Friday, 22 October 2010

उन्नीसवें अन्तर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन, पंचकुला(हरियाणा) के अवसर पर विशेष

-->पंचकुला(हरियाणा) में आज 23 अक्टूबर, 2010 को लघुकथा सम्मेलन है। सम्मेलन के पहले सत्र में भाई भगीरथ परिहार का लेख ‘लघुकथा के आईने में बालमन’ पढ़ा जाना है तथा डॉ अनूप सिंह मिन्नी कहानी(पंजाबी में लघुकथा के लिए यही नाम स्वीकार किया गया है) की पुख्तगी के बरक्स ‘साऊ दिन’ शीर्षक अपनी पुस्तक पर आलेख पढ़ेंगे। इन दोनों ही लेखों पर डॉ अशोक भाटिया, सुभाष नीरव और डॉ मक्खन सिंह के साथ मुझे भी चर्चा करने वालों में शामिल किया गया था। मेरा दुर्भाग्य कि इन दिनों मुझे बंगलौर आना पड़ा और मैं सम्मेलन का हिस्सा न बन पाया। सम्मेलन के दूसरे सत्र में कुछ लघुकथाओं का पाठ उपस्थित लघुकथा-लेखकों द्वारा किया जाना है। इन लघुकथाओं का चुनाव पूर्व-प्रेषित सामग्री से श्रेष्ठता के आधार पर ‘मिन्नी’ संस्था के कर्णधार श्रीयुत श्यामसुन्दर अग्रवाल व डॉ श्यामसुन्दर दीप्ति द्वारा हुआ है। भाई श्यामसुन्दर अग्रवाल ने बताया था कि इस सम्मेलन के जुए का कुछ बोझ भाई रतन चंद 'रत्नेश' के कन्धों पर भी टिकाया गया है, लघुकथाएँ उनके सौजन्य से भी प्राप्त हुई हैं। भाई श्यामसुन्दर अग्रवाल ने 14 लघुकथाएँ इस आशय के साथ मुझे अग्रिम मेल की थीं कि मैं उन्हें पढ़ लूँ और यथानुसार अपनी टिप्पणी उन पर तैयार कर लूँ। चयनित लघुकथा का पाठ ‘मिन्नी’ की परम्परा के अनुसार उसके लेखक द्वारा ही किया जाना है। पढ़ी जाने वाली लघुकथाओं पर चर्चा के लिए प्रपत्र में डॉ अनूप सिंह, डॉ कुलदीप सिंह दीप, डॉ अशोक भाटिया, सुकेश साहनी, निरंजन बोहा के साथ मेरा भी नाम शामिल है। मैं सदेह पंचकुला सम्मेलन में अनुपस्थित रहूँगा लेकिन मेरी मानसिक उपस्थिति वहाँ बनी रहेगी। सम्मेलन की सफलता के साथ-साथ मैं भाई श्यामसुन्दर अग्रवाल द्वारा प्रेषित लघुकथाओं में से कुछ को अपनी टिप्पणी सहित ‘जनगाथा’ के अक्टूबर 2010 अंक में दे रहा हूँ और इस तरह अपनी उपस्थिति वहाँ दर्ज़ कर रहा हूँ।
21 अक्टूबर की शाम एक एसएमएस इस आशय का आया था कि गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में 23 अक्तूबर 2010 को लघुकथा सम्मेलन है। इस बारे में किसी भी प्रकार की अन्य चर्चा न करके मैं उक्त सम्मेलन की भी सफलता की कामना हृदय से करता हूँ।सभी लघुकथाओं में जो अंश लाल रंग से दिखाए हैं, उसका अर्थ मूल लघुकथा से उन अंशों को हटाने की सलाह है तथा जो अंश हरे रंग से दिखाए हैं, उसका अर्थ उन अंशों को मूल लघुकथा में जोड़ने की सलाह है।–बलराम अग्रवाल–बलराम अग्रवाल


॥लघुकथाएँ॥


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॥9॥ मालिक/राम कृष्ण ‘कांगड़िया’
होटल के जूठे बर्तनों को साफ करते-करते उसकी उँगलियाँ कड़कती ठंड में बेजान-सी होती जा रही थीं। वह चाहकर भी अपनी उँगलियों को गति नहीं दे पा रहा था।
मालिक ने गुर्राते हुए कहा, “क्यों बे…क्या कर रहा है तू? रात के नौ बजने वाले हैं और अभी तक तुझसे बर्तन ही साफ नहीं हुए! चल जल्दी कर।”
“साहब! क्या करूँ, पानी इतना ठंडा है कि क्या बताऊँ! उंगलियाँ जाम हो गई हैं। गर्म पानी होता तो जल्दी हो जाता।”
“बड़ा आया गर्म पानी वाला! अगर इतनी ही ठंड लगती है तो घर में क्यों नहीं बैठता? नौकरी करने की क्या जरूरत है?”  इतना कह वह बड़बड़ाता हुआ अंगीठी की तपिश का आनंद लेने बैठ गया।-0-
संपर्क : गाँव व डाक: भूमती, तहसील: अर्की-173 221 (हि.प्र.)

टिप्पणी : पूँजी के क्रूर चरित्र को दर्शाती एक अच्छी लघुकथा। चरित्र-विकास की दृष्टि से भी यह सधी हुई रचना है। ‘मालिक’ शीर्षक से भी दमनकर्ता, शोषक अथवा पूँजीपति ही अधिक ध्वनित होता है।


॥10॥ अनजाने में/अनिल कटोच
शाम हो आई थी। अंधेरा अपने पाँव पसारने लग पड़ा था। गाँव को जाने वाली अंतिम बस भी जा चुकी थी। बस स्टाप पर मैं था और एक नवयौवना थी। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। ऐसे में ऑटो वाले भी मुँह मांगा दाम लेते हैं।
इतने में एक युवक बाइक पर आया और बोला, “मैडम! कहो तो मैं छोड़ आऊँ, जहाँ तुम्हें जाना है?”
नवयौवना ने ‘न’ में सिर हिला दिया। बाद में न जाने कितने मनचले आए और कुछ न कुछ कह कर चल दिए।
मैं भी उस नवयौवना के नजदीक चला गया। थोड़े ही समय बाद एक और युवक आया। नवयौवना उस समय किसी से मोबाइल पर बात कर रही थी। युवक ने कहा, “मैडम! कहाँ जाना है, मैं छोड़ आता हूँ।”
नवयौवना ने मेरी ओर इशारा करते हुए कहा, “ठीक है, पहले इन्हें छोड़ आएँ।”
मैं भी बिना कोई देरी किए उस युवक के पीछे बैठ गया। रास्ते में देखा वह नवयौवना अपने पिता की बाइक पर बैठी मंद-मंद मुस्कराती हुई जा रही थी।-0-
              संपर्क : टी-2/46, जुगयाल, पठानकोट-145 029 (पंजाब)

टिप्पणी : यद्यपि कथाकार ने यह प्रयत्न किया है कि वह महिला पात्र के प्रति पुरुष पात्रों की मानसिकता को दर्शाए, लेकिन शैल्पिक दृष्टि से इसका निर्वाह कुशलतापूर्वक नहीं कर पाया है। मुख्य-पात्र को यह कैसे पता चला कि नवयौवना अपने पिता की ही बाइक पर बैठी जा रही है?

॥11॥ ससुराल/डॉ. पूनम गुप्त
दौरे से वापस आया तो बड़े भाई साहब का फोन मिला,“तीन दिन हो गए नीरजा आई हुई है।”  
आठ महीने पहले ही नीरजा की शादी हुई थी। नीरजा भाई साहब की इकलौती बेटी है। नाम के अनुरूप ही सुंदर और समझदार। पता नहीं वह ससुराल में क्यों खुश नहीं थी। जब भी उससे फोन पर बात करता, वह रो पड़ती।
भाई साहब के घर गया तो नीरजा मेरे गले लगकर रो पड़ी। वह काफी कमज़ोर लग रही थी। ‘मैने वापस नहीं जाना।’ एक ही रट लगा रखी थी उसने। मैने उसे समझाना चाहा तो बोली, “सास बात-बात पर ताने देती रहती है। हर काम में टोकती है। मुझसे नहीं सहा जाता अब।”
मैने उसे समझाया कि एक-दूसरे को समझने में वक्त लगता है, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।
“वहाँ कुछ नहीँ सुधरेगा, चाचाजी! मैं ही चाहे…” वह रो पड़ी।
उसका मन बहलाने के लिए मैं उसे बाहर लॉन में ले गया। टहलते हुए उसके साथ इधर-उधर की बातें करने लगा। तभी नीरजा का ध्यान कुछ मुरझाए हुए पौधों की ओर गया। वह बोली, “माली काका! जो पौधे आप परसों रोप कर गये थे, वे तो मुरझाए जा रहे हैं। सूख जाएँगे तो बुरे लगेंगे। इन्हें उखाड़कर फेंक दो।”
 “नहीं बिटिया, ये सूखेंगे नहीं। ये नर्सरी में पैदा हुए थे, इन्हें वहाँ से उखाड़कर यहाँ लगाया है। नई जगह है, जड़ें जमाने में थोड़ा समय तो लगेगा।”
माली की बात सुन नीरजा किसी सोच में डूब गई। थोड़ी देर बाद ही वह ससुराल जाने की तैयारी करने लगी।-0-
संपर्क : 21-ए, रामबाग, पटियाला-147001 (पंजाब)

टिप्पणी : इस लघुकथा का शीर्षक अगर ‘बेटियाँ’ हो तो कैसा रहे? यह सलाह है, टिप्पणी नहीं। यद्यपि ‘ससुराल’ भी ठीक ही है, लेकिन सीमित अर्थ में, क्योंकि ससुराल सिर्फ लड़कियों का नहीं होता, लड़कों का भी होता है। जबकि रोपी सिर्फ बेटियाँ जाती हैं, बेटे नहीं।
कुल मिलाकर यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य को पुष्ट करती शिक्षाप्रद और सराहनीय लघुकथा है।

॥12॥ लक्ष्मी-पूजन/ अनन्त शर्मा ‘अनन्त’
वह हर दीपावली की रात को लक्ष्मी की मूर्ति के सामने देर तक पूजा करता, परंतु उसकी आर्थिक हालत बद से बदतर होती गई। वह गरीब से और गरीब होता गया। उसके बीवी-बच्चे त्यौहार के दिन भूखे थे। रात के दस बजे थे। लक्ष्मी के आने के स्वागत में लोगों ने घरों के दरवाजे खुले छोड़ रखे थे।
वह एक घर से दूसरे घर गया और उन घरों की सारी नकदी, जवाहरात इकट्ठे कर लाया। सबसे पहले उन्होंने जी-भर कर खाना खाया। फिर लक्ष्मी-पूजन किया। लक्ष्मी ने इस बार उन पर भरपूर कृपा की थी। घर आई लक्ष्मी को वे खोना नहीं चाहते थे, इसलिए घर के सारे दरवाजे उन्होंने बंद कर दिए। -0-
संपर्क : 1142-ए, सैक्टर 41-बी, चंडीगढ़

टिप्पणी : साधारण रचना। कोई टिप्पणी नहीं।


॥13॥ कर्जमुक्त/ अशोक दर्द
एक वक्त था, सेठ करोड़ीमल अपने बहुत बड़े व्यवसाय के कारण अपने बेटे अनूप को समय नहीं दे पाते थे। अतः बेटे को अच्छी शिक्षा भी मिल जाए और व्यवसाय में व्यवधान भी  उत्पन्न न हो, इसलिए उन्होंने बेटे को शहर के महंगे बोर्डिंग स्कूल में दाखिल करवा दिया था। साल बाद छुट्टियाँ पड़ती तो वह नौकर को भेज कर अनूप को घर बुला लेते थे। बेटा छुट्टियाँ बिताता, स्कूल खुलता तो उसे फिर वहीं छोड़ दिया जाता।
अनूप पढ़-लिख कर बहुत बड़ा व्यवसायी बन गया। सेठ करोड़ी मल बूढ़ा हो गया। बापू का अनूप पर बड़ा कर्ज था। उसे अच्छे स्कूल में जो पढ़ाया-लिखाया था। बापू का सारा कारोबार बेटे अनूप ने खूब बढ़ाया-फैलाया। कारोबार में अति व्यस्तता के कारण अब अनूप के पास भी बूढ़े बाप के लिए समय नहीँ था। वह भी बापू को शहर के बढ़िया वृद्धाश्रम में छोड़ आया। फुर्सत में बापू को घर ले जाने का वायदा कर वापिस अपने व्यवसाय में रम गया। वृद्धाश्रम का मोटा खर्च अदा कर वह अपने को कर्जमुक्त महसूस कर रहा था। -0-
संपर्क : प्रवास कुटीर, गाँव व डाकः बनीखेत, तहसील : डलहौजी, जिला : चम्बा-176303
(हि.प्र.)

टिप्पणी : स्तरीय लघुकथा। कहने को इस ‘वस्तु’ को अनेक कथाकारों ने अपनी लघुकथा का कथानक पहले भी बनाया है लेकिन अशोक दर्द ने इसको प्रस्तुत करने में जिस धैर्य का परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। यह लघुकथा बिना किसी नारेबाजी के स्थिति के बयान भर के माध्यम से पाठक को आज के माता-पिता की भौतिक-दौड़ और उसके परिणामों की ओर देखने के लिए हमें विवश करती है और अपने उद्देश्य में सफल रहती है।



Tuesday, 28 September 2010

बन्द आँखों का समाज : संतोष सुपेकर की लघुकथाएँ

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11 सितम्बर, 2010 को उज्जैन की कालिदास अकादमी में कथाकार संतोष सुपेकर के लघुकथा संग्रह ‘बंद आँखों का समाज’ का लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ शैलेन्द्र कुमार शर्मा, वरिष्ठ साहित्यकार श्रीयुत् श्रीराम दवे, सूर्यकांत नागर, बलराम अग्रवाल, सुरेश शर्मा, प्रतापसिंह सोढी तथा अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित थे।
विमोचन के अवसर पर बायें से सर्वश्री राजेन्द्र देवधरे 'दर्पण', सुरेश  शर्मा, श्रीराम दवे, सूर्यकांत नागर, बलराम अग्रवाल तथा डॉ शैलेन्द्र शर्मा



संतोष सुपेकर की लघुकथाओं में संवेदन के अनेक अनछुए बिंदु दृष्टिगत होते हैं। संवेदना के स्तर पर संतोष अपने समकालीनों में एकदम अलग और बेहतर नजर आते हैं। उनकी लघुकथाओं में व्यंग्य जैसे करेंट की तरह दौड़ता है; लेकिन शिल्प के स्तर पर वे बहुत लापरवाह नजर आते हैं। कथा को पूर्णता प्रदान करने का धैर्य उनकी कम ही लघुकथाओं में नजर आता है। यही कारण है कि बहुत-से अनमोल अनुभव जो पाठक को उनकी वीक्ष्ण और तीक्ष्ण दृष्टि का लोहा मनवाते हैं, शैल्पिक गठन के अभाव में बिखर गए-से लगते हैं। कई गंभीर कथ्य उपहास की भेंट भी चढ़ गए हैं। उनकी लघुकथाओं को पढ़ते हुए यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि वे एक सचेत चिंतक हैं, मानवीय-समता के पक्षधर हैं, संस्कृति के पक्षधर हैं, वसुधैव कुटुम्बकम् के पक्षधर हैं। उनमें एक अच्छा लघुकथाकार सिद्ध होने की पूर्ण सम्भावना है। यहाँ प्रस्तुत हैं उनके लघुकथा संग्रह ‘बंद आँखों का समाज’ से दो तथा ‘हाशिए का आदमी’ से एक लघुकथा:


महान पाप
सुबह-सवेरे वे अपने धर्मस्थल का ताला खोलने पहुँचे तो बुरी तरह चौंक पड़े। दिल धक् से रह गया।
धर्मस्थल के चबूतरे पर कुछ ‘अपवित्र’ वस्तुएँ पड़ी हुई थीं। उन्हें गहरा धक्का लगा। कुछ क्षण वे अपने-आप को सँभाल न सके। फिर अचानक सम्भलकर चारों ओर देखा। कोई न दिखने पर उन्होंने चुपचाप वे टुकड़े उठाए, सड़क के उस पार कूड़े के ड्रम में फेंके और आकर चबूतरा साफ किया।
मैं सारी घटना देख रहा था। आखिर पूछ ही बैठा—“बाबा, यह शरारत तो लगता है…जान-बूझकर की गई है। फिर आपने हल्ला…?”
“बेटा,” वे भरे कंठ से बोले,“चाहता तो मैं भी सबकी तरह हल्ला मचा सकता था; परन्तु आखिर में होता क्या? वही दंगा-फसाद, कई सारी मौतें, घरों की बरबादी, वहशीपन, अफवाहों का दौर, कर्फ्यू…! मैंने चुप रहकर यह पाप जरूर किया है पर इस छोटे-से पाप ने मुल्क के करोड़ों रुपए बचा लिए, कई जानें बच गईं। खैर छोड़ो। तुम भी मेहरबानी करके यह घटना किसी को बताना मत।”

बॉर्डर का दर्द
“आप तो बहुत जल्दी तैयार हो गए! आपका बैग भी कम्पलीट है!! पहले फौज़ में रहे हैं क्या?”
“नहीं मैडम, फौज़ में तो नहीं, बॉर्डर के गाँव में रहा हूँ कई साल। बॉर्डर पर गोलीबारी, युद्ध की स्थिति में सब-कुछ छोड़कर तुरंत तैयार होकर भागना पड़ता है, फिर यह तो छोटा-सा बैग है। बॉर्डर पर रहना, फौज में रहने से कम नहीं है।” कहते-कहते आँखें छलछला उठीं उनकी।

समझा करो
“हैलो! महेश जी को देखने जा रहे हो क्या?”
“हाँ यार, बस निकल ही रहा था कि तुम्हारा फोन आ गया। बहुत सीरियस कंडीशन में है।”
“पर अभी मत जाना। जरा रुककर…शाम तक जाना।”
“क्यो?”
“अरे यार समझा करो। उन्हें अभी ब्लड की जरूरत है।”
“ओ…ऽ…थैंक्यू यार! अब मैं कल ही जाऊँगा उनको देखने। थैंक्यू वैरी मच।”


संतोष सुपेकर: संक्षिप्त परिचय
29 जून 1967 को मध्य प्रदेश के उज्जैन नगर में जन्मे संतोष सुपेकर की मातृभाषा मराठी है लेकिन लेखन वे हिन्दी में करते हैं। उनके पिताश्री मोरेश्वरजी सुपेकर अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के जिमनास्टिक-कोच हैं। एम कॉम तथा पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त संतोष सुपेकर पश्चिम रेलवे में ‘लोको पायलट’ के पद पर कार्यरत हैं। उनकी साहित्य सेवा को देखते हुए अनेक साहित्यिक संस्थाओं ने उनको सम्मानित एवं पुरस्कृत किया है। कविता, लघुकथा एवं व्यंग्य उनकी प्रिय विधाएँ हैं। ‘साथ चलते हुए’(2004) तथा ‘हाशिए का आदमी’(2007) के बाद ‘बंद आँखों का समाज’ उनका तीसरा लघुकथा-संकलन है।
उनके निवास का पता है :31, सुदामा नगर, उज्जैन(म प्र) / मोबाइल : 09424816096

Wednesday, 25 August 2010

पवन शर्मा की लघुकथाएँ


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घर-परिवार के बीच से कथानक चुनने और उन्हें सार्थक ऊँचाई प्रदान करने में पवन शर्मा सिद्धहस्त हैं। घर-परिवार से जुड़ी उनकी हर लघुकथा सामने घटित होती जान पड़ती है। अभी, हाल में उनकी 100 लघुकथाओं का संग्रह ‘हम जहाँ हैं’ आया है। प्रस्तुत हैं उक्त संग्रह से तीन लघुकथाएँ:
॥1॥ आग
उसने दो रुपए का नोट निकालकर मोंटू के हाथ में थमाया और कहा,“जल्दी में कोई चीज़ नहीं ला पाया…ले लेना।”
फिर भाभी के पाँव छुए और बाहर निकल आया।
बाहर निकलते हुए भैया बोले,“चल, तुझे बस-स्टैंड तक पहुँचा दूँ।”
“मैं निकल जाऊँगा। आपके ऑफिस का समय हो रहा है।”
“चल तो।”
भैया ने सड़क पर चलते-चलते पूछा,“तेरा पोस्ट-ग्रेजुएशन पूरा हो गया?”
“हाँ।” उत्तर देते हुए वह विस्मित हो गया।
“अब आगे?”
“कुछ नहीं…पूरी तरह घर पर बैठा हूँ।” कहते-कहते वह भीतर तक सिकुड़ गया।
“अम्मा और बाबू कैसे हैं रे?” भैया ने पूछा।
उसके भीतर भक्क-से आग लगती है। पूरे तीन दिन से इनके यहाँ हूँ—अब चलते वक़्त पूछ रहे है!
“ठीक हैं।” उसने अपने भीतर की आग दबाई।
बस-स्टैंड में घुसते हुए वह कहता है,“बाबूजी कह रहे थे कि अब तीन सौ से घर का खर्चा नहीं चल पाता है। कुछ-और भेज दिया करें।”
सामने खड़ी बस का नम्बर देख भैया कहते हैं,“यही बस जाएगी। तू यहीं रुक, मैं टिकट लेकर आता हूँ।”
उसे लगा कि भैया ने उसकी बात सुनी ही नहीं है। उसके भीतर की आग फिर से सुलगती है।
थोड़ी देर बाद भैया हाथ में टिकट लिए लौटे और बोले,“तू बस में बैठ, मैं चलता हूँ।”
उसे टिकट थमाते हुए भैया ने जेब में से पचास रुपए का नोट निकाला और उसकी ओर बढ़ाया,“ले…रख ले…काम आयेंगे।”
भैया थोड़ी देर चुप रहे, फिर बोले,“बाबूजी से कहना कि शहर में तो पानी भी खरीदकर पीना पड़ता है।”
उसके भीतर की आग न जाने क्यों एकदम ठंडी पड़ गयी।
॥2॥ बाप, बेटे और माँ
बूढ़ा बाप दर्द के मारे दुहरा हो गया और पेट पकड़कर बिस्तर पर बैठ गया। तीनों बेटे पलंग के आसपास खड़े अपने बाप को देख रहे थे। तीन दिन से यही हाल है। बड़ा बेटा डॉक्टर की सलाह पर जो भी दवा-गोली दे देता, बाप खा लेता, पर दर्द खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।
“आज बड़े अस्पताल ले चलते हैं पिताजी को—इलाज करवा लें।” बड़ा बेटा बोला।
“और नहीं तो क्या—कहीं कुछ हो गया तो दुनिया कुछ की कुछ बोलेगी।” छोटे बेटे ने कहा।
बाप का दर्द जरा कम हुआ। वह सीधा होकर पलंग पर बैठ गया। उसने पीने के लिए पानी माँगा। छोटा बेटा दौड़कर एक गिलास पानी ले आया। बाप ने गट-गट करते पूरा गिलास खाली कर दिया।
“तू चले जाना पिताजी के साथ अस्पताल। आज मुझे ऑफिस जल्दी जाना है।” बड़े बेटे ने छोटे से कहा।
“मैं!” छोटा बेटा चौंका।
“और नहीं तो क्या…तू ही चला जा। आज मुझे भी काम है, नहीं तो मैं ही चला जाता।” मँझले बेटे ने बड़े का समर्थन किया।
“पर मैं तो आज तक अस्पताल नहीं गया—और फिर मैं अकेला कैसे सँभाल पाऊँगा पिताजी को?” छोटे बेटे ने कहा।
“तो फिर पिताजी को कौन ले जाएगा?” मँझले बेटे ने प्रश्न किया।
तीनों बेटों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
“तुम लोग परेशान मत होओ…मैं तुम्हारी माँ के साथ चला जाऊँगा।” बाप ने धीमे स्वर में कहा।
तीनों बेटों के सिर पर से जैसे रखा मनों वज़न हट गया हो!
॥3॥ उतरा हुआ कोट
“देखो, दिनेश ने कितना बढ़िया कोट दिया है। अच्छा लग रहा है न?” पिताजी कोट पहने हुए कह रहे हैं माँ से। आज सुबह ही लौटे हैं।
“हाँ-हाँ…क्यों न लगेगा अच्छा, जब बेटे का उतरा हुआ कोट बाप पहनेगा तो। तुम्हें तो उसने अपने उतरे हुए कपड़े ही दिये हैं पहनने को। नौकरी के इतने साल हो गये…नये सिलवाये हैं कभी?” माँ सहज रूप से कहती हैं।
इतनी सहजता से कही गई बात निश्चित रूप से सत्य है—यह तो पिताजी भी जानते हैं।
पिताजी पहने हुए कोट पर हाथ फिराते जाते हैं और खुश होते जाते हैं।
वह जानते हैं कि अपने ऑफीसर बेटे को नाराज करके वह कहीं के नहीं रहेंगे।
पवन शर्मा : संक्षिप्त परिचय

Thursday, 8 July 2010

समकालीन लघुकथा और माँ

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‘माँ’ को केन्द्र में रखकर लिखी गई समकालीन लघुकथाओं का एक संकलन कथाकार प्रतापसिंह सोढ़ी के सम्पादन में ‘लघुकथा संसार:माँ के आसपास’ नाम से आया है। इसमें देशभर के 62 कथाकारों की 101 लघुकथाएँ संकलित हैं। ‘जनगाथा’ के इस अंक में प्रस्तुत हैं उक्त संकलन से कुछ रचनाएँ:


॥1॥ संबोधन/खुदेजा खान
बाहर से किसी बूढ़े भिखारी ने टेर लगाई,“माँ…ऽ…मुट्ठी दे माँ…ऽऽऽऽ…”
इतना सुनते ही वो वृद्ध महिला चावल का कटोरा ले उस बूढ़े भिखारी की झोली में डालने के लिए दौड़ पड़ती है।
एक तो ये बूढ़ा भिखारी ऊँचा सुनता है, जब तक बाहर निकलकर दिख न जाए तब तक पुकारता रहता है। उसकी पुकार से वृद्ध पुरुष खीझ उठता—“तुमने बहुत लपका लिया है उसे, असमय आकर ऐसे चिल्लाता है जैसे उसका उधार खाए बैठे हैं। इकट्ठा राशन क्यों नहीं दे देती उसको?”
वृद्ध महिला बड़ी धीरता से बोली,“इकट्ठा राशन दे भी दूँ, लेकिन वो जो ‘माँ’ बोलकर बुलाता है, उसमें बड़ी आत्मीयता झलकती है। अब अपने बच्चे तो साथ रहते नहीं, ‘माँ’ सुनने को तरस जाता है मन। कम-से-कम ये अभागा आकर मेरी ममता को तो छू जाता है।”
वृद्ध पति, पत्नी के मर्म को समझकर सम्बोधन की आर्द्रता में भीग गया।
सम्पर्क:धर्मपुरा, चित्रकूट रोड, जगदलपुर(छत्तीसगढ़)

॥2॥ मेरी प्यारी माँ/पारस दासोत
दीपावली का दिन…
“माँ! आज तो मैं मिठाई खाकर रहूँगा। माँ! राजा बाबू की सफेद मिठाई-जैसी खाऊँगा, हाँ।”
“मेरे शेर, मेरे लाल! आज नहीं…आज नहीं।”
बच्चा रोने लगा।
“राजा बेटे, रोते नहीं। ठहर, मैं अभी तेरे लिए मिठाई लाती हूँ।”
इन्हीं शब्दों के साथ माँ रसोई की ओर चली गई। थोड़ी देर बाद, माँ के हाथ में मिठाई थी।
“ले, ये ले सफेद मिठाई।”
“माँ! तू कितनी अच्छी है। क्यों माँ, ये दिवाली रोज क्यों नहीं आती?” बच्चे ने मिठाई को अपने मुँह में रखते हुए पूछा।
“आएगी-आएगी, रोज-रोज आएगी। बेटे! तू बड़ा होकर काम तो कर!”
इस उत्तर के साथ माँ पास ही रखे टिमटिमाते दिये को निहारती, गुड़-आटे से सनी अपनी अंगुलियाँ चाट रही थी।
सम्पर्क:प्लॉट नं 129, गली नं 9, क्वींस रोड, जयपुर(राजस्थान)

॥3॥ हक़ अदा कर दिया/मुइनुद्दीन अतहर
बुढ़िया के तीन बेटे थे, तीनों सरकारी विभाग में अच्छे पदों पर आसीन थे। अच्छी आय थी।
आज उनकी माँ का तीजा था। मस्जिद में क़ुरआन-ख्वानी हो रही थी। पढ़ने वालों को बाँटने के लिए लाई, चना, चिरौंजी, काजू, किशमिश तथा मिश्री मिश्रित बड़े-बड़े दाने बनाए गए थे।
दसवें तथा बीसवें में रिश्तेदारों तथा मोहल्ले वालों को खूब अच्छा-अच्छा खाना खिलाया गया। किसी परिचित ने पूछा,“मियाँ, फकीर नहीं दिख रहे हैं! क्या उन्हें नहीं बुलाया गया?”
जवाब मिला,“फकीर लोग आजकल बुलाने वालों की हैसियत देखकर आते हैं। इसलिए उन्हें नहीं बुलाया गया।”
जिस अभागी माँ को तीनों बेटों ने जीवन में कभी अच्छा खाना नहीं खिलाया, माँ को माँ की तरह नहीं रखा, आज उन तीनों बेटों ने अपनी माँ के चालीसवें में दिल खोलकर खर्च किया। रिश्तेदारों तथा मोहल्ले वालों को बिरयानी व मुर्ग-मुसल्लम खिलाया गया। जिस माँ को कभी अच्छे कपड़े नसीब नहीं हुए, आज गरीबों को उनके नाम से कपड़े बाँटे जा रहे हैं। एक छोटे-से बिना हवा-पानी वाले कमरे में रहने वाली माँ की कब्र को खूब सजाया-सँवारा गया। कब्र की पहचान के लिए माँ के नाम का संगमरमर का पत्थर भी लगाया गया तथा इत्र की खुशबू छिड़ककर गुलाब के गजरों से लाद दिया गया।
तीनों भाइयों का कहना था—“हमने अपना हक़ अदा कर दिया।”
सम्पर्क:1308, अजीजगंज, पसियाना, शास्त्री वार्ड, जबलपुर(मध्य प्रदेश)
प्रतापसिंह सोढ़ी : संक्षिप्त परिचय
प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त। साहित्य की सभी विधाओं में लेखन। अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित। लघुकथा संग्रह ‘शब्द संवाद’ प्रकाशित। मासिक पत्रिका ‘शहादत’ एवं ‘संप्रति’, कविता संकलन ‘काव्यकुंज’, लघुकथा संकलन ‘समप्रभ’ तथा ‘लघुकथा संसार:माँ के आसपास’ का सम्पादन।
सम्पर्क:5, सुखशान्ति नगर, बिचौली हप्सी रोड, इंदौर(मध्य प्रदेश)
मोबाइल:09753128044

Wednesday, 16 June 2010

नींव के नायक


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इस माह में अशोक भाटिया द्वारा संपादित लघुकथा-संकलन ‘नींव के नायक’ प्रकाश में आया है। ‘नींव के नायक’ में माधवराव सप्रे, प्रेमचन्द, माखनलाल चतुर्वेदी, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, जयशंकर प्रसाद, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, छबीलेलाल गोस्वामी, जगदीशचन्द्र मिश्र, सुदर्शन, रामवृक्ष बेनीपुरी, अयोध्या प्रसाद गोयलीय, यशपाल, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’, रावी, विष्णु प्रभाकर, जानकीवल्लभ ‘शास्त्री’, रामनारायण उपाध्याय, हरिशंकर परसाई, दिगंबर झा, आनन्द मोहन अवस्थी, शरद कुमार मिश्र ‘शरद’, ब्रजभूषण सिंह ‘आदर्श’, श्यामनन्दन शास्त्री, पूरन मुद्गल, युगल, सुरेन्द्र मंथन तथा सतीश दुबे यानी 29 कथाकारों की कुल 177 लघुकथाएँ संगृहीत हैं। पुस्तक में उनका शोधपूर्ण लेख ‘सन् 1970 तक की लघुकथाएँ’ भी है जिस पर चर्चा अलग से की जा सकती है। ‘जनगाथा’ के इस अंक में प्रस्तुत हैं उक्त सकलन से तीन लघुकथाएँ:
जमा-खर्च/अयोध्या प्रसाद गोयलीय
हमारे मुहल्ले में एक बुजुर्ग थे। खरी-खरी कहने में किसी से चूकते नहीं थे। उनसे बात करते हुए लोग घबराते थे। एक रोज एक युवक रोते हुए आकर बोला,“ताऊजी, लाला काल कर गए।”
आपने अन्यमनस्क भाव से जवाब दिया,“अच्छा हुआ।”
युवक सकते में रह गया कि यह इन्होंने क्या कहा? मेरे पिताजी मर गए, सहानुभूति प्रदर्शित करने की बजाय कहते हैं, अच्छा हुआ। मनोव्यथा दबाकर बोला,“अभी रात को ले जाने का इरादा है।”
वे उसी तरह बोले,“सुबह भी ले जा सको तो गनीमत है।”
“यह क्यों ताऊजी?”
“भाई अपना खाता देख लो। किसी की अर्थी को कन्धा दिया होगा तो उन्हें भी कन्धा देने वाले मिलेंगे। वर्ना झल्ली वालों से लाश उठवानी पड़ेगी।”
और सचमुच उनका कहा सत्य हुआ।
मुहल्ले के दो-चार रईसों की आदत थी कि मुर्दनी में साथ न जाकर कारों-ताँगों से सीधे श्मशान-घाट पहुँच जाते थे। न अर्थी को कन्धा देते, न हाथ लगाते थे। उनका यह व्यवहार लोगों को खटकता तो था, परन्तु कहने का साहस नहीं होता था। उस रोज उक्त बुजुर्ग उन्हें सुनाकर कहने लगा,“भाई, अबकी इनके यहाँ किसी की मौत हुई तो हम भी टैक्सी में श्मशान-घाट आयेंगे।”
तब से उन रईसों ने मोटरों-ताँगों में श्मशान-घाट जाना छोड़ा। (1951)
संस्कृति/हरिशंकर परसाई
भूखा आदमी सड़क के किनारे कराह रहा था। एक दयालु आदमी रोटी लेकर उसके पास पहुँचा और उसे दे ही रहा था कि एक दूसरे आदमी ने उसका हाथ खींच लिया। वह आदमी बड़ा रंगीन था।
पहले आदमी ने पूछा,“क्यों भाई, भूखे को भोजन क्यों नहीं देने देते?”
रंगीन आदमी बोला,“ठहरो, तुम इस प्रकार उसका हित नहीं कर सकते। तुम केवल उसके तन की भूख समझ सकते हो, मैं उसकी आत्मा की भूख जानता हूँ। देखते नहीं हो, मनुष्य-शरीर में पेट नीचे है और हृदय ऊपर। हृदय की अधिक महत्ता है।”
पहला आदमी बोला,“लेकिन उसका हृदय पेट पर ही तो टिका हुआ है। अगर पेट में भोजन नहीं गया, तो हृदय की टिक-टिक बंद हो जाएगी!”
रंगीन आदमी हँसा; फिर बोला,“देखो, मैं बतलाता हूँ कि उसकी भूख कैसे बुझेगी!”
यह कहकर वह उस बूढ़े के सामने बाँसुरी बजाने लगा। दूसरे ने पूछा,“यह तुम क्या कर रहे हो? इससे क्या होगा?”
रंगीन आदमी बोला,“मैं उसे संस्कृति का राग सुना रहा हूँ। तुम्हारी रोटी से तो एक दिन के लिए ही उसकी भूख भागेगी, संस्कृति के राग से उसकी जनम-जनम की भूख भागेगी।”
वह फिर बाँसुरी बजाने लगा।
और तब वह भूखा उठा। उसने बाँसुरी झपटकर पास की नाली में फेंक दी। (1956)
स्नेह का स्वाद/शरद कुमार मिश्र ‘शरद’
मकान के आँगन में नन्हे-मुन्ने शिशु आँख मिचौनी खेल रहे थे। खेलते-खेलते एक बच्चा धक्का खाकर जमीन पर आ गिरा। उसके होठों से खून निकल आया, फिर भी वह रोया नहीं। उसने एक बार अपने चारों ओर देखा और यह अनुभव कर कि उसे किसी ने नहीं देखा, झट खड़ा हो खेलने लगा।
बच्चों की किलकी सुनी तो माँ ने बाहर झाँककर देखा और चिल्लाकर बोली,“पप्पू, इधर चलो, चोट लग जाएगी।”
“हम नहीं आते अम्मा, खेल रहे हैं।” कहकर वह फिर दौड़ने लगा। दौड़ते-दौड़ते एक बार फिर ठोकर खाई तो गिर पड़ा। माँ उसे उठाने दौड़ी तो रो पड़ा।
अब क्या था, ज्यों-ज्यों माँ बच्चे को चुप करने की चेष्टा करती, त्यों-त्यों वह और अधिक रोता, हालाँकि इस बार उसे चोट क्या खरोंच भी न आई थी। फिर भी वह हिड़कियाँ भर रहा था। माँ पुचकार रही थी, मुँह चूम रही थी, और बच्चा स्नेह का स्वाद ले रहा था! जिद्दी हो रहा था। (1957)

Saturday, 1 May 2010

मधुदीप की लघुकथाएँ

-->वरिष्ठ कथाकार मधुदीप 30 अप्रैल 2010 को सरकारी सेवा से निवृत्त हो चुके हैं। दिशा प्रकाशन के प्रबन्धक एवं उपन्यासकार के तौर पर वह गत कई दशकों से समाज एवं साहित्य की सेवा में भी रत हैं जिससे निवृत्ति वे शायद न ले पाएँ। फिलहाल, सरकारी सेवा से निवृत्ति के अवसर पर उन्हें शतश: शुभकामनाएँ।
लघुकथाकार के रूप में मधुदीप की विशेषता यह है कि उनके पात्र किसी दुविधा अथवा दवाब में नहीं जीते। इसका तात्पर्य यह बिल्कुल भी नहीं है कि वे अपने समय और सामाजिक परिस्थितियों से प्रभावित नहीं हैं; बल्कि ऐसा इसलिए होता है कि वे निर्णय लेने में सक्षम हैं। यद्यपि उनके सामने ‘हिस्से का दूध’ के पति जैसी परिस्थिति भी उत्पन्न होती है और ‘खुरंड’ के उस व्यक्ति जैसी भी जिसकी उम्मीदों पर कारखाने की तालाबन्दी पानी फेर देती है। बावजूद इस सबके उनके पात्र ‘एलान-ए-बगावत’, ‘तनी हुई मुट्ठियाँ’, ‘अतित्वहीन नहीं’ जैसे जुझारू चरित्र के कारण समकालीन लघुकथा में अपनी अलग पहचान बनाने में सक्षम हैं। ‘जनगाथा’ के इस अंक में प्रस्तुत हैं उनके कथा-संग्रह ‘मेरी बात तेरी बात’ से तीन लघुकथाएँ:

अस्तित्वहीन नहीं
उस रात कड़ाके की ठंड थी। सड़क के दोनों ओर की बत्तियों के आसपास कोहरा पसर गया था।
रोज़ क्लब के निकास-द्वार को पाँव से धकेलते हुए वह लड़खड़ाता हुआ बाहर निकला। झट दोनों हाथ गर्म पतलून की जेबों के अस्तर छूने लगे।
बरामदे में रिक्शा खड़ी थी। उसकी डबल सीट पर पतली-सी चादर मुँह तक ढाँपे चालक गठरी-सा बना लेटा था। घुटने पेट में घुसे थे।
रिक्षा देखकर उसका चेहरा चमक उठा।
“खारी बावली चलेगा…?” वह रिक्शावाले के समीप पहुँचा।
उधर से चुप्पी रही।
“चल, दो रुपए दे देंगे।” युवक ने उसके अंतस को कुरेदा।
“दो रुपैया से जियादा आराम की जरूरत है हमका।”
“साले! पेट भर गया लगता है…” नशे में बुदबुदाता हुआ जैसे ही वह युवक आगे बढ़ा…
तड़ा…ऽ…क!!! रिक्शेवाले का भारी हाथ उसके गाल पर पड़ा।
क्षणभर को युवक का नशा हिरन हो गया। वह अवाक्-सा खड़ा उसके मुँह की ओर देख रहा था।
रिक्शावाला सीना फुलाए उसके सामने खड़ा था।

रुदन
अर्से से बीमार पति को एक रात धरती पर उतार लिया गया। सारा परिवार रोने-पीटने लगा था। नीरा को गहरा सदमा पहुँचा था। वह जड़ हो गई। उसकी रुलाई नहीं फूट रही थी। प्रतिदिन वह गीता का पाठ करती थी, वह शायद इसी का प्रभाव रहा हो।
सियापे के मध्य दूर कोने में बैठी सास-ननद उसे सुनाते हुए बत्तियाने लगी थीं—
“रोयेगी क्यों? इसकी तो मुराद पूरी हो गयी!” वे सिसक रही थीं।
“पीहर में जाकर मौज उड़ाएगी, रोये इसकी जूती! इसके मन में तो लड्डू फूट रहे हैं।”
“इसका क्या, दूसरा कर लेगी। राँड तो वो जिसका मर जाए भाई…” ननद ने घृणित स्वर में कहा।
अभी बात पूरी भी नहीं हुई थी, नीरा का हृदय फटने लगा और वह दहाड़ मार-मारकर रोने लगी।
अब सास-ननद के साथ सारा मोहल्ला उसे ढाढ़स बँधा रहा था।

बंद दरवाज़ा
उसके शरीर पर फटी-पुरानी मर्दानी कमीज़ थी जो अपना असली रंग खो चुकी थी। उसकी तरह मटमैली ही थी, बस। उसके धूल से भरे मैले पाँवों पर, पसीना आने से कुछ आधुनिक चित्र-से बन गए थे। मन्दिर के मुख्य-द्वार पर खड़ी वह बड़े चाव से नाक की गन्दगी निकाल-निकालकर फेंक रही थी।
“यहाँ क्यों खड़ी है हरामजादी! कोई मन्दिर में आयेगा तो तेरी गन्दी परछाई उस पर पड़ेगी। चल दूर हो यहाँ से…।” पण्डित की क्रोध उगलती लाल आँखें देख वह आठ वर्षीया बच्ची सहम गयी थी।
“मेरी माँ अन्दर गई है।” उसका डरा-सा स्वर बस इतना ही उभर पाया था।
पण्डितजी की लाल आँखें खुमार से मुँदने लगी थीं।
“अच्छा, कोई बात नहीं। यहीं पर खेल ले।” कहते हुए पण्डित तेज कदमों से अन्दर की ओर चल पड़ा।
दरवाज़ा खटाक-से बंद हुआ।
नन्हीं बच्ची बंद दरवाजे को देर तक निहारती रही।

मधुदीप : संक्षिप्त परिचय
मूल नाम: महावीर प्रसाद
जन्म : 1 मई 1950 को हरियाणा के गाँव दुजाना में
शिक्षा: कला स्नातक
मौलिक कृतियाँ: 7 उपन्यास, 1 कहानी संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह व 1 बाल उपन्यास
संपादित कृतियाँ: 2 लघुकथा संकलन तथा 3 कहानी संकलन
हिमप्रस्थ पुरस्कार से सम्मानित
सम्प्रति: निदेशक, दिशा प्रकाशन
सम्पर्क: 138/16, त्रिनगर, दिल्ली-110035
मोबाइल: 9312400709