Wednesday, 22 May 2024

पाठक के लिए प्रेरणास्रोत दो आलोचना पुस्तकें / डॉ. सुरेश वशिष्ठ

डॉ. सुरेश वशिष्ठ वरिष्ठ साहित्यकार हैं। कहानी, लघु-कहानी, लघुकथा, नाटक, नुक्कड़ नाटक, एकांकी, आलोचना आदि साहित्य की अनेक विधाओं में लेखन किया है। उनसे आज यह समीक्षात्मक आलेख मिला है जिसे उनकी अनुमति के बिना मैं ‘जनगाथा’ और लघुकथा-साहित्य के पाठकों के समक्ष रख रहा हूँ।

पिछले दिनों लघुकथा विमर्श पर दो पुस्तकें प्राप्त हुई। एक पुस्तक नेतराम भारती द्वारा संपादित--'लघुकथा चिंतन और चुनौतियाँ' है। इस पुस्तक में 25 लघुकथा लेखको से विचार विमर्श किया गया है। लेखक लघुकथा को लेकर क्या सोचते हैं, इस पर साक्षात्कार के रूप में चर्चा हुई है। 
दूसरी पुस्तक 'उत्कृष्ट लघुकथा विमर्श' दीपक गिरकर द्वारा संपादित है। इसके खंड-एक में 26 लघुकथा लेखको से आलेख प्रस्तुत हुए हैं। दोनों पुस्तकों में जिन रचनाकारों के विचार साझा हुए, करीबन वही लोग दोनों तरफ हैं। खंड-दो में कुछ अच्छी लघुकथाएँ हैं। दोनों पुस्तकें लघुकथा के इतिहास, मानक अथवा उसकी स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं। दोनों पुस्तकों में करीब-करीब उन्हीं लोगों के विचार साझा हुए हैं। आलेख के माध्यम से या साक्षात्कार के रूप में, लघुकथा के मापदंड प्रस्तुत हुए हैं। अच्छा होता यदि यहाँ विद्वान समीक्षक भी अपने विचार साझा करते। लघुकथा लेखक से अलग लोग, इस विधा पर मापदंड तय करें तो बेहतर है। 

खैर ! सर्वप्रथम 'लघुकथा क्या है?' इस पर दृष्टि डालते हैं। नेतराम भारती द्वारा संपादित पुस्तक में, डॉ. अशोक भाटिया का कहना है--"कथा परिवार की सबसे छोटी इकाई लघुकथा है। सबसे बड़ी इकाई उपन्यास, फिर कहानी और फिर लघुकथा और यह विशुद्ध भारतीय परंपरा की देन है। इस विद्या ने परंपरा से आकार लिया है और समय के दबाव से समकालीन यथार्थ को अभिव्यक्त करने की प्रेरणा पाई है।" डॉ. अशोक भाटिया ने कालदोष पर भी अपने विचार रखे हैं। उन्होंने इसे हवाई बीमारी कहा है और कालदोष को सिरे से नकारा है। स्पष्ट किया है कि किसी भी विधा की रचना को समय सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। कालखंड पर उमेश महदोषी भी यह मानते हैं कि अब इस मुद्दे को समाप्त मान लेना चाहिए क्योंकि विभिन्न कालखंडों को समाहित कर अनेक लघुकथाएँ लिखी जा चुकी हैं। उनकी नजर में--'जीवन से जुड़ी समस्याओं, विसंगतियों और अनुभूतियों पर केन्द्रित आलोचनात्मक और संवेदनात्मक प्रकृति की तीव्र वैचारिक एवं भावनात्मक संवेग वाली कथात्मक रचनाएँ लघुकथा की श्रेणी में आती हैं।'

      अंतरा करवड़े की नजर में प्रत्येक लेखक की अपनी क्षमता अनुसार सामने आने वाली एक बार की सोच, घटना के प्रति उसकी दृष्टि, उसी कालावधि में सामने आते संदर्भ और इन सभी के ताने-बाने लेकर बुनी गई एक रचना लघुकथा है। डॉ. कमल चोपड़ा का मानना है--'लघुकथा अपने आप में एक संपूर्ण कला है। सृजनात्मक कथा साहित्य में लघुकथा एक ऐसा कथा प्रकार है, जिसमें धनीभूत अनुभूतियों की प्रकृति और अभिव्यक्ति सार्थक रूप से पूर्णतया संभव है। दूसरे शब्दों में कहें तो लघुकथा जीवन के यथार्थ खंड, प्रश्न, विचार या अनुभूति को गहराई और गहनता के साथ व्यंजित करने वाली कथा-विधा है। कांत राय लघुकथा को बंद कली के सदृश मानती हैं। बंद कली से उनका आशय कथ्य के संप्रेषण के लिए प्रयोग की गई सांकेतिक भाषा से है। जिस प्रकार बंद कली में पंखुड़ियाँ एक दूसरे में लिपटी और गुँथी हुई रहती है, उसी तरह से लघुकथा में भी अंतर्द्वंद्वों के माध्यम से कथ्य गुंथा हुआ होना चाहिए। डॉ कुमारसंभव जोशी लघुकथा की सर्वमान्य एवं संपूर्ण परिभाषा देने में स्वयं को सामर्थ्यवान नहीं मानते लेकिन संक्षेप में अपनी बात रखते हैं--'सामाजिक विसंगति को तिक्ष्णता से उठाते हुए कथातत्व की अनिवार्यता के साथ, अत्यल्प व आवश्यक शब्दों में कही गई, सुउद्देश्य एवं सुस्पष्ट सम्प्रेषित रचना लघुकथा कही जा सकती है। डॉ. खेमकरण सोमन का कहना है--'लघुकथा ओस की बूँदों के समान है। लघुकथा फूलों की तरह है। लघुकथा तारों के समान है। लघुकथा नदी या कहूँ कि समुद्र की तरह है, जो अपने भीतर बहुत कुछ समाए बैठी है। लघुकथा मनुष्य की आँखों की तरह है जिसे मनुष्य ने कभी छोटा नहीं कहा। परन्तु इन आँखों ने क्या-क्या सच नहीं दिया। कहने का आशय यह कि सारा खेल छोटे होने का नहीं, क्षमताओं का है। जैसे बूँद, फूल, तारे, नदी, समुद्र और आँखें। ये शब्द छोटे अवश्य हैं परन्तु इनके कार्य बहुत बड़े हैं।'

     डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी न्यूनतम शब्दों में रचित एकांगी गुण की कथात्मक विधा को लघुकथा मानते हैं। पुरुषोत्तम दूबे का कहना है--'जीवन में घटने वाली आशा के विपरीत अथवा समस्यामूलक कोई घटना हमको घेर ले तो कारगर संप्रेषण से ऐसे विषम चक्रव्यूह को तोड़कर विसंगतियों रहित, मूल्य आधारित सलभ मार्ग का आश्रय सहज उपलब्ध कराने वाली विधा लघुकथा है।'प्रबोध कुमार गोविल कहते हैं--'हर कथ्यात्मक कल्पना में कोई न कोई बिन्दु ऐसा अवश्य होता है, जिसके चारों ओर कहने योग्य बात घूमती है। यह केन्द्रीय बिन्दु किसी तथ्य, भाव अथवा स्थिति के रूप में हो सकता है। इस बिन्दु पर आधारित संक्षिप्त रूप में विकसित गद्य रचना ही लघुकथा है।' डॉ. बलराम अग्रवाल सुरुचि सम्पन्न लघु-आकारीय कथा को ही लघुकथा मानते हैं। सुरुचि सम्पन्नता का सम्बंध वे मूल्यों से मानते हैं। उनकी नजर में लघुकथा सघन अनुभूति की सुगठित प्रस्तुति है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि लघुकथा उस चिप की तरह है जिसमें पूरी दुनिया और सारे विषय समाए हुए हैं। उस विद्युत उपकरण अथवा स्विच की तरह है, इसके ऑन होते ही वातावरण रोशनी से नहा देता है। कालखंड के विषय में चंद्रेश कुमार छतलानी का कहना है कि एकांगी होना लघुकथा का स्वभाव है। यदि लघुकथा एकांगी नहीं हो पा रही है, तो वह कहानी में तब्दील हो सकती है। और यदि लेखक इस तब्दीली में कोई घटना कर्म से नहीं ले पा रहा है तो वह रचना एक से अधिक कालखंड में विभक्त होकर छोटी कहानी की तरफ मुड़ सकती है और इसमें कोई दोष भी नहीं है।

       भगीरथ परिहार किसी एक दृश्य या घटना को, एक कथानक या मानसिक द्वंद्व और एक सार्थक वार्तालाप या एक अनुभव की कम से कम शब्दों में कथात्मक अभिव्यक्ति को लघुकथा मानते हैं। 

      संतोष सुपेकर लघुकथा को लेकर अपना दृष्टिकोण स्पस्ट करते हैं--"लघुकथा क्षण विशेष की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। इसकी संक्षिप्तता का अन्य अर्थ न लगाया जाए। जैसा कि रमेश बतरा जी ने कहा है कि 'लघुकथा में शब्द सीमित होते हैं लेकिन चिंतन नहीं।' विसंगति और विडंबना इसके केंद्र में रही हैं। सुप्त समाज के लिए इंजेक्शन की सुईं है लघुकथा, जिसकी थोड़ी सी दवा विशाल स्तर पर जागृति फैला सकती है। या यूँ कह लीजिए कि बाहर बिखरा पड़ा ढेर सारा सामान, एक छोटे कमरे में आपको इस तरह सजाना है कि कोई सामान बाहर भी न रहे और कमरा भी व्यवस्थित लगे। इस सजाने की प्रक्रिया में लगने वाला श्रम भी लघुकथा सृजन है। यहाँ सामान से आशय विचारों की भीड़ से है और कमरे से आशय लघुकथा की फ्रेम से है। लघुता, कसावट, सांकेतिकता, संप्रेषणीयता और पैनापन लघुकथा की मुख्य विशेषताएँ हैं।"

     'उत्कृष्ट लघुकथा विमर्श' में बलराम अग्रवाल ने लघुकथा के पैमाने की स्पष्टता के लिए कुछेक बिंदु तय किए हैं। कथा-धैर्य, बिंब, प्रतीक और सांकेतिक योजना, उसका विगत, नेपथ्य और लाघव से उसे संवारने की कवायद, यथार्थ घटना और कथा घटना की अहमियत, कल्पित उड़ान, भाषा-परिवेश और शिल्प एवं शब्द प्रयोग, दृश्य योजना और परस्पर संवाद, लेखकविहीनता, संपूर्णता और शीर्षक इत्यादि बिंदुओं द्वारा उसके स्वरूप को निर्धारित किया है। बलराम अग्रवाल ने बहुत अच्छे से लघुकथा की बारीकियों को समझने और आपको उसे समझाने का प्रयास किया है। लघुकथा को लेकर दीपक गिरकर भी अपनी राय देते हैं—'लघुकथा मानव जीवन की सूक्ष्म एवं तीक्ष्ण अभिव्यक्ति है। लघुकथा कथ्य प्रधान विधा है। लघुकथा में पात्रों की संख्या एक दो तक ही सीमित होती है। लघुकथा के कथानक में घटनाओं के विस्तार का अभाव होता है। लघुकथा के अंत में विस्मयकारी मोड़ लघुकथा को एक नया आयाम प्रदान करता है। जो मानस पटल पर अमित छाप छोड़ जाए, वहीं उत्कृष्ट लघुकथा है।' उन्होंने अपने इस आलेख में भगीरथ के विचार भी सांझा किए हैं। भगीरथ कहते हैं—'लघुकथा अक्सर द्वंद्व से आरंभ होकर तेजगति से चरम की ओर चलती है, तथा चरमोत्कर्ष पर अप्रत्याशित ही समाप्त हो जाती है। लघुकथा का अंत अक्सर चौंकाने वाला तथा हतप्रभ करने वाला होता है। इस तरह का अंत पाठक की जड़ता को तोड़ता है।' दीपक गिरकर जी का कहना है कि लेखक आस-पास जब भी कुछ असाधारण देखता है और अनुभूत करता है, तब उसका अंतर्मन व्यथित होने लगता है और अभिव्यक्ति के लिए छटपटाने लगता है। अंतः लघुकथा क्षणिक घटनाक्रम को आधार बनाकर बुनी जाती है। लघुकथा लिखने से पहले लेखक के समक्ष युगबोध की स्पष्टता, अनुभवों का विस्तार और गहन अनुभूतियों की समझ होनी आवश्यक है। लघुकथा की सृजन प्रक्रिया दीर्घकालिक है, इसीलिए यह देर तक और दूर तक जीवित रहती है। लघुकथा में कथ्य के अनुरूप संप्रेषणीयता, भाषा शैली में सांकेतिकता व संक्षिप्तता का गुण होना आवश्यक है। संवाद चुस्त सटीक एवं संक्षिप्त होने चाहिए। लघुकथा की भाषा जनभाषा होनी चाहिए। लघुकथा की भाषा जीवन्त, प्रवाहमयी, सांकेतिक एवं व्यंजनात्मक होनी चाहिए। लघुकथा का जन्म संवेदनाओं की पृष्ठभूमि पर ही होता है।

       विद्वान मित्रों की राय जान लेने के बाद लघुकथा को लेकर मेरी जो सोच विकसित हुई, वह सामने रख रहा हूँ। मेरी नजर में लघुकथा यथार्थ परिवेश में घटित घटनाओं या समस्याओं से सवेंदित और आहत हृदय का उद्वेग है। यह उद्वेग राजनैतिक, शोषित, सामाजिक और अभाव में घिरे इंसान का रुदन है। आपसी संबंधों का खुलासा है। यह रुदन जब फूटता है, तब रचनाकार की बुनावट में बुन लिया जाता है। सूझ-बूझ से बुना गया तो रचना अच्छी बुनी जाएगी और पाठक पर प्रभाव छोड़ पाएगी। उसे नींद से उठने के लिए बाध्य करेगी। चुनौतीपूर्ण उस यथार्थ के प्रति पाठक को सोचने पर विवश करेगी।'

      दूसरे विश्वयुद्ध के बाद संपूर्ण विश्व में जो परिस्थितियाँ बनी और जो परिणाम सामने आकर खड़े हुए, उनसे आहत या मौत को प्राप्त हुआ आदमी अपनी दास्तान कहने को उठ खड़ा हुआ। दुनिया को सच दिखाने के लिए उसकी वह दास्तान ही कथा बनने लगी। वहीं से लघुकथा का भी जन्म हुआ। भारत में इमरजेंसी से कुछ पहले गरीबी और परिस्थितियों से घिरे चरित्र, पात्र रूप में उपस्थित होने लगे। साहित्य की सभी विधाओं में ऐसे चरित्र दिखलाई पड़ने लगे। लेखन से गोरिल्ला युद्ध लड़ा जाने लगा। उन्हीं दिनों, नुक्कड़ नाटक का भी आगमन हुआ। छोटे क्लेवर में कहानियाँ भी लिखी जाने लगी। लघुकथा उसी समय की देन है। ये दोनों विधाएँ गोरिल्ला की तरह अटैक करती हैं और दर्शक या पाठक की बुद्धि को प्रभावित करती हैं। उसे सोचने पर विवश करने लगती हैं।

     पुरातन काल से चली आ रही कथा सुनने-सुनाने की हमारी प्रवृति धरोहर थी। कथा के माध्यम से यहाँ ऋषि-मुनि मूल्य परोसते थे। अनैतिक का हश्र दिखाते और पाठक या श्रोता के मन को फेरने के लिए प्रयास करते थे। आज के इस दौर में यह सब साहित्य को करना चाहिए। लघुकथा और नुक्कड़ नाटक उसी प्रयास का एक हिस्सा हैं। यह लेखन सामान्य परिस्थितियों में सम्भव ही नहीं। बिना गाम्भीर्य इसे बुनावट नहीं दी जा सकती। यह अंतस के रेशों से बुना जाता है। लेखन के लिए प्रतिभा सम्पन्न हृदय के महत्व को स्वीकार किया जाना चाहिए।

     इसमें भी अलग कोई राय नहीं कि लघुकथा, कहानी का ही एक छोटा कथारूप है। कथा, कहानी लिखना कोई कला नहीं है। वह तो स्वतः अंतस से उपजती है। किन्हीं बेचैन पलों में भीतर से उसका सृजन होता है। शब्दों में आबद्ध होने के बाद उसे भावतत्व से सवार देना कला हो सकती है। कथा, कहानी लिखते समय मानो अवचेतन में सुगबुगाहट हुई, रंध्र फड़के और हाथों में पकड़ी कलम चल पड़ी। मीठा कोई दर्द कहानी के गलियारे में पैदा होने लगता है। आँखें यथार्थ में जिसे देखती रही, समझती और हृदयगम करती रही, उस तकलीफ को बुनती रही, वही तो बाहर आता है। उच्छवास के साथ, वही सब फूटने भी लगता है। फिर हम उसे शब्दकार की तरह सँवारने लगते हैं। उसके अंतिम वाक्य को चौकाने वाला, झकझोरने वाला और पूरी कथा के द्वंद्व को खोल देने वाला मोड़ देकर छोड़ देते हैं। अगला काम पाठक का है। 

      दीपक गिरकर ने खंड-दो में चुनिंदा जिन लघुकथाओं को लिया है, उन्हें पढ़ने से लघुकथा का प्रारूप समझ में आने लगता है। दोनों पुस्तकों में अनेक प्रश्न और जवाब हैं जो निस्संदेह पाठक के लिए प्रेरणास्रोत रहेंगे। नेतराम भारती और दीपक गिरकर जी का यह कार्य प्रशंसा के योग्य है।                                                            -डॉ. सुरेश वशिष्ठ   मो. 9654404416  दिनांकः 23. 5. 24   

Saturday, 13 January 2024

उत्सवों का आकाश यानी त्यौहारों की सांस्कृतिक-सामाजिक दुनिया / बलराम अग्रवाल

            

सुधा भार्गव जानी-मानी बाल साहित्यकार, कवयित्री और लघुकथा लेखिका हैं। इनके अलावा उन्होंने यात्रा वृत्तांत भी लिखे हैं और डायरी साहित्य भी। ‘उत्सवों का आकाश’ विभिन्न भारतीय त्यौहारों को केन्द्र में रखकर रची गयी उनकी दस बाल कहानियों का संग्रह है।

पहली कहानी का विषय है—नये साल का आगमन। कहानी का शीर्षक है—नये वायदे, नये कायदे। जैसाकि शीर्षक से स्पष्ट है, सुधा जी अपने गद्य में काव्यात्मक प्रवाह का ध्यान रखती हैं। बालकों के लिए लिखी होने की वजह से तो यह और भी आवश्यक है कि भाषा में सरलता और तरलता दोनों हों। कहानी की शुरुआत उन्होंने यों की है—‘नन्हे-मुन्नो, नया साल सूर्य-रथ पर सवार होकर निकलता है।’ अब, सही बात तो यह है कि प्रत्येक दिन सूर्य के रथ पर सवार होकर निकलता है; लेकिन जब यही बात नये साल की नयी सुबह के बारे में कही जाती है, तब उसके ध्वन्यार्थ अलग और आकर्षक होते हैं। ‘नये वायदे, नये कायदे’ सर्रू नाम के एक छोटे बच्चे की कहानी है। उसके पापा नाश्ते के लिए माँ द्वारा बनाये गये गाजर के हलुए, मठरी और बेसन के लड्डू को चोरी-चोरी अकेले ही चट कर जाते हैं। इसके कारण वह खाना भी नहीं खाते और काम पर निकल जाते हैं। यह बात जब सर्रू को पता चलती है तो वह नाराज हो जाता है। उसे खुश करने के लिए माँ नये सिरे से सारी चीजें बनाकर उसे खिलाती है। नये साल के आगमन पर माँ, सर्रू और पापा—तीनों अपनी-अपनी दिनचर्या को निर्धारित करने हेतु स्वयं से नये वायदे करते हैं जिन्हें वे पूरे साल निभायेंगे। सर्रू की मित्र मंडली के अन्य बच्चे भी उत्साह में भरकर नये वादे करते हैं।

दूसरी कहानी है—वेलेंटाइन डे की रानी। पहली ही पंक्ति में कहती हैं—14 फरवरी का प्रेमोत्सव दिवस प्यार देने और प्यार पाने का दिन होता है। इस कहानी की नायिका यानी मुख्य पात्र ‘चिन्नी’ नाम की पालतू बिल्ली है जो दादी की लाड़ली है। घर में दादी के अलावा मम्मी, पापा और गौरव भी हैं। चिन्नी को गौरव के स्कूल से आने के समय का ध्यान रहता है और वह सही 2 बजे दरवाजे पर टकटकी लगाकर बैठ जाती है। गौरव भी चिन्नी का बहुत ख्याल रखता है। मम्मी से कहकर वह आराम से उसके बैठने-खाने के लिए कुर्सी-मेज का इंतजाम कराता है। दादी अपने पुराने तौलिए से काटकर चिन्नी के लिए दो ‘बिब’ बना देती हैं ताकि खाते हुए वह गंदी न हो। पुराने स्वेटरों से वह उसके लिए शॉल भी बनाती हैं। वेलेंटाइन डे को गौरव घर में अपने दोस्तों के चिराग और पराग के साथ केक काटकर मनाता है। इस अवसर पर पराग की ओर से चिन्नी को गुलाब का एक फूल भी भेंट में मिलता है।

तीसरी कहानी का शीर्षक है—ओए बल्ले-बल्ले। यह छोटी-सी एक कविता से शुरू होती है। इसमें गुलाल बिखरते मार्च का जिक्र है तो ‘बड़कू’ नामक उसके बड़े भाई अप्रैल का भी जिक्र है। सुधा जी की बाल कहानियों में बड़ी बात यह है कि बातों ही बातों में वे बाल-संस्कार की बात भी कह देती हैं। इस कहानी में, ‘दादू कहते हैं—हरेक के शरीर में होलिका और प्रह्लाद रहते हैं।’ इसी के साथ बैसाखी का भी उल्लेख एक कविता के माध्यम से हुआ है।

चौथी कहानी ‘नाग देवता’ है। कहती हैं—‘बच्चो, मुझे मालूम है कि तुम्हें रिमझिम बरसते पानी में भींगना बड़ा अच्छा लगता है।’ इस तरह सुधा जी वाचक की तरह केवल कहानी नहीं कहती हैं बल्कि बच्चों से संवाद भी स्थापित करती हैं। बालकों को वह हेल-मेल और प्यार-स्नेह सिखाती हुई समझाती हैं कि—‘तुम्हारी बहन जब झूला झूले तो तुम जरूर उसे झोटा देना। पर धीरे-धीरे। वरना वह डर जाएगी। प्यार से उसे झोटा देना तो वह बहुत खुश होगी।’ जुलाई के साथ-साथ वह हिन्दी महीने सावन का नाम बताना भी लेखकीय कर्तव्य समझती हैं। इस कहानी में रिमझिम बारिश और झूला के साथ ही भारतीय त्यौहार ‘नाग पंचमी’ की भी एक कहानी जोड़ी गयी है। वह यह भी बताना नहीं भूलती हैं कि सारे साँप जहरीले नहीं होते और उनके जहर से दवाई भी बनाई जाती है, इसलिए बिना सोचे-समझे साँपों को मार नहीं देना चाहिए।

पाँचवीं कहानी ‘गुल्लक की करामात’ के केन्द्र में राखी का त्यौहार है। भाई-बहन हैं—टीटू और कोयलिया। इसके माध्यम से वह बताती बताती हैं कि—जिन भाई-बहन के हाथ प्यार से मिले रहते हैं, उनके दो नहीं चार हाथ होते हैं।

छठी कहानी ‘मीठी खीर’ की भूमिका में सुधा जी धीरे-से पहले कृष्ण की कहानी बच्चों को बताती हैं। उसके बाद सुनाती हैं मुख्य कहानी। इस कहानी के मुख्य पात्र बालक सारंगी, उसकी दादी और मम्मी हैं। इनके साथ ही एक गरीब बालक को भी कहानी से जोड़ा है। उस बालक के पास दूध और चावल हैं और वह चाहता है कि उन दूध-चावल से वे उसके लिए खीर बना दें। जाहिर है कि उसका अनुरोध स्वीकारा नहीं जाता है और दुत्कार कर भगा दिया जाता है। ऐसे में, सारंगी अपने हिस्से की खीर दादी से लेकर छिपता हुआ कबीरा नाम के उस बालक के पास जा पहुँचता है। उसे देखकर दादी उसकी माँ से कहती है—‘एक दुखिया को खुशी देकर हमारे घर के कन्हैया ने तो सच्चे अर्थों में जन्माष्टमी मनाई है।’

सातवीं कहानी गणेश चतुर्थी पर्व पर केन्द्रित है। इसका शीर्षक है—‘पूत के पाँव पालने’। इस कहानी को सुधा जी ने सीधे पुराण कथा के आधार पर प्रस्तुत किया है। इस कथा में उन्होंने सरस काव्य पंक्तियों का भी प्रयोग किया है।

आठवीं कहानी दशहरा त्यौहार पर केन्द्रित है। इसके शीर्षक ‘घर का भेदिया’ से ही अनुमान हो जाता है कि इसमें सुधा जी ने किस की ओर निशाना साधा होगा। बाल कहानियों के बारे में सुधा जी का सिद्धान्त है—कहानी की कहानी और जानकारी की जानकारी। सही है, बाल कहानियाँ केवल मनोरंजन और रोमांच के लिए ही प्रस्तुत न की जाएँ बल्कि उनसे बालकों के ज्ञान में भी यथेष्ट वृद्धि होनी चाहिए। न केवल सांस्कृतिक और पौराणिक जानकारी बल्कि वैज्ञानिक जानकारी भी।

नौवीं कहानी के केन्द्र में दीपावली पर्व है। इसका शीर्षक है—‘घर-घर जन्मो राम’। अलटू-पलटू और रामा-लाखा नाम के बच्चे इस कहानी के मुख्य पात्र हैं। इनमें पलटू बड़ा भाई है और अलटू छोटा। ये दोनों इस कदर शरारती हैं कि दिवाली के मौके पर छोड़े जाने वाले पटाखों को जलाकर किसी के भी ऊपर फेंक देते हैं। इसी कारण रामा-लाखा से इनका झगड़ा भी हो जाता है; लेकिन कहानी के अन्त में सब के बीच सुलह हो जाती है। सब प्रेम से दीवाली-पूजन करते हैं।

और अन्त में, दसवीं कहानी दिसम्बर माह की 25 तारीख को मनाये जाने वाले त्यौहार ‘क्रिसमस’ को केन्द्र में रखकर रची गयी है। शीर्षक है—‘लो मैं आ गया’। एक छोटे से घर में मंकी और टंकी नाम के दो लड़के रहते हैं। दिसम्बर की रात दस बजे दरवाजे पर खट-खट की आवाज सुनकर वे चौंक जाते हैं। मंकी झांककर देखता है कि बाहर उसी की उम्र का एक लड़का खड़ा ठंड से काँप रहा है। दोनों भाई मनमौजी नाम के उस लरके को शरण देते हैं। अपनी चारपाई पर उसे सुलाकर खुद जमीन पर सो जाते हैं। सुबह उठकर जो देखते हैं तो मनमौजी गायब! कमरे के बाहर वे सजे-धजे एक पेड़ को खड़ा देखते हैं। पूछने पर वह पेड़ बताता है कि वही मनमौजी है। कहानी इसी तरह बड़े रोचक ढंग से आगे बढ़ती है। पेड़ इस कहानी में सेंटा क्लाज की भूमिका निभाता है।

कुल मिलाकर ‘उत्सवों का आकाश’ रोचक और ज्ञानवर्द्धक बाल कहानियों का पुलिंदा है। इसके लिए लेखिका सुधा भार्गव साधुवाद की अधिकारी हैं। पुस्तक के भीतर विषयानुरूप श्वेत-श्याम चित्र हैं लेकिन वे किसी चित्रकार से न बनवाकर इन्टरनेट से उठाये लगते हैं। मात्र 96 पृष्ठ की पेपरबैक पुस्तक की रुपए 230/- कीमत बहुत अधिक प्रतीत होती है। इस तरह के अनाप-शनाप मूल्य पुस्तकों को बाल-पाठकों से दूर रखने का काम करते हैं।

समीक्षित पुस्तक—उत्सवों का आकाश (बाल कहानी संग्रह); लेखक—सुधा भार्गव; प्रकाशक—श्वेतांशु प्रकाशन, डी-14 नियर रामलीला पार्क, पाण्डव नगर, दिल्ली-110092; प्र॰ संस्करण—मई 2023; कुल पृष्ठ—96; मूल्य—रुपए 230 (पेपरबैक)

 

 

 

समीक्षक सम्पर्क—एफ-1703, आर जी रेजीडेंसी, सेक्टर 120, नोएडा-201301 (उप्र)

मोबाइल—8826499115  

Thursday, 11 January 2024

पठनीय और विचार उत्प्रेरक ‘तूफान गुजरने के बाद’ / बलराम अग्रवाल

           

प्रत्येक लेखक, वह चाहे कवि हो चाहे कथाकार, उसकी स्मृति में अतीत चक्कर काटता है। उस अतीत का कोई हिस्सा कब ज्यों का त्यों अथवा रचना के रूप में उतरने का दबाव रचनाकार पर डालने लगेगा, कहा नहीं जा सकता। अतीत की बहुत-सी अच्छी-बुरी स्मृतियाँ अचेतन मन में आराम से सोई रहने में ही भलाई समझती हैं; लगभग यह गुनगुनाती-सी कि—‘सोई हुई यादो मुझे इतना न सताओ, अब चैन से रहने दो मेरे पास न आओ।’

ॠता शेखर ‘मधु’ द्वारा सम्पादित, उन सहित 29 लेखकों-लेखिकाओं की कलम से नि:सृत, ‘तूफान गुजरने के बाद’ की सभी रचनाओं को न तो कहानी कहा जा सकता न संस्मरण और न ही अतीत रुदन। रुदन तो खैर इनमें से एक भी रचना है ही नहीं। सब की सब कुछ न कुछ लोहा लिए हुए हैं। सब की सब करुणा से सराबोर हैं। इसीलिए वे आपको रुलाती भी हैं और आपकी संवेदना को सहलाती भी हैं। ‘सम्पादक की दृष्टि से’ इन्हें देखते हुए ॠता जी ने पहला ही वाक्य यह लिखा है कि—‘कहानियाँ, जो काल्पनिक नहीं सच हैं।’ 

अंजू शर्मा की संघर्षगाथा पढ़ते हुए लगा कि उन्होंने अपनी नहीं मेरी गाथा लिखी है। किशोर अवस्था से लेकर युवावस्था तक मैंने भी पटरी लगाई, पुलिस कान्स्टेबिल के डंडे खाये, म्युनिस्पैलिटी की रसीद काटने वालों की झिड़कियाँ सुनीं; और भी पता नहीं क्या-क्या। इन स्मृतियों को पढ़ने का एक लाभ यह भी है ये आपके भीतर की आग को कुरेद देती हैं, चिंगारियों को उभरकर ऊपर आने को उकसाती हैं। अर्चना चावजी की रचना बताती है कि सहायता करने वाले के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन कितना बड़ा गुण है। लम्बा संघर्ष करने के बाद बच्चे का कैम्पस सलेक्शन खुशी और सम्मान का जो उपहार संघर्षमयी माँ को देता है, असफल साक्षात्कार वह सब एक ही पल में मटियामेट कर देता है। एकबारगी लगता है कि सब चौपट; लेकिन नहीं। बच्चा नये सिरे से उठ खड़ा होना शुरू करता है और ‘इसरो’ जैसी संस्था में वैज्ञानिक का सम्मानजनक पद पा लेता है। इसे पढ़कर मुझे अनायास ही एक शे’र याद हो आया—

तुंदी-ए-वादे-मुखालिफ से न घबरा ऐ उकाब।

ये तो चलती है तुझे ऊँचा उड़ाने के लिए।  (तुंदी-ए-वादे-मुखालिफ यानी तीव्र तूफान की विपरीतता)  

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने अपनी गाथा ‘गूँज’ के अन्त में लिखा भी है—‘तूफान केवल विध्वंस का प्रतीक नहीं होते, कभी-कभी उनमें निर्माण की गूँज भी होती है।’

एक ओर मधु जैन की कहानी ‘जीवन के रंग’ की वह युवती है जो कमर से नीचे के समूचे अंगों से अपाहिज हो चुके पति की प्राण-पण से देखभाल करती है और दूसरी ओर सुरिन्दर कैले की कहानी ‘मैं नहीं बताऊँगी’  के घायल मेजर शेरसिंह के बचपन की प्रेमिका डॉक्टर मनमीत जो किसी अन्य के साथ सगाई करके अलग जीवन साथी का चुनाव करती है।

‘ये कैसा रिश्ता’ (मनोरमा जैन ‘पाखी’) की शामली को भाग्य की मारी लड़की ही कहा जा सकता है। समूचे संघर्षों के बावजूद, वह सही समय पर साहस नहीं दिखा पाती, वैसा विद्रोह नहीं कर पाती जैसा उसने पढ़ाई जारी करने के लिए विद्यालय का फार्म भरते समय किया था; और सम्भवत: इसी कारण दुर्भाग्य से उबर नहीं पाती और कह सकते हैं कि नष्टप्राय हो जाती है।

निशा महाराणा की ‘दो हंसों का जोड़ा’ एक शिक्षा देती है कि ‘कई बार नादानीवश अपनी बहनों और सहेलियों की सहायता के चक्कर में (महिलाएँ) अपनी जिन्दगी को दाँव पर लगा बैठती हैं।’ दूसरी ओर ‘सूनी तीज’ (रीता मक्कड़) की सरोज है जो ब्रेस्ट कैंसर की अपनी बीमारी का पता चलने पर अपने बच्चों के भविष्य के प्रति चिन्ता से मुक्त होने की खातिर अपने जीवित रहते ही पति का विवाह अपनी छोटी बहन से कराकर मुक्ति की साँस लेती है।

निवेदिता श्रीवास्तव ‘निवी’ की कहानी ‘किन्नर मन’ बताती है कि ‘किन्नर मन होना गलत है, शरीर नहीं।’ पूजा अनिल की ‘मेरी बहादुर बच्ची’ विजातीय युवक से प्रेम विवाह कर लेने वाली एक युवती और उसकी माँ आदि को त्रास दिये जाने की व्यथा है। पूर्णिमा शर्मा की ‘अन्तहीन संघर्ष’ एक महिला के पति की मृत्यु के बाद अनेक संघर्षों से गुजरने की कथा है।

ॠता शेखर ‘मधु’ ने एक ऐसे पिता को रेखांकित किया है जो बदचलन बेटे को घर और सम्पत्ति से निष्कासित कर नाराज बहू को घर वापस ले आता है। ‘आतंक के घेरे से’ (सीमा वर्मा) की दीदी सिर-चढ़े अपने बिगड़ैल पति को उस समय झापड़ मारकर उसकी औकात समझा देती है जब वह अपने ससुर यानी दीदी के पिता पर हाथ उठा देता है।

शोभना चौरे की ‘गुलाब माँ’, एक जुझारू महिला के जीवन की गाथा है तो शील रानी निगम की ‘वात्सल्य’ एक बिगड़ी हुई दत्तक पुत्री के दुर्व्यहार की, ‘अनावरण’ देश पर जान न्यौछावर करने वाले बेटे के पिता के साहस की कहानी है तो शुचि मिश्रा की ‘माँ’, माँ बनने की अनुभूतियों का ऐसा यथार्थ चित्रण है जिसे कोई माँ ही कर सकती है।

सुधा भार्गव की रचना ‘कहर की रात’ पति को तिल-तिल मृत्यु के आगोश में जाते देखने वाली असहाय पत्नी की दारुण कथा है। ‘अनिता जायसवाल की कहानी’ (सुनीता पाठक) दिव्यांग और अनाथ एक ऐसी युवती की सत्यकथा है जो अनाथालय में पली-बढ़ी और पढ़ी है तथा इन दिनों एक आर्मी स्कूल में संगीत शिक्षिका के तौर पर कार्य करती हुई शासकीय सेवा में जाने की तैयारी में रत है। सुरेश सौरभ की ‘आप के अहसासों में रहूँगी’, उपमा शर्मा की ‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत’, उषा किरण की ‘शरबती बुआ’, डॉ॰ वन्दना गुप्ता की ‘सीमा रेखा’ कहानियाँ भी पठनीय हैं।

उपासना सियाग की ‘जीत’ सास और पति की मृत्यु के बाद अकेली रह गयी ऐसी युवती की कथा है जो अपने साहस के बल पर शासकीय सुरक्षा पाने में कामयाब हो जाती है और निर्बाध अपने शिशु का लालन-पालन कर पाती है।

कुल मिलाकर ‘तूफान गुजरने के बाद’ एक पठनीय और विचार उत्प्रेरक पुस्तक है जिसके संचयन और सम्पादन के लिए ॠता शेखर ‘मधु’ बधाई की पात्र हैं।

सम्पादक : ॠता शेखर 'मधु'
समीक्षित पुस्तक—तूफान गुजर जाने के बाद ; सम्पादक—ॠता शेखर ‘मधु’; प्रकाशक—श्वेतवर्ण प्रकाशन, 212 ए, एक्सप्रेस व्यू अपार्टमेंट, सुपर एमआईजी, सेक्टर 93, नोएडा-201304 (उप्र), कुल पृष्ठ—176; मूल्य—रुपए 249 (पेपरबैक)

समीक्षक—डॉ॰ बलराम अग्रवाल, एफ-1703, आर जी रेजीडेंसी, सेक्टर 120, नोएडा-201301 (उप्र)

Tuesday, 5 December 2023

लिखे जो खत .../ स्नेह गोस्वामी

लघुकथा संकलन 'शब्दों की हांडी में संवेदनाएं' की सम्पादक स्नेह गोस्वामी लिखित पुरोवाक्

 मेरी बात 

स्नेह गोस्वामी

आज के समय में साहित्य की सबसे लोकप्रिय विधा है लघुकथा । आज से लगभग तीस वर्ष पहले तक चुटकुले प्रहसन और फिलर के रूप में जानी जाने वाली लघुकथा अब सभी छोटी बड़ी पत्रिकाओं , समाचारपत्रों , संग्रहों और संकलनों के माध्यम से साहित्य जगत में स्थापित हो चुकी है । लगभग सभी पत्रिकाएं लघुकथा विशेषांक निकाल रही हैं या निकाल चुकी हैं तो इसका श्रेय 1 इसकी संक्षिप्तता, 2 रोचकता, 3 मारक पंचलाइन, 4 गठी हुई भाषा शैली और विषय वैविध्य को दिया जा सकता है । 

लघुकथा की शब्द सीमा, आकार, पंचलाइन और कालदोष निर्धारण को लेकर समय-समय पर विभिन्न विद्वानों में मतभेद और तर्क-वितर्क भी सामने आए पर लघुकथाकार अपने तीर-तरकश संभाले इसका रूप संवारने में दत्त-चित्त होकर डटे रहे । परिणामस्वरूप आज हम लघुकथा का एक सर्वमान्य स्वरूप देख पाते हैं । कथानक और कथ्य (भावपक्ष) के रूप में लघुकथा विधा की स्वीकार्यता हो जाने के बाद लघुकथाकारों का ध्यान इसकी कथन शैलियों की ओर गया और वे लघुकथा का रूप संवारने और उसका श्रृंगार करने को कटिबद्ध हो गये । फिर क्या था, हर रोज नये-नये प्रयोग होने लगे । हर रोज नये-नये शब्द, नये प्रतीक और नई लघुकथा शैलियां अस्तित्व  में आने लगीं। वैसे तो वर्णनात्मक शैली सभी कथाकारों की प्रिय शैली है जिसमें स्थान-स्थान पर रचकर सजाए गये संवाद आभूषण में जङे हीरों की तरह झिलमिलाते हुए पहले से ही दिखाई देते थे। फिर इस शैली को नाम दिया गया मिश्रित शैली। इसके साथ ही मात्र संवाद शैली में भी बहुत-सी लघुकथाएं लिखी गईं।

 अब तो हरि अनंत हरि कथा अनंता के अनुसार, लघुकथा की कई शैलियां दृष्टिगोचर हो रही है यथा–आत्मकथा शैली, एकालाप शैली, डायरी शैली, काव्य शैली, टैलीफोन शैली, तोता मैना शैली, विक्रम बेताल शैली, पत्र शैली, एकांकी शैली, विज्ञापन शैली, समाचारपत्र शैली, पैरोडी शैली, साक्षात्कार शैली, नाट्य शैली, चैट शैली, मानवेतर शैली और प्रतीकात्मक शैली । हालांकि इन सब शैलियों में अभी बहुत कम रचनाएं सामने आई हैं पर लघुकथाकार इन सभी शैलियों में विभिन्न प्रयोग कर रहे हैं और शीघ्र ही हमें अन्य नये प्रयोग भी देखने को मिल सकते हैं ।

यह मेरे हाथ में लिया हुआ संकलन लघुकथा में पत्र शैली की लघुकथाओं पर आधारित है। जब मैंने इस संकलन को संपादित करने का निर्णय लिया तो संशय मन में छाया था । आजकल पत्र लिखने की परंपरा छूट रही है । पत्र लेखन बङे धैर्य का काम था । घर का कोई एकांत कोना तलाशना, फिर कागज कलम दवात का जुगाङ बैठाना और फिर मन की भावनाएं उस कागज पर उंड़ेल देना। कई घंटे की मेहनत से कोई पत्र लिखा जाता, पर पढ़ने पर पता चलता कि ये सब तो लिखना ही नहीं था । तब कागज चिंदी-चिंदी कर फाड़कर फेंक दिया जाता और दोबारा से लिखना शुरु । कई खत तो सात-सात दिन तक लिखे जाते। फिर उनको डाक में डाला जाता। जब पत्र अपने गंतव्य तक पहुँचता तो पत्र पाने वाला उस पत्र को बीसियों बार पढ़ डालता । 

आज मोबाइल के इस मशीनी युग में वह पत्र लेखन के लिए अपेक्षित धैर्य और भावुकता कहाँ। अब तो वाटसएप्प पर, फोन पर दो लफ्जों में ही बात समाप्त हो जाती है । सब शुभकामनाएं और बधाइयां उधार के संदेशों के सहारे चलती हैं । यहाँ से कट, वहाँ पेस्ट या सीधे ही फारवर्ड कर दिया जाता है । ऐसे माहौल में नई पीढ़ी ने तो कभी पत्र लिखा ही नहीं, न पढ़ा । ऐसे में पत्र में लघुकथा शायद आकाश-कुसुम छूने की कल्पना ही न साबित हो । फिर सोचा, कोशिश करने में क्या हर्ज है । कहीं दिमाग में घूम रहा था कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ।  

और सही में, मेरा विश्वास जीत गया । एक सप्ताह के भीतर ढेर सारी पत्र शैली की लघुकथाएं प्राप्त हुईं। उनमें से कुछ लघुकथाएं बहुत खूबसूरती से लिखी गई थी । 

प्राप्त हुई वे सभी लघुकथाएं इस संकलन में शामिल नहीं हो पाई । कुछ लघुकथाएं पत्रशैली के फार्मेट में नहीं थीं। कुछ लघुकथाओं में मात्र पत्र था, लघुकथा नदारद थी । कुछ मित्रों ने मुझ पर दया करके दो-तीन लघुकथाएं भेजी थीं, उनमें से एक ही लघुकथा ले पाई हूँ । आप सब को मेल से ही सूचना दे दी गई है । इन सब लघुकथाओं को न ले पाने का मुझे दुःख है पर मेरी और इस संकलन की अपनी सीमाएं हैं, आशा है आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे ।

संकलन में कई लघुकथाओं में हल्की-फुल्की कलम भी चलानी पङी है, कोशिश की है कि कम से कम कलम चले । कुल चौंसठ लघुकथाओं से सजा यह संकलन आप सब के हाथ में है । आप सब की रचनाएं आप सब को 'त्वदीयं वस्तु त्वदीयं समर्पयामि' के भाव से समर्पित कर रही हूँ। स्वीकार करें । 

पसंद तो आप करेंगे ही, ऐसा विश्वास है ।  पढ़कर जरूर मेल के जरिए या जैसा भी आपको सुविधा हो (फेसबुक, वाटसएप, मसैंजर इंस्टाग्राम) जहाँ भी आपका मन चाहे,  बताइएगा कि संकलन कैसा बन पड़ा है । 

स्नेह गोस्वामी 

8054958004

Sunday, 17 September 2023

लघुकथा को लेकर कुछ बातें / डॉ. सुरेश वशिष्ठ

डॉ. सुरेश वशिष्ठ वरिष्ठ साहित्यकार हैं। कहानी, लघु-कहानी, लघुकथा, नाटक, नुक्कड़ नाटक, एकांकी, आलोचना आदि साहित्य की अनेक विधाओं में लेखन किया है। गत लगभग एक सप्ताह से मधुमेह के कारण अस्पताल में हैं। आज उनसे बहुत-सी बातें हुईं। स्वस्थ हो जाने के बाद मैंने उन बातों को लिख भेजने का अनुरोध किया तो उन्होंने आज इस टिप्पणी के साथ यह लेख भेज दिया कि यह अभी फाइनल नहीं है। बहरहाल, उनकी अनुमति के बिना मैं इसी रूप में ‘जनगाथा’  और लघुकथा-साहित्य के पाठकों के समक्ष इसे रख रहा हूँ।

डॉ. सुरेश वशिष्ठ
लघुकथा में कथा के अंश का रहना अनिवार्य है। सहज और स्वाभाविक रूप से कथा आगे बढ़े और रोचक परिवेश बनाती हुई कोई सीख देती जाए, यह जरुरी है। सामान्य रूप से लघुकथा में विचार प्रभावी रहता है। विचार और कथा दोनों का आभास पाठक को होता रहे, तभी उसकी सार्थकता है। गोल-गोल घुमाकर वार्तालाप को रख देना ही लघुकथा नहीं। लेखक व्यंग्य छोड़कर रह जाता है, वह भी ठीक नहीं। महसूस हो कि वह छोटी, रोचक और व्यंग्य रचना के साथ बुद्धि पर कटाक्ष करती है। उसमें निहित विचार चोट दे रहा है। लघुकथा का यह ढंग पाठक को परिवेश बदलने के लिए बाध्य करता है। उसे जागने, उठने के लिए विवश करता है। कथ्य में जो कहा गया, वैसा तो हुआ है और उसे वैसा नहीं होना चाहिए था। अब इसे बदलने के लिए आवाज दी जानी चाहिए। यह यथार्थ का सत्य-रूप है, इसे पढ़ने पर ह्रदय मचल उठा है। यही लघुकथा का सार्थक पहलू है।

        आज लघुकथा अपने जिस रूप में हमारे सामने है,उसने  यहाँ तक आने में अनेक करवटें बदली हैं। उसके कथ्य-रूप की चर्चाएँ अस्सी के दशक में शुरू हुई। उन दिनों, आम इंसान का जीना दूभर हो रहा था। भारत ही नहीं, पूरे विश्व में अराजकता का आलम था। आदमी का अस्तित्व खंडित हो रहा था। लोगों में अपने हक के लिए बेसब्री थी। साहित्य पर विसंगत दृष्टि प्रभावी थी। नाटक, कहानी और अन्य विधाओं में परिवर्तन लाजमी हो चला था। नाटक या कहानी के माध्यम से आदमी का जुझारू स्वरूप सामने आने लगा था। डॉयलॉग मुखर हो रहे थे। उसी परिवेश से लघुकथा बाहर आई।

         इमरजेंसी से पूर्व युद्ध के गौरिल्ला सैनिकों की तरह साहित्य में भी ऐसे पात्र खुलकर बोलने लगे थे। कहानी अपने छोटे रूप में यथार्थ को उकेरने लगी थी। पत्र-पत्रिकाओं में आपसी संबंध, मुखर विरोध या छुपा हुआ परिवेश सधे हुए डॉयलॉग के साथ उलीचा जाने लगा था। मंटो, खलिल जिब्रान और ब्रेख्त की धारदार लघु कहानियाँ व्यक्ति मन को प्रभावित करने लगी थी। अंतर्मन और बुद्धि ने करवट बदली और लेखन की दिशा परिवर्तित हुई। नुक्कड़ नाटक और लघुकथा उसी दौरान की देन है।

          उन दिनों, फैक्ट्री के गेटों पर, मलिन बस्तियों में, नगर-गाँव के चौराहों पर धड़ल्ले से नुक्कड़ नाटक खेले जा रहे थे। नाटक में दृश्य को थामकर जो मोड़ लिया जाता और विसंगति को जिस कदर प्रस्तुत किया जाता, निस्संदेह वह चौकाने वाला था। झकझोर देने वाला था। उसी तरह पत्र-पत्रिकाओं में लघु कहानी का जो ढंग विकसित हो रहा था, आगे चलकर उसी ढंग ने लघुकथा को जन्म दिया। अर्थात नुक्कड़ नाटक हो या लघुकथा, दोनों का जन्म एक ही गर्भ से हुआ और वह गर्भ था-- चेतना की नई दृष्टि। यथार्थ परिवेश और रचनात्मक संघ-जाग्रति।

           यह शायद 1984 के आसपास का समय रहा होगा। लेखन में जो रचनात्मक बदलाव हो रहा था, पत्र-पत्रिकाओं ने इसे सहेजकर प्रकाशित करना शुरू किया। उन्हीं दिनों, जानी-मानी पत्रिका 'सारिका' ने भी लघुकथा पर एक विशेषांक निकाला। सारिका के उस अंक में मेरी भी एक लघुकथा 'अनोखा मिलन' जिसे मैंने बाद के दिनों में 'काली छाया' के नाम से पुस्तक में समाहित किया, छपी थी। उसी दौर में असगर वजाहत के 'संवाद' और 'रूहों' के माध्यम से उघाड़े गए सच से पाठक का सामना हुआ। वह लेखन की नई तकनीक और तीखे सवालों से रू-ब-रू हुआ। लिखने का चलन बढा और इजाद के इस रूप में इजाफा होने लगा। लघुकथा को लेकर चर्चाएं तीव्र होने लगीं। असंख्य रचनाकार एक मंच पर एकत्रित होने लगे और लघुकथा के नये आयाम खुलते चले गए।लघुकथा को लेकर भ्रम की स्थिति भी है। लोग उसे परिभाषित भी करने लगे हैं। जिक्र हुआ तो समझ भी विकसित हुई और लघुकथा के प्रति सुदृढ़ विश्वास भी बना। इस विधा के प्रति मेरा दृष्टिकोण सीखने की तरफ ज्यादा गया। इसके तीक्ष्ण प्रहार ने मुझे सहज आकर्षित किया। उसकी गुदगुदी और चुभन सच को बेपर्दा करती है। मैंने असंख्य लघुकथाओं को पढ़ा है। असगर वजाहत के संपर्क में रहने से इसके पक्ष को जाना है। टीम वर्क में डॉयलॉग लिखते समय इसके प्रहार पर नजरें गई हैं। उसके बाद ही लघुकथा लिखने का सिलसिला शुरू हुआ है।

       रंगमंच से हमेशा मेरा जुड़ाव रहा है। ब्रटोल्ट ब्रेख्त पर काम करने के दौरान, ब्रेख्त के रंगकर्म और उनकी लघुकथाओं के तीखे सवालों और कुलबुलाते यथार्थ को जाना है। लेखक उतनी जल्दी नहीं लिख सकता, जितनी जल्दी सरकारें बदल जाती हैं... और सरकारें बदलने का यह सिलसिला बहुत पुराना है। इसी ढंग पर चोट करने का काम लघुकथा करती आई है। मंटो ने जिस मंजर पर कटाक्ष किया, वह मंजर किसने इजाद किया, सहज समझा जा सकता है। अपने समय के सच को कहने और उसके पक्ष में खड़ा रहने का काम लघुकथा का है। यही कारण है कि यह विधा दिनों-दिन अपने क्लेवर को सुदृड़ करती जा रही है।

मैंने अब तक एक सौ पचास से ऊपर लघुकथाएँ लिखी हैं। संवाद शैली में भी और पत्रशैली में भी। रूहों के माध्यम से यथार्थ को अनावृत्त भी किया है।

मोबाइल 96544 04416