Monday, 5 October 2009

डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति की लघुकथाएँ

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‘जनगाथा’ के इस अंक में हिन्दी व पंजाबी लघुकथा-लेखन में समान रूप से सक्रिय डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की लघुकथाएँ प्रस्तुत है। ये लघुकथाएँ भाई श्याम सुन्दर अग्रवाल के सौजन्य से प्राप्त हुई है जो स्वयं भी हिन्दी व पंजाबी दोनों भाषाओं की लघुकथाओं के साथ लेखन, संपादन, आलोचना और अनुवाद सभी स्तरों पर जुड़े हुए हैं। श्याम सुन्दर अग्रवाल जी की लघुकथाओं को आप अगस्त 2009 के ‘जनगाथा’ में पढ़ चुके हैं। दीप्ति जी की लघुकथाओं में मानव-मन की गहरी गुफाओं के दर्शन होते हैं। ऐसी गुफाएँ जो पाठक में अपने और भीतर…और भीतर प्रविष्ट होने की जिज्ञासा उत्पन्न करती हैं और किसी भी बिन्दु पर उसे हताश नहीं होने देतीं। पंजाब के इन दोनों ही कथाकारों की लघुकथाओं से ‘लघुकथा कहने की (न कि लिखने की) कला’ को जाना जा सकता है। प्रयत्न रहेगा कि ‘जनगाथा’ के माध्यम से देश अन्य प्रांतों के लघुकथा-लेखन से पाठकों को परिचित कराया जाता रहे। -बलराम अग्रवाल
गुब्बारा
गली में से गुब्बारेवाला रोज गुजरता। वह बाहर खड़े बच्चों को गुब्बारा पकड़ा देता और बच्चा माँ-बाप को दिखाता। फिर बच्चा खुद ही पैसे दे आता, या उसके माँ-बाप। इसी तरह एक दिन मेरी बेटी से हुआ। मैं उठकर बाहर गया और गुब्बारे का एक रुपया दे आया। दूसरे दिन फिर बेटी ने वैसा ही किया। मैने कहा, “बेटे, क्या करना है गुब्बारा? रहने दे न!” पर वह कहाँ मानती थी, रुपया ले ही गई। तीसरे दिन जब रुपया दिया तो लगा कि भई रोज-रोज तो यह काम ठीक नहीं। एक रुपया रोज महज दस मिनट के लिए। अभी फट जाएगा।
मैने आराम से बैठकर बेटी को समझाया, “बेटे! गुब्बारा कोई खाने की चीज है? नहीं न! एक मिनट में ही फट जाता है। गुब्बारा अच्छा नहीं होता। अच्छे बच्चे गुब्बारा नहीं लेते। हम बाजार से कोई अच्छी चीज लेकर आएंगे।”
अगले दिन जब गुब्बारेवाले की आवाज गली से आई तो बेटी बाहर न निकली और मेरी तरफ देखकर कहने लगी, “गुब्बारा अच्छा नहीं होता। भैया रोज ही आ जाता है। मैं उसे कह आऊँ कि वह चला जाए।”
“वह आप ही चला जाएगा।” मैने कहा। वह बैठ गई।
उससे अगले दिन गुब्बारेवाले की आवाज सुनकर वह बाहर जाने लगी तो मुझे देख बोली, “मैं गुब्बारा नहीं लूँगी।” और वह वापस आई तो, “अच्छे बच्चे गुब्बारा नहीं लेते न? राजू तो अच्छा बच्चा नहीं है। गुब्बारा तो मिनट में फट जाता है।” कहती हुई अपनी मम्मी के पास रसोई में चली गई और उससे बोली, “मम्मी जी, मुझे गुब्बारा ले दो न!”
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हद
एक अदालत में मुकदमा पेश हुआ।
“साहब, यह पाकिस्तानी है। हमारे देश में हद पार करता हुआ पकड़ा गया है।”
“तुम इस बारे में कुछ कहना चाहते हो?” मजिस्ट्रेट ने पूछा।
“मैने क्या कहना है, सरकार! मैं खेतों में पानी देकर बैठा था। ‘हीर’ के सुरीले बोल मेरे कानों में पड़े। मैं उन्हीं बोलों को सुनता चला आया। मुझे तो कोई हद नज़र नहीं आई।”
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दूसरा किनारा
काफिला चला जा रहा था। शाम के वक्त एक जगह पर आराम करना था और भूख भी महसूस हो रही थी। एक जगह दो ढाबे दिखाई दिए। एक पर लिखा था–‘हिंदु ढाबा’ और दूसरे पर ‘मुस्लिम ढाबा’। दोनों ढाबों में से नौकर बाहर निकल कर आवाजें दे रहे थे। काफिले के लोग बँट गए। अंत में एक शख्स रह गया, जो कभी इस ओर, कभी उस ओर झांक रहा था। दोनों ओर के एक-एक आदमी ने, जो पीछे रह गए थे, पूछा, “किधर जाना है? हिंदु है या मुसलमान? क्या देख रहा है, रोटी नहीं खानी?”
वह हाथ मारता हुआ ऐं…ऐं…अं…आं करता हुआ वहीं खड़ा रहा। जैसे उसे कुछ समझ में न आया हो और पूछ रहा हो, ‘रोटी, हिंदु, मुसलमान।’
दोनों ओर के लोगों ने सोचा, वह कोई पागल है और उसे वहीं छोड़कर आगे बढ़ गए।
कुछ देर बाद दोनों ओर से एक-एक थाली रोटी की आई और उसके सामने रख दी गईं। वह हलका-सा मुस्काया। फिर दोनों थालियों में से रोटियां उठाकर अपने हाथ पर रखीं और दोनों कटोरियों में से सब्जी रोटियों पर उँडेल ली। फिर सड़क के दूसरे किनारे जाकर मुंह घुमाकर खाने लगा।
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मुसीबत
शाम को बारिश शुरू हुई और सुबह तक रुकी ही नहीं। ठंड भी काफी बढ़ गई। नरेश का रजाई से बाहर निकलने को मन नहीं कर रहा था।
बच्ची उठ कर स्कूल के लिए तैयार हो गई थी। बारिश में भी आटो वाला आया और वह स्कूल चली गई।
“ अब आप उठ जाओ, तैयार नहीं होना?” आखिर पत्नी ने नरेश को टोक दिया।
“ बारिश तो रुके, चले जाएंगे। वहाँ भी क्या करना है।”
“ अच्छा, तैयारी तो करो ताकि बारिश रुकने पर जा सको।”
पत्नी ने नाश्ता बना कर माँ को दिया और फिर नरेश से बोली,“ आप भी नाश्ता कर लो, फिर जो मन में आए करना।”
नरेश ग्यारह बजे दफ्तर पहुँच सका। उस समय तक केवल अरोड़ा ही आया था।
“ इस सुहावने मौसम में आप क्या करने आ गए?” अरोड़ा बोला।
“ क्यों? ड्यूटी पर तो आना ही था।”
“ ड्यूटी कहीं भागी तो नहीं जा रही थी। आज तो घर में ठंड एंज्वाय करने का दिन था।”
“ तो फिर आप किस खुशी में आ गए?”
“ हमारी तो मजबूरी थी,” अरोड़ा ने ठंडी साँस ली, “ पत्नी प्राईवेट स्कूल में है। हमारी तरह सरकारी ऐश थोड़े ही है। अब देखो गर्ग साहब नहीं आए न, आएंगे भी नहीं। आप भी घर जाकर मजे करो। यहाँ मैं देख लूँगा।”
“ गर्ग साहब की बात छोड़,” नरेश बोला,“ अपने यहाँ भी मुसीबत है। माँ आई हुई है गाँव से।” नरेश ने गहरी साँस छोड़ते हुए कहा।
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माँ की जरूरत
“ कर लो पता अपने काम का, साथ ही उन्हें चेयरमैन बनने की बधाई भी दे आओ, इस बहाने।”
पत्नी ने कहा तो भारती चला गया, वरना वह तो कह देता था,‘ देख,‘गर काम होना होगा तो सरदूल सिंह खुद ही सूचित कर देगा। हर चार-पाँच दिन के बाद मुलाकात हो ही जाती है।’
तबादलों की राजनीति वह समझता था। कैसे मंत्री ने विभाग संभालते ही सबसे पहले तबादलों का ही काम किया। बदली के आदेश हाथ में पहुँचते ही भारती ने अपनी हाज़िरी-रिपोर्ट दी और योजना बनाने लगा कि क्या किया जाए– वहाँ रहे, बच्चों को साथ ले जाए या फिर रोजाना आए-जाए। बच्चों की पढ़ाई के मद्देनज़र आख़िरी निर्णय यही हुआ कि अभी यहीं रहते हैं और ‘दंपति-केस’ के आधार पर एक अर्जी डाल देते हैं। और तो भारती के वश में कुछ था भी नहीं। फिर पत्नी के कहने पर एक अर्जी राजनीतिक साख वाले पड़ोसी सरदूल सिंह को दे आया था।
सरदूल सिंह घर पर ही मिल गया। वह भारती को गर्मजोशी से मिला। भारती को भी अच्छा लगा। आराम से बैठ, चाय मँगवा कर सरदूल बोला, “ छोटे भाई! वह अर्जी मैने तो उस वक्त पढ़ी नहीं, वह अर्जी तूने अपनी तरफ से क्यों लिखी? माता जी की तरफ से लिखनी थी। ऐसा कर, एक नई अर्जी लिख, माता जी की तरफ से। लिख कि मैं एक बूढ़ी औरत हूँ, अकसर बीमार रहती हूँ। मेरी बहू भी नौकरी करती है…बच्चे छोटे हैं, देर-सवेर दवाई की ज़रूरत पड़ती है…मेरे बेटे के पास रहने से मैं……। कुछ इस तरह से बात बना। बाकी तू समझदार है। मैने परसों फिर जाना है, मंत्री से भी मुलाकात होगी।” उसने आत्मीयता दिखाते हुए कहा।
भारती ने सिर हिलाया, हाथ मिलाया और घर की तरफ चल दिया। माँ की तरफ से अर्जी लिखी जाए। माँ को मेरी ज़रूरत है…माँ बीमार रहती है…कमाल! बताओ अच्छी-भली माँ को यूँ ही बीमार कर दूँ। सुबह उठ कर बच्चों को स्कूल का नाश्ता बना कर देती है। हम दोनों तो ड्यूटी पर जाने की भाग-दौड़ में होते हैं। दोपहर को आते हैं तो खाना तैयार मिलता है। मैं तो कई बार कह चुका हूँ कि माँ बर्तन साफ करने के लिए नौकरानी रख लेते हैं, पर माँ नहीं रखने देती। कहती है,‘ मैं सारा दिन बेकार क्या करती हूँ।’…कहता लिख दे, बेटे का घर में रहना ज़रूरी है। मेरी बीमारी के कारण मुझे इसकी ज़रूरत है। कोई पूछे इससे कि माँ की हमें ज़रूरत है कि…। नहीं-नहीं, माँ की तरफ से नहीं लिखी जा सकती अर्जी।
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मूर्ति
वह बाज़ार से गुजर रहा था। एक फुटपाथ पर पड़ी मूर्तियाँ देख कर वह रुक गया।
फुटपाथ पर पड़ी खूबसूरत मूर्तियाँ! बढ़िया तराशी हुईं। रंगो के सुमेल में मूर्तिकला का अनुपम नमूना थीं वे!
वह मूर्तिकला का कद्रदान था। उसने सोचा कि एक मूर्ति ले जाए।
उसे गौर से मूर्तियाँ देखता पाकर मूर्तिवाले ने कहा, “ ले जाओ, साहब, भगवान कृष्ण की मूर्ति है।”
“भगवान कृष्ण?” उसके मुख से यह एक प्रश्न की तरह निकला।
“हाँ साहब, भगवान कृष्ण! आप तो हिंदू हैं, आप तो जानते ही होंगे।”
वह खड़ा-खड़ा सोचने लगा, यह मूर्ति तो आदमी को हिंदू बनाती है।
“क्या सोच रहे हैं, साहब? यह मूर्ति तो हर हिंदू के घर होती है, ज्यादा महँगी नहीं है।” मूर्तिवाला बोला।
“नहीं चाहिए।” कहकर वह वहाँ से चल दिया।
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माँ
“ मम्मी, मम्मी! मेरा शार्पनर कहाँ है?”
“ मौम! कुछ खाने को बना दो।”
“ मौम…”
बेटा बार-बार कुछ माँग रहा था।
“ तू आवाज देने से न हटना। तू एक ही बार नहीं माँग सकता सब कुछ। बता, क्या मौम-मौम लगा रखी है?”
वह भी परेशान थी, अपने सर्वाइकल के दर्द से और ऊपर से नौकरानी भी देर से आई थी। उसकी प्रतीक्षा कर वह आधा काम स्वयं ही निपटा चुकी थी।
“ कभी खुद भी उठना चाहिए।” उसने बेटे को जूस का गिलास देते हुए कहा।
राजेश अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था। वह उठ कर बेटे के कमरे में आ गया। वैसे माँ-बेटे की बातें वह वहाँ बैठा सुन ही रहा था।
कुछ देर बाद बेटा उठकर बाहर माँ के पास जाकर बोला,“ मम्मी, पापा कहते हैं…”
“ अब उन्हें क्या चाहिए? उन्हें कह रुकें पाँच मिनट, एक ही बार फ्री होकर चाय बनाऊँगी।”
“ नहीं मम्मी! पापा कहते हैं…माँ बनना आसान नहीं होता।”
“ अच्छा! अब तुम्हें पढ़ाने आ गए। क्यों? पिता बनना आसान होता है? दूसरे की तारीफ करो और अपना काम निकालो। ये नहीं कि काम में हाथ बंटा दें।” उस ने उसी रौ में बात को जारी रखा और उसकी ओर मुँह करके बोली, “ पूछना था न, माँ बनना क्यों कठिन है?”
“ पूछा था मम्मी!”
“ अच्छा तो फिर क्या जवाब मिला?”
“ पापा कहते, तुझे जन्म देने के लिए तेरी माँ का बड़ा आपरेशन हुआ,” बच्चे ने आँखें तथा हाथ फैलाकर कहा, “ मम्मी के पेट को चीरा देना पड़ा। मम्मी! पापा कहते, पता नहीं कितने टाँके लगे। बड़ी तकलीफ हुई…।”
बच्चे की बात सुन, माँ ने उसे कसकर सीने से लगा लिया।
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डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति: संक्षिप्त परिचय
जन्म : 30 अप्रैल 1954, अबोहर (जिला: फिरोज़पुर),पंजाब।
शिक्षा : एम.बी.बी.एस., एम.डी.(कम्युनिटी मैडीसन), एम.ए.( समाज विज्ञान व पंजाबी), एम.एस-सी.(एप्लाइड साइकोलॉजी)
प्रकाशित पुस्तकें
मौलिक : ‘बेड़ियाँ’, ‘इक्को ही सवाल’(लघुकथा संग्रह, पंजाबी में), तथा विभिन्न विधाओं से संबंधित 33 और पुस्तकें।
संपादित : 27 लघुकथा संग्रह (पंजाबी व हिंदी में) तथा 10 अन्य पुस्तकें।
संपादन : पंजाबी त्रैमासिक ‘मिन्नी’ का वर्ष 1988 से तथा पत्रिका ‘चिंतक’ का वर्ष 2000 से निरंतर संपादन।
संप्रति : एसोसिएट प्रोफेसर, मैडीकल कॉलेज, अमृतसर।
संपर्क : 97, गुरु नानक एवेन्यू, मजीठा रोड, अमृतसर (पंजाब)-143004
दूरभाष : 0183-2421006 मोबाइलः 09815808506
ईमेलः drdeeptiss@yahoo.co.in

Monday, 7 September 2009

आशीष रस्तोगी की लघुकथाएँ

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जनगाथा के इस अंक के माध्यम से एकदम नए रचनाकार आशीष रस्तौगी का पदार्पण कथा-साहित्य की दुनिया में हो रहा है। इससे पहले आशीष ने कहीं भी अपनी रचनाओं को प्रकाशन के लिए नहीं भेजा। अपनी रचनाओं की उत्कृष्टता का उन्हें जैसे पता ही नहीं है। मुझे मेरे बेटे और उसके मित्र आकाश के जरिए ये रचनाएँ प्राप्त हुईं—गड़े हुए खजाने की तरह। सौभाग्य से आज आशीष का जन्मदिन भी है। जन्मदिन पर ईश्वर से उनके लेखन को और उत्कृष्टता प्रदान करने की प्रार्थना और जीवन-संग्राम में उनकी सफलता हेतु हार्दिक शुभकामनाओं के साथ आइए पढ़ते हैं इस जवान कलम से उतरी ये लघुकथाएँ :
-बलराम अग्रवाल
॥1॥ मानसून आया
जून का महीना। आसमान से शोले बरस रहे थे। हर व्यक्ति ऊपर की ओर देखता और इन्द्रदेव से प्रार्थना करता; लेकिन लग रहा था कि वह भी पृथ्वीवासियों पर कुपित हो गये हैं, पानी की जगह आग बरसा रहे हैं।
समय कुछ और आगे खिसका। मौसम का मिजाज बदलने-सा लगा। आसमान में बादल छाने लगे। हालाँकि वे अभी बरसे नहीं थे, लेकिन लोगों के दिलों में कुछ ठंडक पहुँचने लगी। बादलों ने गड़गड़ाना शुरू किया तो लोगों की जैसे जिन्दगी ही बदलनी शुरू हो गई।
‘जो गरजते हैं बरसते नहीं’ का अपना ही नियम तोड़ बादलों ने पानी छिड़कना शुरू किया तो घाम की चोटों से हाँफ गये लोगों की जान में जान आनी शुरू हुई। रसोईघरों में बरतन खनकने लगे। चाय और पकौड़ियों का…समोसों का दौर शुरू हो गया। कॉपियों से पन्ने फाड़-फाड़कर बच्चे नावें बनाने और नालियों में तैराने की तैयारी करने लगे। सभी के मन में सिर्फ एक ही बात थी—‘बरसो रे…ऽ…बैरी बदरवा बरसो रे…ऽ…!’
एकाएक बूँदें थमने-सी लगीं। सभी की निगाहें सूने होते जा रहे आसमान की ओर उठ गयीं। सड़क किनारे की एक छप्परनुमा दुकान से आवाज आई—“अरे इन्द्र देवता, अभी तो चाय की प्याली को होठों से लगाया ही था…और पकौड़ियाँ तो अभी कड़ाही में छनन-छनन नाच ही रही हैं, बाहर निकली तक नहीं। कम से कम एक राउंड तो इनका चला लेने देते!”
इसे सुनकर आसपास बैठे हालाँकि सभी लोग हँसने लगे, लेकिन बड़ी हसरत के साथ भागते बादलों की ओर ताकने लगे।
॥2॥ रहम कर
अभी दो दिन पहले की ही बात है। मैं रोज की तरह अखबार पर सरसरी नजर दौड़ा रहा था। एकाएक दो सुर्खियों पर मेरी निगाह टिक गई।
पहली थी—
एक उद्योगपति ने अपनी पत्नी के जन्मदिन पर 400 करोड़ का जेट विमान उपहार में दिया।
दूसरी थी—
एक किसान ने कर्ज न चुका पाने की वजह से आत्महत्या की। उस पर पूरे 18000 रुपए का कर्ज था।
मैं समझ नहीं पा रहा था कि देश में यह हो क्या रहा है? इतनी असमानता! आजादी के बाद अमीर जहाँ और-अमीर हो रहा है, वहीं गरीब गरीबी के गर्त में और-ज्यादा धँसता जा रहा है।
मन बहुत अशांत हो उठा था। रह-रहकर बस एक ही आवाज भीतर से सुनाई दे रही थी—हे ईश्वर! तू और चाहे जो कर, लेकिन इस देश के किसान को आत्महत्या के लिए मजबूर मत कर।
॥3॥ कुत्ता
शाम का समय था। ठेकेदार साहब अपने घर पर बैठकर चाय का मजा ले रहे थे। तभी गेट पर घंटी बजी। दुबला-पतला एक व्यक्ति गेट पर खड़ा था। गेट खुला हुआ ही था।
“साहब, मुझे गुप्ताजी ने आपके पास भेजा है।” पूछने पर उसने बताया।
ठेकेदार ने उसे अन्दर बुला लिया। अन्दर पहुँचकर वह ठेकेदार से कुछ दूरी बनाते हुए जमीन पर बैठ गया।
“घरेलू कामकाज के लिए हम लोगों को एक नौकर की तलाश है। घर में सिर्फ तीन प्राणी हैं—मैं, मेरी पत्नी और विदेशी नस्ल का हमारा रूमी।”
जमीन पर बैठे आदमी की समझ में वह तीसरा प्राणी एकाएक ही नहीं आया कि कौन है। वह ठेकेदार से उसके बारे में पूछने ही वाला था कि सुती-सी कमर वाला एक कुत्ता वहाँ आया और उसे घूरता हुआ ठेकेदार के समीप सोफे पर बैठ गया।
“साहब, मेरे को घर का सारा काम आता है।” सारी बात समझकर व्यक्ति बोला।
“नाम क्या है तुम्हारा?” ठेकेदार ने उससे पूछा।
“जी, गरीबू।” वह बोला।
“तुम्हारे परिवार में कितने लोग हैं?”
“पाँच लोग हैं साहब—मैं, मेरी बीवी और तीन बच्चे…।”
ये बातें चल ही रही थीं कि गेट की घंटी पुन: बजी। देखा—ठेकेदार का एक अन्य मित्र सोहन सिंह घर में घुस रहा था। वह आया और उसी सोफे पर बैठकर कुत्ते से खेलने लगा।
“घर और बाजार का सारा काम करना होगा।” ठेकेदार गरीबू से बोला,“पगार तीन हजार रुपए महीना यानी कि सौ रुपए रोज। जिस दिन भी छुट्टी करोगे—सौ रुपया काट लिया जाएगा।”
“जी।” गरीबू ने गरदन हिलाई।
“आने-जाने वालों का भी पूरा ध्यान रखना होगा—मंजूर है?” ठेकेदार ने पकाया।
“जी।” उसने पुन: गरदन हिलाई।
“यार ऐसा ही एक पीस मैं भी घर में रखना चाहता हूँ।” बातचीत के बीच में ही सोहन सिंह ठेकेदार से बोला,“माहवार कितना खर्चा आ जाता होगा?”
“ठीक-ठाक चलता रहे तो यही करीब दस हजार…।” ठेकेदार बोला।
गरीबू की हसरत भरी नजरें ठेकेदार का जवाब सुनते ही रूमी पर जा टिकीं।
॥4॥ आत्मनिर्भर
“बहुत भूख लगी है…दो दिनों से कुछ खाया नहीं है…रुपया-दो रुपया दे दो साहब।” मंदिर-प्रांगण के बाहर घूम रहे भिखारीनुमा नौजवान ने नंदू के निकट आकर कहा। उसने देखा कि भीख माँगने के लिए हाथ फैलाए खड़ा लड़का हट्टा-कट्टा और मझोली कद-काठी का था।
“हट्टा-कट्टा होकर भीख माँगता है? मेहनत-मजदूरी कर, कमाकर खा।” नंदू गुस्से में बोला।
“अनजान आदमी को शहर में कौन काम पर रखता है साहब?” भिखारी बोला।
“मैं रखूँगा तुझे, चल।” कहते हुए नंदू ने उसको कलाई पर से पकड़ लिया। भिखारी झेंप-सा गया। हाथ छुड़ाता हुआ बोला,“एक दिन का कितना पैसा दोगे साहब?”
“एक दिन का नहीं, महीना-भर काम करने का पैसा मिलेगा—चार हजार…।” उसकी कलाई पर पकड़ को बरकरार रखते हुए नंदू उससे बोला।
“चार हजार!” भिखारी उपहास-भरे अंदाज में चौंका। बोला,“पाँच हजार की नौकरी छोड़े बैठा हूँ साहब। बंदा समझने लगता है जैसे वही हमारा पेट पाल रहा है और हम उसके लिए कुछ नहीं कर रहे हैं! उस जलालत से यह भीख माँगकर पेट भर लेने का धंधा भला। वैसे भी, यहाँ बैठकर डेढ़-दो सौ रुपया रोज तो बना ही लेता हूँ मैं। कभी-कभी खाना-कपड़ा-फल-मिठाई वगैरा भी मिल जाता है सो अलग। न किसी की चें-चें न चिख-चिख, न गुलामी। अपने काम का खुद मुख्तार हूँ।” कहते-कहते नंदू की पकड़ से अपनी कलाई को छुड़ाकर वह वापस अपनी जगह पर जा बैठा।
॥5॥ श्यामपट
यह उन दिनों की बात है जब विजय-चाचा ने काले रंग की नई होंडा सिटी खरीदी थी। उसके प्रति उसके जुनून को देखकर लगता था कि उसे वे चाची से भी ज्यादा प्यार करते थे।
अपनी उस नई प्रियतमा को एक दिन घर की चारदीवारी से निकालकर चाचा ने घर के सामने खुली हवा में खड़ा कर दिया। उनका मंशा उसे शायद पड़ोसियों को दिखाने का भी रहा हो। उसे वहाँ खड़ी करके वे घर के कामकाज में लग गए। अभी कुछ ही मिनट बीते होंगे कि बाहर से आती चाची की तेज पुकारों ने उनका ध्यान आकृष्ट किया।
“अरे, मनु के पापा, जल्दी से बाहर आओ…।” वे चिल्ला रही थीं।
हाथ का काम जहाँ का तहाँ छोड़-छाड़कर चाचा बाहर की ओर भागे।
“क्या हुआ?” उन्होंने चाची से पूछा।
“वो देखो…।” चाची ने कार की ओर इशारा करते हुए कहा।
चाचा ने कार की ओर देखा। पड़ोस के एक छोटे बच्चे ने पत्थर की नोक से कार की पूरी बॉडी पर अंग्रेजी अल्फाबेट ए से जैड तक लिख मारा था। जगह बचती तो उस पर वह गिनतियाँ भी जरूर लिखता। चाचा के गुस्से का न ओर था न छोर। कार के पास ही खड़े उस बच्चे के दोनों कंधों को पकड़कर उन्होंने कहा—“ये क्या किया तूने!”
बच्चा उनकी मुख-मुद्रा को देखकर सहम गया। बड़े भोलेपन के साथ बोला—“मम्मी ने मुझे एबीसी याद कराई थी और बोला था कि एक घंटे बाद फिर पूछेंगी। मैंने सोचा कि लिखकर याद करूँगा तो पता चल जाएगा कि कोई लैटर छूटता तो नहीं है। मैंने इसीलिए…।”
उसकी बात सुनकर चाचा का गुस्सा काफूर हो गया। बच्चा जान बचाकर भाग खड़ा हुआ।
॥6॥ आण्टी का ढाबा
मैं उन दिनों मेरठ में रहा करता था। यों खाने-पीने की कोई परेशानी वहाँ पर नहीं थी, लेकिन घर के भोजन की याद फिर भी बहुत आया करती थी। दोस्तों के बीच भी इस बात का जिक्र हो जाया करता था।
इसी तरह की बात चली तो एक दोस्त ने एक दिन आण्टी के ढाबे के बारे में बताया। कहा कि वह एकदम घर जैसा भोजन बनाती है और माँ की तरह ही स्नेह के साथ खिलाती है। तारीफ सुनी तो दोस्त के साथ मैं भी उस दिन आण्टी के हाथ के खाने का स्वाद चखने उसके ढाबे पर पहुँच गया। खाने वालों की जैसे लाइन लगी हुई थी।
दो छोटी दुकानों को मिलाकर आण्टी ने एक ढाबे का रूप दे रखा था। साफ-सफाई भी ज्यादा नहीं थी। करीब दस मिनट इंतजार के बाद हमें दो सीटें खाली मिलीं और उसके बीस मिनट बाद खाने की थाली हमारे सामने आई। इतना समय बरबाद हो जाने पर बड़ी कोफ्त हुई, लेकिन जब खाना खाया तो…इंतजार करने का सारा अफसोस जाता रहा। खाना वाकई एकदम घर जैसा, स्वादिष्ट था। खाना खाने के बाद पैसे दिये तो वह भी वाजिब। उस दिन से सुबह-शाम हर रोज वहीं पर जाना शुरू कर दिया।
आण्टी का व्यवहार, जैसा कि दोस्त ने बताया था, माँ जैसा ही था; लेकिन उसका पति, जिसे सब लोग ‘अंकल’ संबोधित करते थे—बड़ा ही खड़ूस किस्म का इंसान था। वह रोजाना ही किसी न किसी ग्राहक से किसी न किसी बात पर उलझता ही रहता। ग्राहकों से नोक-झोक करना उसके लिए आम बात थी लेकिन ग्राहकों के लिए नहीं। उसके व्यवहार से परेशान कई लोगों ने ढाबे पर आना छोड़ दिया। कुछ दिनों बाद मेरा मन भी उसकी बेमतलब चूँ-चपड़ से ऊब गया, मैंने भी जाना छोड़ दिया।
दो या तीन महीने बाद पता चला कि आण्टी का ढाबा बंद हो गया है।
॥7॥ कार या प्यार
सुबह का समय था। परिवार रविवार की छुट्टी का मजा ले रहा था। पिता अपनी नई चमचमाती कार को बाहर सड़क पर निकालकर बहुत प्यार से साफ कर रहा था। माता रसोईघर में सुबह के नाश्ते की तैयारी में व्यस्त थी। बेटा अपने खिलौनों से खेल रहा था।
खेलते-खेलते बेटे को अचानक कुछ सूझा। खिलौनों को एक ओर सरकाकर वह उठ खड़ा हुआ और बाहर आ गया। बाहर आकर सड़क पर से उसने एक नुकीला पत्थर उठाया और कार पर ‘आइ लव यू पापा’ लिख दिया।
पिता ने देखा तो आगबबूला हो गया। पत्थर के उसी टुकड़े से चोटें मार-मारकर उसने बालक की उँगलियाँ कुचल दीं। वह दर्द से बिलबिला उठा। माता ने पिता का चीखना-चिल्लाना और बच्चे का रोना-बिलबिलाना सुना तो सब-कुछ छोड़-छाड़कर बाहर की ओर भागी। हालात पर बहस करने में समय बरबाद करने की बजाय उसने बच्चे को गोद में उठाया और क्लीनिक जा पहुँची।
“कई उँगलियों की हड्डियाँ टूट गई हैं…” डॉक्टर ने देखकर बताया,“तीन-चार महीने तो लग ही जाएँगे।”
इसी बीच पिता भी वहाँ पहुँच गया। अपने किये पर वह बहुत दुखी था और मन ही मन खुद को कोस रहा था। वह लगातार यही सोच रहा था कि बेटे ने तो उसके प्रति अपना प्यार प्रकट किया था लेकिन उस प्यार के बदला उसने क्या दिया!
अफसोस के उन्हीं क्षणों में उसकी नजर क्लीनिक की दीवार पर लिखे इस स्लोगन पर पड़ गई—मनुष्य प्यार करने के लिए बना है और वस्तु इस्तेमाल के लिए। मगर दुर्भाग्य! हम आज वस्तु को प्यार करने लगे हैं और मनुष्य को इस्तेमाल!
आशीष रस्तौगी : संक्षिप्त परिचय
7 सितम्बर, 1984 को जन्मे आशीष ने ‘यूपीटेक’ के माध्यम से गाजियाबाद के आई एम एस से बी टेक तत्पश्चात एम बी ए किया है और संप्रति एच सी एल की नोएडा स्थित इकाई में मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं। लेखन के बारे में उनका कहना है कि—मेरा लेखन मेरे अनुभवों की देन है। मेरी रचनाओं में से कुछ का संबंध मुझसे है तो कुछ का देश की सामाजिक समस्याओं से। कुल मिलाकर मैं महसूस करता हूँ कि लिखना आपको उस दुनिया से जोड़ देता है जहाँ इस दुनिया के दुख आपको नहीं सता सकते।
उनका पता है: ए-27, लोहिया नगर, गाजियाबाद-201001(उ प्र)
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ई-मेल: ashish.rastogi7984@gmail.com

Tuesday, 18 August 2009

श्याम सुन्दर अग्रवाल की लघुकथाएँ

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‘जनगाथा’ के इस अंक में प्रस्तुत हैं कथाकार श्याम सुंदर अग्रवाल की लघुकथाएँ। इनकी लघुकथाओं में व्यक्त आम आदमी के संत्रास, पीड़ा, व्यथा पाठक को उस बिंदु पर छूते हैं जहाँ किसी जमाने में ‘कहानी’ छुआ करती थी। इन्हें पढ़कर पाठक न तो तिलमिला पाता है और न ही हँस या मुस्करा पाता है। वह इनमें व्यक्त उद्वेलनकारी स्थितियों पर सोचने को विवश होता है। इनकी उल्लेखनीय विशेषता यह है कि ये चमत्कारपूर्ण शब्दों की भूलभुलैया में पाठक को न घुमाते रखकर कथा को सीधे-सीधे इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि उसी में से संवेदना का कोई गहरा सूत्र पाठक तक पहुँच जाता है। समाज के निरीह, त्यक्त और लगभग विस्मृत पात्रों की स्थिति पर ये न तो आँसू बहाते हैं और न उसे सुधारने के लिए निरा नारा ही हवा में उछालते हैं। यह सारा काम ये पाठक पर ही छोड़ देते हैं। वस्तुत: यही समकालीन लघुकथा का हेतु भी है और यही शक्ति भी।

--बलराम अग्रवाल
--> रोटी की ताकत
लगभग बारह वर्ष का एक लड़का आँख बचा कर खाना खा रही बारात में शामिल हो गया। उसने तरह-तरह के पकवानों से प्लेट भर ली और खाने के लिए एक तरफ खड़ा हो गया।
उसका हाथ तेजी से चल रहा था और मुँह भी। अपने मैले वस्त्रों एवं टूटी हुई चप्पलों के कारण वह शीघ्र ही प्रबंधकों की निगाह में आ गया।
“चल भाग साले, बाप का माल है क्या?” देखने वाले ने उसको जोरदार झिड़की दी। इस झिड़की का उसपर कोई असर नहीं हुआ। बस उसके मुँह और हाथ ने और तेजी पकड़ ली।
एक ने उसके हाथ से प्लेट छीनने की कोशिश करते हुए थप्पड़ मारा। छीना-झपटी में प्लेट नीचे गिर पड़ी। भोजन उठाने के लिए वह नीचे झुका तो पीछे से किसी ने जोर की ठोकर मारी। उसका चेहरा दर्द की लकीरों से भर गया। इससे पहले कि एक और ठोकर लगती, वह भाग कर पंडाल से बाहर हो गया।
“आज तो मजा आ गया! रोटी बहुत स्वाद है। कितना ही कुछ है। जा तू भी आँख बचा कर घुस जा।” बाहर पहुँच कर उसने अपने छोटे भाई से कहा।

उत्सव
सेना और प्रशासन की दो दिनों की जद्दोजेहद अंतत: सफल हुई। साठ फुट गहरे बोरवैल में फंसे नंगे बालक प्रिंस को सही सलामत बाहर निकाल लिया गया। वहाँ विराजमान राज्य के मुख्यमंत्री एवं जिला प्रशासन ने सुख की साँस ली। बच्चे के माँ-बाप व लोग खुश थे।
दीन-दुनिया से बेखबर इलैक्ट्रानिक मीडिया दो दिन से निरंतर इस घटना का सीधा प्रसारण कर रहा था। मुख्यमंत्री के जाते ही सारा मजमा खिंडने लगा। कुछ ही देर में उत्सव वाला माहौल मातमी-सा हो गया। टी.वी. संवाददाताओं के जोशीले चेहरे अब मुरझाए हुए लग रहे थे। अपना साजोसामान समेट कर जाने की तैयारी कर रहे एक संवाददाता के पास समीप के गाँव का एक युवक आया और बोला, “हमारे गाँव में भी ऐसा ही…”
युवक की बात पूरी होने से पहले ही संवाददाता का मुरझाया चेहरा खिल उठा, “क्या तुम्हारे गाँव में भी बच्चा बोरवैल में गिर गया?”
“नहीं।”
युवक के उत्तर से संवाददाता का चेहरा फिर से बुझ गया, “तो फिर क्या?”
“हमारे गाँव में भी ऐसा ही एक गहरा गड्ढा नंगा पड़ा है,” युवक ने बताया।
“तो फिर मैं क्या करूँ?” झुँझलाया संवाददाता बोला।
“आप महकमे पर जोर डालेंगे तो वे गड्ढा बंद कर देंगे। नहीं तो उसमें कभी
भी कोई बच्चा गिर सकता है।”
संवाददाता के चेहरे पर फिर थोड़ी रौनक दिखाई दी। उसने इधर-उधर देखा और अपने नाम-पते वाला कार्ड युवक को देते हुए धीरे से कहा, “ध्यान रखना, जैसे ही कोई बच्चा उस बोरवैल में गिरे मुझे इस नंबर पर फोन कर देना। किसी और को मत बताना। मैं तुम्हें इनाम दिलवा दूँगा।”
साझा दर्द
वृद्धाश्रम में गए पत्रकार ने वहाँ बरामदे में बैठी एक बुजुर्ग औरत से पूछा, “माँ जी, आपके कितने बेटे हैं?”
औरत बोली, “ न बेटा, न बेटी। मेरे तो कोई औलाद नहीं।”
पत्रकार बोला, “आपको बेटा न होने का गम तो होगा। बेटा होता तो आज आप इस वृद्धाश्रम में न होकर अपने घर में होती।”
बुजुर्ग औरत ने उत्तर में थोड़ी दूर बैठी एक अन्य वृद्धा की ओर इशारा करते हुए कहा, “वह बैठी मेरे से भी ज्यादा दुखी। उसके तीन बेटे हैं। उससे पूछ ले।”
पत्रकार उस दूसरी बुढ़िया की ओर जाने लगा तो पास ही बैठा एक वृद्ध बोल पड़ा, “बेटा, इस वृद्धाश्रम में हम जितने भी लोग हैं, उनमें से इस बहन को छोड़ कर बाकी सभी के दो से पाँच तक बेटे हैं। परंतु एक बात हम सब में साझी है…”
“वह क्या?” पत्रकार ने उत्सुकता से पूछा।
“वह यह कि हम में से किसी के भी बेटी नहीं है। बेटी होती तो शायद हम यहाँ नहीं होते।” वृद्ध ने दर्दभरी आवाज में कहा।

साझेदार
घर की मालकिन का कत्ल कर सारी नकदी व गहने साधव ने थैले में समेट लिए। वह जब मकान से बाहर निकला तो अकस्मात लोगों की निगाह में आ गया। ‘चोर-चोर’ का शोर मच गया तो हड़बड़ाहट में उससे चोरी का स्कूटर भी स्टार्ट नहीं हो पाया। लोगों से बचने के लिए वह पैदल ही भाग लिया।
पूरा दम लगाकर भागते साधव को लग रहा था कि पीछे दौड़ रहे लोग शीघ्र ही उसकी गरदन मरोड़ डालेंगे। अपने बचाव हेतु वह शीघ्रता से पुलिस-थाने में दाखिल दो गया।
साधव के पीछे लगी भारी भीड़ को देख थानेदार को लगा कि वह उसे नहीं बचा पायेगा। उसने उसे दूसरे रास्ते से बाहर निकाल दिया। जब साधव थाने से बाहर निकला तो उसके थैले का वज़न पहले से कम हो गया था।
लोगों को थानेदार की करतूत का पता लग गया। वे फिर से साधव के पीछे हो लिए।
साधव को अपनी जान फिर से संकट में घिरी लगी। प्राण बचाने हेतु वह पूरी शक्ति लगा दौड़ा और बड़े नेता की कोठी में प्रवेश कर गया।
जब तक लोग नेता की कोठी पर पहुँच कोई कारवाई करते, तब तक साधव को पिछले दरवाजे से कार द्वारा भगा दिया गया।
साधव जब घर पहुँचा तो उसके थैले में मात्र कुछ गहने ही बचे थे।
अनमोल ख़ज़ाना
अपनी अलमारी के लॉकर में रखी कोई वस्तु जब पत्नी को न मिलती तो वह लॉकर का सारा सामान बाहर निकाल लेती। इस सामान में एक छोटी-सी चाँदी की डिबिया भी होती। सुंदर तथा कलात्मक डिबिया। इस डिबिया को वह बहुत सावधानी से रखती। उसने डिबिया को छोटा-सा ताला भी लगा रखा था। मुझे या बच्चों को तो उसे हाथ भी न लगाने देती। वह कहती, “इसमें मेरा अनमोल ख़ज़ाना है, जीते जी किसी को छूने भी न दूँगी।”
एक दिन पत्नी जल्दी में अपना लॉकर बंद करना भूल गई। मेरे मन में उस चाँदी की डिबिया में रखा पत्नी का अनमोल ख़ज़ाना देखने की इच्छा बलवती हो उठी। मैने डिबिया बाहर निकाली। मैने उसे हिला कर देखा। डिबिया में से सिक्कों के खनकने की हल्की-सी आवाज सुनाई दी। मुझे लगा, पत्नी ने डिबिया में ऐतिहासिक महत्त्व के सोने अथवा चाँदी के कुछ सिक्के संभाल कर रखे हुए हैं।
मेरी उत्सुकता और बढ़ी। कौन से सिक्के हैं? कितने सिक्के हैं? उनकी कितनी कीमत होगी? अनेक प्रश्न मस्तिष्क में उठ खड़े हुए। थोड़ा ढूँढ़ने पर डिबिया के ताले की चाबी भी मिल गई। डिबिया खोली तो उसमें से एक थैली निकली। कपड़े की एक पुरानी थैली। थैली मैने पहचान ली। यह मेरी सास ने दी थी, मेरी पत्नी को। जब सास मृत्युशय्या पर थी और हम उससे मिलने गाँव गए थे। आँसू भरी आँखों और काँपते हाथों से उसने थैली पत्नी को पकड़ाई थी। उसके कहे शब्द आज भी मुझे याद हैं–‘ले बेटी ! तेरी माँ के पास तो बस यही है देने को।’
मैने थैली खोल कर पलटी तो पत्नी का अनमोल ख़ज़ाना मेज पर बिखर गया। मेज पर जो कुछ पड़ा था, उसमें वर्तमान के ही कुल आठ सिक्के थे– तीन सिक्के दो रुपये वाले, तीन सिक्के एक रुपये वाले और दो सिक्के पचास पैसे वाले। कुल मिला कर दस रुपये।
मैं देर तक उन सिक्कों को देखता रहा। फिर मैने एक-एक कर सभी सिक्कों को बड़े ध्यान से थैली में वापस रखा ताकि किसी को भी हल्की-सी रगड़ न लग जाए।
माँ का कमरा
छोटे-से पुश्तैनी मकान में रह रही बुज़ुर्ग बसंती को दूर शहर में रहते बेटे का पत्र मिला- ‘मां, मेरी तरक्की हो गई है। कंपनी की ओर से मुझे बहुत बड़ी कोठी मिली है रहने को। अब तो तुम्हें मेरे पास शहर में आकर रहना ही होगा। यहां तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी।
पड़ोसन रेशमा को पता चला तो वह बोली, “अरी रहने दे शहर जाने को। शहर में बहू-बेटे के पास रहकर बहुत दुर्गति होती है। वह बसंती गई थी न, अब पछता रही है, रोती है। नौकरों वाला कमरा दिया है, रहने को और नौकरानी की तरह ही रखते हैं। न वक्त से रोटी, न चाय। कुत्ते से भी बुरी जून है।”
अगले ही दिन बेटा कार लेकर आ गया। बेटे की ज़िद के आगे बसंती की एक न चली। ‘जो होगा देखा जावेगा’ की सोच के साथ बसंती अपने थोड़े-से सामान के साथ कार में बैठ गई।
लंबे सफर के बाद कार एक बड़ी कोठी के सामने जाकर रुकी।
“एक ज़रूरी काम है मां, मुझे अभी जाना होगा।” कह, बेटा मां को नौकर के हवाले कर गया। बहू पहले ही काम पर जा चुकी थी और बच्चे स्कूल।
बसंती कोठी देखने लगी। तीन कमरों में डबल-बैड लगे थे। एक कमरे में बहुत बढ़िया सोफा-सैट था। एक कमरा बहू-बेटे का होगा, दूसरा बच्चों का और तीसरा मेहमानों के लिए, उसने सोचा। पिछवाड़े में नौकरों के लिए बने कमरे भी वह देख आई। कमरे छोटे थे, पर ठीक थे। उसने सोचा, उसकी गुज़र हो जाएगी। बस बहू-बेटा और बच्चे प्यार से बोल लें और दो वक्त की रोटी मिल जाए। उसे और क्या चाहिए।
नौकर ने एक बार उसका सामान बरामदे के साथ वाले कमरे में टिका दिया। कमरा क्या था, स्वर्ग लगता था- डबल-बैड बिछा था, गुस्लखाना भी साथ था। टी.वी. भी पड़ा था और टेपरिकार्डर भी। दो कुर्सियां भी पड़ी थीं। बसंती सोचने लगी- काश! उसे भी कभी ऐसे कमरे में रहने का मौका मिलता। वह डरती-डरती बैड पर लेट गई। बहुत नर्म गद्दे थे। उसे एक लोककथा की नौकरानी की तरह नींद ही न आ जाए और बहू आकर उसे डांटे, सोचकर वह उठ खड़ी हुई।
शाम को जब बेटा घर आया तो बसंती बोली, “बेटा, मेरा सामान मेरे कमरे में रखवा देता.”
बेटा हैरान हुआ, “मां, तेरा सामान तेरे कमरे में ही तो रखा है नौकर ने।”
बसंती आश्चर्यचकित रह गई, “मेरा कमरा ! यह मेरा कमरा !! डबल-बैड वाला…!”
“हां मां, जब दीदी आती है तो तेरे पास सोना ही पसंद करती है। और तेरे पोता-पोती भी सो जाया करेंगे तेरे साथ। तू टी.वी. देख, भजन सुन। कुछ और चाहिए तो बेझिझक बता देना।” उसे आलिंगन में ले बेटे ने कहा तो बसंती की आंखों में आंसू आ गए।
वापसी
पत्नी के त्रियाहठ के आगे मेरी एक न चली। अपने खोये हुए सोने के झुमके के बारे में पूछने के लिए, उसने मुझे डेरे वाले बाबा के पास जाने को बाध्य कर दिया।
पत्नी का झुमका पिछले सप्ताह छोटे भाई की शादी के अवसर पर घर में ही कहीं खो गया था। बहुत तलाश करने पर भी वह नहीं मिला।
बाबा के डेरे जाते समय रास्ते में मेरी पत्नी बाबा जी की दिव्य-दृष्टि का बखान ही करती रही, “पड़ोस वाली पाशो का कंगन अपने मायके में खो गया था। बाबाजी ने झट बता दिया कि कंगन पाशो की भाभी के संदूक में पड़ा दीख रहा है। पाशो ने मायके जाकर भाभी का संदूक देखा तो कंगन वहीं से मिला। जानते हो पाशो का मायका बाबाजी के डेरे से दस मील दूर है।”
मैं कहना तो चाहता था कि ऐसी बातें बहुत बढ़ा-चढा कर की गईं होती हैं। परंतु मेरे कहने का पत्नी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला था, इसलिए मैं चुप ही रहा।
पत्नी फिर बोली, “…और अपने गब्दू की लड़की रेशमा। ससुराल जाते समय रास्ते में उसकी सोने की अंगूठी खो गई। बाबाजी ने आँखें मूँद कर देखा और बोल दिया– नहर के दूसरी ओर नीम के वृक्ष के नीचे घास में पड़ी है अंगूठी।…और अंगूठी वहीं से मिली।”
गाँव के बाहर निकलने के पश्चात बाबा के डेरे पहुँचते अधिक देर नहीं लगी। बाबा अपने कमरे में ही थे। हमने कमरे में प्रवेश किया तो सब सामान उलट-पुलट हुआ पाया। बाबा और उनका एक शागिर्द कुछ ढूँढने में व्यस्त थे।
हमें देख कर बाबा के शागिर्द ने कहा, “बाबा जी थोड़ा परेशान हैं, आप लोग शाम को आना।”
मैने पूछ लिया, “क्या बात हो गई?”
“बाबा जी की सोने की चेन वाली घड़ी नहीं मिल रही। सुबह से उसे ही ढूँढ रहे हैं।” शागिर्द ने सहज भाव से उत्तर दिया।
वापसी बहुत सुखद रही। पत्नी सारी राह एक शब्द भी नहीं बोली।
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श्याम सुंदर अग्रवाल : संक्षिप्त परिचय :
8 फरवरी 1950 को कोटकपूरा (पंजाब) में जन्मे श्याम सुन्दर अग्रवाल ने बी.ए. तक शिक्षा प्राप्त की है। लेखन, संपादन और अनुवाद के माध्यम से वह हिन्दी और पंजाबी दोनों भाषाओं में समान रूप से सक्रिय हैं। इनके द्वारा मौलिक रूप से लिखित, संपादित एवं अनूदित कृतियों का विवरण निम्न प्रकार है:-
मौलिक : ‘नंगे लोकां दा फिक्र’ तथा ‘मारूथल दे वासी’(लघुकथा संग्रह, पंजाबी में)
संपादित : 23 लघुकथा संकलन पंजाबी में तथा 2 संकलन हिंदी में।
अनुवाद : 4 लघुकथा संग्रह( हिंदी से पंजाबी भाषा में अनुवाद)
संपादन : पंजाबी त्रैमासिक पत्रिका ‘मिन्नी’ (1988 से निरंतर)
संपर्क : बी-1/575, गली नं:5, प्रताप सिंह नगर, कोटकपूरा (पंजाब)-151204
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