Saturday, 30 May 2009

लघुकथा-लेखन में राजस्थान का योगदान

-->
महेन्द्र सिंह महलान
पत्र-पत्रिकाएँ
नवरी 1971 में मोहन राजेश ने ब्यावर से प्रकाशित पवित्रा में चार लघुकथाएँ प्रकाशित करना आरम्भ किया। रावतभाटा(वाया कोटा) से 1972 में भगीरथ व रमेश जैन ने लघुकथा को समर्पित देश की प्रथम पत्रिका अतिरिक्त में न केवल प्रकाशित किया बल्कि एक सार्थक दिशा भी दी। लघुकथा को व्यवस्थित रूप देने में इस पत्रिका का बहुत योगदान रहा। ब्यावर से ही मोहन राजेश के संपादकत्व में 1974 में डिक्टेटर साप्ताहिक का दीपावली के अवसर पर अच्छा विशेषांक प्रकाशित हुआ। इससे लघुकथा की पहचान और भी स्पष्ट हो गई। इसी पत्रिका का दूसरा विशेषांक 12 अगस्त, 1976 को भँवर शर्मा और सत्य शुचि के संपादकत्व में आया। यह अंक भी उपयोगी सिद्ध हुआ। जयपुर से प्रकाशित अग्रगामी(संपादक:जुगल किशोर टकसाली) का एक लघुकथा-विशेषांक जून 1977 में कृष्ण कमलेश के अतिथि-संपादन में प्रकाशित हुआ जो बहुत ही चर्चित व उल्लेखनीय रहा। इसमें 29 लघुकथाएँ थीं तथा लघुकथा विषय पर केन्द्रित 3 लेख भी सम्मिलित थे। इस अंक की प्राय: सभी लघुकथाएँ श्रेष्ठता की गिनती में आती हैं।
प्रभाकर आर्य के संपादन में हिंडौन सिटी से प्रकाशित होने वाली पत्रिका युगदाह का भारी-भरकम विशेषांक कृष्ण कमलेश के अतिथि-संपादकत्व में सन 1979 में निकला। इसमें मुलम्मा, बड़ा आदमी, संवेदनशील, हिस्से का दूध, स्थगन, नियति, नसीहत आदि लघुकथाएँ विशेष रूप से अपने तेवर के कारण प्रभावित करती हैं। भगीरथ व पुष्पलता कश्यप के लघुकथा-विषयक लेख इस अंक की विशेष उपलब्धि हैं। ये लघुकथा के विकास और स्वरूप पर पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। यह देश का प्रथम लघुकथा-विशेषांक है जिसमें लघुकथारों का सचित्र परिचय प्रकाशित किया गया।
ए हुसैन और क़मर मेवाड़ी के संपादन में कांकरोली से प्रकाशित सम्बोधन ने 1982 के अपने अंक में प्रतियोगिता में पुरस्कृत लघुकथाएँ प्रकाशित कीं। भारत, प्रत्याक्रमण, खेल जैसी कालजयी लघुकथाएँ इसी अंक की उपलब्धि हैं। वर्ष 1988 में सम्बोधन ने लघुकथा-विशेषांक भी प्रकाशित किया जिसमें मनुष्य के चरित्र-पतन, घनीभूत होती कठिनाइयों, मुखौटाग्रस्त तथा अवसरवादी एवं पलायनवादी प्रवृत्तियों को अनावृत्त करने वाली सशक्त लघुकथाएँ, सटीक समीक्षाएँ, स्तरीय बातचीत व आलेख थे।
प्रताप सिंह शेखावत के संपादन में जयपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका कर्म चिन्तन का जनवरी 1983 में लघुकथा-प्रतियोगितांक प्रकाशित हुआ। इसमें गिरोह का आदमी(कालीचरण प्रेमी), आउट(कमल चोपड़ा), पेट पर लात(विक्रम सोनी), आटा और जिस्म(सतीश राठी), थूक सने चेहरे(महेन्द्र सिंह महलान), कुत्ता-पाठ एक(राजकुमार सिंह) जैसी यादगार रचनाएँ इस अंक की देन हैं। कर्म चिन्तन का जनवरी 1985 का अंक लघुकथा-विशेषांक के रूप में निकला। सम्बोधनकर्म चिन्तन के ऊपर लिखित अंक बहुत चर्चित एवं प्रशंसित रहे। इनके साथ ही युवा हस्ताक्षर(हिण्डौन सिटी) तथा लहर(अजमेर) के लघुकथांक भी कम महत्वपूर्ण नहीं थे।
वर्ष 1987 में हनुमानगढ़ से महेश संतुष्ट के संपादन में राजस्थान साहित्यिक का एक लघुकथा-विशेषांक तथा एक मिला-जुला साहित्यांक छपा। लघुकथांक में राष्ट्रीय व राज्य स्तर के कुछ चोटी के लेखकों की रचनाओं के अलावा श्रीगंगानगर जिले के कई उदीयमान लेखकों की रचनाएँ भी थीं। जिले के लघुकथाकारों को प्रकाश में लाने की दृष्टि से इन दोनों ही अंकों की उपयोगिता विशेष परिलक्षित होती है। वर्ष 1979 में मोहन योगी व महेन्द्र सिंह महलान के संपादकत्व में राजस्थान सावित्री के अंकों में रमेश सिंह राणावत व श्रीराम मीणा की व्यंग्य-प्रधान तीखी लघुकथाएँ थीं। श्रीगंगानगर से स्नेह इन्द्र गोयल के संपादन में प्रकाशित होने वाले स्नेहिल संदेश में लगातार श्रेष्ठ रचनाएँ देखने में आती रही हैं। श्रीगंगानगर से ही छपने वाले लोक सम्मत, दैनिक प्रताप, नियति आदि में भी लघुकथा पर उपयोगी सामग्री प्रकाशित होती रही है।
जयपुर से प्रकाशित होने वाली प्रदेश की मुख्य साप्ताहिकी इतवारी पत्रिका ने शुरू-शुरू में यद्यपि लघुकथाओं से परहेज किया, लेकिन 1978-79 में पहली बार इस पत्रिका ने पुष्पलता कश्यप की लघुकथाएँ धारावाहिक रूप से 11-11 की संख्या में सचित्र छपीं। ये लघुकथाएँ अत्याधिक चर्चित व प्रशंसित हुईं और इन्होंने राजस्थान प्रदेश के पत्रों में छाई जड़ता को तोड़ने व इस विधा को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण कार्य किया। जयपुर से प्रकाशित दैनिक नवज्योति में भी स्तरीय लघुकथाएँ छपती रहीं हैं।
राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर की पत्रिका मधुमती में श्रेष्ठ लघुकथाएँ छपती रही हैं। इस अकादमी और युगधारा के संयुक्त तत्वावधान में नवन्बर 1992 में अकादमी के सभागार में एक लघुकथा-संगोष्ठी का आयोजन किया गया था।
इन पत्र-पत्रिकाओं के अलावा अलवर विचार टाइम्स, विवेक विकास, सूर्यमुखी, निरन्तर कालबोध, प्रताप केसरी, तटस्थ, आसंगिनी, परिदृष्टा, लोक शासन, प्रभासिका, बात तो चुभेगी, युवादृष्टि, राजस्थान शिक्षक, शिविरा, लोक संपर्क, श्रमोपदेशक, अपूर्ण, राही, जगमग दीप ज्योति, राजस्थान विकास, विश्वम्भरा, वरदा, गुलजस्ता, परिणय संदेश, वातायन, सीमा संदेश, राजस्थान सुजस तथा शेष इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं ने भी लघुकथा के प्रकाशन एवं प्रचार-प्रसार में सहयोग देकर राजस्थान की साहित्यिक एकजुटता का परिचय दिया है।
राजस्थानी भाषा की पत्र-पत्रिकाएँ
राजस्थानी भाषा में लघुकथा का अंकुरण किशोर कल्पनाकांत द्वारा संपादित ओलमो के सन 1954 में प्रकाशित प्रवेशांक में छपी मुरलीधर व्यास की प्रभु से धरम तथा ललित कुमार की आवाजभेद शीर्षक लघुकथाओं के रूप में दिखाई देता है। यद्यपि इन लघुकथाओं में लघुकथा के सभी आधुनिक गुण मौजूद नहीं हैं, फिर भी इन्हें लघुकथा की श्रेणी में रखने से नकारा नहीं जा सकता। इस अंक में ये रचनाएँ नानकड़ी कांणी यानी छोटी कहानी स्तंभ के अन्तर्गत प्रकाशित हुई थीं। डॉ रावत सारस्वत द्वारा संपादित मरुवाणी(अंक 2, 1956) में शान्ति शर्मा की रचना बिचारो दिनकर लघुकथा के रूप में दृष्टिगत है। 1956 में ही अद्भुत शास्त्री द्वारा संपादित कुरजा-1 में लघुकथा स्तंभ के अन्तर्गत श्रीलाल नथमल जोशी की रचना गोथळी रा लाड छपी। अगस्त 1973 में रमेश बतरा के संपादन में तारिका का लघुकथा-विशेषाँक प्रकाशित हुआ। विविध भाषाओं के इस विशेषांक में राजस्थानी भाषा की लघुकथाएँ भी थीं।
राजस्थली त्रैमासिक के सितम्बर-दिसम्बर 1980 अंक को उसके संपादक श्याम महर्षि ने लघुकथांक के रूप में प्रकाशित किया। इसमें हिन्दी और राजस्थानी भाषा की लघुकथाएँ राजस्थानी में छापी गई थीं। इनमें मुकुट सक्सेना की धर्मालु, श्रीकांत मंजुल की अक्कलवान एवं भगीरथ की बगलो भगत उल्लेखनीय रहीं। बीकानेर से प्रकाशित होने वाली राजस्थानी भाषा एवं साहित्य संगम की पत्रिका जागती जोत में भी लघुकथाएँ छपती रही हैं। रूपराम आशादीप के संपादकत्व में श्रीगंगानगर से प्रकाशित त्रैमासिक गोरबंद के 1988-89 के संयुक्तांक में प्रदीप नील, सेवासदन मनोज, मदन अरोड़ा, जया नर्गिस, निरंजन जमींदार, शराफत अली खान तथा महेन्द्र सिंह महलान की हिन्दी लघुकथाओं के राजस्थानी भाषा में सुन्दर अनुवाद देखने को मिलते हैं।
जोधपुर से प्रकाशित मासिक माणक राजस्थानी भाषा की व्यापक प्रसार-प्रचार वाली एक उत्कृष्टपत्रिका है। इसमें लघुकथा स्तम्भ के अन्तर्गत प्राय: स्तरीय लघुकथाएँ प्रकाशित होती रही हैं।
(शेष आगामी अंक में…)

Tuesday, 28 April 2009

जाना विष्णु प्रभाकर का

-->
विष्णुजी के देहावसान की सूचना पूरी तरह से चौंकाने वाली रही। उनकी गत चार जन्मदिन-पार्टियों में तो लगातार उपस्थित रहने का अवसर मिलता रहा। पिछ्ले महीनों में कई बार सोचा कि जाकर एक दिन उनका दर्शन कर आऊँ। दो-चार दिन पहले ही शकुन्तला किरण से बातचीत के दौरान भी उनको देखकर आने का जिक्र हुआ था, लेकिन… मेरा आलस्य, मेरी संवेदनहीनता, मेरा आलस्य। न इनका कोई अंत है और न इनके द्वारा मिलने वाले हर प्रकार के कष्टों का। कष्टकारक हैं, फिर भी ये छूट नहीं पाते, पता नहीं क्यों? यों पता तो है कि ये छूट क्यों नहीं पाते, फिर भी कहा यही जाता है कि पता नहीं क्यों? बात दरअसल यह है कि आलसी आदमी सृष्टि में सिर्फ और सिर्फ एक ही व्यक्ति को प्यार करता है, और वह आदमी कोई दूसरा नहीं वह खुद ही होता है। प्यार करने के मामले में, वैसे तो, एक ही लाइन में कहूँ तो यह कि हर आदमी सबसे ज्यादा खुद को प्यार करता है, किसी और को नहीं। केवल खुद से प्यार न होता तो विष्णुजी को देखने जा पाना इतना दुष्कर तो नहीं था। खुद से प्यार किया इसीलिए तो दिल्ली में रहते हुए भी उनका अंतिम दर्शन तक न कर पाने का दण्ड मिला। निधन का समाचार भी शिमला से मिलाबड़े भाई बद्री सिंह भाटिया जी के द्वारा। विष्णुजी की चिता को एक लकड़ी उनकी ओर से सौंपने का अनुरोध तक मैं पूरा नहीं कर पाया, यह भी कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है। शिमला में बैठा उनका प्रशंसक दिल्ली में बैठे अपने छोटे भाई से इतनी अपेक्षा तो कर ही सकता है।…सिर्फ अपेक्षा।
चिता को अंतिम समिधा सौंपने का सौभाग्य कविवर त्रिलोचन शास्त्रीजी ने अवश्य प्रदान किया था। यमुना विहार में उनके प्रवास के दौरान उनके मुख से जितनी बातें सुनीं, उन्हें कलमबद्ध करना तुरंत आसान नहीं रहा तो बाद में कैसे रहता। उनके सान्निध्य में कुछ दिनों तक कुछेक घण्टे बिताए, वाग्देवी की यही कृपा क्या कम है?
हालाँकि लगभग एक साल बीत चुका; फिर भी, ज्यादा दिन नहीं हुए ऐसा लगता है। जून 2008 के दूसरे सप्ताह की बात है। श्रीयुत उमेश चन्द्र अग्रवालजी(स्वामी:आलेख प्रकाशन, दिल्ली) से आदरणीय विष्णुजी के जन्मदिन (21 जून) पर उनके निवास पर जाने के बारे में बात हुई तो उन्होंने अपनी रजामंदी दे दी। उसके बाद एक दिन फोन आया कि आदरणीय से रा यात्रीजी भी विष्णुजी के दर्शनार्थ जाने के इच्छुक हैं, लेकिन भीड़-भाड़ से बचने और आराम से बातें करने की दृष्टि से उनकी सलाह है कि 21 के बजाय 20 को चला जाए। मुझे इसमें भला क्या एतराज हो सकता था। होता भी तो यात्रीजी केवल मेरे न जाने की वजह से रुक जाने वाले व्यक्ति नहीं थे। मुझे अच्छा ही लगा कि इस बार यात्रीजी भी साथ होंगे। मैंने हाँ कह दी।
20 जून 2008 को हम तीन व्यक्ति(सर्वश्री से रा यात्री, उमेश चन्द्र अग्रवाल और मैं यानी बलराम अग्रवाल) शाहदरा के मेट्रो रेल स्टेशन पर मिले। वहीं पर मालूम चला कि अजित कुमारजी का निवास कोहाट मेट्रो स्टेशन के नजदीक ही है और उनसे भी भेंट करने आने के बारे में यात्रीजी की बात हो गई है। यात्रीजी ने कहा—“बलराम, कोहाट उतरकर पहले अजित कुमार से भेंट करेंगे, फिर विष्णुजी के यहाँ जाएँगे।
जी। मैंने कहा। यात्रीजी जैसे व्यक्तित्व की कृपा से ही भाई स्वयं प्रकाश से उनके भोपाल निवास पर भेंट हुई थी और लघुकथा-कहानी पर बड़ी सार्थक चर्चा हुई थी। अब उन्हीं के कारण अजित कुमारजी से भेंट करने का अवसर मिलने वाला था।
कोहाट उतरकर हम अजित कुमारजी के निवास पर पहुँचे। वह यात्रीजी का इंतजार कर रहे थे। अच्छी गर्मजोशी के साथ उन्होंने हमारा स्वागत किया। अपने पुराने दिनों के बहुत-से ऊँचे-नीचे संस्मरण उन्होंने सुनाए। तार-सप्तक की कवयित्री अपनी बहन सुश्री कीर्ति चौधरी, जिनका उन्हीं दिनों लंदन में देहांत हुआ था, को याद करके आँखें नम कीं। कहा कि पति-पत्नी दोनों की शारीरिक अक्षमता के चलते अब कहीं जाया-आया नहीं जा सकता। व्यस्त और कष्टभरी दिनचर्या के बारे में बताया। बच्चनजी(हरिवंशराय) के साथ बिताए दिनो के संस्मरणों पर केन्द्रित ज्ञानपीठ से आने वाली उस पुस्तक के बारे में बताया जो अब आ चुकी है। दिल्ली विश्वविद्यालय में अपनी नियुक्ति के पीछे की राजनीति का खुलासा किया और एक खास बिन्दु को याद करके अफसोस भी जाहिर किया। गरज यह कि उन्होंने हर बात खुले दिल से की। मैं उनके सामने नया व्यक्ति था, लेकिन कोई संकोच, कोई छिपाव उन्होंने नहीं बरता।
और उस समय, जब यात्रीजी ने यह बताकर कि हमें अब विष्णुजी के घर भी जाना है, वहाँ से उठ खड़े होने का प्रयत्न किया तो अजित कुमारजी ने अनुरोध किया कि हम अगर दस-पन्द्रह मिनट और रुक सकें तो वह भी इस गंगा में डुबकी लगाने के इच्छुक हैं। हृदय की गहराई से उन्होंने कहा कि वह अनेक बार विष्णुजी से भेंट करने के लिए जाने के बारे में सोचते हैं, लेकिन जा नहीं पाते।
अब, आप लोगों का सान्निध्य मिल रहा है तो मैं भी हो आऊँगा। वह बोले,मिसेज लौटकर आती ही होंगी, उसी गाड़ी में हम चले चलेंगे।
यह अनुरोध किसी भी तरह टाल सकने वाला नहीं था। हम पुन: बैठ गए।
गाड़ी आ गई। हम लोग बैठे और विष्णुजी के निवास की ओर चल दिए।
विष्णुजी का महाराणा एन्क्लेव, पीतमपुरा लगभग वहीं रहने वाले अजित कुमारजी और उनके ड्राइवर के लिए भी बहुत आसान नहीं रहा। रास्ते में एक-दो बार पूछताछ करनी ही पड़ी। मैं पिछले वर्ष भी यहाँ आ चुका था, लेकिन इस बार भी विष्णुजी के निवास की ओर ले जाने वाले रास्तों से खुद को उतना ही अनजान पाया जितना कि पिछली या कहूँ कि पहली बार में पाया था। बहरहाल, ड्राइवर काफी समझदार था और एक ही बार की पूछताछ में सारे मोड़ समझ गया। दोबारा किसी से कुछ भी पूछे बिना उसने हमें विष्णुजी के निवास के बाहर उतार दिया।
हम अन्दर दाखिल हुए। सबसे आगे यात्रीजी और पीछे-पीछे हम सब। अनिता दीदी (विष्णुजी की बड़ी बेटी) वहीं पर थीं। वह बहुत आत्मीय हैं। उनकी मुस्कराहट मुझे विष्णुजी की सौम्यता की याद दिला देती है।
विष्णुजी शैय्या पर लेटे हुए थे, लेकिन जाग रहे थे। हम सब ने लगभग एक साथ ही उनका अभिवादन किया।
नमस्कार…नमस्कार…ेटे-लेटे ही हाथों को जोड़कर अभिवादन को स्वीकार करते विष्णुजी ने कहा,बहुत दिनों बाद कोई साहित्यकार मिलने आया है।
उनका यह वाक्य सुनते ही मुझे कुछ ही दिनों पहले जनसत्ता में छपा भाई प्रेमपाल शर्मा का वह लेख याद हो आया, जिसमें विष्णुजी की इस मर्मान्तक पीड़ा को स्वर दिया गया था और जिस पर लम्बी चर्चा हुई थी। उस चर्चा में किन्हीं अति-विद्वान महाशय ने यहाँ तक वमन किया था कि साहित्यकार खुद जनता के बीच नहीं जाते हैं अत: जनता के उनके पास न आने का उन्हें अफसोस नहीं होना चाहिए। उन महाशय को यह ख्याल ही नहीं रहा कि चर्चा विष्णुजी के बारे थी। उन विष्णुजी के बारे में, जो थे ही जनता के बीच के लेखक।
इस दौरान यात्रीजी विष्णुजी के समीप बैठकर यात्रीजी ने गहन आत्मीयता के साथ उनका दायाँ हाथ अपने हाथ में थाम लिया था। बिल्कुल इस अन्दाज में जैसेकि विष्णुजी के शारीरिक कष्ट स्वयं उनके हों और जैसेकि उनका वश चले तो विष्णुजी को वे कोई कष्ट न झेलने दें।
उससे कुछ ही दिन पहले अपने निवास के बरामदे में संतुलन बिगड़कर गिर जाने की वजह से विष्णुजी के कूल्हे की हड्डी में फ्रेक्चर आ गया था। इसी कारण उन्हें लेटे रहना पड़ रहा था।
जितनी देर हमने विष्णुजी से दो-चार बातें कीं, उतनी देर में आ0 भाभीजी(विष्णुजी की पुत्र-वधू, अतुल प्रभाकर की पत्नी) हम लोगों के लिए चाय-आदि ले आईं। हमने सबसे पहले नाश्ते की प्लेट्स में रखे स्वीट-पीसेज़ को चम्मच से काटकर एक दिन पहले ही विष्णुजी के जन्मदिन का केक काटने की औपचारिकता पूरी की और विष्णुजी को जन्मदिन की बधाई दी।
ईश्वर करे कि आप सौ बरस जिएँ। हममें से अधिकांश ने कहा।
यह बेहद औपचारिक दुआ थी। हिन्दी भवन में मनाये गए उनके जन्मदिन के एक समारोह में बोलते हुए प्रबुद्ध पत्रकार प्रभाष जोशीजी ने मंच से बोलते हुए कामना की थी कि—“मेरी इच्छा है कि विष्णुजी शतक मारें, शतक-वीर कहलाएँ…शतक से भी आगे जीएँ।
यह सम्भवत: 2006 की बात है। विष्णुजी ने उस वर्ष उम्र के 94 वर्ष पूरे किए थे। इतनी उम्र का व्यक्ति ही बता सकता है कि यहाँ पहुँचने के बाद उम्र का एक-एक रन कितना भयावह होता है। अगर प्रभाषजी की दृष्टि से ही देखा जाए तो एक बात पक्के तौर पर कही जा सकती है। यह कि विष्णुजी को वक्त ने रिटायर्ड-हर्ट करने की बहुत कोशिश की, लेकिन वे क्रीज से हटे नहीं, डटे रहे। उन्होंने पूरा प्रयत्न किया कि वे प्रभाषजी जैसे प्रखर क्रिकेट-दृष्टियुक्त हितैषी की कामना का मान रखें; लेकिन वह रन-आउट हो गए। अपना 97वाँ रन पूरा करने हेतु क्रीज में पहुँचने से मात्र 71 दिन पहले वक्त ने उनकी गिल्लियाँ बिखेर दीं। हमारी ओर से खेलता लगने वाला वक्त एकाएक कब विरोधी टीम का खिलाड़ी बन बैठेगा, कोई नहीं जानता।
यद्यपि 2006 में भी विष्णुजी पूर्णत: स्वस्थ नहीं थे, लेकिन चल-फिर लेते थे। सुनाई कम देने लगा था, लेकिन बोलने में कठिनाई का अनुभव नहीं करते थे। परन्तु 2008 में हमारे मिलने जाने के समय वे बहुत अस्वस्थ थे। हालाँकि उस समय भी उन्होंने कहा था कि बोलने में उन्हें कोई परेशानी नहीं है, मस्तिष्क ठीक-ठाक काम कर रहा है; लेकिन शरीर के दूसरे-दूसरे अवयव थक गये हैं। शायद इसीलिए उस समय उनके द्वारा आयु का शतक पूरा करने की हमारी कामना मुझे बहुत अव्यवहारिक महसूस हुई। घर का कोई व्यक्ति, विशेषत: वह जिसने 70-80-90 साल पूरे कर लिए हों, जब खाट पकड़ लेता है, तब उसके तीमारदारों को कैसा महसूस होता है यह बताने की आवश्यकता नहीं है। किसी भी व्यक्ति की उपयोगिता उसके प्रोडक्टिव, उसके रचनाशील रहने तक ही रहती है। सक्रिय रचनाशीलता का ह्रास यानी एक व्यक्ति के रूप में लेखकीय उपयोगिता का, उसके बाजार-मूल्य का ह्रास। गत अनेक वर्षों में हमने परलोक सिधार गए अनेक साहित्यकारों की गति देखी है। पता नहीं कितने विमर्शों में उलझे हम सम्मान शब्द के अर्थ भूल ही गए हैं।
जनगाथा के इस अंक में राजस्थान की लघुकथा-यात्रा पर केन्द्रित सामग्री को रोककर श्रद्धेय विष्णु प्रभाकर को श्रद्धांजलिस्वरूप उनकी कुछ बाल-मन की लघुकथाएँ प्रस्तुत हैं।
--बलराम अग्रवाल
विष्णु प्रभाकर की बाल-मन की लघुकथाएँ
शैशव
र लौटकर वह देखता है कि उसकी मरणासन्न पत्नी के पलंग के पास उसका तीन वर्षीय पौत्र ध्यानस्थ बैठा कह रहा है, हे भगवान! मेरी अम्मा को अच्छा कर दो।
इस दृश्य पर वह चकित था और उसकी पत्नी तरल।
दो क्षण बाद वह दवा देने उठा तो उस बालक ने कहा, मैं दूँगा दवा अम्मा को।
पत्नी और-भी गदगद हो आयी। बोली, अब मैं अच्छी हो जाऊँगी।
लेकिन प्रभु ने बालक की गुहार अनसुनी कर दी। पत्नी अच्छी नहीं हुई। उसकी शव-यात्रा में बालक ने उसपर चँवर ढुलाया और घण्टा बजाया। कई दोन तक कहता रहा, चँवर ढुलाकर, घण्टी बजाकर अम्मा को भगवान को दे आए। वह फिर आवेंगी।
कुछ दिन बाद बालक के पिता बीमार हो गए। बालक मस्ती में शोर मचाता घूम रहा था। उसने कहा, बेटे, शोर मत मचाओ, तुम्हारे पापा बीमार हैं।
बालक ने तुरन्त सहज-भाव से पूछा, वैसे ही बीमार हैं, जैसे अम्मा बीमार थीं? उन्हें भी भगवान के पास ले जावेंगे, घण्टी बजाकर, चँवर ढुलाकर।
जैसे पृथ्वी डोली हो, वह सहम आया। चाहा कि एक थप्पड़ जड़ दे उसके गाल पर; लेकिन तभी उसकी दृष्टि बालक की आँखों पर जाकर अटक गयी। वहाँ तो शैशव बैठा मुस्करा रहा था, वीतराग-नि:संग।
तो अच्छा
हुत पुरानी बात है। उसका बच्चा कई बार उससे क्रिकेट खेलने का सामान लाने के लिए कह चुका था। वह बार-बार उसको टाल देता था। एक दिन जब वह काम कर रहा था तो वह बालक उसके पास आया और क्रोध में भरकर बोला,मैं कई दिन से तुमसे खेलने का सामान लाने के लिए कह रहा हूँ, लेकिन तुम लाते नहीं।
उसने सहसा बालक की ओर देखा और कहा,हाँ, मैं ला नहीं सका।
क्यों नहीं ला सके?
क्योंकि पैसे नहीं हैं।
बालक और भी उग्र होकर बोला,सारा दिन मेज पर बैठे-बैठे लिखते रहते हो, इतने पैसे भी नहीं कमा सकते कि मेरे लिए खेल का सामान ला सको?
उसने उदासीनता से कहा,हाँ, नहीं कमा सकता।
तो कितना कमा सकते हो?
उतना, जितने में अपना और तुम-सबका पेट भरा जा सके।
यह कहकर उसने बालक की ओर देखा कि वह और-भी उग्र हो उठेगा। लेकिन आश्चर्य, वह उतना ही शान्त हो आया और अपने स्वर में अत्यन्त करुणा भरकर बोला,तो अच्छा।
लेकिन बालक जितना शान्त हुआ, उसका पिता सहसा उतना ही अशान्त और उग्र हो उठा। उसका रोम-रोम जैसे उत्तेजित हो उठा हो। उसके जी में आया कि बालक का गला घोंट देइस दुष्ट का इतना साहस कि उससे सहानुभूति प्रकट करता है!
यह सब पलक मारते न मारते हो गया। जब उसे होश आया तो वह बालक जा चुका था। लेकिन वह इतना उद्विग्न हो उठा कि उस दिन कुछ काम न कर सका। उसका वह तो अच्छा उसके लिए चुनौती बन गया।
शैशव का भोलापन
पनी मेज पर बैठा लिखने में व्यस्त था। पास के कमरे में बच्चे खेल रहे थे। सहसा सुनता हूँ, मेरे भाई की पाँच वर्षीय बेटी मेरे छह वर्षीय बेटे से कह रही है,मैं तुमसे शादी करूँगी।
कर लेना। मेरे बेटे ने तुरन्त उत्तर दिया।
मैं कुछ सोच पाऊँ कि आठ वर्षीय बड़ा बेटा तुनककर बोल उठता है,कर लेना? कैसे कर लेना? तू नहीं कर सकता शादी।
मेरा छोटा बेटा भी भड़क उठता है, क्यों नहीं कर सकता? मैं करूँगा।
बड़ा बेटा सहसा बुजुर्ग हो उठा, देख, पिताजी ने अम्मा से शादी की है न?
हाँ, की है।
अम्मा का घर कहाँ हैइलाहाबाद। पिताजी यहाँ दिल्ली में रहते हैं। तभी उनकी शादी हुई। तुम दोनों तो एक ही घर में रहते हो। तुम्हारी शादी कैसे हो सकती है?
छोटा बेटा जैसे सोच में पड़ गया। दो क्षण सन्नाटा छाया रहा फिर वह मेरी भतीजी से कहता है,हाँ, यह शादी नहीं हो सकती। मैं नहीं करूँगा तुमसे शादी।
मैं साँस रोके भतीजी की प्रतिक्रिया की राह देखता हूँ कि जैसे तूफान आ जाता है। मेरी भतीजी चीख उठती है, कैसे नहीं करेगा शादी, तुझे करनी होगी…। और यह कहते-कहते अपने हाथ के खिलौने को मेरे छोटे बेटे के सिर पर दे मारती है और तीर की तरह भागती चली जाती है।
अब जो मेरी हँसी छूटती है तो मुझे यह भी पता नहीं रहता कि वे बच्चे भी जोर-जोर से हँस रहे हैं…हँसे जा रहे हैं।
शैशव की ज्यामितीतीन कोण
माँ समझा-समझाकर परेशान हो गई। उसके चार वर्षीय बेटे टिंकू की शरारतों का अन्त नहीं था। सन्ध्या को पिता लौटे तो उसने बेटे की शरारतों की कहानी सुनाते हुए कहा,हमारा बेटा बिगड़ता जा रहा है, उसे सँभालिए।
किसी कारणवश पिता उस समय स्वयं बहुत त्रस्त थे। पत्नी की शिकायत सुनकर वे एकाएक क्रोध से उबल उठे। आव देखा न ताव, तैड़-से एक थप्पड़ टिंकू के गाल पर जड़ दिया,बदतमीज, दिन पर दिन बिगड़ता जा रहा है।
टिंकू एकदम जोर से चीख उठा, लेकिन तभी सहसा उसकी दृष्टि पापा के हाथ पर गयी। पाया कि उसमें चोट लगी है और जोर थप्पड़ मारने के कारण उसमें से खून रिसने लगा है। तब रोते-रोते वह एकाएक बोल उठा, पापा, आप मुझे थप्पड़ न मारें। डण्डे से मारें।
बच्चे शरारती होते ही हैं, पर अंशु कुछ अधिक ही उत्पाती था। कभी तो उसका उत्पात सीमा लाँघ जाता। उसके ममी-पापा उसे खूब प्यार करते थे, पर जब उसकी शरारतें थमती ही नहीं थीं तो वे उसे पीट भी देते थे।
ऐसे ही अवसर पर एक दिन उसके पापा ने उसके गाल पर जोर-से दो थप्पड़ जड़ दिए। एक बार तो अंशु सहम गया, लेकिन दूसरे ही क्षण गाल पर हाथ रखे-रखे और रोते-रोते उसने कहर-भरी दृष्टि से पापा की ओर देखा और कहा, प्यार भी करते हो, मारते भी हो। हम नहीं बोलेंगे तुमसे। कुट्टी! कुट्टी!!
और वह भागा-भागा कमरे से बाहर निकल गया।
मण्टू अपनी दादी का बहुत प्यारा था। इसलिए मरते समय वे विशेष रूप से मण्टू के पिता से कह गयी थी, बच्चों डाँटना मत। प्यार से रखना।
मण्टू के पिता स्वयं भी मण्टू को कम प्यार नहीं करते, परन्तु जब मण्टू की शरारतें सीमा लाँघ जाती हैं तो विवश होकर खंग-हस्त हो उठते हैं। ऐसे ही एक दिन जब बहुत समझाने पर भी मण्टू ने शरारत करना बन्द नहीं किया तो उन्होंने खीझकर उसके गाल पर तड़ाक-तड़ाक से दो तमाचे जड़ दिए।
मण्टू तड़प उठा, पर दूसरे ही क्षण उसने आग्नेय नेत्रों से पिता की ओर देखा और चीखकर कहा, भगवान के पास जाते हुए अम्मा कह गयीं थींबच्चों को डाँटना मत, प्यार से रखना; और आप मुझे इतने जोर से मारते हैं। मैं अम्मा के पास चला जाऊँगा।
और वह चीख-चीख कर रो उठा।
मोहब्बत
गाँव के प्राइमरी स्कूल में वह मेरा सहपाठी था। मेरा सहपाठी था। मेरी उसके साथ विशेष रूप से छनती हो, ऐसा नहीं था। फिर भी, एकाएक वह घटना घट गई। ईद का दिन था। उस गाँव में ऐसा रिवाज था कि उस दिन हिन्दू लोग अपनी गाय-भैंसों का दूध मुसलमानों को बाँट देते थे। बहुत सवेरे काम समाप्त हो जाता था। हमारी गाय-भैंसों का दूध भी उस दिन बँट चुका था। तभी मैंने देखामेरा सहपाठी लोटा लिए चला आ रहा है। लोटा खाली था। मैंने पूछा,तुम्हें दूध नहीं मिला?
उसने उत्तर दिया,मुझे आने में देर हो गई। दूध सब बँट गया।
सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगा। मन में करुणा-सी पैदा हुई। करुणा तो उसे अब कहता हूँ, तब की उस अनुभूति को शब्द नहीं दे सकता। उम्र भी तो हम दोनों की यही नौ-एक साल की रही होगी। उस पर वह बहुत गरीब था। मैंने कहा, जरा रुको।
और मैं भागा-भागा अन्दर गया। अपनी माँ से सारी बातें कहीं। कहते-कहते स्वर कुछ भीग आता शायद। माँ ने मेरी ओर देखा। बोली,दूध तो बेटा सब खत्म हो गया। तुम दोनों भाइयों के लिए बचा रखा है, बस…
मैंने बिना सोचे तुरन्त कहा, वही दे दो।
माँ ने एक बार फिर मेरी ओर देखा। कुछ कहा भी, लेकिन अन्तत: वह दूध सईद को दे दिया। वह खुशी-खुशी चला गया। बात यहीं समाप्त हो जानी चाहिए थी। लेकिन जैसा कि रिवाज है, मुसलमान मित्र उस दिन सिवैयाँ बनाते हैं और अपने सब रिश्तेदारों और दोस्तों में बाँटते हैं। दोपहर को देखा कि सईद फिर हमारे दरवाजे पर खड़ा है! मैंने पूछा, क्या बात है सईद?
उसने भोलेपन-से जवाब दिया, सिवैयाँ बनाई थीं न, तुम्हारे लिए लाया हूँ।
मेरे चाचा पास ही खड़े थे। वे मुस्कराए। बोले, तुम्हारे घर की सिवैयाँ क्या हम खा सकते हैं? किसने दी हैं?
माँ भी वहीं खड़ी थीं। वह समझ गईं। बोलीं,बेटे, हम लोग तुम्हारी पकाई हुई सिवैयाँ नहीं खा सकते। तुम बहुत अच्छे हो। इन्हें वापिस ले जाओ।
सईद की कुछ भी समझ में नहीं आया। वह कभी मेरी ओर देखता, कभी मेरी माँ की ओर। माँ ने उसे फिर प्यार-से समझाया। अनबूझ-सा वह जाने के लिए मुड़ा, लेकिन न जाने क्या हुआ, कटोरा उसके हाथ से वहीं गिर पड़ा और सिवैयाँ चारों ओर बिखर गईं।
हठात मैंने सईद की ओर देखा। मुझे लगावे सिवैयाँ नहीं थीं, इन्सान की मोहब्बत थी जो मेरे दरवाजे पर पैरों से रौंदी जाने के लिए बिखरी पड़ी थी।
पिरीन पियारे पिराणनाथ
ह ग्यारह वर्ष का भी नहीं था, तब की बात है। उत्तर प्रदेश के एक प्रसिद्ध नगर में किसी नातेदार के पास ठहरा हुआ था। सड़क के एक किनारे उनकी बैठक थी। उस पार दुमंजिले पर कोई परिवार रहता था। उस परिवार की केवल स्त्री की याद है। कभी-कभी खिड़की से झाँकते देखता था। एक दिन इशारे से उसने उसे ऊपर बुलाया। आज उसकी जो मूर्ति उसके मस्तिष्क में उभरती है, वह इतनी ही है कि वह स्वस्थ थी। उसके गदराए हुए गालों पर निखार था और आँखों में थी चंचलता। बड़े प्यार-से उसने कहा,एक चिट्ठी पढ़ दोगे?
अब तक झिझक रहा था वह, लेकिन अपना गुण प्रकट करने का अवसर पाकर वह तुरन्त बोला, हाँ-हाँ, मुझे पढ़ना आता है।
वह मुस्कराई और अन्दर जाकर एक पत्र ले आई। किसी नारी के कच्चे अक्षरों में, लाइनदार कागज पर, दोनों ओर लिखा हुआ एक पत्र था। उस पिरीन पियारे पिराण्नाथ से शुरू होनेवाली चिट्ठी को पूरा पढ़ जाने के बाद भी उसकी कुछ समझ में नहीं आया। अनबूझ-सा उस स्त्री की ओर देखता खड़ा रहा। अत्यन्त गम्भीरता-से वह बोली,तुम्हारे मकान के बायीं ओर वाले घर में जो लड़की रहती है, उसी ने यह पत्र लिखा है।
उसने बुद्धिमान बनने का गौरव झेलते हुए कहा, किसको लिखा है?
वह बोली, तुम्हारे मकान के दाईं ओर जो मन्दिर है, उसी के पुजारी के लड़के को। लड़की उसे छिपे-छिपे प्यार करती है। दोनों बड़े…
उसने और क्या-क्या कहा, उस बालक को ठीक याद नहीं है। पर, कहकर वह एकटक इस तरह उसकी ओर देखने लगी थी जैसे कोई गहन रहस्य प्रकट कर रही हो और उस पत्र पर उसकी प्रतिक्रिया जानने को अतिशय उत्सुक हो। पर वह निपट अबोध गूँगा खड़ा ही रहा और वह धीरे-धीरे बोलती रही। फिर एकाएक रुककर बोली, कुछ खाओगे?
और वह एक कटोरे में कुछ ले आई। उसे अपने पास खींचकर पुचकारा भी। पर उसने खाया नहीं। लेकिन आज भी, लगभग 60 वर्ष बाद, वह चेहरा उसके मस्तिष्क में उसी तरह अंकित है। भरा हुआ मुख, गदराए कपोल, बड़ी-बड़ी चंचल आँखें और रहस्यमय आत्मीयता से पूर्ण गहन-गम्भीर वाणी। उस मूढ़ और गूँगे बालक को प्रेम का रहस्य समझाती हुई वह नारी या तो अत्यन्त भोली थी या अत्यन्त प्यासी।
वह बच्चा थोड़े ही न था
ह एक लेखक था। उसके कमरे में दिन-रात बिजली जलती थी। तभी प्रकाश मिलता था। एक दिन क्या हुआ कि बिजली रानी रूठ गई। वह परेशान हो उठा। पाँच घण्टे हो गए।
तभी ढाई वर्ष का शिशु उधर आ निकला। मस्तिष्क में एक विचार कौंध गया। बोला, बेटे, बिजली रानी रूठ गई है, जरा बुलाओ तो उसे।
शिशु ने सहज-भाव-से पुकारा, बिजली रानी, देर हो गई, जल्दी आओ।
और संयोग देखिए, वाक्य पूरा होते न होते वह कमरा बिजली के प्रकाश में नहा उठा।
पापा वायुयान चालक थे। उस दिन वे समय पर घर नहीं लौटे। एक घण्टा, दो घण्टा, पूरे चार घण्टे हो गए। रात हो आई। मम्मी परेशान हो उठी।
तभी छोटी बच्ची भी पापा को पूछती-पूछती वहाँ आ पहुँची। मम्मी बोली, बेटी, तुम्हारे पापा अभी तक नहीं आए। बहुत देर हो गई। तुम उन्हें पुकारो तो।
बच्ची ने सहज-भाव-से पुकारा, पापा, देर हो गई, अब आजाओ।
तभी दरवाजे की घण्टी बज उठी। पापा खड़े मुसकरा रहे थे।कैसा अदभुत संयोग था यह!
उसकी पत्नी बहुत दूर चली गई थी। वहाँजहाँ से डाक भी नहीं आती। एक दिन उसने सोचायदि मैं सच्चे मन से पुकारूँ, तो क्या वह लौट नहीं आएगी?
वह सचमुच उसे बहुत प्यार करता था और उसका अभाव उसे बहुत खलता था। इसलिए एक दिन उसने पुकार लिया, प्रिये, तुम लौट आओ, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पा रहा।
पर वह नहीं आई।
वह गणित से अतीत बच्चा थोड़े ही न था।

Tuesday, 24 March 2009

जनगाथा मार्च 2009

-->
लघुकथा-लेखन में राजस्थान का योगदान
महेन्द्र सिंह महलान

ठवें दशक के अन्त तक आधुनिक हिन्दी लघुकथा में सामान्य किस्म के संकलनों का दौर रहा है। इन संग्रहों की विषय-वस्तु व्यापक थी। इनमें विविध विषयों की विभिन्न लघुकथाएँ समाविष्ट होती थीं। नौवें दशक में लघुकथा सृजन एवं मूल्यांकन, विवेचन व विश्लेषण के स्तर पर अनेक पड़ावों को पार करती हुई जाँच-पड़ताल के सूक्ष्म, गहन व गंभीर गलियारों में उतर गई। विशिष्ट लघुकथा-संग्रहों के प्रकाशन का प्रारंभ इस दशक की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वर्ष 1983 में उत्तर प्रदेश से देश का पहला विशिष्ट लघुकथा-संकलन आतंक(सं नन्दल हितैषी, संयोजन धीरेन्द्र शर्मा) देखने में आया जो पुलिस संबंधी लघुकथाओं पर केन्द्रित था।
राजस्थान से प्रथम विशिष्ट लघुकथा-संकलन वर्ष 1987 में संघर्ष नाम से प्रकाशित हुआ जो विशुद्ध रूप से अखिल भारतीय लघुकथा-प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत रचनाओं पर केन्द्रित था। वर्ष 1989 में मंथन निकला जिसमें देश में पहली बार एकल-संग्रहों पर कार्य हुआ। इसी क्रम में सन 1998 में राजस्थान का लघुकथा-संसार पाठकों के हाथ में आया। यह राजस्थान के लघुकथा-कर्म की प्रथम प्रतिनिधि पुस्तक है।
प्रतियोगिताएँ
देश में लघुकथा-प्रतियोगिताओं का बोलबाला आठवें दशक के उत्तरार्द्ध में शुरू हो चुका था। लघुकथा-प्रतियोगिता आयोजित करने वाले प्रदेशों में हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा दिल्ली अग्रणी रहे हैं। इनमें भी राजस्थान लघुकथा-प्रतियोगिता का गढ़ ही रहा है। यहाँ प्रतियोगिताओं की शुरूआत वर्ष 1981 से होती है, जब युवा रचनाकार समिति, फेफाना(श्री गंगानगर) तथा आदर्श भारतीय साहित्यकार परिषद, जयपुर ने अखिल भारतीय लघुकथा-प्रतियोगिताएँ आयोजित कीं। इसके बाद सम्बोधन(कांकरोली), कर्मचिन्तन(जयपुर), गुलजस्ता रचना मंच, लोढ़सर(चुरू), साहित्यिक राजस्थान (हनुमानगढ़), युवा मंच(प्रतापगढ़), शेष(लुहारपुरा, जोधपुर), युवा रचनाकार समिति, फेफाना(अलवर) की लघुकथा-प्रतियोगिताएँ प्रमुख हैं। युवा रचनाकार समिति ने वर्ष 1981 से 1986 तक लगातार छह सफल प्रतियोगिताएँ आयोजित कर देश में कीर्तिमान स्थापित किया।
राजस्थान से आयोजित इन प्रतियोगिताओं में रचनाओं के मूल्यांकन हेतु डॉ सतीश दुबे, विक्रम सोनी, डॉ मदन केवलिया, डॉ आलमशाह खान, वेदव्यास, श्रीकांत मंजुल, मुकुट सक्सेना, डॉ अमर सिंह, लतीफ घोंघी व क़मर मेवाड़ी जैसे विषय के विद्वान, अनुभव व योग्यता की दृष्टि से निर्विवाद व्यक्तियों को निर्णायक-मण्डल में स्थान देकर लघुकथाकारों की पीठ थपथपा, पुरस्कारों-प्रमाणपत्रों के सम्मान द्वारा उत्कृष्ट लेखन का आदर कर, प्रतिभा पर स्वीकृति की मुहर लगाई गई तथा पुरस्कृत रचनाओं को सम्बोधन, कर्म-चिन्तन, लघु आघात, दर्शन मंथन जैसी पत्रिकाओं के अंकों-विशेषांकों तथा कल हमारा है, प्रेरणा, यथार्थ, सबूत-दर-सबूत, संघर्ष आदि लघुकथा-संकलनों में प्रकाशित कर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान प्रदान की गई।
शोध-कार्य
भारत में लघुकथा पर जिन्होंने शोध किया, उनमें डॉ शकुन्तला किरण, डॉ शमीम शर्मा, डॉ मंजु पाठक, डॉ अंजलि शर्मा, सुशील राजेश, ईश्वर चन्द्र, आशा पुष्प, नरेन्द्र प्रसाद नवीन, मणिप्रभा, विभा खरे, रामदुलार सिंह पराया आदि प्रमुख हैं।
देश में लघुकथा पर सर्वप्रथम शोध-उपाधि प्राप्त करने का श्रेय अजमेर की डॉ शकुन्तला किरण को है। इन्होंने हिन्दी लघुकथा विषय लेकर इसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर कार्य किया। जनवरी 1996 में डॉ मदन केवलिया(हिन्दी विभागाध्यक्ष, डूँगर कॉलेज, बीकानेर) के निर्देशन में श्रीमती नवनीत को हिन्दी लघुकथा साहित्य का समाज-शास्त्रीय अध्ययन विषय पर अजमेर विश्वविद्यालय से पी-एच डी की उपाधि प्रदान की गई।
मंचन
लघुकथाओं के मंचन की शुरूआत देश में सबसे पहले राजस्थान में ही हुई। 1 मई, 1981 को पहली बार रावतभाटा(कोटा) की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था पलाश के रंगकर्मियों ने रंगमंच के इतिहास में सर्वप्रथम लघुकथाओं के मंचन का साहसिक एवं सफल प्रयोग किया। मंचित लघुकथाओं में चित्रा मुद्गल की नसीहत, लक्ष्मीकांत वैष्णव की लोग, डॉ सतीश दुबे की फैसला तथा भगीरथ की ओवरटाइम थीं। इन सभी लघुकथाओं का मंचन भगीरथ के मुख्य निर्देशन में अरविंद श्रीवास्तव, चं प्र दायमा, श्याम विजय, वरुण परिहार, कु राज गुप्ता, लालबचन, कैलाश टेलर, हंसराज चौधरी एवं रमेश जैन द्वारा किया गया।
राजस्थान के बाद बिहार के धनबाद व रांची तथा हरियाणा के सिरसा में भी लघुकथा-मंचन का कार्य हुआ। मध्य प्रदेश(घरघोड़ा-रामगढ़) की सांस्कृतिक संस्था ने भी इसीप्रकार का एक आयोजन किया जिसमें देश के कुछ अन्य कथाकारों के साथ प्रदेश के महेन्द्र सिंह महलान की लघुकथा पहचान का मंचन किया गया।
(शेष आगामी अंक में…)

-->
लघुकथाएँ
बुढ़ापे का सहारा
डॉ रामकुमार घोटड़
माँ रोए जा रही थी और पापा अभी ड्यूटी से नहीं लौट पाये थे।
सोनू बिटिया, क्या कर लिया यह! मैं सब्जी लेने बाजार गई थी कि पलभर में यह सब हो गया। अपने छोटे भैया मोनू को बचाने के लिए तुमने अपना ध्यान ही नहीं रखा? बेटी, हमने तुम्हें फूलों की तरह पाला है, सहेजा है। तू हमारे आँगन की तुलसी है…तो क्या भगवान ने हमें कन्यादान करने का सौभाग्य ही नहीं दिया?…क्या किया तुमने यह…आखिर क्यों?…
मम्मी…! मोनू सो रहा था। अचानक न जाने कमरे में कैसे आग लग गई!! मोनू की चीख सुनकर जब मैं भागी, तब तक आग पूरे कमरे में फैल चुकी थी। जल्दी ही अन्दर घुसकर मैंने मोनू को बाहर की ओर धकेल दिया और लपटों ने मुझे घेर लिया…मैं बाहर न आ सकी। चीखें सुनकर जब पड़ोसी पहुँचे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी…मम्मी, आप तो हमेशा कहा करती हैं कि मोनू हमारे बुढ़ापे का सहारा है…मैं तो एक लड़की हूँ, पराया धन…एक न एक दिन मुझे आपसे विदा लेनी ही थीअगर मम्मी, मोनू को कुछ हो जाता तो आपके बुढ़ापे का सहारा कौन होता?… कहते-कहते वह शान्त हो गई और निस्तब्ध वातावरण को एक माँ की चीख ने कम्पायमान कर दिया।
बेटी का रोल
महेन्द्रसिंह महलान
बिंदिया खुश थी। बड़े बजट की फिल्म में एक छोटा-सा रोल जो मिल गया था उसे।
फिल्म अपार सफलता के साथ शहर में प्रदर्शित हुई। बिंदिया के घर मिलने-जुलने व बधाई देने वालों का ताँता बँध गया।
उसने अपने अनपढ़ और भोले-भाले पिता से फिल्म देखने का आग्रह किया। पिता बेटी की सफलता पर फूला नहीं समा रहा था। वह प्रसन्नता एवं गर्व के साथ बेटी के संग सिनेमा पहुँचा।
शो खत्म होने को आया। पिता व्यग्रतापूर्वक पूछ बैठा,बेटी, तुम्हारा रोल कब आएगा…?
तभी पर्दे पर एक बलात्कार-दृश्य उभरकर आया। कोई बदमाश किसी लड़की को हिंसक जानवर की भाँति नोंच-खसोट रहा था। लड़की के सभी वस्त्र फट गए थे और उसके सभी सुडौल अंग बाहर झाँकने लगे थे। बिंदिया खुशी से चिल्लाई, बाबा, ये ही है…ये ही है मेरा रोल…कितना रियल, कितना नेचुरल बन पड़ा है! देखो तो…
मगर बाबा न तो देख रहा था और न ही सुन रहा था। वह तो सिर्फ बेटी के चेहरे की ओर ताक रहा था।
रिश्ता
रत्नकुमार साँभरिया
प्रशासनिक सेवा में चयन हो जाने के बाद वह पहली बार अपने छोटे भाई राजदीप से मिलने के लिए गाँव से शहर आया था। फटी और उधड़ी कमीज, छोटी-सी एकलाँघी धोती, सिर पर मैला-कुचैला अँगोछा और पाँवों में टूटी चप्पलें। राजदीप ने जब अपने बड़े भैया को फटेहाल देखा तो उसे अपने आप पर ग्लानि हुई।
वह मन-ही-मन सोचने लगायह वही मेरे मसीहा भाई हैं, जिन्होंने दिन-रात मेहनत-मजदूरी करके मुझे पढ़ाया है, लिखाया है और नौकरी के काबिल बनाया है। कर्जा आज तक भी सिर पर है इनके।
दूसरे दिन, जब वह घर जाने लगा तो राजदीप ने अटैची खोलकर उसमें से अपने पुराने कुर्ता-कमीज निकालकर बाहर रख दिए। उसने अपनी पत्नी से सहज ही पूछ लिया—“भैया के पास कपड़े नहीं हैं, ये पुराने कुर्ता-कमीज हैं, दे देता हूँ।
सारा घर ही उठाकर दे दो न भैया को!…जब चाहेंगे, आ बैठेंगे। मत लगाओ मुँह। वह तुनक उठी।
लेकिन, फटे कपड़ों में इनका बदन दिखता है। शर्म आती है मुझे कि मैं इतना बड़ा अधिकारी हूँ और मेरे यह भाई हैं, जिनके तन पर पूरे कपड़े भी नहीं हैं।
जब कपड़े नहीं थे तो यहाँ आये ही क्यों? इनको इतना भी मालूम नहीं कि किसके घर कैसे जाया-आया जाता है?
ये कपड़े पुराने ही तो हैं, दे देते हैं भैया को। राजदीप ने आग्रहपूर्वक कहा।
उसकी पत्नी होंठ बिचकाकर बोली,रामू ने कितनी बार कहा हैबीबीजी, साब के पुराने कपड़े पड़े हों तो दे दो मुझे, मेरे कपड़े फट गए हैं। अगर उसे दे देंगे तो हाथ बढ़ा-बढ़ाकर काम करेगा। आखिर नौकर है अपना।
उसने कपड़े अपनी बगल में दबाए और उन्हें रखने के लिए दूसरे कमरे की ओर बढ़ गई।
सम्मान
दुर्गेश
क्यों भाई, तुम यहाँ क्यों खड़े हो?
हम अपने आदमी के पास आए हैं, तुम कौन होते हो पूछने वाले?
लेकिन तुम्हारे आने का फायदा क्या हुआ?
कैसे नहीं हुआ? हम इसके सम्मान में आए हैं।
सम्मान! यह कैसा सम्मान? यह तो बीमारी और भूख से जूझ रहा है और तुम सम्मान की बात कर रहे हो! पहले इसके लिए दवा और रोटी का प्रबंध करो। सम्मान तो बाद की बात है।
चुप रहो, बदतमीज! तुम्हें पता है, यह कौन हैं? यह हैं हमारे देश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीबज्र। अगर हम इनके कष्ट मिटा देंगे तो इन्हें कल्पना कैसे सूझेगी? कष्टों में ही तो लेखक की लेखनी में चमत्कार आता है। भोगा हुआ कष्ट ही तो साहित्य की मूल प्रेरणा है। क्या इनके लिए दवा-रोटी का प्रबंध करना एक साहित्यिक व्यक्तित्व को कुंठित करना नहीं होगा?
प्रणय
पुष्पलता कश्यप
ब वह ताड़ी चढ़ाकर देर रात गए घर लौटता, उसकी गुलबिया लालटेन के टिमटिमाते उजास में गठरी-सी बनी, उनींदी, इंतजार में देहरी पर बैठी-पसरी मिलती। किसी तरह थोड़ा-बहुत खाने के बाद नशे में जाग उठता उसकी हवस का पशु! वह उसे गुलाब की तरह उठा अपने सीने में भीच लेता। सूँघता, चूमता-चाटता और पंखुरियों की परत-दर-परत उघाड़कर देखता-मसलता-भोगता। झोंक में मरमराता जातामेरी रानी!…मेरे दिल के आमलेट!…और भी न जाने क्या-क्या कितना-कुछ। वह सब गुलबिया को कुछ समझ नहीं पड़ता।
सुबह उठता तो उसका नशा उतर चुका होता और खुमारी का अवशेषसिरदर्द बचा रहता। गुलबिया को अस्त-व्यस्त, विकृत अवस्था में देखकर उसे चिढ़ हो जाती।
देखो, दिन चढ़े तक महारानीजी कैसी लुढ़की-उथली पड़ी हैं, जैसे बाप से कोई रियासत पट्टे पर चढ़ाकर साथ लाई हो। कहते हुए एक लात जमा देता—“निर्लज्ज-बेहया-फूहड़, चल उठ! सूरज सर पर आ गया है और मलकाजी अभी तक सो रही हैं!…
और नोंक-झोंक, तू-तड़ाक से एक और दिन की शुरूआत हो जाती।
चपत-चपाती
अंजना अनिल
क्षा पाँच।
हिन्दी का पीरियड।
चपाती पर कुछ पंक्तियाँ कहो। मास्टर साहब बोले।
कई हाथ एक साथ उठ खड़े हुए, मगर उमेश निर्जीव-सा बैठा रहा।
नालायक! एक तू ही है जिसे कुछ नहीं आता…खड़ा हो और बता।
उमेश बेबस-सा उठा और नीची निगाहें किए बोल उठा—“मास्साब! माँ बीमार है…बरतन माँजने नहीं जा सकी…पैसे नहीं आए…आटा नहीं था। चपाती नहीं बनी… बोलते-बोलते उमेश रुआँसा हो उठा।
लड़के हँसने लगे।
चुप्…बहुत हो चुका…बैठ जा! मास्टर साहब ने तड़-से उसे एक चपत पिला दी।
राधा नाचेगी
गोविन्द गौड़
ड़की की शादी कर देने के बाद उसका परिवार आर्थिक-तंगी महसूस करने लगा था। परिवार का मुखिया स्वयं ही तो थाएकमात्र कमाने वाला। लड़की की शादी से पहले सब अपनी पसंद का खाते-पहनते थे; लेकिन अब वह स्वतन्त्रता कर्जे के कारण उनसे छिन गई थी। बच्चे लोग मुँह फुलाए रहने लगे थे। यहाँ तक कि उसकी पत्नी स्वयं भी स्थिति को समझे बिना बच्चों के अभावों को बार-बार गिनाने लगी थी।
उसने स्वयं अपने परिश्रम से अपने परिवार के लिए सब सामान्य सुविधाओं का जुगाड़ किया था। कुछ ज्यादा ही स्वाभिमानी होने के कारण, पैतृक-सम्पत्ति में से उसने कुछ नहीं लिया। कुछ अचल सम्पत्ति उसके नाम, उसके पिता ने कर भी दी तो भाइयों ने कब्जा कर लिया। तिस पर ॠण-स्वरूप भी उसे उन लोगों से सहयोग नहीं मिला था। सरकारी नौकरी में अध्यापक के पद पर था वह। वह जानता था कि इस तनावपूर्ण स्थिति के लिए उसकी पत्नी जिम्मेदार है; क्योंकि उसने बच्चों को मानसिक रूप से अभावग्रस्त-स्थिति से निपटने के लिए तैयार नहीं किया था।
एक दिन यह काम उसने स्वयं कर डाला। पत्नी समेत बच्चों को अपने पास बिठाया और उन्हें समझाने का प्रयास किया कि देखो, यह आर्थिक-तंगी सामयिक है। दो-एक साल बाद लड़के की शादी करेंगे ही। कुछ-न-कुछ भरपाई तो हो ही जाएगी। मेरे रिटायरमेंट में भी पाँचेक साल ही बाकी हैं। कम्यूटेड पेंशन, जी पी एफ, स्टेट इंश्योरेंस ग्रेच्युयटी, लीव इनकैशमेंट आदि मिलाकर कोई तीन लाख तो मिल ही जाएगा। तुम लोग असहाय नहीं हो। खुदा-न-खास्ता नौकरी में रहते हुए, किसी कारण मैं चल बसता हूँ तो दो लाख तक की सहायता-राशि अलग मिल सकती है। थोड़ा धैर्य-साहस से काम लो। वक्त हमेशा एक-सा थोड़े न रहता है।
और वह आश्वस्त हो लिया थाअब सब सहज हो जाएगा।
लेकिन नहीं। यह जानकर अफसोस होना स्वाभाविक है कि स्थिति अब और-जटिल हो गई थी। अब तो परिवार ही संवाद-शून्य हो गया था। जमाना बदला है, और इस बुरी कदर बदला है कि अर्थ ही अब लोगों का माई-बाप हो गया है। लोग संवेदन-शून्य हो गये हैं। अपने बड़े बेटे, जिसकी धमनियों में उसका अपना खून बह रहा है, के मुँह से यह सुनकर तो उसके पैरों-तले की जमीन ही खिसक गई कि यह बुड्ढा मरे तो ही मेरे सपने साकार हो सकते हैं। मैं कैसे इंजीनियरिंग में दाखिला ले सकूँगा? दो लाख तो डोनेशन ही देने पड़ जाएँगे। न तो मण तेल होगा न राधा नाचेगी।
क्लास लेने के बाद वह स्टाफ-रूम में आकर कुर्सी में धसक गया। नाचेगी बेटे, राधा नाचेगीवह बुदबुदाया और उसके सीने ने धड़कना बंद कर दिया।

Saturday, 31 January 2009

जनगाथा फरवरी 2009


समय के साथ चलते मालवांचल के लघुकथाकार
सूर्यकांत नागर

(गतांक से आगे)
न्य लघुकथाकार, जिनका उल्लेख जरूरी लगता है, वे हैं—कृष्ण्कान्त दुबे, संजय कुमार डागा(हातोद), सुरेश बजाज, डॉ तेजपाल सिंह सोढ़ी, सिंघई सुभाष जैन, वीरचन्द नरवाले, सत्यनारायण पटेल, रमेश जाधव, कान्तिलाल ठाकरे, राज केसरवानी, मधुकर पँवार, महेश भण्डारी आदि। डॉ सोढ़ी का सन 2005 में लघुकथा संकलन ‘महामानव’ आया है। कृष्णकान्त दुबे ने प्रकृति और ग्रामीण परिवेश को लेकर अच्छी लघुकथाएँ लिखी हैं। डॉ रमेशचन्द्र दुबे का अलग से उल्लेख इसलिए आवश्यक है कि उन्होंने भी लघुकथा विधा के संवर्धन हेतु बहुत काम किया है। ‘आस्था’ उनकी एक अविस्मरणीय लघुकथा है। व्यंग्यकार से एक जागरूक कवि का चोला पहन लेने वाले ब्रजेश कानूनगो ने यद्यपि कम ही लघुकथाएँ लिखी हैं, लेकिन जो भी लिखी हैं, वे उन्हें एक समर्थ लघुकथाकार सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। घुलती पृथ्वी, रंग-बिरंग आदि उनकी महत्वपूर्ण लघुकथाएँ हैं।
मालवा-अंचल की महिला लघुकथाकारों में ध्यान आकर्षित करने वाले नाम हैं—चेतना भाटी, अन्तरा करवड़े, लीला रूपायन, कृष्णा अग्निहोत्री, सीमा पाण्डे ‘सुशी’, रेखा कारड़ा, सुनयना वोरा, सुमति देशपाण्डे, डॉ पुष्पारानी गर्ग, स्वाति तिवारी(सभी इंदौर), प्रज्ञा पाठक और मीरा जैन(दोनों उज्जैन)। इनमें भी चेतना भाटी, अन्तरा करवड़े, सीमा पाण्डे, मीरा जैन और प्रज्ञा पाठक अधिक सक्रिय हैं। रेखा कारड़ा शारीरिक रूप से अशक्त होते हुए भी मानसिक रूप से काफी सशक्त हैं। साहित्य और कला के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। ‘उसका सपना’(2005) रेखाजी का लघुकथा-संग्रह है। प्रचार-प्रसार से दूर रहने वाली अंतरा करवड़े ने बहुत ही खूबसूरत लघुकथाएँ लिखी हैं। उनके लघुकथा-संग्रह ‘देन उसकी हमारे लिए’ को अखिल भारतीय अम्बिका प्रसाद ‘दिव्य’ रजत अलंकरण मिल चुका है। सीमा पाण्डे ‘सुशी’ और अंतराजी इंटरनेट पर भी बहुत सक्रिय हैं। चेतना भाटी की उल्लेखनीय लघुकथाएँ हैं—हेलमेट, ऊँची जाति, मंजर आदि। मीरा जैन की अब तक सौ से अधिक लघुकथाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। कई अन्य लघुकथा-संकलनों में भि वे संकलित हैं। ‘मीरा जैन की सौ लघुकथाएँ’ उनका एकल लघुकथा-संग्रह है। लघुकथा-लेखिकाओं की अधिकांश लघुकथाएँ परिवेशजन्य हैं। घर-परिवार, नाते-रिश्तों को शायद पूरी तरह छोड़ पाना उनके लिए संभव नहीं है। इसीलिए उनकी रचनाओं में अनुभूति की प्रामाणिकता है। प्रश्न यही है कि जो एक स्त्री अपने जीवन में झेलती-भोगती है, उसे पुरुष तो क्या, वह स्त्री जिसने वह-सब भोगा नहीं है, ठीक-से बयान नहीं कर सकती।
उज्जैन का जिक्र आया है तो वहाँ के पुरुष-लघुकथाकारों को भी याद कर लिया जाए। पोलियोग्रस्त स्व0 अरविन्द नीमा विकलांग होते हुए भी विचित्र जिजीविषा के धनी थे। लिखने-पढ़ने में उनकी गहरी रुचि थी। अच्छी रचनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया भेजना वे कभी नहीं भूलते थे। उनका एक लघुकथा-संग्रह ‘गागर में सागर’ उनकी मृत्यु के पश्चात सन 2000 में प्रकाशित हुआ था। उज्जैन के ही सन्तोष सुपेकर, राजेन्द्र नागर ‘निरन्तर’, मुकेश जोशी, शैलेन्द्र पाराशर, स्वामीनाथ पाण्डेय, डॉ शैलेन्द्र कुमार शर्मा, भगीरथ बड़ोले, बी0 एल0 आच्छा, डॉ प्रभाकर शर्मा, रमेश कर्नावट और श्रीराम दवे आदि अनेक रचनाकार लघुकथा-विधा से जुड़े हैं। ख्यात व्यंग्यकवि ओम व्यास ने भी लघुकथाएँ लिखी हैं। ‘मजदूरी’ उनकी एक महत्वपूर्ण रचना है। डॉ प्रभाकर शर्मा का संकलन ‘सागर के मोती’(2004) चर्चित रहा है। लेखक, पत्रकार, चिंतक श्रीराम दवे ने भी लघुकथाएँ लिखी हैं। उनके संपादन में इंदौर के तीन लघुकथाकारों का संकलन ‘त्रिवेणी’(2003) आया था। प्रो0 शैलेन्द्र पाराशर के संपादन में लघुकथाओं के संकलन ‘सरोकार’ का प्रकाशन उज्जैन से हुआ था। संकलन में रमेशचन्द्र शर्मा, हरीश कुमार, प्रभाकर शर्मा, रमेश कर्नावट, प्रवीण देवलेकर आदि की लघुकथाएँ शामिल थीं। उक्त संकलन का भव्य लोकार्पण-समारोह हुआ था जिसमें सांसद सत्यनारायण जटिया, ख्यात कवि-आलोचक प्रमोद त्रिवेदी, प्रो0 रमेश गुप्त ‘चातक’ आदि अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे। उक्त संकलन का लोकार्पण सूर्यकांत नागर ने किया था। इस अवसर पर लघुकथाकार वेद हिमांशु को सम्मानित भी किया गया था। प्रो0 बी0 एल0 आच्छा ने लघुकथा के सिध्दान्त-पक्ष पर अनेक विचारपरक लेख लिखे हैं। पिलकेन्द्र अरोरा भी इस दिशा में काफी सक्रिय हैं।
लेखक, कवि, विचारक और वरिष्ठ विज्ञानी रतलाम के डॉ जयकुमार जलज ने हिसाब, हासिल, नेता-शिष्य, वंशबेल, झूठा सच, शॉर्टकट जैसी यादगार कथाएँ लिखकर सिद्ध कर दिया है कि उनकी इस विधा पर गहरी पकड़ है। उनकी लघुकथाओं में मनुष्य के दोहरे चेहरे और स्खलित होते मानवीय मूल्यों के प्रति उनकी चिन्ता को रेखांकित किया जा सकता है। साहित्य की विभिन्न विधाओं में सतत लिखने वाले झाबुआ के रामशंकर ‘चंचल’ भी अब तक अनेक श्रेष्ठ लघुकथाएँ लिख चुके हैं। उनकी रचनाएँ देशभर की छोटी-बड़ी पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। उनके द्वारा संपादित ‘एकलव्य’(2004) संकलन में उनकी अनेक लघुकथाएँ संकलित हैं। उनकी झीतरा और ब्लाउज रचनाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अशोक ‘आनन’(मक्सी) ‘आयाम’ लघु-पत्रिका निकालते रहे हैं। इस पत्रिका का एक पूरा अंक लघुकथा को समर्पित था। ‘आनन’ ने स्वयं भी अनेक लघुकथाएँ लिखी हैं। ‘मातुश्री कमलादेवी स्मृति पुरस्कार’ का प्रोत्साहन पुरस्कार भी उनको मिल चुका है। ‘खिलौने’ उनकी उल्लेखनीय लघुकथा है। देवास के उपेन्द्र मिश्र एवं नितिन घुणे के समर्पण-भाव को याद रखना भी जरूरी है।
इंदौर में रहे और मुंबई में जा बसे अनन्त श्रीमाली ने सतीश राठी के साथ मिलकर लघुकथा के संवर्धन के लिए खूब काम किया। राठीजी के साथ वे ‘क्षितिज’ और ‘मनोबल’ के सहयोगी संपादक रहे। इंदौर के एक और लघुकथाकार जो फिलहाल नौकरी के सिलसिले में मुंबई में हैं, वे हैं—डॉ सतीश शुक्ल। शुक्लजी भी लघुकथा के प्रति समर्पित रहे हैं। कर्ज-अदायगी तथा स्वाभिंमान जैसी लघुकथाओं के माध्यम से उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
मालवा-अंचल के देवास, उज्जैन, इंदौर आदि स्थानों पर लघुकथा-सम्मेलनों, सेमीनारों, कार्यशालाओं, लोकार्पण-समारोहों और चर्चा-गोष्ठियों का आयोजन अक्सर होता रहता है। इनमें लघुकथा लेखन के विविध पक्षों पर खुली चर्चा होती है। कुछ स्थानों पर लघुकथाओं पर आधारित चित्र-प्रदर्शनियाँ भी लगाई जा चुकी हैं। दिल्ली निवासी मधुदीप के लघुकथा-संग्रह ‘मेरी बात तेरी बात’ पर स्वयं मधुदीप की उपस्थिति में इंदौर में विस्तृत चर्चा हुई थी। चैतन्य त्रिवेदी के लघुकथा-संग्रह ‘उल्लास’ पर भी एकाधिक बार बहस हो चुकी है। मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति द्वारा भी लघुकथा-वाचन के कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। गत वर्ष डॉ सतीश दुबे की लघुकथाओं के गुजराती संकलन ‘करोड़ रज्जू’ का वृहद लोकार्पण-समारोह गुजराती समाज द्वारा आयोजित किया गया था। गुजरात साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित और कभी इंदौर में ही रहे रोहित श्याम चतुर्वेदी द्वारा हिन्दी से गुजराती में अनूदित यह पुस्तक काफी चर्चित रही। सतीश राठी ने ‘क्षितिज’ के लिए 1983-84 में लघुकथा-प्रतियोगिता आयोजित कि थी जिसमें फजल इमाम मलिक, मदन शर्मा और शंकर पुणतांबेकर को पुरस्कृत किया गया था। निर्णायक थे—निमाड़ लोक संस्कृति के पोषक रामनारायण उपाध्याय, सूर्यकांत नागर और राजेन्द्र पाण्डेय। अशोक शर्मा ‘भारती’ द्वारा आयोजित प्रतियोगिता का उल्लेख पूर्व में किया जा चुका है। मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति की मुख-पत्रिका ‘वीणा’ में आज भी लघुकथाओं का प्रकाशन नियमित रूप से हो रहा है। लघुकथा पर क्षेत्र के अनेक छात्र-छात्राओं द्वारा एम फिल हेतु लघु शोध-प्रबन्ध तथा पी-एच डी हेतु शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत कर डिग्रियाँ हासिल की गई हैं। इनमें कुछ नाम हैं—सुनीता पाटीदार, संजय गुप्ता, पल्लवी, भारती ललवानी, मनीषा व्यास आदि।
देश में लघुकथा के बदलते नक्शे के साथ-साथ मालवांचल में भी लघुकथा लेखन में भाषा, शिल्प और कथ्य के स्तर पर बदलाव आया है। हृदयहीनता, भ्रष्टाचार और परस्पर विरोधी स्थितियों वाले घिसे-पिटे विषयों से मुक्ति मिल रही है। अतिरिक्त स्पष्टीकरण और विवरणात्मकता के प्रति भी लेखक-वर्ग सावधान हुआ है। बदलते यथार्थ को सामने लाने के लिए लघुकथा के रचनात्मक स्वरूप में रूपात्मक बदलाव आया है। पहले लगता था, सारी लघुकथाएँ एक ही टकसाल से निकलकर आ रही हैं। अब मालवा का लघुकथाकार अधिक सजग हुआ है। उसने लघुकथा के बने-बनाए ढाँचे को तोड़ने की कोशिश की है। उसकी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक समझ विकसित हुई है। लघुकथा के विकास की दृष्टि से यह एक शुभ लक्षण है। विक्रम सोनी, सतीश दुबे से प्रारम्भ परम्परा विकसित-पल्लवित होकर नए रंग-रूप में अपनी सुरभि बिखेर रही है और लघुकथा विधा के संवर्धन में अपना विनम्र योगदान कर रही है। निस्सन्देह मालवा-अंचल के लघुकथाकारों ने साहित्य कोष को समृद्ध करने और लघुकथा को अधिकाधिक लोगों से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उम्मीद है, अंचल की नई प्रतिभाएँ भी आगे आएँगी और इस विधा की जड़ों को मजबूत करने में भरपूर सहयोग करेंगी।
मोबाइल:09893810050

लघुकथाएँ


लक्ष्मी-निवास
सुरेश शर्मा

दीपावली की आधी रात बीत चुकी थी। लक्ष्मीजी अपने वाहन पर सवार उपयुक्त पात्र को वरदान देने निकल पड़ीं।
एक झोपड़ी का दरवाजा बन्द था। भीतर-बाहर अँधेरा पसरा देखकर विस्मय के साथ लक्ष्मीजी ने पूछा, “दीवाली की रात भी अँधेरा?”
“यह एक गरीब मजदूर का घर है। दिनभर कठोर श्रम करने के बाद भी इसके परिवार का गुजारा नहीं हो पाता। इसीलिए आपका स्वागत नहीं कर पाया बेचारा।” उल्लू ने स्थिति स्पष्ट की तो लक्ष्मीजी ने आगे बढ़ने का इशारा किया।
कुछ दूर चलने के बाद एक घर के आगे केवल एक दीया टिमटिमाता हुआ देखकर वे ठिठकीं। आशय समझकर उल्लू बोला,“यह एक ईमानदार शासकीय कर्मचारी का घर है। ऊपर की कमाई को हाथ लगाना भी पाप समझता है। इसीलिए इसका परिवार गरीबी और अभाव से त्रस्त रहता है। अपनी क्षमता अनुसार ही आपकी सेवा कर सन्तुष्ट है, देवि!”
लक्ष्मीजी की खामोशी का अर्थ समझकर उल्लू आगे बढ़ लिया। तभी उनकी नजर विद्युत रोशनी से जगमगाते एक भव्य भवन पर पड़ी। वहाँ आतिशबाजी से आसमान तक गूँज रहा था। दर्जनों देशी-विदेशी कारों की लाइन लगी हुई थी। अच्छा-खासा शोर मचा हुआ था। लक्ष्मीजी को खोया हुआ-सा जानकर उल्लू बताने लगा, “यह एक हवाला और घोटालेबाज का महल है देवि! इसके पास अपार सम्पत्ति व काला धन है।”
सुनकर लक्ष्मीजी बोलीं, “तुम मुझे यहीं उतार दो।”
उल्लू उल्लू-सा खड़ा-खड़ा लक्ष्मीजी को भीतर जाते देखता रहा।
मोबाइल:09926080810

संस्कार
श्यामसुन्दर व्यास
(निधन: 03 अक्तूबर, 2007)

सार्वजनिक नल पर पानी भरने वालों की भीड़ जमा हो गई थी। हंडा भर जाने के बाद बूढ़ी अम्मा से हंडा उठाया नहीं जा रहा था।
लोगों का अधैर्य बड़बड़ाहट में बदलने लगा। मनकू ने हंडा हटाकर अपनी बाल्टी लगाते हुए बूढ़ी से कहा, “बहू को मेंहदी लगी है क्या, जो तू आ गई?”
कातर स्वर में बूढ़ी के बोल फूटे—“उसका पाँव भारी है।”
मनकू को लगा जैसे किसी ने उस पर घड़ों पानी डाल दिया हो।
उसने हंडा उठाया और बूढ़ी अम्मा के द्वार पर रख आया।


मूल्यान्तर
विक्रम सोनी

रोगाजी प्याऊ के आगे अंजुरी बाँधते उसे देखकर बेहद आत्मीयता व नम्रता से बोले,“क्यों बे हरामी की औलाद अहीरराम, तूने अभी तक एक टीन घी नहीं पहुँचाया? एक तेरे ही घर का हुआ तो हम खाते-पीते हैं। गाँव में एक तेरे ही घर की किसी चीज से हमें परहेज नहीं है, और तू है कि…”
“तीन गायें मर गयीं हुजूर।”
“अबे तो गाँवभर में सौ-सौ ग्राम भी माँग लिया होता तो टीन भर जाता। देखता, कौन साला हमारे नाम से नहीं देता!”
वह कुछ उत्तर देता, तभी पानी पिलाने वाली बुढ़िया ने धीरे-से कहा,“माँगकर ला देना बेटा, भिखारी को जूठन से परहेज नहीं होता।”
सम्पर्क:0734-2533910


हक़ की मजदूरी
प्रताप सिंह सोढ़ी

पने पाँच-वर्षीय बच्चे का हाथ पकड़े भूरीबाई दाड़की पाने की प्रतीक्षा में लगभग दो घण्टे से मजदूर-चौक में खड़ी हुई थी। उसने मजदूरी मिलने की आस अब छोड़ दी थी। सुस्ताने के लिए वह पास की पुलिया पर बैठ गयी। तभी, उसे किसी की आवाज़ सुनाई दी,“क्या काम नहीं मिला?”
उसने देखा कि एक नौजवान अपनी पतली नुकीली मूँछों पर उँगली फेरते हुए उसे घूर रहा था। संक्षिप्त-सा उत्तर दिया उसने—“नहीं मिला।”
“हम देंगे तुम्हें बढ़िया काम।”
“क्या मजदूरी दोगे?”
कमीज की कॉलर ऊपर उठाते हुए उसने कहा, “मुँहमाँगी मजदूरी मिलेगी।”
उसे घूरते हुए दृढ़तापूर्वक वह बोली, “हक़ की मजदूरी ही लूँगी। कहाँ जाना होगा?”
कुटिल हँसी बिखेरते हुए उस नौजवान ने उत्तर दिया, “मेरे ठिकाने पर चलना होगा, जहाँ सभी मजदूरिनें जाती हैं। वहाँ सभी सुविधाएँ हैं। दो-तीन घण्टे में तुम्हें छुट्टी मिल जाएगी और भरपूर मजदूरी भी।”
अनपढ़ भूरीबाई सब-कुछ समझ गई। उसकी भृकुटी तन गई और पूरी ताकत लगा वह चीख पड़ी, “अबे हरामी, मैं मजदूरी कर पेट भरती हूँ, इज्जत बेचकर नहीं। भाग जा यहाँ से, नहीं तो…।”
एक बड़ा-सा पत्थर उसके हाथ में था। भूरीबाई के इस विकराल रूप को देखकर वह नौजवान भयभीत वहाँ से भाग खड़ा हुआ। भूरीबाई ने अपने बच्चे का हाथ पकड़ा और लम्बे-लम्बे डग भरती, बड़बड़ाती हुई अपने घर की तरफ चल दी।
मोबाइल:09753128044

खामोश
रमेश मनोहरा

“क्यों लीला, आजकल खामोश क्यों रहने लगी? क्या हो गया, बोल्।”
“कुछ नहीं हुआ।”
“जो हमेशा दिन-रात बड़बड़ाती रहती थी। अपनी बहू को कम दहेज लाने पर कोसती रहती थी। मगर कुछ दिनों से देख रही हूँ—किसी ने तुम्हारी जुबान सी दी है। बता, बहू ने कुछ कह दिया क्या?”
“बहू क्या कहेगी मीरा बहिन्।”
“तो फिर किसने कह दिया?”
“मेरे अपने बेटे ने।”
“क्या कह दिया ऐसा तुम्हारे बेटे ने?”
“कह दिया, तुम दहेज के लिए बार-बार बहू को परेशान नहीं करोगी।”
“बेटे ने ऐसा कह दिया और तुम डर गई?”
“डरे मेरी जूती।” जरा गुस्से से लीला बोली।
“तो फिर, इतनी खामोश क्यों रहने लगी? बहू को भी अब दहेज के लिए नहीं उकसाती हो?”
“बात दरअसल यह हुई मीरा बहिन, बेटे ने जोर देकर कह दिया—अब दहेज के लिए बहू को परेशान करोगी तो हम दोनों आत्महत्या कर लेंगे।”
“और तुम डर गई?”
“हाँ मीरा बहिन, बेटा तो मेरा ही है। बहू में आँसू आ गये।
“यानी कि बेटा बहू का गुलाम हो गया?” मीरा ने उसके दर्द को फिर कुरेदा।
“हाँ मीरा बहिन, मैं अपने को नहीं खोना चाहती।” कहकर लीला ने अपनी वेदना उगल डाली।
मीरा बहिन अन्दर-बाहर से मुस्करा दी, क्योंकि यह योजना उसी की थी।
सम्पर्क:07414-229414


आशंका
डॉ योगेन्द्रनाथ शुक्ल

घर के सामने कार रुकने की आवाज़ आते ही पिता छड़ी के सहारे रूम की ओर चल दिए।
“बेटा! यात्रा में कोई कष्ट तो नहीं हुआ?”
“नहीं पिताजी।”
“कार्यक्रम अच्छी तरह निपट गया?”
“जी पिताजी। चाचाजी आपको बहुत याद कर रहे थे…मैंने कह दिया कि आपकी तबियत ठीक नहीं थी, इसलिए नहीं आ सके।”
“बेटा, तुम्हारी चाची बहुत अच्छी महिला थी…तुम्हें तकलीफ तो हुई होगी, लेकिन उनके तेरहवें में शामिल होना बहुत जरूरी था…उनका परिवार भले ही दूसरे शहर में रह रहा हो, पर हमारा खून तो एक ही है…।” यह कहते हुए उनकी आँखें भर आई थीं; किन्तु उन्हें मन ही मन सन्तोष भी था कि पुत्र और पुत्रवधू ने उनकी आज्ञा का पालन किया था।
रात को यश उनके कमरे में आया।
“दादाजी, पापा कानपुर से मेरे लिए ये वीडियो-गेम लाए हैं।”
“यह तो बहुत अच्छा है! जरा मुझे भी बताओ…।” उसके सिर पर हाथ फेरते हुए दादाजी ने कहा।
“दादाजी, मम्मी कह रही थी कि चाचीजी की साग-पूड़ी चार हजार में पड़ी।…दादाजी, क्या साग-पूड़ी इतनी मँहगी मिलती है?”
यश अपने प्रश्न का जवाब चाह रहा था और दादाजी अपने भावी जीवन के प्रति आशंकित हो मूर्तिवत खड़े थे।
सम्पर्क:0731-2483893


कचरा
मनोज सेवलकर

प्रतिदिन गली में आने वाली स्वीपर प्रत्येक घर के सामने झाड़ू लगाते हुए अपना निर्धारित वाक्य दोहराती—“आंटीजी, कचरा्।” तथा प्रत्येक घर उसका आशय जान उसकी हाथ-ट्राली में कचरा डाल देते। परन्तु मेरे पड़ोस में जब भी वह आती, तब उसके वाक्य में परिवर्तन हो जाता। कहती—“दादाजी, कचरा।” क्योंकि दादाजी प्रतिदिन उसी समय अपने घर के आँगन तथा आसपास की सफाई कर कचरा डस्टबिन में डालते, फिर उस स्वीपर की हाथ-ट्राली में।
आज भी दादाजी व्यस्त थे तथा उनकी बहू दरोगा की माफिक बरामदे में खड़ी अपने ससुरजी की गतिविधियों को देख रही थी। जैसे ही स्वीपर ने “दादाजी, कचरा” कहा, वैसे ही उन्होंने उससे प्रश्न किया—“तुम मुझे इस ट्राली में कहाँ डालोगी?”
स्वीपर ने कहा—“क्यों मजाक करते हैं दादाजी!”
“तुम ही तो रोज कहती हो—दादाजी कचरा!”
“वो तो दादाजी, मैं कचरा माँगती हूँ।”
“नहीं बेटा, मैं तो अब रोज कचरा होता जा रहा हूँ…।”
दादाजी की बात को वह तो हँसी-ठिठोली समझकर आगे बढ़ गई। बहू उनके आशय को समझ नाराजगी प्रकट करती, पैर पटकती घर के अन्दर चली गई।
सम्पर्क:0731-2484321