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पृथ्वीराज अरोड़ा |

10 अक्टूबर, 1939 को पाकिस्तान के बुचेकी (ननकाना साहिब) में जन्मे, हिन्दी लघुकथा के महत्वपूर्ण स्तम्भों
में से एक आ॰ पृथ्वीराज अरोड़ा आज 20 दिसम्बर, 2015 को दोपहर 11:40
बजे
अपनी नश्वर देह को त्यागकर अनन्त में जा मिले। वे गत लगभग 3 साल से
शारीरिक-मानसिक अक्षमता से जूझ रहे थे। उनका इस तरह अक्षम हो जाना हिन्दी लघुकथा
की अपूरणीय क्षति थी। उनसे मेरी अन्तिम बातचीत सम्भवत: अक्टूबर 2012 में
उस समय हुई थी, जब मैं 'अविराम
साहित्यिकी' के लघुकथा विशेषांक में प्रकाशित करने हेतु
वरिष्ठ लघुकथा लेखकों से उनकी 'लघुकथा यात्रा' पाने का निवेदन
कर रहा था। अरोड़ा जी ने उस समय मुझे बताया था कि उनके डॉक्टर ने उन्हें कोई भी ऐसा
काम करने से मना किया है जिसे करने में उन्हें मानसिक श्रम करना पड़े; इसलिए
मैं तुम्हारा यह काम करने में असमर्थ हूँ। मैंने उनसे कहा--कोई बात नहीं। मैं
स्वयं आपके पास रिकॉर्डर लेकर आ जाऊँगा, आप बोलते रहना, बस। लेकिन
उन्होंने इस काम में भी अपनी असमर्थता साफ-साफ व्यक्त कर दी थी। और इस तरह,
हिन्दी
लघुकथा की शुरुआत का एक हिस्सा हम-सब के हाथ आने से रह गया, एक ऐसा हिस्सा
जो जीवंत इतिहास था। उस हिस्से की महत्वपूर्ण कड़ी, रमेश बतरा बहुत
पहले जा चुके थे। लेकिन उस दौर की कुछ महत्वपूर्ण कड़ियाँ अभी भी हमारे पास उपलब्ध
हैं, बशर्ते वो इस ओर श्रम करना जरूरी समझें--कमलेश भारतीय और सिमर सदोष और महावीर प्रसाद जैन। यद्यपि इन सभी ने अपनी-अपनी लघुकथा यात्रा 'अविराम साहित्यिकी' को उपलब्ध करा दी थी, तथापि, मैं समझता हूँ कि उसका बहुत-सा हिस्सा अभी भी लिखना बाकी है।
पृथ्वीराज अरोड़ा की रचनाओं के तीन संग्रह मेरे पास हैं--1 तीन न तेरह (1997, लघुकथा संग्रह) 2 पूजा (2003, कहानी संग्रह) तथा 3 आओ इंसान बनाएँ (2007, लघुकथा संग्रह)। इनके अलावा 'प्यासे पंछी' नाम की एक औपन्यासिक कृति का भी उल्लेख 'आओ इंसान बनाएँ' के पिछले कवर पृष्ठ पर किया है; लेकिन वह मेरे पास नहीं है।
पृथ्वीराज अरोड़ा जी से मेरी मुलाकातों का
सिलसिला बहुत बाद में शुरू हुआ—रमेश बतरा के निधन के बाद। रमेश बतरा के निधन से
पृथ्वीराज अरोड़ा बेहद आहत थे। दिल्ली में सम्पन्न रमेश बतरा की लगभग हर शोक सभा
में वे सम्मिलित हुए, उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की, दु;ख में डूबे।


कुल मिलाकर, वे बहुत प्यारे इंसान थे--हमेशा मुस्कुराते रहने वाले। जिन बातों का वे बुरा मान जाते थे, उन्हें भी दिल में नहीं रखते थे। याद रखते थे, सिर्फ दोस्ती। खूबसूरत इतने थे कि मैं जब भी उन्हें देखता, उनके रूप में मुझे कैनेडी की छाया नजर आती थी।
एक बात और। रचनाओं से अलग अपने आप को
प्रदर्शित करने में वे काफी संकोची रहे। इस बात का प्रमाण उनके संग्रहों में दिया
गया उनका वह परिचय है जिनमें उन्होंने अपने जन्म की तारीख तक देना जरूरी नहीं
समझा…वह परिचय है जिसमें अपनी ताजातरीन फोटो देने की ओर उन्होंने कभी ध्यान नहीं दिया।
बहरहाल, उनकी स्मृति को शत-शत नमन।
भावभीनी श्रृद्धांजलि।
7 comments:
सही कह रहे है आप ,ये हिंदी लघुकथा में अपूरणीय क्षति ही है। आपके द्वारा आज उनका यह आलेख ,उनके लिए अटूट श्रद्धा को रोपित कर गया है। हमारे लिए उनके सन्दर्भ में उनकी वर्तमान स्थितियों को जानकर मन विह्ल हो उठा। हिंदी साहित्य में लघुकथा के लिए उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। विनम्र श्रद्धांजलि
बलराम भाई पृथ्वीराज अरोड़ा जी के चले जाने से लघुकथा जगत की महत्वपूर्ण कड़ी ,सुदृढ स्तम्भ हमारे बीच से हट गया मानो।पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ कर ही उनके व्यक्तित्व को जान पाई। कभी मिलने का सौभाग्य नहीं मिला ।आप जब लघुकथा सम्मेलन से पूर्व उनसे मिलने गये थे तब आपने उनकी असाध्य-रुग्णता विषयक जानकारी साझा की थी। आपसे और भी यादें साझा करने का अनुरोध है। मैं उनकी हमेशा से प्रशंसक रही हूँ।मेरे नमन उन्हें।
क्या उनकी लघुकथा की पुस्तकें पुस्तक मेले में उपलब्ध हो सकेंगी?प्रकाशक का पता मिल जाए तो वहाँ से मँगवा लूँगी ताकि मेरा बुक-शेल्फ़ समृद्ध हो सके ।
विभाजन और विस्थापन की त्रासदी को कोई किस प्रकार , सृजन में परिवर्तित कर सकता है , इसका स्थाई एवं अनुकरणीय उदाहरण थे " प्रोफेसर पृथ्वीराज अरोड़ा " . हमने सारिका में उनकी लघुकथाओं को पढ़कर जाना कि इस विधा में भी मानवीय संवेदनाओं को ऐसे स्वर दिए जा सकते हैं जो समस्या को सीधे पाठक के ह्रदय तक पहुंचाते हैं . उन्होंने साहित्य की इस विधा को न केवल पल्ल्वित और पोषित किया , अपितु इसे प्रतिष्ठा भी दिलवाई . नमन उस पवित्र आत्मा को जो हिन्दीं साहित्य में मील का एक पत्थर साबित हुई है . वे अपनी जीवंत रचनाओं के माद्यम से हमेशा जीवित रहेंगे ................सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
विनम श्रद्धांजलि
विनम्र श्रद्धांजलि
विभाजन और विस्थापन की त्रासदी को कोई किस प्रकार , सृजन में परिवर्तित कर सकता है , इसका स्थाई एवं अनुकरणीय उदाहरण थे " प्रोफेसर पृथ्वीराज अरोड़ा " . हमने सारिका में उनकी लघुकथाओं को पढ़कर जाना कि इस विधा में भी मानवीय संवेदनाओं को ऐसे स्वर दिए जा सकते हैं जो समस्या को सीधे पाठक के ह्रदय तक पहुंचाते हैं . उन्होंने साहित्य की इस विधा को न केवल पल्ल्वित और पोषित किया , अपितु इसे प्रतिष्ठा भी दिलवाई . नमन उस पवित्र आत्मा को जो हिन्दीं साहित्य में मील का एक पत्थर साबित हुई है . वे अपनी जीवंत रचनाओं के माद्यम से हमेशा जीवित रहेंगे ................सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
पृथ्वीराज अरोड़ा की लघुकथाएं अलग त्वरा की रचनाएं हैं। कथा-तत्व का सर्वथा भिन्न विन्यास। उन्होंने इस विधा में कुछ अत्यंत विशिष्ट जोड़ा है। इस पर बात होनी चाहिए। उनका जाना व्यथित कर देने वाली घटना है। ..विनम्र श्रद्धांजलि..
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