Thursday, 2 July 2020

दर्द काल—पाँच लघुकथाएँ / डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति


चित्र साभार गूगल से
लॉकडाउन की औचक घोषणा चौंकाने वाली थी क्योंकि इसमें ‘ब्लैकमनी’ जैसा कोई मसला कहीं से भी नहीं था। कोरोना के संदर्भ में यह निर्विबाद सत्य है कि सरकार से प्राथमिक स्तर पर चूक हुई। इस ‘बीमारी’ का वायरस 100 प्रतिशत विदेश से आया या आ रहा था। इसलिए उचित और आसान उपाय यही था कि विदेश से आने वाली सभी फ्लाइट्स को रोका जाता। जो आ चुके थे, देशभर के विमानपत्तन स्थलों को इस प्रकार सील किया जाता कि विदेश से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 14 दिन के लिए क्वारंटीन होना ही होगा। सम्भवत: मात्र 1 माह की इस ‘राष्ट्रीय शर्त’ से देश उस उथल-पुथल और अवांछित मारा-मारी से बच जाता, जिसमें वह अनावश्यक रूप से उलझ गया। देश के महानगरों से जो मजदूर-पलायन हुआ, वह निश्चित रूप से नहीं होना चाहिए था और उसे रोका जा सकता था। अगर योजनाबद्ध काम होता तो किसी भी राज्य के किसी भी मुख्यमंत्री को अपने राज्य के रहवासियों को दिल्ली, कोटा, अहमदाबाद, मुम्बई आदि से लाने के लिए 10,000-20,000 बसें लगाने की आवश्यकता न पड़ती। यह मैं लिख रहा हूँ, क्योंकि गलत महसूस होने के बावजूद आदेश-पालन की दिशा में सरकार को भरपूर सहयोग देने के साथ-साथ अपनी पीड़ा और असहमति व्यक्त करने के अधिकार को मैं खो नहीं सकता हूँ। 
महानगर छोड़कर पैदल ही गाँव जाने को विवश हुए मजदूरों के कष्ट पर 5 लघुकथाएँ डॉ॰ श्यामसुंदर दीप्ति से प्राप्त हुई हैं, जो आप सब के अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं—बलराम अग्रवाल


डॉ॰ श्याम सुन्दर दीप्ति
दर्द काल : 1
मुंडेर पर बैठे कौवे को काँव- काँव करते देख,  माँ खुशी से बोली, "आज अपना दर्शी आवेगा। कई दिन से आँख भी फड़के थी। " फिर बहू की तरफ देखती बोली,  "सुना ना तूने, कौवा बोल रहा है।"
सुदर्शन घर का चूल्हा जलता रखने के लिए माँ व नौजवान पत्नी को गाँव छोड़, राजधानी में काम करता है।  साल दो साल बाद ही आना होता, किसी तीज-त्यौहार।
''माँ, तुझे बताया तो था रात को, चल पड़े हैं;  अभी लगेंगे पाँच-सात दिन पहुँचने में।  अभी तो आधी राह भी नहीं हुई है। " सितारा ने माँ को  समझाया। उसकी  सुदर्शन से बात हुई थी कि तालाबंदी के कारण फैक्ट्री बंद हो गई है और रहने-खाने का प्रबंध नहीं है तो सभी पैदल ही चल दिए हैं।
''तो फिर कौवा ऐसे ही… ?" माँ बुड़बुड़ करती  अपनी चारपाई पर जा बैठी।
 कुछ समय बाद सायरन की आवाज वाली गाड़ी सुदर्शन के घर के आगे आकर रुकी और एक  भीड़ इकट्ठी हो गई।
तालाबंदी गाँव में भी थी,  पर सब-कुछ सामान्य था।  बीमारी अभी देश की खबरों में ही थी, गाँव  में नहीं।
सायरन की आवाज़ से सितारा और माँ  भी दरवाजे पर आ गईं।
भीड़ में से कोई बोला, '' अरे दर्शी की लाश!… बेचारा!!"
 माँ को सिर्फ ‘दर्शी’ सुना और वह खुश होती बोली, "सितारा मैं कहूँ थी ना, कोवा झूठ नहीं बोलता! मेरा दर्शी आ गया है।" और भीड़ की तरफ लपकी तो उस भीड़ ने उसे रोका और वापिस घर के अंदर ले आई।

दर्द काल : 2
राम बिहारी रात भर परेशान रहा। नींद भी पूरी तरह नहीं आई और सुबह मालिक को फैक्ट्री में आया देख, उसके पास जा पहुँचा ।
फैक्ट्री मालिक प्रभात, चेहरे पर मास्क से ही उसकी परेशानी को समझते हुए बोला, "क्या बात, कोई दिक्कत ?"
"नहीं साब,  सारी व्यवस्था ठीक है।" और फिर धीरे-धीरे  बोलने लगा, "माँ का फ़ोन आया था रात को। बहुत डरी हुई है।"
"तूने बताया नहीं यहाँ का हाल?" प्रभात ने कहा।
“बताया था मालिक।  पहले दिन ही बता दिया था, रहने-खाने की कोई परेशानी नहीं।" फिर जरा रुककर भरे गले से बोला, "रात तो माँ रोने लगी, रोते-रोते बोली, तेरा मुँह देखे बिना ही मर जाऊँगी।”
"अरे समझाना था ना।"   प्रभात ने उसकी परेशानी समझते हुए भी दिलासा दिया।
“बहुत समझाया। रोज़ ही समझाता हूँ, पर माँ  है ना साब।"
"अभी तो बीमारी गाँवों तक पहुँची  नहीं है,  है ना! फिर भी?" प्रभात ने कहा।
 "हाँ साब,  पर तालाबंदी ने दिमाग भी बंद कर दिया है। अखबार, टीवी, हर तरफ  एक ही बात, डर तो  है ही ना।” राम बिहारी ने बात रखी।
 "वो तो तू सही कह रहा है। डरे तो सभी हुए हैं।"
"साब, मैं कहने आया था कि मैं जाना चाहता हूँ।"
"कैसे जाऐगा… सब कुछ तो बंद है।"
 " जैसे तैसे… धीरे-धीरे पहुँच जाएँगे।  कई साथी हैं मालिक।"
 "अरे  क्यों जान जोखिम में डालकर जाएगा!"
 "जान तो यहाँ  भी जोखिम में है साहब। बीमारी का क्या कोई पता है।"
प्रभात  चुप  रहा ।
"सच कहें  मालिक, मुझे भी डर लग रहा है। मैं भी गाँव में अपने घर में ही सबके बीच…” कहते हुए उसका रोना  निकल गया। 

दर्द काल : 3
वह अपने पति से फोन पर बात कर रही थी। दो दिन से एक वक्त की रोटी खाकर गुजारा करने का दर्द और ऊपर से पति से मिल रहा  समाचार, उसकी बातों और चेहरे पर स्पष्ट से।
माँ ये सब देख बोली, "क्या कहत है बिटवा।  क्या कुछ पैसा भेज रहा है या नहीं। काहे दिल छोटा करती है।"
उसने खीझते हुए कहा , "ले तू खुद ही सुन ले।"  और फोन उसको पकड़ा दिया।
 "मुझे काहे दे दिया! मुझे कब समझ आवे है इसमें बात!!"  बुड़बुड़ाती हुई फोन को सीधा-उल्टा करते कान में लगाती, बस इतना ही बोली, “बिटुवा!” तो उधर से जवाब आया, "हाँ, मैं कहे था कि वापस लौट रहा हूँ। देखो, पहुँच ही जाएँगे।"
माँ को ‘वापसी’ शब्द ही  सुना तो बोली, "वापस काहे को!  अरे जिद्द करके तो गया था चाचा के साथ। अब  का ?"
"माँ, यहाँ बीमारी फैल गई है।"
"बीमारी? तो क्या?  दो-तीन रोज़ में ठीक हो जाएगा।  अभी तो काम मिला था तेरे को, बहू बताये थी।"
 "माँ, वह नहीं; एक नई बीमारी है, करोना।  लछमी को बता दिया है बस।" बेटे ने समझाने की कोशिश की।
माँ को करोना शब्द  सुना और फिर उसी धुन में लगी बोलने, "करोना! मालिक तो काम करने को कहेगा। करो ना फिर। काहे नहीं करता बिटुवा।"
बेटा भी खीझने लगा कि लछमी ने माँ को फोन क्यों थमा दिया। वह फिर समझाने लगा, "माँ, काम तो करे जा रहे थे। बीमारी आ गई तो मालिक ने सब को भगा दिया। "
माँ ने बात जारी रखी, "भगावेगा ही मालिक। काम नहीं करोगे तो, काहे हरामखोरी करें हैं वहाँ भी!"
 अब साथ खड़ी बहू को भी गुस्सा आने लगा। उसने माँ से फोन छीनते हुए कहा, "हो गई तसल्ली!"
और फिर भूख का प्रश्न आ खड़ा हुआ, जिसका इंतजाम होता कही नजर नहीं आ रहा था।


दर्द काल : 4
"उतरो सब !"  यह आवाज रामू की थी, जिसने सभी  को घर तक पहुँचाने के लिए एक ट्रक वाले से बात कर, यह  बंदोबस्त किया था।
सभी उतरने लगे तो करीम बोला, " काहे! गाम आई गवा?"
"अरे, उतरो-उतरो जल्दी, खाली करना है ट्रक।" ऐसी आवाजें आ रही थीं और रामू सबको एक तरफ  इकट्ठा कर रहा था।
करीम नीचे उतरा तो  दाएँ-बाएँ देख एकदम बोला, "यह तो अपना देस नहीं आया है। कहाँ आया है अपना गाम अभी।"
 "अरे चुप रह। अभी अपने देस का बारडर आया है।  ट्रक वाला उसे लाँघकर फिर बैठावेगा।"
  "काहे ! बारडर कैसा ! नहीं यह धोखा है।" करीम चिल्लाया  और वापस  ट्रक पर चढ़ने को लपका।
"चिल्ला मत, पुलिस खड़ी है। जाँच करती है ट्रकों की। हम  पैदल निकलेंगे एक तरफ से। "
"नहीं-नहीं, झूठ बोल रहे हैं सब।  मुझे अपने देस जाना है,  मैं नहीं उतरुँगा।"
"खुशी चाचा ! समझाओ इसे। कोई लफड़ा करेगा।" रामू बोला। 
 वह लगातार चिल्लाए जा रहा था--"नहीं-नहीं, मुझे बारडर के पार नहीं जाना है, अपने देस  जाना है। "
"अरे! काहे पागलों-सी बातें कर रहा है? अपने देस ही  जाएँगे सब।"
"पागल तो वह बना रहा है, क्या नाम है उसका रामू।  झूठ है, धोखा,  बुद्धू मत बनाओ।  पहले कभी नहीं आया बारडर।  शहर से सीधी  गाड़ी चलती थी गाँव को। कभी बारडर  नहीं आया।"
सभी उसे रोकने, पकड़ने और दबोचने को लगे थे। पर, वह पूरे जोर व जोश से ‘झूठ, धोखा,  नहीं जाना बारडर पार’ ही बोले जा रहा था।

दर्द काल : 5
फोन की घंटी बजी।  उसका हाथ एकदम जेब की तरफ गया। कल रात उसे लगा था कि इसकी बैटरी खत्म हो गई है। शायद दस दिन से चलते  हुए भूख, प्यास और थकावट के कारण  ऐसा लगा होगा।  कुछ भी तो नहीं था राह में।
हाँ, एक पछतावा। आत्मग्लानि। तौबा।  राजधानी छोड़कर गाँव लौटने की नहीं,  तौबा इस जिंदगी से।  साँसों के साथ हो रहे व्यवहार से।
समझ नहीं आ रहा था, एकदम से ये क्या हो गया। सब-कुछ तहस-नहस हो गया। राजधानी से बनाया रिश्ता, एक विश्वास। कोई हाथ थामने  वाला नहीं।  भूख से दिमाग भिन्ना रहा था और बिगड़ती जा रही थी दिल की धड़कन।
सोचते-सोचते  फ़ोन कान को लगाया जो कि गाँव से था।
"हाँ भाई !  बोल।" एक  निराश आवाज।
"मैं क्या बोलूँ,  तू बोल। कहाँ पहुँच गया?" भाई पूछ रहा था।
"क्या बताऊँ! कुछ भी समझ मेँ नहीं आ रहा है।  बीच मँझधार मेँ ही है।"
"अरे! क्या हो गया?  बड़ी मरियल-सी आवाज है! और ये क्या मंझधार…!! "
"छोड़ भाई इस कहानी को।" वह धीरे- धीरे कदम घसीटता बोला।
"चल फिर, ये बता कब पहुँच रहा है ?" भाई ने सवाल किया।
"कहाँ ?"
"अरे गाँव, घर! और कहाँ?"
तेज़ दुपहरी और सीमेंट की शाह सड़क।  तेज रफ़्तार मेँ गुजरती गाड़ियों मेँ उसकी थिरकती आवाज़… "साँस रहेगी तो जरूर…" और उसका संतुलन बिगड़ गया।  साथ चलते भाई ने थामा और उसे गंजी सड़क के किनारे जा लेटाया।
# 97, गुरु नानक एवेन्यु, अमृतसर, 98158 08506

Wednesday, 1 July 2020

महेश दर्पण की लघुकथाएँ


महेश दर्पण ने लघुकथा-लेखन में आठवें दशक में ही पदार्पण कर लिया था। तभी से उन्होंने जीवन के बेहद नजदीक की लघुकथाएँ इस विधा को दी हैं। उनका पहला लघुकथा संग्रह 'मिट्टी की औलाद' (1997) और दूसरा 'हमारा समय' (2015) चर्चित रहे हैं। ये चारों लघुकथाएँ कथाकार बलराम द्वारा चार खंडों में संपादित 'बीसवीं सदी की लघुकथाएँ' (2003) के तीसरे खंड 'पाप और प्रायश्चित' से साभार उद्धृत हैं। इनमें आप मनोभावों की बारीक बुनावट के साथ नौवें और दसवें दशक के लघुकथा-लेखन की खनक भी सुन सकते हैं।


मन का चोर
महेश दर्पण
“मैं बाल कटवाने जा रहा हूँ। तुम तब तक बर्तन माँजकर कमरों में झाड़ू लगा लेना। और हाँ, मुझे आने में देर हो जाए तो ताले लगाकर चाबी पड़ोस में दे जाना।” कामवाली को समझाकर मित्र के साथ मैं घर से बाहर हो लिया।
मित्र को मेरी यह लापरवाही कतई पसंद न आई।
“तुम्हें पता नहीं, कैसे होते हैं ये लोग? पहले तो विश्वास जीत लेंगे आपका और फिर एक रोज चूना लगाकर चलते बनेंगे। पूरा घर इस तरह खुला छोड़ आना भी कोई समझदारी होती है?”
“अपने यहाँ रखा ही क्या है यार! कोई चाहेगा भी तो क्या ले जाएगा?” मैंने आदतन उसे चुप करा दिया।
बाल कटवाते वक्त अनायास ध्यान हो आया कि अलमारी में 700 रुपये यों ही छोड़ आया हूँ। अलमारी बंद हो, सो भी नहीं। मित्र का कहा बार-बार कानों में बजने लगा। उसके चेताने पर भी तो मैं... पर अब किया ही क्या जा सकता था!
बाल कटवाकर आदत के ठीक विपरीत पाँव मुझे सीधे घर खींच ले गए। पड़ोस से चाबी लेकर ताला खोलने के बाद पहला काम मैंने पर्दा हटाकर अलमारी देखने का किया। 100 - 100 रुपये के साथ नोट ठीक उसी तरह करवट लिए निश्चिंत पड़े थे, जैसा मैं उन्हें छोड़ गया था। घर पहले से कहीं ज्यादा ठीक-ठाक नजर आ रहा था। मैं सोच ही रहा था कि बेकार उस भली औरत पर शक किया कि वह फिर आ पहुँची, “आ गए बाऊ जी! डॉक्टर साहब के याँ जा रई थी। गेट खुला देखा, तो मैंने कही, जरा देख लऊँ, गर्मी के दिनन में चोरी-चकारी का डर रहवै है न!” कहकर वह तो चली गई, पर मैं देर तक शीशे के सामने सिर झुकाए खड़ा रहा।

शहर-बाजार
बाजार की चमक रामदीन की कल्पनाओं तक को मात कर गई थी। पहनने-ओढ़ने से लेकर खाने-पीने तक, और खेलने-कूदने से लेकर दुनिया-जहान तक... कौन-सी चीज थी, जो वहाँ मौजूद न थी!
‘यहाँ सँभल कर रहना जरूरी है!’ रामदीन ने सोचा और अपनी टेंट को सँभालते हुए निश्चिंत हो गए। किसी ने चलते समय कहा जो था—‘देखते-देखते जेब कट जाती है शहर में!’
फ्रॉक उठाकर देखा-भर तो था रामदीन ने। जाने कैसा पहाड़ टूट पड़ा—“पैसे निकाल जल्दी!... घंटे भर से कपड़े खराब कर रहा है।” पास ही खड़े एक युवक ने कहा।
खरीदार की हैसियत से रामदीन कुछ कहते, इससे पहले ही दूसरा युवक सामने आ गया, “अरे, ये तो उठाईगीर है... उठाईगीर!”
रामदीन अपने आप को इज्जतदार आदमी बताते, उससे पहले ही बगल की दुकान से उठकर आया युवक उनका दायाँ हाथ थाम चुका था, “क्यों बे, कपड़ों पर हाथ साफ करने आया था?”
“नहीं भैया, मैं तो खरीदने के ताईं देख रहा था... ” रामदीन की आवाज बेहद सहमी हुई थी।
“खरीदने के लिए!” युवक ने दूसरा हाथ रामदीन के बाएँ कंधे पर रख दिया, “खरीदना है तो निकाल पैसे... या फिर बुलाऊँ पुलिस को?”
बेबात पुलिस का झंझट सिर पर आता देख रामदीन की घिग्गी बँध गई। उन्होंने टेंट से निकाल कर देखे तो कुल जमा 40  रुपये थे। ‘घर भी तो लौटना है!’... सोच ही रहे थे कि तीनों युवक करीब-करीब एक साथ आगे बढ़े। एक ने झपटकर उनके हाथ से 10-10 के चार नोट छीन ही तो लिए। बेबस, भौंचक देखते रह गए रामदीन। अँधेरा ही अँधेरा उनकी आँखों के सामने घिर आया था।
“यह ले 5 रुपये!... और हो जा उड़न छू!” दुकानदार ने उनकी तंद्रा को तोड़ा तो वे 5 का नोट मुट्ठी में जोर से भींचे पस्त चाल से आगे बढ़ लिए। चलते-चलते कुछ देर तो वे मोमिया थैली में से बार-बार फ्रॉक को निकालकर देखते रहे, फिर उसे थैले में रख अपने भीतर खो गए। उन्हें पता ही न चला कि चौक पर एक ही जगह कितनी देर खड़े रह गए थे।
“ए, खाली हो? सामान ले जाना है!” कोई शहरी बाबू पूछ रहा था।
रामदीन ने एक नजर बाबू पर दौड़ाई और फिर अपने भीतर लौट गए... ‘अरे बाप रे! यहाँ तो एक जगह चुपचाप खड़ा होना भी गुनाह है!! कौन जाने कोई आके हमारी कीमत ही पूछने लगे!!!’ उन्होंने खुद से कहा और तेज चाल से स्टेशन की तरफ चल दिए।

एहसास
8 महीनों बाद उसे यह मौका हाथ लगा था। शीशे के सामने खड़ा वह चेहरा निहार रहा था। उसे लगा कि कनपटी पर के बालों में सफेदी उभर आई है और मूंछ के बाल बेतरतीब बढ़े चले जा रहे हैं। दाढ़ी पर हाथ फिराते हुए तो उसकी हँसी ही छूट गई। घर से दफ्तर और दफ्तर से घर के बीच झूलते हुए वह अपने आप से ही मिल नहीं पाता था।
पत्नी जाने कब पीछे आ खड़ी हुई थी। जैसे ही उसने अपनी ठोड़ी उसके कंधे पर रखी, वह घबरा गया। तभी उसे शीशे पर पत्नी का चेहरा नजर आ गया।
“आज कोई खास बात नजर आती है।” पत्नी ने चेहरा घुमाकर पूछा।
“हाँ, खास बात तो है ही!” कहते हुए वह पत्नी की आँखों में तैरने लग गया।
“क्या बात है? जल्दी बताओ।” इस बार पत्नी उससे सट ही गई।
“देखते-देखते कितना वक्त गुजर गया न! अपनी शादी को पूरे 10 साल हो गए!” उसने कहा और पत्नी का चेहरा गौर से देखने लगा।

तर्क
सिगरेट सुलगाकर अभी वह पहला कश ही ले पाया था कि सामने से आती चाची दिखाई दे गई। साथ में चल रही औरतों के संग बातचीत में मशगूल होने की वजह से चाची का ध्यान उस तक भले ही न पहुँचा हो, मगर धुआँ उसके नाक और गले के बीच घूम रहा था। सिगरेट को उसने तुरंत उँगलियों के घेरे में छिपा लिया। एक मन हुआ कि झट से सिगरेट को फेंक चाची के हाल-चाल पूछ ले, तभी दूसरा मन सामने आ खड़ा हुआ—‘पूरे 1 रुपए की सिगरेट है!  इस तरह सब का लिहाज करते रहे तो जीना दुश्वार हो जाएगा!’
चोर आँखों से उसने देखा, चाची अब महज दस-पाँच कदम दूर रह गई थी। गनीमत बस यही थी कि अब तक उनकी नजर उस पर नहीं पड़ी थी।
उसके भीतर तर्क का एक तिनका उठ खड़ा हुआ—‘शर्म तो आँखों की होती है यार! चाची ने मुझे देखा ही नहीं तो फिर काहे की शर्म!!’
पल भर में, बिजली की-सी फुर्ती से, जब तक चाची उसके करीब पहुँचती, उसने पीठ फेर ली!
संपर्क—सी-55, गली नं॰ 5, सादतपुर विस्तार, दिल्ली-110090 / मो 90132 66057