Friday, 10 July 2015

विभा रश्मि की लघुकथाएँ



विभा रश्मि ने आठवें दशक में काफी लघुकथा लेखन किया। उनकी रचनाओं का संग्रह 'अकालग्रस्त रिश्ते' भी प्रकाशित हुआ। परन्तु आठवें दशक के बाद लघुकथा के परिदृश्य से वे एकाएक गायब हो गयीं। डॉ॰ शकुन्तला किरण की पुस्तक 'हिन्दी लघुकथा' के विमोचन के अवसर पर (सम्भवत: 2003 में) अजमेर में उनसे पहली बार मुलाकात हुई थी। तब उन्होंने कहा था कि वे सेवामुक्त होने वाली हैं और उसके बाद लेखन और सिर्फ लेखन ही करेंगी। उसके कई साल बाद एक दिन उनका फोन आया--बलराम भाई, मेरा ब्रीफकेस किसी ने उठा लिया। पुरानी रचनाओं लिखी सभी डायरियाँ उसमें थीं। लेकिन कोई बात नहीं, मैं नए सिरे से लेखन करूँगी। बीच-बीच में जब भी वे अपनी बेटी के पास गुड़गाँव आतीं, फोन जरूर करतीं। पिछले कुछ समय से वह पुन: अपनी बेटी के पास आई हुई हैं। भाई मधुदीप को उन्होंने फोन पर बताया कि गत एक सप्ताह से वह अस्पताल में भर्ती हैं…। ईश्वर से उनके शीघ्र स्वस्थ होने और पुन: रचनाशील होने की हार्दिक मंगलकामनाओं के साथ प्रस्तुत हैं उनकी चार रचनाएँ। ये रचनाएँ उन्होंने 'अविराम साहित्यिकी' के आगामी लघुकथा विशेषांक में चयन हेतु प्रेषित की थीं : 
 1. आदमखोर शेरनियाँ            

घुसपैठिये तारबंदी के पीछे से आये दिन सीमावर्ती गाँव पर गोलाबारी कर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते रहते थे। आज फिर आतंकी अपने नापाक इरादों को पूरा करने की मंशा से गाँव में घुस बैठे थे। 
 गाँव के अधिकतर परिवार घर छोड़ पलायन कर गये थे। बचे-खुचे बूढ़े, औरतें और बच्चे आतंकियों को ठेंगा दिखाते वहीं डँटे थे।
जवान व किशोरों को अपहृत कर आतंकी कैम्पों में अपने ही देश के खि़लाफ़ आतंकी-गतिविधियों को संचालित करने के लिये उनकी खेप तैयार की जा रही थी।
आज सरफिरे आतंकियों में इधर के दिग्भ्रमित किशोर भी आये थे।
कुछ बकरवाल पेशे के लोग गर्मियों में अपनी भेड़ों को पहाडि़यों पे चराने चले गये थे जो जाड़ों से पहले घाटी में नहीं लौटेंगे। फिर सुरक्षा की जि़म्मेदारी औरतों के हाथ।
रात घिरते ही आगजनी करते, दरवाज़ों की साँकलें बजाते-तोड़ते, लूटपाट मचाते, लड़कियों की इज़्ज़त से खेलने के लिये वे पागल कुत्तों की तरह उन्हें ढूँढ़ने लगे।
ढलानों पे बने मकानों का नीचे का हिस्सा ख़ाली था। एक आतंकी हथियार रख के लकड़ी की सँकरी खड़ी सीढ़ी पर चढ़ गया। उसने पी रखी थी। जैसे ही वो ऊपर पहुँचा, कुल्हाड़ी ब्रिगेड की घाटी की कमसिनें हिंसक शेरनी बन उस पर टूट पड़ीं।
निर्जन कोनों से निकल-निकल वे नीम अँधेरे में इतिहास रच रहीं थीं।
भेड़ों, ढोरों को लेकर बकरवाल सर्दी व बर्फ़बारी में जब घर लौटेंगे तब घाटी की शेरनियों के किस्से सुनकर वे छाती फुलाये घूमेंगे और कहवा या हथकढ़ी पीते हुये जश्न मनायेंगे ।
तब कई रात से जागे फ़ौजी जवान हथेली पर जान लिये रात्रि गश्त लगायेंगे।      
                                                                                                                                                                                                                                              
2.  परछाइयां

पांच वर्ष… तल्ख कुनैनी डोज़ से वैवाहिक जीवन का अंत... आखि़र यही होना थाए रेत की दीवार धंसने लगी…दरारें चैड़ी होती चली गयीं… आज अलगाव की अवधि पूरी करने के लिए वो सुसराल की परिचित देहलीज़ लांघ चुकी थी… वही गली जहाँ नयी-नवेली इकलौती बहू की अगवानी में खूब रौनक की गयी थी। बिरादरी की बड़ी-बूढ़ियों ने झटके से घूँघट पलट कर द्वार पर ही मुंह दिखाई की रस्म अदा कर दी थी। घर व मुहल्ले की शोख़-चंचल युवा ननदों ने आँखों में अपने भविष्य के मधुर सपने सजायें, चुहलबाजी में खूब चुटकियां ली थीं।
और आज परिस्थितियाँ अपना चोला बदल चुकी थीं। तलाक की अर्जी कोर्ट में जा चुकी थी…।
मकान की दहलीज़ लांघ कर वो गली में खड़े तांगे की पिछली सीट पर उचक कर बैठ गयी थीए अड़ोस.पड़ोस के घरों की खिड़कियों.दरवाजों की चिकें हिल उठीं..कई जोड़ा रूखीए कुछ नम आंखें लुके-छिपे मौन विदा दे रही थीं।
तांगा चल पड़ा… एक ’रहस्य’ उसने छिपा रखा था।
ट्रेन रात के दस बजे की थी। तब तक थर्ड क्लास के वेटिंग रूम में ही सही… हफ़्ते भर का कड़वापन कलह की पराकाष्ठा लांघ चुका था। मां-बाऊ को तार दे दिया गया था।
आँखें जल रही थीं। शायद सुर्ख हो गयी होंगी। गये सालों इतना बरसी थी कि ऐन वक्त पर साफ़ धोखा दे बैठीं। सारा भीगापन, सारे आंसू लुप्त हो गये थे।
मौसी के छोटे लाला बाहर खड़े सिगरेट के कश खींच रहे थे। खाना नहीं खाया था, इसलिए पेट में भूख से ऐंठन शुरू हो गयी थी। चाची ने खाना साथ बांध दिया था, जो डिब्बे में पड़ा गोबर हो रहा था—भूख प्यास किसे थी!
घाव पुनः पीर उठे थे। व्यथा से भरा रोम-रोम अगर शब्दों में ढाला जा सकता था तो पन्ने पर पन्ने नहीं रंग जाते क्या? संयुक्त लंबा परिवार। बड़ी-बूढि़यों के ताने-तिशने, घंटों निकट बैठाकर बेटे से खुसर-फुसर—परिवार कैसे चलेगा आगे?
जाने क्या पाप किये थे जो ये बां…झ… साड़ी की सरसराहट सुनते ही कुहनी पर टल्ला मारकर चाची अम्मा को चुप करा देती।
ट्रेन आ गयी थी। खिड़की के निकट बैठते हुए पहली बार उसे निर्वासिता होने का आभास हुआ। रुलाई का गोला मुँह को आने लगा। ट्रेन चलने वाली थी। सीटी सुनाई दी।
लाला के किसी से बतियाने का स्वर। झांक कर देखती है.. आखि़र आना पड़ा न! ‘रहस्य’ ओठों पर आने को हुआ।
‘कह दे’… मन ने कहा भारतीय संस्कारों से बंधी नारी जाग उठी थी। कुछ कसैलापन घुल गया जिह्वा पर..उसकी जूती जायेगी! खिड़की की ओर पीठ करके बैठ गयी वो।
‘भाभी…चाय-पानी कुछ…?’  खिड़की के निकट आकर लाला फुसफुसाये।
‘नहीं!’ ऐंटन-भरा उसका स्वर रूखा हो गया था।
सीटी सुनाई दी।  ट्रेन खिसकने लगी थी।  वो झटके से पलटी। “ला…ला, सुनो,  अपने भाई साहब को बुलाना।”
वे दौड़कर खिड़की पर आ गये।  अलविदा के समय पुरानी यादें करवट ले उठ बैठी थीं।  जंगला पकड़ वे साथ-साथ चलने लगे।
खिड़की से चेहरा हटाए गले को साफ़ कर उसने  ‘रहस्य’ उगल ही दिया—उसे …पहला …माह …माँ बनने…।
स्टेशन के अंत तक वे दौड़ते रहे। आखि़री डिब्बों की परछाइयाँ उनकी ही तरह हमेशा के लिए दूर होती चली गयीं। ट्रेन के जंगले की सलाखों पर चेहरा टिका उसने फटे नेत्रों से पीछे छूटते स्टेशन को देखा—स्टेशन के अंत में प्रश्नों के ढेर में लिपटे, हाँफते हुए पति लघुतर होते चले गये।

 3. वर्चस्व                                 
पुरुष स्वर—संसार को मैं चलाने वाला…।
गर्वीली मुस्कान!
हुम्म… लापरवाही का स्त्री स्वर उभरा। 
पुरुष­­—मंगल पर फ़तह की तैयारी, अब आगे-आगे देखती चलो ।
स्वर दर्प से लबरेज़ था।
हो…गा। मुझे क्या?  स्वर में लापरवाही।
मैं श्रेष्ठ हूँ। तुम तो सदियों से मेरे इशारों पर नाचती एक बाँदी…।
स्वर में सामंती शासकों जैसी तर्ज़ सुनाई दी।
परछाई फिर बोली—मेरे बस्स, दो हाथ एक मन, एक मुस्कान…एक कोख।
मेरी शक्ति…तुम्हारी धरा पर चौखट तक।
भारी स्वर के साथ  पुरुषत्व फैल गया, बस्स…इस पर इतना गुमान।
मेरे अविष्कारों-खोजों का तो तुम्हें गुमान ही नहीं…।
वो बोलता रहा तब तक, जब तक थक ना गया।
और स्त्री चिरमयी मुस्कान के साथ  नन्ही पुरुष आकृति को स्तनपान करा जीवनदान देती रही।
                               

4॰ अवमूल्यन
                                                               

अचानक उस नगर की भीड़-भरी सड़क पर शाही हाथी जुलूस के शोर, थकान और जयकारों के बीच चिंघाड़ता हुआ धराशायी हो गया। गिर पड़ा और अंतिम सासें गिनने लगा। चारों ओर भगदड़ और अ़फरा-तफ़री मच गयी।समाचार आग की लपटों की तरह फैल गया और शाह तक जा पहुँचा। शाही हाथी के नीचे पूरे आधे दर्जन राहगीर आ दबे और कुछ गम्भीर रूप से घायल हो गए।  नगर भर के चिकित्सकों के दल गजराज की नब्ज़ टटोलने और बीमारी की खोज-बीन करते रहे। दोपहर तक हाथी की अंतिम सांस भी निकल गयी और वह मृत घोषित कर दिया गया।
नगर भर में तहलका मच गया। नगर के कोने-कोने से जन-समुदाय शाही हाथी के दर्शनार्थ आकर पुष्प-मालाएँ अर्पित करते रहे। मृत गजराज का दाह-संस्कार करने के लिए विशाल शरीर को जब हटाया गया तो पूरे छः मृत राहगीरों के शव प्राप्त हुए, जिनकी शिनाख्त नहीं हो सकी...।
तीन दिनों तक सम्पूर्ण नगर गजराज की आकस्मिक मृत्यु के कारण शोक-मनाता रहा। तीन दिन के पश्चात् सभी अपने-अपने नित्य कार्यों में जुट गये।
मुर्दाघर से तीन दिन बाद अपहचाने शवों को निकाला गया और उनका सामूहिक दाह-संस्कार चुपचाप कर दिया गया।
किसी के कानों में खबर तक नहीं हुई है। दीवारों ने भी अपने कान बन्द कर लिए थे।


विभा रश्मि

जन्म—यू॰पी॰ में 1952
शिक्षा—एम॰ ए॰ बी॰एड॰ कोलकाता एवं राजस्थान विश्वविद्यालय।
प्रकाशन—प्रथम कहानी ‘उपहार’  1974 में कलकत्ता से प्रकाशित। कहानी संग्रह ‘अकाल ग्रस्त रिश्ते’ (1976) कोलकाता से प्रकाशित।
सारिका, कथायात्रा, मधुमति, साहित्य गुंजन, जगमग दीप ज्योति, बस्तर पाति, साहित्य नेस्ट, कुतुबनुमा आदि देश के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशन। कहानियों का आकाशवाणी से 1985 से निरंतर प्रसारण। विभिन्न कविता व लघुकथा संग्रहों में कविताएँ एवं लघुकथाएँ प्रकाशित। ‘कुहू तू बोल’ हाइकु संग्रह प्रेस में।  कविता संग्रह व लघुकथा संग्रह पर कार्य ।
फेस बुक पर ‘सरस्वती दीप साहित्य हाइकु ताँका’ के अंतर्गत  व हिन्दी हाइकु साहित्य नेट मैग्ज़ीन में हाइकु प्रकाशित।
सेंट मेरीज़ कान्वेंट से अवकाश प्राप्त।
पुरस्कार व सम्मान—सर्वश्रेष्ठ शिक्षिका 1995, कोलकाता में महाविद्यालयी कविता लेखन प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार,  सामाजिक कार्यए अंधविद्यालय में  सेवाकार्य व कहानी सुनाना। राजस्थान लेखिका सम्मेलनों में पत्रवाचन व भागीदारी।
संप्रति—स्वतंत्र लेखन।
मो॰नं॰ — 09414296536



Saturday, 13 June 2015

राजेश उत्‍साही की लघुकथाएँ



समकालीन हिन्दी लघुकथा के इतिहास का एक स्वर्णिम चित्र : राजेश उत्साही के सौजन्य से 
(बाएं से पहले शंकर पुणतांबेकर हैं , दूसरे का नाम याद नहीं।तीसरे संभवत: सतीश दुबे हैं। चौथे वेद हिमांशु,पांचवे,छठवें का नाम भी याद नहीं। सातवें सनत कुमार हैं। आठवें बलराम,नौवें का नाम भी याद नहीं, दसवें हर‍ि जोशी । ग्‍यारहवें कन्‍हैयालाल नंदन,बारहवीं संभवत: मालती महावर हैं। तेरहवें शकील,चौदहवें संतोष रावत और पंद्रहवें कैलाश परसाई( कैलाश जी लघुकथाकार नहीं हैं) । बाएं से बैठे हुए अखिल पगारे, राजेश उत्‍साही और ब्रजेश परसाई। होशंगाबाद,मप्र में 22 एवं 23 नवम्‍बर,1980 को आयोजित इस कार्यक्रम के आयोजन का श्रेय ब्रजेश परसाई को जाता है। इस कार्यक्रम की विस्‍तृत रपट 'रंग चकल्‍लस' के एक अंक में प्रकाशित हुई। श्रीयुत भगीरथ के अनुसार, 'इस कार्यक्रम में वह भी सम्मिलित हुए थे, लेकिन फोटो में नहीं हैं।--विवरण राजेश उत्साही द्वारा फेसबुक के 'लघुकथा साहित्य' समूह पर। लिंक:https://www.facebook.com/groups/171401019700719/465524473621704/?comment_id=466655210175297&notif_t=group_comment)
 ॥1॥ नुमाइंदे
शहर के लगभग बाहर पत्‍थर तोड़ने वालों की बस्‍ती में मजदूरों की दयनीय स्थिति देखकर उनके बीच कुछ काम करने की इच्‍छा हुई।
 *
     बस्‍ती के हमउम्र लड़के और उनसे छोटे बच्‍चे मेरी बातें रुचि और ध्‍यान से सुन रहे थे। शायद कुछ कल्‍पनाओं में अपने आपको फुटबाल,व्‍हालीबॉल खेलते हुए,पढ़ते हुए भी देखने लगे थे। उनकी सपनीली आंखों में मुझे भी वह सब नजर आ रहा था।
     तभी पीछे वाले झोपड़े से एक अधेड़ निकल आया।
     ‘सबरा शहर मर गवा है का। यिहां आये हो फिटबाल, बिलीबाल खिलान। इन मोड़ा-मोडि़न का पढ़इएके का कलीक्‍टर बनाई दोगे। कछु नहीं हुइए यिहां। ... भैया से पूछों हे तुमने? बस घुस आए।’
     मैं हतप्रभ रह गया। मैंने कहा, ‘मैं जो कुछ करना चाहता हूं, उसके लिए......भैया मना नहीं करेंगे।’
     ‘कछ़ु नहीं। पेलें.....भैया से पूंछ के आओ।’
     सामने बैठे युवक से रहा नहीं गया। बोला, ‘हलकू दादा,ये यहां हमें पढ़ाएंगे। अच्‍छी बातें बताएंगे। एकाध घंटा कुछ खेल खिलाकर मन बहला दिया करेंगे। कोई चकलाघर तो खोलेंगे नहीं।’
उसके पास शायद इससे बेहतर तुलनात्‍मक उदाहरण नहीं था।
     ‘ ...भैया कहियें तो चकलाघर भी खुलिहे।’ यह हलकू दादा का स्‍वर था।
  *
      भैया उस बस्‍ती के वार्ड मेम्‍बर हैं।
 ॥2॥ भ्रष्‍टाचार
अन्‍ना ने बहुत बुरा किया।
    -हां यार सचमुच।
    -अब कैसे मिटेगा भ्रष्‍टाचार इस देश से।
    -उनसे ही कुछ उम्‍मीद थी।
    दोनों राज्‍य परिवहन की बस में सवार थे। टिकट टिकट.... कंडक्‍टर ने आवाज लगाई।
    -दो टिकट कोदंडराम नगर।
    -चौदह रूपए।
    पहले ने बीस का नोट आगे किया।
    कंडक्‍टर ने दस का नोट वापस किया और आगे बढ़ गया।
    -भाई साहब टिकट..।
    -अरे छोड़ो न यार,क्‍या करोगे।...कंडक्‍टर मुस्‍कराया।
    और दोनों फिर से चर्चा में डूब गए।
    -बहुत भ्रष्‍टाचार है इस देश में।...पहला बड़बड़ाया।
    -कैसे जाएगा ये।...दूसरे ने फिर चिंता जताई।
॥3॥ अहसान
पठानकोट एक्‍सप्रेस का साधारण कम्‍पार्टमेंट। दरवाजे पर खड़े दो नौजवान। एक-दूसरे से अपरिचित। लेकिन एक, दूसरे की अपेक्षाकृत अधिक ताकतवर।
    ‘टिकट दिखाइए।’ एक आवाज गूंजी।
    दूसरे ही क्षण रामपुरी सामने था। यह पहले का टिकट था। वह आगे कुछ करता, इससे पहले ही दूसरे ने तुरंत चाकू छीनकर जेब के हवाले किया और रसीद किए दो हाथ।
टिकट चेकर की आंखों में कृतज्ञता झलक आई। दूसरे ने एक नजर पहले को देखा और फिर टिकट चेकर को दूसरे दरवाजे की ओर ले जाकर धीरे से कहा, ‘बाबूजी,टिकट तो मेरे पास भी नहीं है।’
   (बम्‍बई यानी आज की मुम्‍बई से रामवतार चेतन के संपादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका रंग-चकल्‍लस के नवम्‍बर-दिसम्‍बर,1981 अंक में प्रकाशित।)

॥4॥ इंतजाम
वह बूढ़ी अम्मां जब भी अपना लकडि़यों का गट्ठर बेचती,दो चार लकडि़यां बचा लेती।
एक दिन मैंने जिज्ञासावश पूछ ही लिया, ‘अम्‍मां अपने चूल्‍हे के लिए तो तुम एकाध गट्ठा ही घर पटक लेती होगी?’
अपने गट्ठर के पैसे धोती के छोर में बांधती हुई बोली, ‘हां बेटा।’
‘तो फिर ये हर बार गट्ठर में से दो-चार लकडि़यां  क्‍यों बचा लेती हो?’ मैंने फिर पूछा।
          बचाई हुई लकडि़यों को उठाती हुई वह बोली, ‘अरे बेटा,जिसे अपनी दो रोटियों की चिंता खुद करनी पड़ती हो,उसकी चिता में दो-तीन मन लकडि़यां कौन लगाएगा?’

(कमलेश्‍वर द्वारा संपादित पत्रिका ‘कथायात्रा’ के जून 1980 अंक में प्रकाशित।)
 
॥5॥ विकल्‍प
‘डॉक्‍टर साहब!’
‘हूं।’
‘क्‍या आपको ऐसा कोई अधिकार नहीं है ?’
‘कैसा? ’ डॉक्‍टर ने इंजेक्‍शन लगाते हुए पूछा।
‘कि आप मुझे दिसम्‍बर के पहले मार डालें।’
            डॉक्‍टर ने अचकचा कर रामलाल की ओर देखा। वह रोज-रोज ऐसे उल्‍टे-सीधे सवालों से डॉक्‍टर को उलझन में डाल देता है। आजकल उसका मानसिक संतुलन ठीक नहीं है। पर आज दिसम्‍बर शब्‍द जोड़कर रामलाल ने बात को रहस्‍यमय बना दिया है।
झल्‍लाकर डॉक्‍टर ने पूछा, ‘आखिर रामलाल तुम जीना क्‍यों नहीं चाहते हो ?’
‘जीना।’ रामलाल ने एक फीकी हंसी हंसते हुए कहा-‘डाक्‍टर साहब कैंसर का रोगी भी कभी बचता है। आठ महीने हो गए,यहां पड़े-पड़े। घर किस तरह चलता होगा,भगवान ही जाने। बड़ा लड़का एमए पास करके मारा-मारा घूम रहा है, आप जानते हैं न? ’
‘जानता हूं।’
‘दो लड़कियों की शादी होना है।’
‘वह भी जानता हूं।’ डॉक्‍टर ने कहा, ‘पर क्‍या दिसम्‍बर के पहले मर जाने से तुम्‍हारे लड़के की नौकरी लग जाएगी या लड़कियों की शादी हो जाएगी? ’
‘हां,डॉक्‍टर साहब।’
            डॉक्‍टर चौंक गया। उसे स्‍वीकारात्‍मक उत्‍तर की आशा नहीं थी। वह रामलाल के अगले वाक्‍य का इंतजार करने लगा।
‘डॉक्‍टर साहब मुझे दिसम्‍बर में रिटायर होना है। अगर दिसम्‍बर के पहले मर गया तो मेरे बदले मेरे बेटे को नौकरी....।’
(कमलेश्‍वर द्वारा संपादित पत्रिका ‘कथायात्रा’ के जून 1980 अंक में प्रकाशित।)
॥6॥ चमत्‍कार

गली के मुहाने पर खाली प्‍लाट था।
       मोहल्‍ले के ज्‍यादातर लोगों के लिए कचरा डालने का एक ठिकाना। प्‍लाट मालिक कहीं और रहता था। बेचना चाहता था। मुहाने पर था सो अच्‍छी कीमत का इंतजार कर रहा था। कहते हैं न कि घूरे के भी दिन फिरते हैं। सो वह दिन आ ही गया। प्‍लाट बिक गया। जल्‍दी ही उस पर एक नया घर भी बनने लगा। कहते हैं कि आदत आसानी से नहीं जाती। कुछ लोग अब भी वहीं कचरा डाल रहे थे।
       मकान मालिक परेशान-हैरान थे। सब उपाय करके देख लिए थे। वहां लिख दिया था अंग्रेजी में भी और स्‍थानीय भाषा में भी कि, ‘यहां कचरा डालना मना है।’ पर हर जगह की तरह वहां भी पढ़े-लिखे गंवारों की संख्‍या अधिक थी। लोग थे कि बाज ही नहीं आ रहे थे।
       एक सुबह चमत्‍कार हो गया। कचरे की बजबजाती दुंर्गध की जगह चंदन की सुगंध ने ले ली थी। अब लोग घर का नहीं मन का कचरा डालने वहां आ रहे थे।
       मकान मालिक ने रातों-रात अपने किसी आराध्‍य को पहरेदारी के लिए एक छोटी-सी मडि़या में वहां बिठा दिया था।
॥7॥ अनुयायी
वह आकर्षक व्‍यक्तित्‍व का मालिक था। बहुत सारे अनुयायी थे उसके। कुछ पक्‍के सिद्धांतवादी और कुछ कोरे अंध-भक्‍त। वे सब उसकी एक आवाज पर मर मिटने को तैयार रहते।
वह कहता,‘.......।।.........।।’ सब हा‍थ उठाकर उसका समर्थन करते।
***
उन सबकी यानी उसकी प्रगति में की राह में एक खाई थी। मंजिल पर पहुंचने के लिए उस खाई  को पाटना जरूरी था।
उसने अपने अनुयायीयों से कहा, ‘यह खाई हमारी प्रगति में बाधा नहीं बन सकती। हमारी हिम्‍मत और दृढ़ निश्‍चय के आगे यह टिक नहीं सकेगी। साथियो, देखते क्‍या हो आगे बढ़ो।’
देखते ही देखते वे सब उस खाई में समा गए।
उसने मुस्‍कराकर एक नजर लाशों से पटी खाई पर डाली और फिर उन पर चलते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ गया। 
(प्रज्ञा,साहित्‍यिक संस्‍था, रोहतक द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता 1980-81 में पुरस्‍कृत। प्रज्ञा द्वारा प्रकाशित लघुकथा संग्रह ‘स्‍वरों का आक्रोश’ में संकलित।)

राजेश उत्‍साही

Ø मध्‍यप्रदेश की अग्रणी शैक्षिक संस्था एकलव्य में 1982 से 2008 तक कार्य। संस्‍था की बाल विज्ञान पत्रिका चकमक का 17 साल तक संपादन। संस्‍था की अन्‍य पत्रिकाओं में संपादन तथा प्रबंधन सहयोग। एकलव्‍य के प्रकाशन कार्यक्रम में योगदान।
Ø मप्र शिक्षा विभाग की पत्रिका गुल्‍लक तथा पलाश का संपादन। नालंदा,रुम टू रीड तथा मप्रशिक्षा विभाग के लिए बच्‍चों के लिए साहित्‍य निमार्ण कार्यशालाओं में स्रोतव्‍यक्ति। कविताएं, कहानी, व्‍यंग्‍य लेखन खासकर बच्‍चों के लिए साहित्‍य निमार्ण, संपादन तथा समीक्षा में गहरी रुचि। रूम टू रीड से पांच बाल कविता पोस्‍टर तथा अन्‍य किताबें प्रकाशित। एक कविता संग्रह ‘वह, जो शेष है..’ प्रका‍शित।
Ø आजकल बंगलौर में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के शिक्षक पोर्टल टीचर्स ऑफ इंडिया में हिन्‍दी संपादक। लर्निंग कर्व के हिन्‍दी संस्‍करण का संपादन। विद्याभवन सोसायटी,उदयपुर तथा अज़ीमप्रेमजी विश्‍वविद्यालय की संयुक्‍त शैक्षिक पत्रिका ‘खोजें और जानें’ की संपादकीय टीम के सदस्‍य।
सम्‍पर्क :
मोबाइल :   09731788446  
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ब्‍लाग :   
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Saturday, 2 May 2015

फ़ज़ल इमाम मल्लिक की लघुकथाएँ

फ़ज़ल इमाम मल्लिक
बिहार के शेख़पुरा जिले के चेवारा के निवासी फ़ज़ल इमाम मल्लिक हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ से जुड़े हैं। साहित्यिक पत्रिका ‘सनद’ और ‘ऋंखला’ का संपादन भी  कर रहे हैं। काव्य संग्रह ‘नवपलव’ और लघुकथा संग्रह  ‘मुखौटों से परे’ का संपादन भी कर चुके हैं। दूरदर्शन के उर्दू चैनल से उन पर एक ख़ास कार्यक्रम ‘सिपाही सहाफत के’ भी प्रसारित  हुआ है।  उन्हें दिल्ली में ही आयोजित एक समारोह में 'रोशनी दर्शन ' पत्रिका  अपने दस साल पूरे करने के मौके पर  ‘चित्रगुप्त सम्मान’ से नवाज चुकी है। हिन्दी लघुकथा आंदोलन से वे नवें दशक से ही जुड़े रहे हैं। यहाँ प्रस्तुत हैं  अभी-अभी मेल से प्राप्त उनकी तीन  लघुकथाएँ:
पाबंदी
उस मोहल्ले में वह अकेली रह रहीं थीं। उनका इस तरह अकेले रहना लोगों को रास नहीं आ रहा था। खासकर जिस तरीके से वे रहती थीं। लोगों को उनका बेपरदा रहना...मर्दों के साथ घूमना-फिरना अच्छा नहीं लगता था। आख़िर मज़हब भी कोई चीज़ होती है; और इस्लाम ने औरतों को परदे की हिदायत की है। मोहल्ले के लोगों ने इसकी शिकायत इमाम से की। लोगों का मानना था कि उनके रहन-सहन के तरीक़े से मोहल्ले की औरतों व लड़कियों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा.......।
          लोगों की शिकायत की वजह से उन्हें एक दिन इमाम की अदालत में पेश होना ही पड़ा। इमाम ने एक नज़र उन पर डाली और फिर बताया कि लोगों को उनके रहन-सहन के तरीक़े पर एतराज़ है। इसके बाद इमाम साहब ने उन्हें इस्लाम में औरतों के परदे को लेकर एक लंबा भाषण दे डाला। वे सारी बातें धैर्य से सुनती रहीं। इमाम साहब ने अंत में जब उन्हें नसीहत देने लगे तो उन्होंने सवाल किया.....‘इस्लाम क्या सिर्फ औरतों को ही परदा के लिए कहता है....?’
          इमाम साहब ने 'हां' में जवाब दिया।
          उन्होंने इमाम साहब से फिर पूछा.....‘इस्लाम में महरम और नामहरम की बात भी कही गई है’।
          इमाम साहब ने कहा...‘हां कही गई है’।
         ‘मैं आपके लिए महरम हूं या नामहरम?’  इमाम साहब से उनका अगला सवाल था।
         इमाम साहब तिलमिला उठे; पर धीरे से कहा....‘नामहरम’।
        ‘और यहां जो लोग खड़े हैं उनके लिए मैं महरम हूं या नामहरम?’
         इमाम साहब ने उसी तरह तिलमिलाते हुए जवाब दिया....‘नामहरम’
        ‘जब मैं आपके लिए नामहरम हूं तो आपको और इन तमाम लोगों को मुझसे परदा करना चाहिए था। इस्लाम ने यह भी साफ़ कहा है कि मरदों को उन औरतों से परदा करना चाहिए जो महरम नहीं हैं। क्या आप और इन तमाम लोगों ने ऐसा किया? जिस मज़हब की बुनियाद पर आप मुझे कठघरे में खड़ा कर रहे हैं उसी मजहब ने मरदों को भी परदा करने की हिदायत दे रखी है। इसलिए मुझसे सवाल-जवाब करने से पहले ख़ुद से और इन तमाम लोगों से सवाल करें तो बेहतर होगा।’
          फिर वे अपनी जगह से उठीं और बिना किसी से कुछ कहे वहां से निकल पड़ीं। इमाम साहब ख़ामोश थे और मजमा शर्मिंदा।

अवाम
सत्ता के शीर्ष पर जब वह पहुंचा तो हैरान रह गया...क़दम-क़दम पर बेईमानी...भ्रष्टाचार....।
आदर्श और मूल्य बस अब सिर्फ किताबों में सिमट कर रह गए हैं...उसे पहले डर भी लगा। किस-किस के खिलाफ़ वह हल्ला बोले....ऊपर से नीचे तक सब एक ही रंग में रंगे थे....लेकिन फिर उसने हिम्मत जुटाई...धीरे-धीरे सत्ता पर पकड़ बनाई। लोगों की आंखों से आंसू पोंछने के लिए वह लगातार कोशिश करता रहा....भ्रष्ट और बेईमानों की परेशानी बढ़ी....सत्ता में उसके सहयोगी उसके ख़िलाफ़ होने लगे तो पार्टी में उसके कामकाज के तरीक़े को लेकर फुसपुसाहट शुरू हो गई। लेकिन इन सबसे बेपरवाह लोगों के पक्ष में खड़ा होना उसने नहीं छोड़ा।
धीरे-धीरे विरोध बढ़ता गया। पार्टी और उसके सहयोगी उसे सत्ता से बेदखल करने के लिए लामबंद हुए...और फिर सबने एक सुर में उसे हटाने की मांग करने लगे....।
सारे विरोध के बावजूद वह अब भी सत्ता के शिखर पर बैठा हुआ है.....अवाम उसके साथ हैं....।

चुनाव
सत्ता के लिए पार्टी चाहिए और पार्टी चलाने के लिए पैसा...।
उसने पहले पार्टी बनाई....फिर पैसा और उसके बाद सत्ता हासिल की.....।
सब कुछ ठीक चल रहा था....सत्ता उसके पास थी और पैसा उस पर बरस रहा था....पैसा अब उसकी मजबूरी नहीं कमज़ोरी बन गई थी.....इस कमज़ोरी की वजह से उसकी परेशानी बढ़ती गई....उसके अपने साथी-संगी उसका साथ छोड़ने लगे....और एक दिन ऐसा आया कि उसे पैसा और लोगों में से किसी एक को चुनना था.....
उसने पैसे को चुना....अगले दिन लोगों ने उसे सत्ता से बेदख़ल कर दिया....।