Friday, 29 November, 2019

'क्षितिज लघुकथा सम्मेलन-2019 / 25 नवंबर 2019 / डॉ. पुरुषोत्तम दुबे


'क्षितिज लघुकथा सम्मेलन-2019 

समापन के बाद दूसरा दिन


इन्दौर महानगर की साहित्य संस्था ‘क्षितिज’ द्वारा आयोजित द्वितीय अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन दिनांक 24 नवम्बर 2019 रविवार को आयोजित होकर समय के पटल पर अपनी कामयाबी के हस्ताक्षर कर करतलध्वनि से सम्पन्न हुआ। सम्मेलन की सफलता ‘क्षितिज’ संस्था से जुड़े सभी माननीय सदस्यों और सम्मेलन में उपस्थित देश के विभिन्न भागों से पधारे रचनाकार अतिथियों की विशिष्ट उपस्थिति के कारण सम्भव हो सकी है। अब, अगले 'क्षितिज लघुकथा सम्मलेन 2020' की प्रतीक्षा....

अगला दिन यानी 25 नवम्बर 2019 
 25 नवम्बर की ऐन सुबह लघुकथाकार बलराम अग्रवाल से मैंने मोबाईल पर संपर्क किया। उनकी दिल्ली के लिये रवाना होने वाली रेल शाम 4 बजे की है। मैंने उनको कहा कि वे मेरे निवास पर आ पधारें, फिर जहाँ भी उनको जाना है या इन्दौर में जिस किसी से भी मिलना है, हम सब मिलकर साथ-साथ चलेंगे। लघुकथाकार बलराम अग्रवाल जी पंजाब की पंजाबी भाषा की प्रसिद्ध लघुकथा पत्रिका ‘मिन्नी’ के सम्पादक श्री श्याम सुंदर अग्रवाल तथा लघुकथाकार जगदीश राय कुलरियाँ के साथ मेरे निवास पर मेरे निमंत्रण पर आये फिर क्या था, जहाँ चार लघुकथाकार, वहाँ लघुकथा पर चार बाते होनी ही थीं। फलस्वरूप लघुकथा की दशा, दिशा तथा संभावनाओं पर चर्चाओं का विषद दौर चला। लघुकथा विषयक विचारें को लेकर अधिकांशतः सहमतियाँ बनीं।
 डॉ. बलराम अग्रवाल से मैं तकरीबन 4 या 5 बार मिल चुका हूँ। लघुकथा विधा पर उनकी बहुतेरी सटीक टिप्पणियाँ सदैव से मुझको प्रभावित करती रही हैं और लघुकथा के संदर्भ में मेरा मार्ग प्रशस्त करती रही हैं। बलराम जी की लघुकथा विषयक प्रायः सभी कृतियों का सांगोपांग अध्ययन मैंने किया है। इस तरह वे मेरे प्रसंदीदा लघुकथाकार भी है। लघुकथाकार जगदीश राय कुलरियाँ से मेरी यह दूसरी मुलाकात रही। इससे पूर्व जगदीश रायजी से मेरी मुलाकात देश के प्रसिद्ध साहित्यकार मनीषी डॉ. रामनिवास मानव द्वारा 13 अक्टूम्बर 2013 को आयोजित नारनौल (हरियाणा) में लघुकथा सम्मेलन में हो चुकी है। जगदीश रायजी जितने भीतर से गंभीर हैं उतने ही बाहर से मुखर भी। प्रसिद्ध लघुकथाकार, पंजाबी से हिन्दी और हिन्दी से पंजाबी के अनुवादक तथा पंजाब की लघुकथा पत्रिका ‘मिन्नी’ के संपादक श्री श्याम सुन्दर अग्रवाल का नाम तो काफी समय से मैंने सुन रखा था। उनके मुख से अपने प्रति यह सुनकर अच्छा लगा कि वे मुझको सितम्बर 2015 से इस आधार के साथ जानते है कि, उन्होंने ‘जनगाथा’ अव्यवसायिक ब्लॉक पत्रिका पर मेरा लिखा आलेख ‘हिन्दी लघुकथा का दिल्ली दरवाजा’ पढ़कर उस पर अपनी लिखित सकारात्मक प्रतिक्रिया प्रस्तुत की थी। तबसे मुझसे मिलने की उनकी प्रबल इच्छा रही थी। अपने निवास पर उनकी उपस्थिति पाकर मैं गौरवान्वित हुआ। लघुकथा रचना-प्रक्रिया के संदर्भ में उनके स्पष्ट विचारों को जानकर मैं लघुकथा विषयक उनके गहन अध्ययन से प्रभावित हुआ। 

प्रस्थान : लघुकथा मंदिर के लिए
 बलराम अग्रवाल जब भी इन्दौर आते हैं वे हिन्दी के सुप्रसिद्ध लघुकथाकार स्व. डॉ. सतीश दुबे के निवास पर अवश्य ही जाते रहे हैं। हम सब मिलकर स्व. डॉ. सतीश दुबे के निवास पर पहुँचे। डॉ. सतीश दुबे के जीवनकाल में ही मॉरिशस के लघुकथाकार राज हीरामन ने उनके निवास पर अपनी उपस्थिति के बीच डॉ. सतीश दुबे के निवास को ‘लघुकथा मंदिर’ की संज्ञा से अभिषिक्त किया है। वहाँ आदरणीय भाभीजी से सौजन्य भेंट की ओर जाना कि उन्होंने उनके यहाँ आने वाली 1973 से लेकर अद्यतन पत्र-पत्रिकाओं तथा पुस्तकों को स्वर्गीय पति की स्मृति की तरह ही सहेज कर रखा हुआ है। निःसंदेश डॉ. सतीश दुबे का रचना संसार शोध का विषय है। सतीश दुबे इन्दौर महानगर में अपनी साहित्यिक संस्था ‘सृजन संवाद’ के अध्यक्ष होकर उसको सुचारू रूप से चलाते रहे हैं। प्रस्तुत संस्था के प्रति उनका अगाध स्नेह इस तरह था कि उन्होंने अपने अंतिम दिनों की अनुभूति को पहचानकर अपने जीवन काल में ही अपनी ‘सृजन संवाद संस्था’ का दायित्व युवा रचनाकार डॉ. दीपा व्यास के हाथों सौंप दिया था। यह डॉ. दीपा व्यास और कोई नहीं, मेरे निर्देशन में सतीश दुबे पर कार्य करने वाली शोधार्थी रही है। डॉ. सतीश दुबे के निवास पर उपस्थित श्यामसुंदर अग्रवाल ने बताया कि वे यहाँ पर अर्से बाद आये हैं। इससे पहले वे इन्दौर मे 2005 में डॉ. सतीश दुबे से मिले हैं और बाद में सन् 2007 में इन्दौर में आयोजित लघुकथा सम्मेलन में उपस्थिति होकर डॉ. दुबे से उन्होंने उनके निवास पर मुलाकात की थी। 
 कभी या शायद सन् 2010 में मैंने अपना गजल संग्रह ‘जिंदगी-ए-जिंदगी’ डॉ. सतीश दुबे जी को भेंट किया था। आज जब हम सतीश दुबे के घर पर इकठ्ठा हुए तब आदरणीय भाभीजी ने बताया कि उनको मेरी लिखी गज़ले बहुत पसंद आयीं। इस बीच ‘सृजन संवाद’ की अध्यक्ष डॉ. दीपा व्यास भी हम लोगों से मिलने की जिज्ञासा लेकर उपस्थित हुई, इस तरह वहाँ देर तक विभिन्न विषयों पर सामुहिक चर्चाएँ चलती रहीं। 

दिन का अंतिम पड़ाव : आपले वाचनालय
 डॉ. सतीश दुबे के घर से निकलकर हम लोग इन्दौर के रेखा चित्रकार, रंगकर्मी, रचनाकार श्री संदीप राशिनकर के निवास पर, जहाँ हमारा जाना पहले से ही तय था, यथा समय पहुँचे। राशिनकर एक ऐसा नाम है जो रेखा चित्रों के माध्यम से समूचे देश में जाना जाता है। संदीपजी की कलाकृतियाँ देश की विभिन्न हिन्दी की विख्यात पत्र-पत्रिकाओं के कव्हर पृष्ठ पर प्रकाशित होती रही हैं। उन्होंने कई पत्रिकाओं, पुस्तकों के लिये रेखांकन फीचर तैयार किये हैं। श्री संदीपजी राशिनकर एक अद्भुत प्रतिभा के धनी हैं। संदीपजी को उनके व्यक्तित्व में समाहित विभिन्न प्रतिभाएँ उनके स्वर्गीय पिता श्री वसंत राशिनकर से वसीयत में मिली है। मेरा, डॉ. बलराम अग्रवाल, श्री श्याम सुंदर अग्रवाल और श्री जगदीश राय कुलरियाँ हम सबका संदीपजी राशिनकर ने गर्मजोशी के साथ स्वागत किया, फिर उन्होंने अपनी प्रातः स्मरणीय माताजी श्रीमती शरयू राशिनकर से हमको मिलवाया, जो स्वयं भी अद्भुत प्रतिभा की धनी हैं। संदीपजी ने सर्वप्रथम हमको उनकी बैठक में लगी उनकी विभिन्न कलाकृतियों से परिचय कराया। जब हमने उनके द्वारा निर्मित सिंहस्थ मेला उज्जैन पर केन्द्रित कलाकृतियों का अवलोकन किया तो हम सभी उनकी रचनाधर्मिता से अत्यंत प्रभावित हुए। इस अवसर पर डॉ. बलराम ने संदीपजी से उनकी रचनाधर्मिता को लेकर विभिन्न जिज्ञासा मूलकप्रश्न पूछे जिनका संदीपजी ने अपने उत्तरों द्वारा युक्तियुक्त समाधान प्रस्तुत किया। इसके पश्चात् संदीपजी हम सबको मकान के उपरी मंजिल पर ले गये जहाँ उनके स्वर्गीय पिता की साहित्य, कला और संस्कृति विषयक कर्मठता और तद्विषयक उनके अवदानों का पता हमको मिला। उन्होंने स्वयं उनके हाथों से गणपति बप्पा और श्री सांईबाबा की आदमकद मूर्तियाँ बनाई हुई हैं जो उनके मकान के अग्र भाग पर यथा स्थान विराजित हैं।
 संदीप जी ने न केवल अपनी विशाल आर्ट गैलरी में सुशोभित भिन्न-भिन्न चित्रों का परिचय हमसे करवाया बल्कि आपले वाचनालय में समय-समय पर आयोजित होने वाले भिन्न-भिन्न कार्यक्रमों की जानकारियाँ भी हमको विस्तारपूर्वक प्रदान कीं। संदीप जी के निवास पर उनके स्वर्गीय पिता की साहित्यक एवं सांस्कृतिक धरोहरों का अवलोकन कर हम भावविभौर हुए। एक कमी यह रही कि इस अवसर पर कवयित्री श्रीमती श्रीति संदीप राशिनकर से भेंट न हो सकीं। बावजूद इसके संदीप राशिनकर द्वारा हमारे सत्कार में कोई कोर-कसर नहीं रही। 
 इस तरह डॉ. बलराम अग्रवाल, श्री श्याम सुंदर अग्रवाल, श्री जगदीश राय कुलरियाँ के साथ मेरा यह दिन बड़ी दिलचस्प व्यस्तता के साथ व्यतीत हुआ। अंत में इन खुबसूरत यादों के पलों को अपने हृदय और अपनी दृष्टि में संचित कर हम संदीपजी के घर से विदा हुए। हमारे यह सभी मोअज़ीज़ मेहमान वहाँ से इन्दौर रेलवे स्टेशन की ओर दिल्ली जाने के लिये रवाना हो गये तथा अत्यंत सदाशयता के साथ संदीप जी ने अपने वाहन से मुझको मेरे निवास तक छोड़ भी दिया।

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