिंह को दे आया था।
सरदूल सिंह घर पर ही मिल गया। वह भारती को गर्मजोशी से मिला। भारती को भी अच्छा लगा। आराम से बैठ, चाय मँगवा कर सरदूल बोला, “ छोटे भाई! वह अर्जी मैने तो उस वक्त पढ़ी नहीं, वह अर्जी तूने अपनी तरफ से क्यों लिखी? माता जी की तरफ से लिखनी थी। ऐसा कर, एक नई अर्जी लिख, माता जी की तरफ से। लिख कि मैं एक बूढ़ी औरत हूँ, अकसर बीमार रहती हूँ। मेरी बहू भी नौकरी करती है…बच्चे छोटे हैं, देर-सवेर दवाई की ज़रूरत पड़ती है…मेरे बेटे के पास रहने से मैं……। कुछ इस तरह से बात बना। बाकी तू समझदार है। मैने परसों फिर जाना है, मंत्री से भी मुलाकात होगी।” उसने आत्मीयता दिखाते हुए कहा।
भारती ने सिर हिलाया, हाथ मिलाया और घर की तरफ चल दिया। माँ की तरफ से अर्जी लिखी जाए। माँ को मेरी ज़रूरत है…माँ बीमार रहती है…कमाल! बताओ अच्छी-भली माँ को यूँ ही बीमार कर दूँ। सुबह उठ कर बच्चों को स्कूल का नाश्ता बना कर देती है। हम दोनों तो ड्यूटी पर जाने की भाग-दौड़ में होते हैं। दोपहर को आते हैं तो खाना तैयार मिलता है। मैं तो कई बार कह चुका हूँ कि माँ बर्तन साफ करने के लिए नौकरानी रख लेते हैं, पर माँ नहीं रखने देती। कहती है,‘ मैं सारा दिन बेकार क्या करती हूँ।’…कहता लिख दे, बेटे का घर में रहना ज़रूरी है। मेरी बीमारी के कारण मुझे इसकी ज़रूरत है। कोई पूछे इससे कि माँ की हमें ज़रूरत है कि…। नहीं-नहीं, माँ की तरफ से नहीं लिखी जा सकती अर्जी।
-0-
मूर्ति
वह बाज़ार से गुजर रहा था। एक फुटपाथ पर पड़ी मूर्तियाँ देख कर वह रुक गया।
फुटपाथ पर पड़ी खूबसूरत मूर्तियाँ! बढ़िया तराशी हुईं। रंगो के सुमेल में मूर्तिकला का अनुपम नमूना थीं वे!
वह मूर्तिकला का कद्रदान था। उसने सोचा कि एक मूर्ति ले जाए।
उसे गौर से मूर्तियाँ देखता पाकर मूर्तिवाले ने कहा, “ ले जाओ, साहब, भगवान कृष्ण की मूर्ति है।”
“भगवान कृष्ण?” उसके मुख से यह एक प्रश्न की तरह निकला।
“हाँ साहब, भगवान कृष्ण! आप तो हिंदू हैं, आप तो जानते ही होंगे।”
वह खड़ा-खड़ा सोचने लगा, यह मूर्ति तो आदमी को हिंदू बनाती है।
“क्या सोच रहे हैं, साहब? यह मूर्ति तो हर हिंदू के घर होती है, ज्यादा महँगी नहीं है।” मूर्तिवाला बोला।
“नहीं चाहिए।” कहकर वह वहाँ से चल दिया।
-0-
माँ
“ मम्मी, मम्मी! मेरा शार्पनर कहाँ है?”
“ मौम! कुछ खाने को बना दो।”
“ मौम…”
बेटा बार-बार कुछ माँग रहा था।
“ तू आवाज देने से न हटना। तू एक ही बार नहीं माँग सकता सब कुछ। बता, क्या मौम-मौम लगा रखी है?”
वह भी परेशान थी, अपने सर्वाइकल के दर्द से और ऊपर से नौकरानी भी देर से आई थी। उसकी प्रतीक्षा कर वह आधा काम स्वयं ही निपटा चुकी थी।
“ कभी खुद भी उठना चाहिए।” उसने बेटे को जूस का गिलास देते हुए कहा।
राजेश अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था। वह उठ कर बेटे के कमरे में आ गया। वैसे माँ-बेटे की बातें वह वहाँ बैठा सुन ही रहा था।
कुछ देर बाद बेटा उठकर बाहर माँ के पास जाकर बोला,“ मम्मी, पापा कहते हैं…”
“ अब उन्हें क्या चाहिए? उन्हें कह रुकें पाँच मिनट, एक ही बार फ्री होकर चाय बनाऊँगी।”
“ नहीं मम्मी! पापा कहते हैं…माँ बनना आसान नहीं होता।”
“ अच्छा! अब तुम्हें पढ़ाने आ गए। क्यों? पिता बनना आसान होता है? दूसरे की तारीफ करो और अपना काम निकालो। ये नहीं कि काम में हाथ बंटा दें।” उस ने उसी रौ में बात को जारी रखा और उसकी ओर मुँह करके बोली, “ पूछना था न, माँ बनना क्यों कठिन है?”
“ पूछा था मम्मी!”
“ अच्छा तो फिर क्या जवाब मिला?”
“ पापा कहते, तुझे जन्म देने के लिए तेरी माँ का बड़ा आपरेशन हुआ,” बच्चे ने आँखें तथा हाथ फैलाकर कहा, “ मम्मी के पेट को चीरा देना पड़ा। मम्मी! पापा कहते, पता नहीं कितने टाँके लगे। बड़ी तकलीफ हुई…।”
बच्चे की बात सुन, माँ ने उसे कसकर सीने से लगा लिया।
-0-
डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति: संक्षिप्त परिचय
जन्म : 30 अप्रैल 1954, अबोहर (जिला: फिरोज़पुर),पंजाब।
शिक्षा : एम.बी.बी.एस., एम.डी.(कम्युनिटी मैडीसन), एम.ए.( समाज विज्ञान व पंजाबी), एम.एस-सी.(एप्लाइड साइकोलॉजी)
प्रकाशित पुस्तकें
मौलिक : ‘बेड़ियाँ’, ‘इक्को ही सवाल’(लघुकथा संग्रह, पंजाबी में), तथा विभिन्न विधाओं से संबंधित 33 और पुस्तकें।
संपादित : 27 लघुकथा संग्रह (पंजाबी व हिंदी में) तथा 10 अन्य पुस्तकें।
संपादन : पंजाबी त्रैमासिक ‘मिन्नी’ का वर्ष 1988 से तथा पत्रिका ‘चिंतक’ का वर्ष 2000 से निरंतर संपादन।
संप्रति : एसोसिएट प्रोफेसर, मैडीकल कॉलेज, अमृतसर।
संपर्क : 97, गुरु नानक एवेन्यू, मजीठा रोड, अमृतसर (पंजाब)-143004