Wednesday, 2 September 2015

हिन्दी लघुकथा का ‘दिल्ली दरवाजा’/डॉ॰ पुरुषोत्तम दुबे



डॉ॰ पुरुषोत्तम दुबे

ऐतिहासिक घटनाओं और युद्धों की विभीषिकाओं के आधार पर कहा जाता है कि दिल्ली सात बार उजड़ी और सात बार बसी। इस उजड़ने और बसने के क्रम में दिल्ली के जन-जीवन में कई सांस्कृतिक परिवर्तन उपस्थित हुए। फलस्वरूप हर बार दिल्लीवासियों की सोच बदली और बदलती चली गई। इस प्रकार निरन्तरता के साथ परिवर्तित सोच का प्रभाव दिल्लीवासी रचनाकारों/लेखकों पर जबर्दस्त पड़ा। कहना न होगा कि रचनाकारों की भी पीढ़ियाँ होती हैं। फलत; उसी सोच का प्रभाव दिल्ली के रचनाकारों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी पर भी देखा गया। फिर मानो हस्तान्तरित लेखन का व्यापक सिलसिला चल निकला जो आज तक अनवरत है।

     मुझको यहाँ यह कहते हुए रश्क हो रहा है कि दिल्ली के अतीत में हुए सांस्कृतिक परिवर्तनों के बूते पर जिस अलहदा और खास किस्म की रचनाधर्मिता दिल्ली के सृजनकारों के हाथ लगी, उससे लेखन की दुनिया इस कदर आन्दोलित हुई कि दिल्ली फैशनपरस्त लेखकों का घर बन गई। गोकि आगे चलकर दिल्ली से जो भी लिखा आया वह हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि में सहयोगी बना।

     दिल्ली का लिखा केवल दिल्ली में ही सीमित न रहकर देश और दुनिया में फैल गया। इतना ही नहीं, हिन्दी साहित्य की मान्य विधाओं के बावजूद सन् 1980 से अपने अंगदी पाँव से जमी हिन्दी लघुकथा विषयक लेखन में दिल्ली के लेखकों ने अपना वर्चस्व जमाया और लघुकथाओं के पठन के सिलसिले में पाठकों की एक बड़ी जमात खड़ी की।

     खेमेबाजियाँ और झण्डाबरदारी के आरोप-प्रत्यारोप कब और किस युग में नहीं लगे? लेकिन परिपक्व लेखन पर क्या कभी कोई उँगली उठ सकी है? अन्य प्रश्नों के विवाद में न पड़कर मैं लघुकथा विधा के उन खास-उल-खास लघुकथाकारों की, जो वर्तमान में दिल्ली में रह रहे हैं एवं जो तन्मयता से हिन्दी लघुकथा लेखन की तरक्की और भलाई में अग्रेसरिक बने हुए है, जिन्होंने लघुकथा लेखन के प्रति अपना जज्बा कायम किया हुआ है, चर्चा कर प्रस्तुत आलेख को विस्तार देना चाहूँगा।

     उपल्बधि के अनुसार, मौजूदा वक्त में दिल्ली के जो कथाकार लघुकथा लेखन में संलग्न हैं उनमें चित्रा मुद्गल, कमल चोपड़ा, बलराम अग्रवाल, मधुदीप, बलराम, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, अशोक गुजराती, कलीम आनंद, कुमार नरेन्द्र, गजेन्द्र रावत, पूरन सिंह, रीता कश्यप, वीरेन्द्र गोयल, शोभा रस्तोगी, सुभाष नीरव, अंकुश पूर्वानिल, महावीर उत्तरांचली, सुशांत सुप्रिय, हरनाम शर्मा, अशोक वर्मा, असगर वजाहत, विष्णु नागर, महेश दर्पण, राजकुमार गौतम, अनिल शूर आजाद, रूपसिंह चन्देल प्रभृति अनेक नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं।

     तेवर और तमीज न तो एक सिक्के के दो पहलू हैं और न ही समानार्थी होकर किसी राह के रहबर हैं। मगर लघुकथा लेखन में दोनों ही का मिजाज असली सिक्कों की भाँति खनकता हुआ मिलता है। तेवर की अस्मिता अथवा तेवर का अस्तित्व रचनाकार के अहम् से बनता है। यहाँ अहम् से मेरा तात्पर्य है—नवलेखन में अच्छे अर्थों में प्रयुक्त साहित्यकार का निजत्व जो उसके साहित्य को विशिष्ट बनाता है; जबकि तमीज विवेकजन्य है। तमीज का अगला कदम ही अदब है। यह अदब ही अरबी भाषा में साहित्य शास्त्र कहलाता है। तेवर और तमीज का सम्मिलन ही दिल्ली के लघुकथाकारों के जोश और जुनून में देखने को मिलता है।

     लघुकथा लिखना और लेखकीय आचरण के साथ-साथ लघुकथा विधा के संवर्द्धन  में दायित्व भाव रखना, सामंजस्य का ऐसा दोहरा प्रीतिकर रूप दिल्ली के लघुकथाकारों को शीर्ष क्रम में खड़ा कर देता है। बात यहाँ डॉ॰ कमल चोपड़ा की करूँ तो इस आलेख के आशय को संगत देने वाली बात होगी। कमल चोपड़ा अपने बूते पर हिन्दी लघुकथा के सन्दर्भ में “संरचना” के अब तक सात अंक निकाल चुके हैं। समय, समाज और साहित्य का परिदृश्य ही ‘संरचना’ की रीढ़ है। ‘संरचना’ वस्तुत; देशभर के लघुकथाकारों की प्रतिनिधि लघुकथाओं का ऐसा जीवंत दस्तावेज है जो लघुकथा लेखन की सार्थकता को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करता है। ‘संरचना’ में ‘विचार’ शीर्षक से जिन आलेखों का प्रकाशन हो रहा है, वे हिन्दी लघुकथा की दशा, दिशा और संभावनाओं से परिचित कराते मिलते हैं। जिस प्रकार भारत देश के केन्द्र में दिल्ली वासित है, ठीक उसी प्रकार हिन्दी लघुकथा के केन्द्र में समय की धड़कनों की तरह वर्ष में एक बार महती अर्थ में प्रकाशित होने वाली ‘संरचना’ लघुकथा के सृजन कर्मियों के मध्य अपना अतुलनीय प्रदेय गिनाती मिलेगी।

     दिल्ली में ‘दिशा प्रकाशन’ के संस्थापक मधुदीप पर यहाँ चर्चा करना कतई गैर-जरूरी नहीं है। हिन्दी लघुकथा का सम्पदा एक विरासत के रूप में खड़ी करने की उनकी जिद अनोखी, अछूती और लाजवाब है। मधुदीप की यह जिद उनके व्यक्तित्व के सकारात्मक गुणों को उजागर करती है। देश-विदेश के हिन्दी और हिन्दीतर क्षेत्र के, स्थापित और नवांकुर गोकि लघुकथाओं के प्रणयन में जो अपने उल्लेखनीय योगदान प्रस्तुत कर चुके अथवा कर रहे हैं, उनकी सृजनाओं को तरजीह देते हुए अत्यन्त उदारमना भाव से वे अपने संस्थान से अनवरत रूप में ‘पड़ाव और पड़ताल’ का प्रकाशन कर रहे हैं और अपने हिन्दी लघुकथा क्षेत्र में इस सारस्वत अनुष्ठान में सक्रिय लघुकथाकारों को आसन्दी प्रदान कर रहे हैं। इस आलेख के लिखे जाने तक ‘पड़ाव और पड़ताल’ के पन्द्रह खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं। ये सब हिन्दी लघुकथा संसार की ऐतिहासिक निधि बन चुके हैं। हिन्दी लघुकथा के सन्दर्भ में अध्ययनरत और शोधरत देशभर के शोधार्थियों के लिए ‘पड़ाव और पड़ताल’ के मौजूदा और आने वाले अन्य खण्ड उपयोगिता की दृष्टि से अनुपम और विश्वसनीय सिद्ध होंगे।

     लघुकथाकार बलराम अग्रवाल हिन्दी लघुकथा के तारतम्य में एक गम्भीर आलोचक की भूमिका का भी निर्वहन कर रहे हैं। वर्तमान में हिन्दी लघुकथा में आलोचना की बड़ी कंगाली देखी जा रही है। आलोचना के मापदण्ड स्थिर करने के सिलसिले में स्थापित लघुकथाकारों के मध्य से ही किसी को आना होगा, तभी हिन्दी लघुकथा सर्जना का कलेवर सजेगा-सँवरेगा। बलराम अग्रवाल का यह कथन कि ‘हिन्दी लघुकथा को बढ़ते-चढ़ते, पुष्पित-पल्लवित होते देखते-करते रहना चाहता हूँ’ लघुकथा विधा की अस्मिता के लिए बड़ा मौजूँ है। ‘पड़ाव और पड़ताल’ खण्ड-2 में लघुकथा विधा के प्रति सम्पादकीय व्यवहार जताते हुए ‘लघुकथा’ पर की गई बलराम अग्रवाल की टिप्पणी महत्वपूर्ण है। उनका मानना है कि ‘लघुकथा एक उर्वर कथा विधा है। उर्वर से तात्पर्य है कि कथा-अभिव्यक्ति की दिशा में सपाट और सहज-बयानी से लेकर बिम्ब, प्रतीक, संकेत, व्यंजना, विरोध आदि जो-जो काव्यांग इसमें आ उपस्थित होते हैं, वे अपनी पूरी आभा और आकर्षण के साथ लगातार पाठक को प्रभावित करते हैं।’ हिन्दी लघुकथा अपने औचित्य निर्धारण के हित में बलराम अग्रवाल सरीखे आलोचक की दरकार करती है।

     भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित लघुकथा संग्रह ‘बयान’ से पहचान बना चुकी चित्रा मुद्गल सच्चे अर्थों में हिन्दी लघुकथा विधा की प्रतिनिधि रचनाकार हैं। सामाजिक विद्रूपता और कोलाहल, अलगाव और रिसते रिश्ते, छद्म नैतिकता और झूठे विश्वास की चीर-फाड़ करने वाली यह अन्वेषी लेखिका हिन्दी लघुकथा लेखन के तारतम्य में आधुनिक शती की ‘रोल मॉडल’ है। चित्रा जी का कर्तृत्व दिल्ली की देहरी तक सीमित न रहकर विश्वव्यापी हो चुका है।

इसी क्रम में कथाकार-नाटककार असगर वजाहत का तथा कवि व व्यंग्यकार विष्णु नागर का नामोल्लेख भी आवश्यक है। लघुकथा संग्रह ‘मुश्किल काम’ के जरिए असगर वजाहत ने और ‘ईश्वर की कहानियाँ’ तथा ‘बच्चा और गेंद’ के जरिए विष्णु नागर ने इस विधा को अपनी लेखकीय सम्मति प्रदान की है।
           प्रस्तुत आलेख का पटाक्षेप करने से पूर्व बजरिये इसी आलेख के वर्तमान हिन्दी लघुकथा के रूप-स्वरूप पर नये सिरे से बहस-मुबाहिसा की बात स्थापित लघुकथाकारों से करना चाहता हूँ। गोकि आजकल ताबड़तोड़ लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं। किसी विधा पर किया जाने वाला अधिकाधिक लेखन ही उस विधा को विनाश का फलक भी देता है। वर्चस्वशुदा लघुकथाकार अपने बेबाक वक्तव्यों से लघुकथा में कदम रखने वाले नवागन्तुकों को सचेत करें। गोकि फूहड़ और स्तरहीन लघुकथाओं के संग्रह/संकलन की भूमिका लिखने से बचें। लघुकथा लेखन की दिशा में प्रवेश करने के निमित्त हिन्दी लघुकथा का ‘दिल्ली दरवाजा’ खुला हुआ है। हिन्दी लघुकथा लेखन की वैतरणी पार करने के लिए हम दिल्ली के लघुकथाकारों को जानें, समझें, पहचानें। कम-अज-कम उनको पढ़ें, उनके अवदानों को समीप से देखें। लघुकथा के प्रति उनकी रागात्मक संवेदना अथवा संवेदनात्मक राग पर विचार करें। यही शुभ-सोच लघुकथा विधा को मानक प्रदान करेगी।
       लेखक सम्पर्क : 'शशिपुष्प', 74जे/ए, स्कीम नं॰ 71, इन्दौर-452009 मो॰:+919407186940

Thursday, 16 July 2015

एन उन्नी की लघुकथाएँ

एन उन्नी की लघुकथाएँ आम आदमी के लहू में बहते विद्रोह की जिस शिद्दत से पहचान करती हैं, वह अन्यत्र दुर्लभ है। अन्य कथाकारों में कुछ के पात्र विद्रोह का नारा लगाते हैं तो कुछ के विद्रोह करते भी हैं: लेकिन एन उन्नी वह विरले कथाकार हैं जो पात्रों के भीतर के विद्रोह को पहचानकर पाठक को बताते हैं कि व्यवस्था और परम्परा के पाटों के बीच यह जो दबा-कुचला विवश-सा आदमी दिखता है, इसे जिस दिन भी अपने साथ हो रहे छल की असलियत का पता चल गया—इसका विद्रोह बाहर आ जाएगा। ‘गेंहूँ’ में तो इस तथ्य को वे खुलकर कहते भी हैं—“गेंहू क्यों नहीं मिल रहा है--यह मैंने नहीं पूछा; क्योंकि मुझे यकीन है कि जिस दिन वह जान जाएगा, नालों में नदी की ओर बहने वाला पानी नहीं खून होगा।” उनकी लघुकथा ‘औकात’ के कथ्य को तो विभिन्न लघुकथाओं में अलग-अलग शीर्षक तले तरह से प्रस्तुत किया देख चुका हूँ।
    भाई प्रदीप कांत के शब्दों में--'मूलत: मलयाली भाषी एन उन्नी हमारे समय के एक महत्वपूर्ण लघुकथाकार हैं। वे समान रूप से मलयालम और हिन्दी में लिखते रहे। कई बार तो उनकी भाषा मूल हिन्दी भाषी लेखकों के लिए चुनौती की तरह उपस्थित हो जाती है। उन्नी की लघुकथाएँ हिन्दी के हाल के बहुत से तथाकथित लघुकथाकारों के लिये चुनौती है।'
    आज (16 जुलाई, 2015) सुबह उनकी बेटी ने फोन पर बताया--"अंकल, पापा जी अपना अंतिम उपन्यास भी पूरा कर गए हैं। हम बहुत जल्द उसे प्रकाशित कराएँगे और अच्छी तरह से उसका लोकार्पण समारोह भी करेंगे।" 

औकात
कबाड़ की माँग बढ़ रही है। कबाड़ की कीमत बढ़ रही है। कबाड़ से नए-नए सामान बनाकर मंडी पहुँच रहे हैं। कुल मिलाकर कबाड़ की इज्जत बढ़ गयी है।

इस ज्ञान के साथ घर का अतिसूक्ष्म निरीक्षण किया तो पाया कि कमरे कबाड़ों से भरे पड़े हैं। एक-साथ नहीं दे सकते क्योंकि कालोनी में एक ही कबाड़ी आता है। कबाड़ ले जाने के लिए उसके पास एक ही ठेला है। मैंने कबाड़ को इकट्ठा किया। भाव करके किश्तों में कई बार ठेला भर दिया। कबाड़ी की खुशी देखते ही बनती थी। आखिर में जब घर खाली हुआ  और मुझे खाने को दौड़ा तो कबाड़ की अंतिम किश्त के रूप में मैं स्वयं ठेला-गाड़ी पर आसीन हो गया। मज़ाक समझकर कबाड़ी हँस दिया और कहने लगा, ‘कबाड़ की कीमत आप जानते ही हैं और अपनी भी। आप कृपया उतर जाइए।’

मैं उतर गया और वह चला गया। उस निर्दयी कबाड़ी की चाल मैं चुपचाप देखता रहा। सोचता रहा कि—आखिर मेरी औकात क्या है।

गेहूँ
बाँध के उद्घाटन के लिए अब सिर्फ तीन दिन ही बाकी हैं। रात-दिन काम चल रहा है। मजदूरों को ऊँची आवाज में डाँटता-फटकारता ठेकेदार इधर से उधर एक बॉल की तरह लुढ़क रहा है। हमेशा स्कॉच की बदबू फैलाने वाला आदमी।

स्वागत समारोह के लिए आवश्यक वस्तुओं की तालिका में सिर्फ शराब की कई किस्मों के नाम देखकर लगा कि उद्घाटन मंत्री शराब की दुकान खोलने जा रहे हैं। फिर, कई तरह के मांसाहारी व्यंजन का भी इंतजाम है।

उन्माद से भरे उस वातावरण में अशुभ-सी सिर्फ एक ही बात है। एक बच्चे का रोना। कांक्रीटिंग हो रहे ट्रेंच से बाहर बैठकर न जाने कब-से वह रो रहा है।

मना कर सकूँ  उससे पहले ही गुस्से में ट्रेंच के बाहर आए पिता ने बच्चे को बेरहमी से पीटा, और सफाई के रूप में कहा, ‘उसको भूख लग रही है। साला हरामी। राशन की दुकान में गेंहूँ नहीं आया, उसको एक हजार बार समझा चुका हूँ।’

गेंहू क्यों नहीं मिल रहा है यह मैंने नहीं पूछा; क्योंकि मुझे यकीन है कि जिस दिन वह जान जाएगा, नालों में नदी की ओर बहने वाला पानी नहीं खून होगा।


समय
बचपन से ही पापाजी अपने बच्चों को कहानी सुनाया करते थे। बच्चे चाव से सुनते थे। बाद में गर्व से सुनने लगे थे। एक कहानीकार के रूप में पापाजी की सफलता में बच्चों का भी हाथ था—ऐसा पापाजी धन्यवाद-स्वरूप महसूस करते थे।

अब बच्चे बड़े होकर नौकरी-पेशा हो गये हैं। बड़े घर से रिश्ता जोड़ लिया है। जिन्दगी की बहुरंगी चकाचौंध में डुबकी लगाने की लालसा पूरी कर रहे हैं। किन्हीं अनजान ऊँचाइयों को छूने की ललक में हमेशा परेशान रहते हैं।

पापाजी अब भी कहानी लिखते हैं। बच्चों को सुनाते हैं। उद्वेग से पूछते हैं—

कैसी है।

ठीक है।

सिर्फ ठीक।

अच्छी है।—कहकर बच्चे पापाजी की तरफ देखते हैं। पापाजी का उदासीन चेहरा देखकर बच्चे तुनक जाते हैं और असहिष्णुता से पूछते हैं:

अब जान लोगे क्या।


आदर्श
महीने भर की दुविधा के बाद आखिर मैंने अपने दोस्त से पूछ ही लिया, ‘प्रेम-विवाह के बारे में तुम्हारी क्या राय है।’

एकदम गम्भीर होकर उसने मुझे पल दो पल निहारा और एक दार्शनिक की मुद्रा में कहने लगा—‘मेरी राय में तो प्रेम-बंधन ही सबसे महत्वपूर्ण है। प्रेम के पश्चात ही विवाह रचाना चाहिए। जो लोग प्रेम से वंचित रह जाते हैं वे जिन्दगी की सबसे खूबसूरत एवं जादूभरी अनोखी अनुभूति से अनभिज्ञ रह जाते हैं।’

इतना कहकर एक गूढ़ मुस्कान लिए उसने आगे पूछा, ‘लड़की कौन है।’

मेरे दोस्त को यकीन था कि हीरो मेरे सिवा कोई-और नहीं है। लेकिन मुझे लगा, मानो मेरे मन से एक पहाड़ उतर गया हो। मैंने चैन की साँस ली और कहा, ‘सवाल पहले लड़के का होना चाहिए। हमारा दोस्त मुकेश मुक्ता से शादी करना है। वे एक-दूसरे को न जाने कब-से चाहने लगे हैं॰॰॰’

उसने मेरी बात को पूरा नहीं होने दिया। वह गुस्से से काँपने लगा और गालियों की बौछार के साथ-साथ चिल्लाया, ‘कहाँ है वह्। मैं उसकी जान ले लूँगा। …’

मुक्ता उसकी बहन थी।

पितृत्व
हमेशा की तरह अत्याधिक मदिरापान की खुमारी में सोकर उठे पिता ने पुत्री से कहा, " अरी ओ! पेट जल रहा है, दो-एक रुपया तो निकाल; जरा चाय-पानी हो जाए।"
एक बेनाम किन्तु गहरी ईर्ष्या से पुत्री ने पूछा, "मेरे पास कहाँ है रुपैय्या…कल मुझे कुछ दिया था क्या?"
पिता को गुस्सा आया। वह जोर से चिल्लाया, "तेरे पास रुपया नहीं है तो फिर रातभर कुत्ता क्यों भौंका?"


एन उन्नी
जन्म: 23-04-1943, मवेली करा, एल्लपी, केरल में
शिक्षा: एम ए (अंग्रेजी)
प्रकाशन: मलयालम में 40 कहानियाँ व दो उपन्यास और हिन्दी में 30 कहानियाँ व 60 लघुकथाएँ प्रकाशित-प्रसारित। लघुकथाएँ विभिन्न संकलनों में शामिल, लघुकथा संग्रह 'कबूतरों से भी खतरा है' (2010)।
सम्मान: हिन्दीतर भाषी हिन्दी कथाकार के रूप में मध्य प्रदेश सहित्य परिषद से पुरुस्कृत-सम्मानित।
पता: 91, नीर नगर, ब्लू वाटर पार्क, बिचौली मर्दाना रोड़, इन्दौर – 452016
मोबाइल: 98930 04848 दूरभाष : 0731-2847509
निधन : 14 जुलाई, 2015