Sunday, 16 August 2020

 

जगदीश कश्यप (01-12-1949—17-8-2004) की 16वीं पुण्यतिथि पर…

मेरे विचार में अच्छी लघुकथाएँ वही लिख सकता है, जिसे कथा-जगत की सम्यक् पहचान हो। यही नहीं, काव्यात्मक पड़ाव की जानकारी और सारगर्भित अभिव्यक्ति के लिए उसे देश-काल-पात्र की भाषा व शिल्प-विन्यास की समझ हो।

—‘हिन्दी लघुकथा की तकनीकी पड़ताल’ शीर्षक लेख में जगदीश कश्यप

 

 

 

जगदीश के बारे में लिखते हुए मेरी स्थिति ऐसी होती है कि उसके खिलाफ सारा ज़हर गले में रोक लेना पड़ता है। उसको और खुद को किसी भी ज़हर से दूर एक रचनाकार के पलड़े में रखना सरल नहीं है, लेकिन लेखकीय ईमानदारी का तकाजा है कि हम लघुकथा के प्रति उसके समर्पण को समुचित सम्मान दें। आज 16वीं पुण्यतिथि पर याद करते हुए प्रस्तुत हैं उसकी दो लघुकथाएँ—‘पहला गरीब’ और ‘अंतिम गरीब’। पहले-पहल इन दोनों रचनाओं को रमेश बतरा ने अपने संपादन में छपने वाली पत्रिका ‘साहित्य निर्झर’ के पहले अंक में स्थान दिया था। 'सारिका' में जाने के बाद इन्हें उन्होंने उसमें भी स्थान दिया। —बलराम अग्रवाल

पहला गरीब

दियासलाई से सुल्फे की गोली सेंकता हुआ एक भिखारी दूसरे से बोला, “आज तो कुल ग्यारह रुपये की ही दिहाड़ी बनी है। चार रुपये का घाटा हो गया।”

दूसरा भिखारी, जो कच्ची शराब की बोतल को पास ही रखे एल्युमिनियम के मगों में खाली कर रहा था; बोला, “अपनी तो आज बोहनी ही अच्छी हो गयी, पूरे चालीस रुपये बन गये।”

“आज कहाँ हाथ मारा स्साले!”

“सुबह काम पर निकला ही था कि एक घर से झगड़े की आवाज सुनकर मैं उसी द्वार पर जा खड़ा हुआ। औरत कह रही थी… घर में आटा नहीं है। कहीं से भी लाओ, वरना भूखा रहना पड़ेगा।… और आदमी कह रहा था कि वह कहाँ से लाये। जो भी है, पहली तारीख तक भूखा रहना ही पड़ेगा।

‘मैं तो भूखी रह लूँगी, पर बच्चों का क्या होगा।’

‘बच्चे जाएँ भाड़ में… अच्छा बाबा, देखता हूँ। दो-चार के पाँव पकड़ूँगा। कहीं से उधार मिला तो ले आऊँगा।’ कहकर आदमी बाहर निकला तो सामने मैं खड़ा था। मैंने झोली फैला दी—दाता तुम्हारी मुराद पूरी करे बाबू साहब’ उसने मुझे पचास पैसे दिये और दिनभर मैंने जिससे भी माँगा, किसी ने खाली हाथ नहीं लौटाया। बड़ा कर्मोंवाला आदमी लगता है।”

“छोड़ यार,” पहले भिखारी ने टोका, “क्यों मजा खराब करता है! चल उठा, और पी।”

दोनों ने अपने मग एक ही साँस में खाली कर दिए। फिर वे बैठे सुल्फे से चिलम फूँकते रहे। थोड़ी देर बाद दूसरे भिखारी को जैसे कुछ याद आ गया। वह एक जोरदार कश लगाकर कुछ खाँसने के बाद वहीं पसरता हुआ बोला, “यार, दिल कहता है, दो-चार किलो आटा लेकर उसके घर दे आऊँ!”  

अंतिम गरीब

दरबान ने आकर बताया कि कोई फरियादी उनसे जरूर मिलना चाहता है। उहोंने मेहरबानी करके उसे भीतर बुला लिया। फरियादी झिझकता-झिझकता उनके दरबार में पेश हुआ तो वे चौंक पड़े! उन्हें आश्चर्य हुआ कि वह वहाँ कैसे आ गया? फिर यह सोचकर कि उन्हें भ्रम हुआ है, उन्होंने पूछ लिया, “कौन हो?”

“मैं वही गरीबदास हूँ सरकार…!”

“गरीबदास तुम! तुम्हें तो मैंने दफन करवा दिया था!”

“भूखे पेट रहा नहीं गया माई-बाप! इसलिए उठकर चला आया।”

“अब, क्या चाहते हो?”

“कुछ खाने को मिल जाए हुजूर!”

“अभी देता हूँ।” उसे आश्वासन देकर उन्होंने सामने, दीवार पर टँगी अपनी दुनाली उतार ली।

“यह लो, खाओ!” दुनाली ने दो बार आग उगल दी। गरीबदास वहीं ढेर हो गया।

“दरबान! इसे लेजाकर दफना दो। इस कमीने ने तो तंग ही कर दिया है।”

दूसरे दिन, जब वह गरीबी उन्मूलन के प्रारूप को अंतिम रूप दे रहे थे, तो दरबान हड़बड़ाया हुआ-सा कमरे में आ घुसा। उसकी घिग्घी बँधी हुई थी।

“मरे क्यों जा रहे हो?” उन्होंने डाँटा।

“हुजूर, हुजूर!…” दरबान ने भयभीत आँखों से बाहर, द्वार की ओर संकेत करते हुए कहा, “वही फरियादी फिर आ पहुँचा है!”

समकालीन हिन्दी लघुकथा इतिहास के पन्ने-4

 


  
 कुछ काम अचानक ही रचनात्मक रूप ले लेते हैं। कथाकार-पत्रकार कमलेश भारतीय ने कहा--1992 में स्वदेश का दीपावली 1973 के अवसर पर प्रकाशित 'लघुकथा का विशेष खण्ड'प्रकाशित उनका लघुकथा संग्रह स्वयं उनके पास ही नहीं है। मैंने कहा--मेरे पास है। कल उसकी स्कैंड कॉपी उन्हें भेजी तो विचार आया और उनसे पूछा कि इस पूरी पुस्तक को 'जनगाथा' पर दे दिया जाए। उन्होंने सहर्ष अनुमति दे दी। कल रात ही युगल जी द्वारा संपादित-प्रकाशित 'फलक' के दो अंकों से भी आपको परिचित कराया।  
इस  बार डॉ॰ शकुन्तला किरण के सौजन्य से प्राप्त, इन्दौर और ग्वालियर से प्रकाशित होने वाले पत्र 'स्वदेश' के दीपावली पर्व 1973 में 'लघुकथाओं का विशेष खण्ड' शीर्षक से प्रकाशित साहित्यिक पुस्तिका। यहाँ पर उक्त  पुस्तिका के केवल उन पन्नों को ही दिया जा रहा है, जिन पर लघुकथाएँ प्रकाशित थीं। 
अब मैं इस शृंखला को 'समकालीन हिन्दी लघुकथा इतिहास के पन्ने' नाम दे रहा हूँ और उम्मीद करता हूँ कि इससे विशेषत; समकालीन लघुकथा के जिज्ञासुओं और शोधार्थियों को यथेष्ट मदद मिलेगी।
'जनगाथा'  पर इस शृंखला की शुरुआत डॉ॰ अनिल शूर के सौजन्य से प्राप्त  डॉ॰ सुरेंद्र मंथन के प्र्थम लघुकथा संग्रह 'घायल आदमी' से मानकर चल रहा हूँ। इस प्रकार यह उक्त शृंखला की 4थी कड़ी है।