Wednesday, 11 June 2014

व्यंजना के सफल प्रयोग / बलराम अग्रवाल



सुभाष नीरव

विषय की एकतानता एवं प्रभावान्विति (यूनिटी आ इम्प्रेशन) समकालीन लघुकथा की ऐसी विशेषता है जिसे जाने-अनजाने अक्सर उसकी कमजोरी बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। कहा जाता है कि ‘लघुकथा में आसपास के परिवेश का चित्रण नहीं हो सकता’ या ‘लघुकथा में चरित्र के व्यापक चित्रण की गुंजाइश नहीं होती है’ या ‘लघुकथा में मनोभावों का विस्तृत चित्रण असम्भव है’ आदि-आदि। लघुकथा के परिप्रेक्ष्य में, ये या इस तरह के सभी वक्तव्य गलत हैं। वास्तविकता यह है कि लघुकथा में ‘यूनिटी आफ इम्प्रेशन’ को बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि बहुत-सी अवांछनीय चेष्टाएँ इस रचना-विधा में न की जायँ। उदाहरण के लिए, आसपास के परिवेश के चित्रण को लें। इसका प्रतिपादन कथा के प्राचीन आचार्यों ने आलंकारिक योजना की प्रस्तुति के माध्यम से कहानी के आकार को यथासंभव प्रभावी बनाने की दृष्टि से किया होगा। परन्तु इस शास्त्रीय गुर का प्रयोग अनेक कहानीकार रचना को बोझिल बना डालने की हद तक करके उसकी हत्या तक कर डालते हैं।  लघुकथा में परिवेश का आभासभर ही पाठक को उसके समूचेपन से परिचित करा देता है। उदाहरण के लिए, यहाँ प्रस्तुत सुभाष की लघुकथाओं में से एक ‘बारिश’ को ले सकते हैं। इसमें वह लिखते हैं—‘दूर तक कोई घना-छतनार पेड़ नहीं था। नये बने हाई-वे के दोनों ओर दूर तक फैले खेत ही बचे थे, बस’ इन दो वाक्यों से ही वे बता देते हैं कि हाई-वे बनानेवाली मशीनरी वृक्षों के प्रति कितनी संवेदनहीन है। यही बात लघुकथा में पात्रों के व्यापक चरित्र-चित्रण तथा मनोभावों के विस्तृत चित्रण के संदर्भ में भी न्यायसंगत है।
रचनात्मक साहित्य की हर विधा की तरह समकालीन लघुकथा के केन्द्र में भी मनुष्य और उसकी बेहतरी की चिंताएँ हैं। मूल्यों को हम राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिकजिस फ्रंट पर भी रखकर परिभाषित करने की चेष्टा करें, यह तो ध्यान में रखना ही होगा कि कुछ मूल्य शाश्वत होते हैं और कुछ सामयिक। व्यक्ति न शाश्वत मूल्यों की अवहेलना करके चैन से बैठ सकता है, न सामयिक मूल्यों की अवहेलना करके। लेकिन मूल्यों की अवहेलना के इन दोनों ही पक्षों से उसे कभी न कभी गुजरना और इस द्वंद्व में फँसना पड़ ही जाता है कि वह इधर जाये या उधर। गलती उसकी नहीं, समय ही ऐसा विकट है कि अच्छे-भले आदमी की विवेकशक्ति को डावाँडोल कर देता है। समकालीन लघुकथा आदमी की इस भ्रमशील स्थिति से बिना किसी नारेबाजी के उसको परिचित कराती है। सुभाष कीकमराइस सहज उद्बोधन का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर सामने आती है।कमरादो खण्डों में सम्पन्न होती हैपहले खण्ड में पिता को उनके कमरे से हटाकर ऊपरी मंजिल पर शिफ्ट कर देने की क्रिया घटती है; तथा दूसरे खण्ड में, बच्चों की पढ़ाई के लिए खाली कराया हुआ कमरा तीन हजार रुपए मासिक की आमदनी के लालच में किराए पर चढ़ा देने की क्रिया घटती है। कथाकार ने किसी आदर्शवादी या आक्रोशपरक मंतव्य को इसमें अपनी ओर से कहीं भी व्यक्त नहीं किया है; और न ही वैसी शब्दावली या भाषा का प्रयोग कहीं किया है। बहू-बेटा का अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर बुजुर्ग पिता की सुख-सुविधा के प्रति असंवेदशील होना जिस विशेष तरह के दबाव का परिचायक है, वह तीन हजार रुपए मासिक की आय के सामने बच्चों के शान्तिपूर्वक पढ़ पाने की बलि चढ़ा देने के रूप में सामने आता है। आर्थिक विपन्नता किस तरह संस्कारहीनता और दायित्वहीनता दोनों को जन्म दे रही है, यह लघुकथा इस ओर संकेत करके अपना काम पूरा कर जाती है।
      धूपदो बातों की तरफ इशारा करती हैपहली यह कि महानगरों की ऊँची-ऊँची इमारतों में, वे चाहे कार्यालय की दृष्टि से खड़ी की गयी हों चाहे निवास की दृष्टि से, नैसर्गिक धूप में नहा पाने का सुख दुर्लभ हो गया है। दूसरी यह कि धूप का सुख पाने के लिए व्यक्ति को अफसर होने के खोल से बाहर निकलकर आम लोगों के बीच बैठना पड़ता है। इस बिन्दु पर यह लघुकथा अशोक भाटिया कीरंगजैसा आनन्द प्रदान करती है।धूपयहाँ रिश्तों की गरमाहट का भी प्रतीक है। बीमारबाल-सुलभ जिज्ञासा और आकांक्षा को अत्यंत सहजता से प्रकट करती है। बाल-मनोविज्ञान को व्यक्त करने वाली सफल लघुकथाओं में इसे उतनी ही आसानी से रखा जा सकता है, जितनी आसानी से बलराम कीगंदी बातको। आर्थिक मोर्चे पर निम्न और निम्न-मध्य वर्ग की त्रासद स्थिति को यह लघुकथा बाल-जिज्ञासा और बाल-आकांक्षा के माध्यम से पाठक के समक्ष रखती हैसफ़र में आदमीमें दिखाया गया है कि विवशता के मात्र स्थूल रूप ही नहीं होते, सूक्ष्म रूप भी होते हैं। जीवन में दैहिक विश्राम एक आवश्यक क्रिया है। देह को सामान्यत: निश्चित समय-अंतराल में विश्राम मिले तो मानसिक अभिजात्यता के पूर्वग्रहित सभी बंधन एक-एक कर टूटने-बिखरने लगते हैं। यह सिद्धांत विश्राम ही नहीं, देह की समस्त क्रियापरक आवश्यकताओं पर समयानुरूप लागू होता है।सफ़र में आदमीमनुष्य की इस जटिल मानसिकता को सफलतापूर्वक प्रस्तुत करती लघुकथा है। इस मानसिक अभिजात्यता अकेले कथानायक में ही नहीं है, यह दर्शाने के लिए सुभाष ने किसी स्टेशन पर वैसे-ही एक अन्य यात्री की प्रविष्टि लघुकथा में कराई है जिससे यह कथानक गतिमान हो उठा है। अभिजात्यता के खण्डित होने का इसमें प्रभावशाली चित्रण देखने को मिलता है।
‘बर्फी’ आमजन से कुछ ऊपर, समाज में विलास-वृत्ति के भोगवादी वर्ग की कथा है। आर्थिक रूप से तुष्ट यह भौतिक सुख-सुविधाओं में डूबा हुआ वर्ग है। इसकी सुबह दिल्ली में, दोपहर मुंबई में और रात न्यूयॉर्क में बीतती है। भोक्ता और भोग्या की, शोषक और शोषित की, नैतिक जीवन-मूल्यों की यहाँ हर बहस बेमानी है। यहाँ कब, कौन परिचित-अपरिचित महिला ‘बर्फी’ बनकर सामने आ खड़ी होगी, ऑर्डर देने वाला नहीं जानता। स्वयं ‘बर्फी’ भी नहीं कि उसे किसके गले में उतरने के लिए भेजा जा रहा है। यह व्यवसाय बिचौलियों के जरिए दुनियाभर में फल-फूल-फैल रहा है, निर्बाध। एक पुरानी कहावत है कि—परदेश गये पति की स्त्री को दृष्ट या अदृष्ट, क्रूर और कृत्रिम वचनमुद्राओं द्वारा धूर्त पुरुष हर लेते हैं। सुभाष की  ‘सेंध’ सीधी-सादी लघुकथा है और इस बात की ओर इशारा करती है कि महिलाओं को विशेषकर निकट के लोगों से कितना सावधान रहना पड़ता है।
‘लाजवंती’ जीवन में आ पसरी वैयक्तिकता के बीच स्नेह और सौहार्द के दो पलों को सुरक्षित रख लेने की कोशिश की सफल प्रस्तुति है। इस रचना में भी समकालीन जीवन में केंसर के जीवाणुओं की तरह आ घुसे द्वैत को बड़ी सहजता से सुभाष ने पिरोया है। बाज़ार किस तरह विवेकपूर्ण और निष्पक्ष लेखन को प्रभावित करता है, इसका उल्लेख ‘बाज़ार’ शीर्षक लघुकथा में हुआ है तो ‘मकड़ी’ अपने शीर्षक को सार्थक करते हुए यह स्थापित करती है कि उपभोक्ता के प्रति बाज़ार की सहृदयता उसके लिए कितनी घातक है।
‘बारिश’ नाटकीयता से परिपूर्ण मनोवैज्ञानिक कथा है। बारिश के इसमें अनेक रूप हैं—पहला वह, जिसमें भीगने से बचने के लिए बाइक पर कहीं जा रहे लड़का-लड़की हाई-वे के दोनों ओर एक छतनार पेड़ तक नहीं देख पाते हैं। यहाँ सुभाष ने धीरे-से यह बता दिया है कि हाई-वे बनाने के क्रम में पेड़ों की अवहेलना किस कद्र की जाती है। बारिश का दूसरा रूप वह है, जब झोंपड़ी के भीतर खाट पर लेटा बूढ़ा उन्हें एकान्त देने की गरज से स्वयं बारिश में जा बैठता है। तीसरा वह है, जब लड़के की शरारत से बचने के लिए लड़की बारिश में भीगने को हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है; तथा चौथा वह, जो इस कथा को क्लाइमेक्स पर पहुँचाता है—बारिश में भीगते लड़का-लड़की के साथ बूढ़े का स्वयं अपने बचपन में उतर जाना और उस युवा जोड़े की तरह बारिश की बूँदों को चेहरे पर लपकने का खेल खेलना शुरू कर देना। ऐसी दृश्यात्मकता के साथ हिन्दी में कम ही लघुकथाएँ आ पाई हैं। यह दरअसल, इक्कीसवीं सदी की लघुकथा का शिल्प है जो उसे ‘कौंध’ से बहुत आगे की विधा सिद्ध करता है।
‘समकालीन लघुकथा का जागरूक हस्ताक्षर’ शीर्षक से मैंने सुभाष के लघुकथा संग्रह ‘सफ़र में आदमी’ की भूमिका लिखी थी; परन्तु प्रस्तुत लघुकथाओं में से कई उस संग्रह के बाद लिखी जाने के कारण उसमें संग्रहीत नहीं हैं। उनमें से ‘जानवर’ एक व्यंजनापरक प्रभावपूर्ण लघुकथा है जिसमें दिखाया गया है कि कुछ लोग अपने भीतर के जानवर की क्षुधा को शांत करने के लिए ही प्यार का नाटक करते हैं। ‘सेंध’ हो, ‘जानवर’ हो या ‘बारिश’; सुभाष की लघुकथाओं के स्त्री-पात्र अपने चारित्रिक कुशल-क्षेम के प्रति सजग हैं। समकालीन लघुकथा की यह विशेषता है कि कथाकार किसी आदर्शपरक, उपदेशपरक अथवा विद्रोहपरक वाक्य या संवाद का प्रयोग किये बिना पाठक में अपने संदेश को संचरित कर देता है। सुभाष ने विशेषत: अपनी इन ताज़ा लघुकथाओं में इस युक्ति का प्रयोग सफलतापूर्वक किया है।
‘सफ़र में आदमी’ के बाद वाली लघुकथाओं के शीर्षकों में (और कथा-निर्वाह में भी) सुभाष ने कुछ व्यंजनापरक प्रयोग किए हैं। ‘बर्फी’, ‘जानवर’, ‘सेंध’ जैसे शीर्षक पाठक की जिज्ञासा को जगाते हैं और कथा के अंत में उसकी सुप्त-चेतना को चौकस-सा करते हैं। इस चौकस करने को कोई झकझोरना न समझे और न ही इसे ‘चौंक’ तत्व (?) से जोड़ ले। ‘चौंक’ विट का धर्म है, कथा का नहीं। कथा का धर्म पाठक में मानवीय संवेदनशीलता को बरकरार रखना है जोकि मनुष्य होने की इकलौती शर्त है। प्रत्येक कथाकार धरती पर मनुष्यता को बरकरार रखने के मानवीय दायित्व को निभाता है। समकालीन लघुकथा लेखक के रूप में सुभाष नीरव भी नि:संदेह इस मुहिम में शामिल है।
मो॰:+918826499115   

Monday, 26 May 2014

‘रोटी का टुकड़ा’ ले गए चोर / सुभाष नीरव



भाई बलराम,

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फेसबुक पर किन्हीं संदीप तिवारी 'राज' की लघुकथा 'प्रश्न' पढ़कर मुझे एकाएक अपने द्वारा अनूदित और संपादित लघुकथा संकलन 'पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं' (1997) में शामिल भूपिंदर सिंह की लघुकथा ‘रोटी का टुकड़ा’ याद हो आई। तब से अब तक यह लघुकथा अनेक लघुकथा संकलनों में अपनी जगह बनाकर पहली पंक्ति की लघुकथा होने का गौरव हासिल कर चुकी है। संदीप तिवारी 'राज'

पंजाबी की चर्चित लघुकथाएँ--पृष्ठ 15

की लघुकथा 'प्रश्न' पढ़कर भगीरथ जी और शोभा रस्तोगी जी ने इसे पंजाबी में पहले छप चुकी लघुकथा बताकर अपना विरोध भी दर्ज़ कराया है। सचाई यह है कि यह लघुकथा पंजाब के जाने-माने कथाकार भूपिंदर सिंह, जो भूपिंदर सिंह (पी॰सी॰एस॰) नाम से रचनाएँ छपवाते थे, की न होकर जम्मू निवासी हिंदी लेखक भूपिंदर सिंह की लघुकथा है जो वर्ष 1989 में इन्दौर निवासी रचनाकार श्री अशोक भारती द्वारा संपादित लघुकथा

संपादकीय पृष्ठ:तलाश जारी है

संकलन 'तलाश जारी है' में पृष्ठ 47-48 पर 'रोटी का टुकड़ा' शीर्षक से छ्पी थी। पंजाबी में भूपिंदर सिंह (पीसीएस) ने अपने समय में बहुत ही सुन्दर लघुकथाएँ पंजाबी के लघुकथा साहित्य को दीं। 'रोटी का टुकड़ा' लघुकथा को मैंने इन्हीं भूपिंदर सिंह (पीसीएस) की लघुकथा मानकर अपने द्वारा संपादित पुस्तक 'पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं' में शामिल किया था जो अभिरुचि प्रकाशन दिल्ली से वर्ष 1997 में आई थी। मेरी इस गलती की ओर पंजाबी के चर्चित लघुकथा लेखक श्याम सुन्दर अग्रवाल जी

तलाश जारी है--पृष्ठ 48
तलाश जारी है--पृष्ठ 47

ने मेरा ध्यान उन्हीं दिनों आकृष्ट किया था; लेकिन तीर तो कमान से निकल चुका थाकल उन्होंने मुझे वर्ष 1989 में अशोक भारती द्वारा संपादित पुस्तक 'तलाश जारी है' की स्कैन कापी भेजी। संदीप तिवारी 'राज' की 'प्रश्न' और भूपिंदर सिंह की लघुकथा 'रोटी का टुकड़ा' का मूल कथ्य वही है और स्थापना भी; बस, संदीप तिवारी ने इसे काट-छाँट कर छोटा कर दिया है। प्रमाण के लिए यहाँ भेजे जा रहे अटैचमेंट देखें। आप देखें कि इस लघुकथा का असली लेखक कौन है। स्पष्ट हो जाएगा कि संदीप तिवारी 'राज' की लघुकथा चोरी की है। भाई श्याम सुन्दर अग्रवाल जी से ही यह भी खुलासा हुआ कि इसी लघुकथा को किन्हीं मंजू जैन ने भी कभी अपने नाम से छपवाया था।
‘जनगाथा’ के माध्यम से इस लघुकथा की प्रामाणिकता को सभी के सामने लाने के लिए प्रमाण सहित तुम्हें भेज रहा हूँ।
-सुभाष नीरव

भूपिंदर सिंह की लघुकथारोटी का टुकड़ा  

चित्र:साभार गूगल

बच्चा पिट रहा था; लेकिन उसके चेहरे पर अपराध का भाव नहीं था। वह ऐसे खड़ा था जैसे कुछ हुआ ही न हो। औरत उसे पीटती जा रही थी, “मर जा जाकरजमादार हो जातू भी भंगी बन जातूने उनकी रोटी क्यों खाई?”
बच्चे ने भोलेपन से कहा, “माँ, एक टुकड़ा उनके घर का खाकर क्या मैं भंगी हो गया?”
चित्र:साभार गूगल

और नहीं तो क्या?”
और जो काकू भंगी हमारे घर में पिछले दस सालों से रोटी खा रहा है, तो वह क्यो नहीं बामन हो गया?” बच्चे ने पूछा।
माँ का उठा हुआ हाथ हवा में ही लहराकर वापस आ गया। वह अपने बेटे के प्रश्न का जवाब देने में असमर्थ थी। वह कभी बच्चे को, तो कभी उसके हाथ में पकड़ी हुई रोटी के टुकड़े को देख रही थी।

Sunday, 13 April 2014

सभी सुलभ शब्द अपनाने योग्य नहीं होते / बलराम अग्रवाल



[डॉ॰ रामकुमार घोटड़ द्वारा संपादित पुस्तक 'गुलाम भारत की लघुकथाएँ' की समीक्षा]
                                                                   चित्र : के॰ रवीन्द्र

डॉ॰ रामकुमार घोटड़ हिन्दी व राजस्थानी भाषा की लघुकथा के वरिष्ठ हस्ताक्षर हैं। अभी तक उनके 7 एकल लघुकथा संग्रह हिन्दी में, 2 राजस्थानी में, 10 संपादित लघुकथा आलोचना व रचना के संकलन, 2 कहानी संग्रह, व्यंग्य संग्रह आदि बहुत-सी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। मुख्यत: लघुकथा संपादन के क्षेत्र में उन्होंने काफी काम किया है जिसमें ‘दलित समाज की लघुकथाएँ’ (2008); ‘भारतीय हिन्दी लघुकथाएँ’ (2010); ‘देश-विदेश की लघुकथाएँ’ (2010); ‘भारत का हिन्दी लघुकथा संसार’ (2011) आदि प्रमुख हैं। उनके द्वारा संपादित ‘गुलाम भारत की लघुकथाएँ’ में 53 पूर्ववर्ती कथाकारों की 73 लघुकथाएँ संकलित हैं। इस पुस्तक को तैयार करते समय उन्हें जिनका सहयोग मिला उन अपने 23 लघुकथाकार साथियों के नाम उन्होंने ‘गुलाम भारत की लघुकथाओं का सफरनामा’ शीर्षक अपनी भूमिका के अंत में लिखे हैं। मुझ अकिंचन का नाम भी उनमें से एक है, इसके लिए मैं उनकी सदाशयता का आभारी हूँ; लेकिन मुझे याद नहीं आ रहा कि इस बारे में मैंने उनकी कोई मदद की होगी या उन्होंने मुझसे कभी इसकी चर्चा भी की होगी।
लघुकथा पर शोध सम्बन्धी संदर्भ-पुस्तक के तौर पर यह एक महत्वपूर्ण कृति बाज़ार में आई है; लेकिन इसका नामकरण जिन पलों में हुआ, वे पल निश्चित ही अशुभ थे। डाक द्वारा मिले पैकेट को खोलने के बाद पुस्तक का नाम पढ़ते ही मुझे अपनी औक़ात पता लगने जैसा आभास हुआ। लगा कि किसी ने ऐसी गाली दे दी है, यथार्थत: सच होते हुए भी जिसे सुनने के हम अभ्यस्त नहीं हैं और जिसका वाचन सभ्य समाज में नहीं किया जाता है। डॉ॰ घोटड़ को भी यह शब्द चुभा जरूर होगा और इसका प्रयोग करते हुए वे आशंकित रहे होंगे कि इसके प्रयोग पर उन्हें विरोध का सामना करना पड़ सकता है। आशंकित न रहे होते तो वे इसकी सफाई में न उतरते। अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए डॉ॰ घोटड़ लिखते हैं—“पुस्तक का शीर्षक ‘गुलाम भारत की लघुकथाएँ’ में ‘गुलाम’ शब्द का उपयोग मैंने सकारात्मक मानसिकता से किया है। स्वतन्त्रता-पूर्व भारत, पराधीन भारत, इसके पर्याय शब्द हैं। लेकिन ‘गुलाम’ शब्द सहज सुलभ होने के कारण शीर्षक के साथ ले लिया। इससे पूर्व 2012 में मैंने ‘आज़ाद भारत की लघुकथाएँ’ शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित की है। अत: इस श्रृंखला को पूर्ण करने के लिए यह शीर्षक देना निहायत ज़रूरी हो गया और मैं विद्वान साथियों से आशा करता हूँ कि इसे धनात्मक नजरिये से लेंगे।”
मुझे लगता है कि ‘आज़ाद भारत की लघुकथाएँ’ शीर्षक से संपादित अपनी पुस्तक के नाम में ‘आज़ाद’ का विलोम उन्हें ‘गुलाम’ ही समझ आया और इसी को उन्हें चुनना पड़ा। उन्होंने लिखा है कि ‘गुलाम शब्द सहज सुलभ है’। ‘सहज सुलभ’ से उनका तात्पर्य संभवत: सामान्यत: प्रचलित होने से है; क्योंकि ‘सहज’ के अर्थ और तात्पर्य को जानना उनके लिए अभी बाकी है; और सभी सुलभ शब्द अपनाने योग्य नहीं होते हैं। डॉ॰ घोटड़ स्त्री रोग एवं प्रसूति विशेषज्ञ हैं। वे राजस्थान के जिस इलाके में कार्यरत हैं, वहाँ उनका वास्ता मैं समझता हूँ कि लगभग अनपढ़ स्त्रियों या उनके अनपढ़/अधपढ़ पतियों-बेटों-भाइयों से ही अधिक पड़ता होगा। सभी तो ‘वैजाइना’ शब्द से परिचित नहीं रहते होंगे। इसके लिए हिन्दी के किसी शुद्ध शब्द से भी वे शायद अपरिचित ही रहते हों। ऐसी हालत में डॉ॰ घोटड़ क्या उन्हें ‘वैजाइना’ के लिए ‘सहज सुलभ’ शब्द के माध्यम से अपनी बातें समझाते हैं? क्या वे नहीं जानते कि प्रत्येक शब्द का अपना चरित्र, मर्यादा और गरिमा होती है। ‘माँ’ को बाप की लुगाई या ‘पिता’ को माँ का खसम संबोधित करना किस सभ्यता या मानसिक-चारित्रिक गिरावट का सूचक है, क्या यह भी बताना पड़ेगा? 1857 के विद्रोह को अंग्रेज और उनके हिन्दुस्तानी पिट्ठू आज तक भी ‘म्यूटिनी’ यानी राजद्रोह कहते, प्रचारित करते हैं, वे उसे ‘ग़दर’ भी कहते हैं; लेकिन हमने उसे हमेशा ही स्वाधीनता का पहला संग्राम माना और कहा है। यह अन्तर मानसिकता का तो है ही, शब्द के गतिशील चरित्र तथा उसकी गरिमा से अपरिचय और दूरी का भी है। काफी पहले डॉ॰ घोटड़ का एक प्रपत्र मिला था जिसमें उन्होंने समकालीन हिन्दी लघुकथा के वरिष्ठ लेखकों को ‘तीसमार खाँ’ शीर्षक से पुस्तक रूप में संकलित करने की योजना का जिक्र किया था। तब मैंने फोन करके उन्हें समझाने की कोशिश की थी कि भाई, ‘तीसमार खाँ’ एक नकारात्मक नाम है। तब उन्होंने उसी की टक्कर एक दूसरा नाम सुझाया था--संभवत: 'अत्ते खां'। मैंने माथा पीट लिया। समझ गया कि डॉ॰ घोटड़ मन के साफ व्यक्ति हैं और अपने द्वारा संपादित संकलनों में मित्रभाव से सभी को शामिल करते रहना चाहते हैं; लेकिन वे साहित्य के अध्येता नहीं हैं। कौन-सा शब्द कब, कहाँ कितना स्फोटक होता है, वे नहीं जानते। कौन-सा शब्द कब गाली बन जाता है, कब आक्षेप, कब व्यंग्य, कब सांत्वना और कब लोहा—इसका अध्ययन वे नहीं करना चाहते। असलियत यह है कि बहुत-से शब्दों के सही अर्थ से भी वे परिचित नहीं हैं। वे बस महत्वाकांक्षी हैं। ऐसा ही आभास मुझे दिल्ली में लोकार्पित उनके एक संकलन का नाम ‘अपठित लघुकथाएँ’ देखकर भी हुआ था। वह हमारी पहली मुलाकात थी। लेकिन तब से अब तक काफी लघुकथा संग्रह, संकलन और आलोचना पुस्तकें आ चुकी हैं। उन्हें विचार करना चाहिए था कि डॉ॰ अशोक भाटिया द्वारा संपादित ‘नींव के नायक’ का नाम ‘गुलाम भारत के लघुकथाकार’ क्यों नहीं हो सकता था।
‘गुलाम भारत की लघुकथाएँ’ की सभी लघुकथाएँ पढ़ जाने के बाद मैं यही सोच रहा हूँ कि वह कैसी गुलामी थी जिसमें जीते हुए भारतेंदु हरिश्चन्द्र, माधवराव सप्रे या प्रेमचंद सरीखे एकाध अन्य कथाकार के सिवा किसी के भी स्वर में गुलाम होने की पीड़ा नजर नहीं आती है! वे दार्शिनकता ही बघारते क्यों नजर आते हैं? अंग्रेजी राज के खिलाफ विद्रोह का दबा-ढका भारतेंदु-जैसा स्वर भी किसी के पास क्यों नहीं है? इन सभी साहित्यिकों की रचनाओं के आधार पर क्या यही सोचा जाय कि जीवन का यथार्थ साहित्य के यथार्थ से भिन्न होता है; या समाज में गुलामी की पीड़ा को उन साहित्यिकों ने अपने-अपने दार्शनिक और भावपूर्ण विचारों के जरिए शांत रखने का यत्न किया था! या साहित्य सृजन एक अलग तरह की विलासिता है और देश की आज़ादी के लिए लड़ना अलग तरह की!!  ‘जब महाप्राण बापू देश के दौरे पर निकले और मैं चन्दे को चला अपनी जन्मभूमि में…’ कहकर कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर अपने-आप को स्वाधीनता-संग्राम का सक्रिय कार्यकर्ता प्रतिष्ठित करने का ही यत्न करते अधिक प्रतीत होते हैं। अपनी रचनाओं में वे स्वाधीनता के लिए लड़ते नहीं दिखाई देते। डॉ॰ घोटड़ को इन बिन्दुओं पर भी अपने संपादकीय में दो-चार लाइनें अवश्य लिखनी चाहिए थी। इन बिन्दुओं पर अन्य आलोचकों को भी अपने विचार अवश्य प्रकट करने चाहिए। इस दृष्टि से लघुकथा का विवेचन करने के लिए पहले अकेली ‘नींव के नायक’ हमारे पास थी; अब यह पुस्तक भी उपलब्ध है।
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पुस्तक : गुलाम भारत की लघुकथाएँ; संपादक : डॉ॰ रामकुमार घोटड़; प्रकाशक : सजना प्रकाशन, 83, शिव कॉलोनी, राजगढ़ रोड, पिलानी-333031 (राज॰); संस्करण : 2014; मूल्य : रु॰ 250/- 
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  समीक्षक संपर्क : एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032