Friday, 2 April 2010

सुधा भार्गव की लघुकथाएँ

-->॥1॥ दूध के दाम
शादी के करीब 15 वर्ष बाद अविनाश के घर में बच्चे की किलकारी सुनाई दी। उसका रोना भी कानों में शहद घोलता। शिशु चार मास का भी नहीं हो पाया था कि माँ का दिन का चैन और रात की नींद कपूर की तरह उड़ गए। घड़ी-घड़ी बच्चा रोता,दिन में मुरझाया-सा रहता।
लेडी डाक्टर ने बताया,बच्चे का माँ के दूध से पेट नहीं भरता है। कम से कम छह मास तक उसका दूध पीता तो अच्छा था। अब गाय का दूध या डिब्बे का दूध पिलाना पड़ेगा।
दुर्भाग्यवश दोनों दूध बच्चा हजम न कर पाया और उसका पेट गड़बड़ा गया। अंत में लेडी डाक्टर ने सुझाव दिया,माताश्री दुग्ध केंद्र चले जाइये। वहाँ कुछ कुछ व्यवस्था हो ही जायेगी।
केंद्र की अध्यक्षा ने एक मोटी-ताजी महिला को अविनाश के साथ कर दिया जो उसके बच्चे की दुग्धपान की आवश्यकता को पूरी कर सके। निश्चित हुआ कि वह रोज 200 रुपये लेगी। अच्छी खुराक के साथ 4 लीटर दूध भी पीना उसके लिए जरूरी है।
अधर में लटके अबिनाश को किनारा मिला। वह महिला बड़े प्यार से उस बच्चे का ध्यान रखती। उसका नाम गोमती था। ग्वाले से अकसर वही दूध लिया करती। पिछले दो दिनों से उसने आना बंद कर दिया था। गृहिणी ने ग्वाले को बुलाया।
बड़ी मिन्नतों के बाद तो वह आया और बोला,मेमसाहब, हम कितने दिनों से बोल रहे हैंदूध का दाम बढ़ाओ, दाम बढ़ाओ। सरकार तक मदर डेरी के दूध-दही के दाम बढ़ाने जा रही है।
तुम्हारी और सरकार की बराबरी है क्या? उसे तो देश सँभालने के लिए पैसा चाहिए।
हम बड़ी-बड़ी बातें नहीं जानते, सरकारी लोग देश को सँभाले हैं या स्वयं को। पर इतनी बात जरूर है कि हमें अपने खेत, जानवर, बीवी-बच्चे सबको सँभालना है। साथ में गाय-भैंस भी हैं।
पशुओं के चारे की क्या कमी है? उन्हें तो जंगल में छोड़ देते हो।
जंगल…जंगल नेता लोगों ने कहाँ छोड़े? आपकी ये शानदार इमारतें पशुओं का चारा चर गईं। चारा भी खरीदना पड़ता है। उसने कहा। फिर बोला,छोड़िये मेमसाहब! आप ये सारी बातें नहीं समझेंगी। इस महीना से हम 16 की जगह 22 रूपये किलो के हिसाब से दूध देंगे। साफ बात…एक बात।
पास में खड़ी गोमती उनका वार्तालाप बड़े ध्यान से सुन रही थी। ग्वाले के जाने के बाद वह बोली,माई जी, दाम तो हमारे दूध के भी बढ़ाने होंगे। मानुष दूध तो सबसे ज्यादा कीमती है।
बच्चे के रोने की आवाज सुनकर वह उसकी ओर दौड़ी। जाते-जाते सुना गई—“देखा माई जी, लल्ला हमारे बिना एक मिनट नहीं रह सके।
॥2॥ पहनूँगी इन्हें
मौसी ,ये चूड़ियाँ रख लो।
अरे, ये तो बड़ी सुन्दर हैं, तूने बनाई हैं संतो?
हाँ ,इन्हें मैं अपनी शादी के समय पहनूँगी। मेरी कलाई पर खूब फबेंगी। माँ को नहीं बताना वरना वह पहन डालेगी। कहते -कहते संतो हाँफने लगी। खाँसी का जोर आया, ढेर-सा खून उगल दिया। मौसी घबरा उठी। गर्म पानी से कुल्ले कराकर उसे चाय पिलाई। सीने में सेक आते ही संतो तो सो गयी पर मौसी भयभीत हिरनी-सी उसे घूरने लगी।
नींद टूटने पर संतो, मौसी की नजरों का सामना नहीं कर पाई।
संदेह की चादर ने उसे ढक दियाकहीं मेरी बीमारी का पता तो नहीं लग गया! I
मौसी की घुटन बाहर आई—“बेटी, अपनी सेहत का ध्यान रखना, कहीं तेरा
सपना अधूरा रह जाये।
कोई ख़ास बात नहीं है। दवा तो रोज पीती हूँ। उसने झूठ का पैबंद लगाने की कोशिश की।
सच कुछ और ही था। चूड़ी के कारखाने में काँच की धूल उसके फेंफडों में जम कर रह गयी थी। उसे लगता, काँच के महीन टुकड़े उसके अंग-अंग को छेदे जा रहे हैं जिन्हें वह निकाल पाती है न सहन कर पाती है।
गहरी साँस छोड़ते हुए मौसी ने सुझाव दिया,कुछ दिन की छुट्टी ले ले।
कैसे ले लूँ! चूड़ियों की काट-छाँट में मेरा जैसा किसी का हाथ नहीं। संतो का जवाब था,मालिक तारीफ करते नहीं अघाता। दिन के हिसाब से मुझे मजूरी मिलती है, माँ तो एक दिन घर नहीं बैठने देगी।
संतो हँसते हुए चली गई। पर वह हँसी दिनोंदिन लुप्त होती गयी और जीवन के सोलह बसंत देखने से बहुत पहले तेरह वर्ष की उम्र में ही एक दिन निर्दयी समाज से उसने छुटकारा पा लिया। जीते-जी उसकी साध पूरी हो सकी लेकिन मृतक शरीर को चिता पर लेटाते समय लोगों ने देखाउसकी कलाई में मीने की दर्जन भर लाल-हरी चूड़ियाँ झिलमिला रही थीं।
॥3॥ आतंकवादी
पिंटू अपनी दादीजी के साथ टी.वी. में समाचार सुन रहा थाशहर में आतंकवादियों ने डेरा जमा लिया है। सावधान रहें।
दादी माँ, ये आतंकवादी कौन होते हैं?”
बड़े बुरे लोग होते हैं। खुद खुश रहते हैं दूसरों को खुश रहने देते हैं। अपनी बात मनमाने के लिए दूसरों को डराते-धमकाते रहते हैं। दादी ने बताया।
पिंटू, काफी देर हो गयी है। अब अपने कमरे में जाकर सो जाओ।पास में बैठे पापा ने आज्ञा दी।
पापा देखोआतंकवादी!
हाँ-हाँ देख रहा हूँ। पर तुम यहाँ से उठ जाओ। पापा के स्वर से लगता था कि ज्वालामुखी बस फटा, अब फटा।
पिंटू बेमन से उठा और पापा को घूरते हुए जाने लगा। सोने का उपक्रम किया मगर नींद कहाँ! अचानक उसके दिमाग में कौंधापापा आतंकवादी तो नहीं!
सुबह स्कूल में अपने साथी से पिंटू बोला,शिन्तू, हमारे घर में आतंकवादी घुस आया है, क्या किया जाये?”
समस्या तो गंभीर है।
कल टी.वी. में भी आतंकवादी थे।
तब आज टी.वी. खोलकर देखना। पता चल जायेगा कि उसने आतंकवादियों के साथ क्या किया।
शाम को पिंटू टी.वी. खोलकर समाचार सुनने लगादो आतंकवादी पकड़े गये हैं और पुलिस की हिरासत में हैं अगर आपको किसी पर आतंकवादी होने का शक हो तो तुरंत सूचना दें। फोन न. है55555555।
पिंटू ने आनन् -फानन में डायल घुमा दिया—“जल्दी आइये, आतंकवादी के आने का समय हो गया है।
आपका पता क्या है?”
चाट वाली गली, फ्लैट नम्बर 111।
संध्या समय एक तरफ से पिंटू के पापा की कार आकर रुकी। दूसरी ओर से पुलिस के जवान जीप से धड़-धड़ करते हुए उतर पड़े। कुछ ने घर को घेर लिया, कुछ अन्दर घुस गये, कुछ घर के बाहर खड़े रहे। पिंटू के पापा भौंचक्के!
क्या यह आपका घर है?” पुलिस अधिकारी ने पूछा।
जी हाँ! पिंटू के पापा ने जवाब दिया।
हमें सूचना मिली है कि इस घर में आतंकवादी आने वाला है।
आतंकवादी!
शोर-शराबा सुनकर पिंटू घर से बाहर निकल आया। चिल्लाया—“पुलिस अंकल, यही आतंकवादी हैं।
बेटा, मैं…मैं तो तुम्हारा पापा हूँ!
नहीं-नहीं, आप आतंकवादी हैं। डाँट पिलाकर, आँखें दिखाकर सबको डराते हैं। मुझे तो मारते भी हैं।… ये किसी को भी खुश होता नहीं देख सकते। पुलिस अंकल, जल्दी पकड़िए…वरना ये भाग जायेंगे!

संक्षिप्त परिचय:सुधा भार्गव
शिक्षा--बी ,ए.बी टी ,रेकी हीलर
शिक्षण--बिरला हाई स्कूल कलकत्ता में २२ वर्षों तक हिन्दी भाषा का शिक्षण कार्य |
साहित्य सृजन--
विभिन्न संकलनों में तथा पत्र-पत्रिकाओं में कहानी, लघुकथा, कविता, यात्रा-संस्मरण, निबंध आदि प्रकाशित।
प्रकाशित पुस्तकें--
रोशनी की तलाश में --काव्य संग्रह
बालकथा पुस्तकें--
१ अंगूठा चूस
२ अहंकारी राजा
३ जितनी चादर उतने पैर--सम्मानित-राष्ट्रीय शिखर साहित्य सम्मान !
आकाशवाणी दिल्ली से कहानी, कविताओं का प्रसारण
सम्मानित कृति--रोशनी की तलाश में
सम्मान--डा .कमला रत्नम सम्मान
पुरस्कार--राष्ट्र निर्माता पुरस्कार(प. बंगाल--1996)
अभिरुचिदेश-विदेश भ्रमण, पेंटिंग, योगा, अभिनय, वाक् प्रतियोगिता
मोबाइल-09731552347
ई-मेल-subharga@gmail.com
ब्लॉग:sudhashilp.blogspot.com

Saturday, 20 March 2010

पृथ्वीराज अरोड़ा की लघुकथाएँ


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करनाल से भाई अशोक भाटिया ने बातचीत के दौरान सूचना दी थी कि श्रीयुत पृथ्वीराज अरोड़ा के मस्तिष्क के किसी हिस्से में फ्लूड्स के रिसाव की वजह से उनके दायें अंगों पर आंशिक पक्षाघात का आक्रमण हुआ था और 18 मार्च को उनका ऑप्रेशन भी करना पड़ा। आज 20 मार्च को आदरणीया भाभीजी से बात करके पता चला कि हॉस्पिटल से रिलीव होकर वे आज ही घर पहुँचे हैं और डॉक्टर ने अधिक बात करने के लिए मना किया है। फिर भी, अरोड़ा जी ने शायद जिद करके मोबाइल उनसे माँगा और मुझसे बात की। मुझे अच्छा लगा कि वे इस सब के बावजूद भी दिलेर रवैया अपनाये हुए हैं। उनके शीघ्र स्वस्थ होने शुभकामनाओं के साथ इस माह भी प्रस्तुत हैं उनकी तीन लघुकथाएँ



शिकार
काश बादलों से ढँका था। पहले टुपुर-टापर बूँदें गिर रही थीं, फिर उन्होंने विकराल रूप ले लिया था। ऐसे में स्ट्रीट लाइटें धुँधली-धुँधली रोशनी दे रही थीं। चोरी के लिए सही समय समझते हुए दोनों पॉलिथीन की बरसातियाँ सिर पर ओढ़े खोलियों से निकल पड़े।
पहला चौकस था,तूने सभी औजार ले लिए हैं न ?
दूसरा आश्वस्त था,हाँ, और तुमने?
पहला भी आश्वस्त लगा,मैंने भी।
थोड़ी दूर चलने के बाद दूसरा रुक गया।
पहले ने पूछा,रुक क्यों गये?
मन में उठ रहे बवंडर को उसने उगल दिया,मन नहीं मानता।
पहले को उपहास सूझा,डर गए क्या?
डर! कभी डरा हूँ मैं ? उसने अपने अंदाज़ में उत्तर दिया।
पहला चौंका,फिर!
दूसरा आहत-सा बोला,हमारा शिकार हमेशा गरीब या कम पैसे वाला ही रहा है। कहीं न कहीं हम अमीर आदमी पर हाथ डालते डरते नहीं हैं क्या?
यह कड़वा सच पहले को गंभीर बना गया,हाँ, तुम सही कह रहे हो।
अचानक दूसरा बोला,तो लौट चलें?
हाँ, मैं भी यही सोचता हूँ। हमें किसी मोटी मुर्गी पर हाथ डालना चाहिए। चलो, सोचते हैं।
सचमुच दोनों लौट पड़े
-->हाथों में हाथ डाले।

प्रश्न
ब उनके अति गोपनीय सेलफोन की घंटी घनघनायी तो वे तत्काल उस विवाहोत्सव के गहमागहमी-भरे माहौल को छोड़ एक एकांत कोने की ओर लपके—“यस सर!
उधर से स्वर था,पांडे, तुम फौरन अपने घर से होते हुए मेरे पास पहुँचो।
यस सर।
वह जानते हैं कि डी आई जी ऐसे आदेश उस समय ही देते हैं जब मामला अत्यन्त गंभीर हो। बिना वक्त गँवाए अपनी ओर देख रहे सिपाही को संकेत से बुलाया और कहा,तुम मेम साहिबा को ढूँढकर बता दो कि साहिब किसी जरूरी काम के लिए चले गए हैं। सिपाही सल्यूट मारकर मेम-साहिबा को संदेश देने के लिए आगे बढ़ गया।
वह बाहर निकले। उन्हें देखते ही ड्राईवर गाड़ी लेकर उनके समीप आ गया। गाड़ी चलते ही उनके पीछे-पीछे पुलिस-वैन भी चल पड़ी। कोठी पर पहुँचते ही उन्होंने देखा किपुलिस से घिरा, हथकड़ियों से जकड़ा उनका घरेलू नौकर सिर झुकाए जमीण पर बैठा था।
एस एच ओ भागकर उनकी गाड़ी के समीप आया। उनके गाड़ी से बाहर निकलते ही सल्यूट मारकर उनके कान में कुछ फुसफुसाया। और फिर, एक कागज पर हस्ताक्षर करवा, नौकर को गाड़ी में बैठा चला गया।
कपड़े बदलते हुए उनका ध्यान बार-बार विश्वसनीय नौकर को लेकर उचट जाता था। यह कैसे संभव है कि एक एस पी के घरेलू नौकर के तार उग्रवादियों के साथ जुड़े हों? सद्भावनापूरित उनकी आशंका बार-बार बलवती हो उठती किकहीं वह अपनी गरीबी से इतना त्रस्त तो नहीं था कि किसी बड़े प्रलोभन में आकर कुछ-भी करने को तैयार हो गया हो?
गाड़ी में बैठते हुए वे लगातार यह सोच रहे थे किवे डी आई जी को यह दलील कैसे दे पाएँगे…कैसे?

बुनियाद
से दुख हुआ कि पढ़ी-लिखी, समझदार पुत्रवधू ने झूठ बोला था। वह सोचता रहाक्यों झूठ बोला था उसने? क्या विवशता थी जो उसे झूठ का सहारा लेना पड़ा?
जब उसका बेटा कार्यालय के लिए चला गया और पत्नी स्नान करने के लिए, तब उपयुक्त समय समझते हुए उसने पुत्रवधू को बुलाया।
वह आई,जी, पापा!
उसने पुत्रवधू को कुर्सी पर बैठ जाने का इशारा किया। वह बैठ गई। उसने कहा,तुमसे एक बात पूछनी थी।
पूछिए पापा।
झिझकना नहीं।
पहले कभी झिझकी हूँ! आपने मुझे पूरे अधिकार दे रखे हैं, बेटी से भी बढ़कर।
थोड़ी देर पहले तुमने झूठ क्यों बोला? मैंने तो अभी नाश्ता करना है! तुमने मेरे नाश्ता कर लेने की बात कैसे कही? उसने बिना कोई भूमिका बाँधे पूछा।
उसका झूठ पकड़ा गया है, उसने अपना सिर झुका लिया। फिर गंभीर-सी बोली,पापा, हम बेटियाँ झूठ बोलने के लिए अभिशप्त हैं। माँएँ भी, गृहस्थी में दरार न पड़े इसलिए हमें ऐसी ही सीख देती हैं। वह थोड़ा रुकी। भूत को दोहराया,भाई के लिए नाश्ता बनाने में देर हो रही है, वह नाराज न हो, कोई बहाना बना डालो। पापा का कोई काम वक्त पर न हो पाया हो तो झूठ का सहारा लो। आज भी ऐसा ही हुआ। नाश्ता बनाने में देर हो रही थी। इनके ऑफिस का वक्त हो गया था। ये नाराज होने को थे कि मैंने आपको नाश्ता करवाने की वजह से देर हो जाने की बात कह डाली। आपका जिक्र आते ही ये चुप हो गये। उसने विराम लिया। फिर निगाह उठाकर ससुर को देखा और कहा,सुबह-सुबह कलह होने से बच गई।…और मैं क्या करती पापा?
ससुर मुस्कुराए। उसके सिर पर हाथ फेरकर बोले,अच्छा किया। जा, मेरे लिए नाश्ता ला। बहुत भूख लगी है।
वह भी किंचित मुस्कराई,आभी लायी।
पुत्रवधू नाश्ता लेने चली गई। ससुर ने एक दीर्घ साँस ली।


पृथ्वीराज अरोड़ा: संक्षिप्त परिचय

जन्म: 10 अक्टूबर, 1939 को बुचेकी(ननकाना साहिब, पाकिस्तान में)

प्रकाशित कृतियाँ:तीन न तेरह(लघुकथा संग्रह), प्यासे पंछी(उपन्यास), पूजा(कहानी संग्रह), आओ इंसान बनाएँ(कहानी संग्रह)

सम्पर्क:द्वारा डॉ सीमा दुआ, 854-3, शहीद विक्रम मार्ग, सुभाष कॉलोनी, करनाल-132001 (हरियाणा)

मोबाइल नं:09255921912