Saturday, 19 September 2020

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में…7 / डॉ॰ उमेश महादोषी

 दिनांक 18-9-2020 से आगे

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में आत्मिक और दैहिक अस्तित्व का तात्विक विवेचन

सातवीं कड़ी


पात्र/चरित्र

सामान्यतःकथा रचनाओं में पात्र चरित्र के रूप में मौजूद होते हैं। लेकिन लघुकथा में ऐसा नहीं है। लघुकथा में समस्या या समस्यात्मक स्थिति एवं अनुभूति प्रमुख होती है, चरित्र नहीं। इसलिए पात्र लघुकथा की क्रियाशीलता को बढ़ाने में सहायक होते हैं, उसके केन्द्रबिन्दु नहीं। पात्रों की क्रियाशीलता कथा में प्रायः कुछ न कुछ स्पेस माँगती है, संख्या में पात्र जितने अधिक होंगे, रचना का आकार और शिथिलता उतनी ही बढ़ती जायेगी। इसलिए पात्रों की संख्या आवश्यकनुरूप कम से कम किन्तु सक्रियता यथाधिक होनी चाहिए। पात्र जितने अधिक सक्रिय और प्रभावशाली होंगे, लघुकथा की कथा भी उतनी ही अधिक क्रियाशील और प्रभावशाली होगी।

      लघुकथा के विधागत स्वभाव के सानुरूप होने के लिए भी पात्रों की क्रियाशीलता स्वतन्त्र, समस्या या अनुभूति और उनके कारणों को उभारने वाली, उसकी सघनता और रचना के प्रभाव को बढ़ाने वाली होनी चाहिए। स्वतन्त्र क्रियाशीलता से आशय यह है कि पात्रों की भूमिका कथा में स्वाभाविक और आवश्यकतानुसार उद्भूत हो। लेखक का हस्तक्षेप उसी स्थिति में हो, जब कोई दूसरा विकल्प मौजूद न हो। रचनाकार की लेखकीय दक्षता का एक बिन्दु यह भी होता है कि वह पात्रों को कथा को क्रियाशील बनाने में कितनी स्वतन्त्रता दे पाता है। प्रायः जहाँ पात्रों की संख्या, उनके नाम, उनके परिचय से जुड़ी जानकारी, उनकी भाषा, वेष-भूषा, स्वभाव और उनके अन्दर चलने वाला चिंतन-मनन-उद्वेलन आदि कथा की आवश्यकतानुरूप होते हैं और उनका प्रकटीकरण वातावरण तथा कथा की क्रियाशीलता में से होता है, वहाँ कथा अधिक स्वाभाविक और प्रभावशाली होती है। जहाँ रचनाकार स्वयं इस कार्य में संलग्न हो जाता है, वहाँ लघुकथा में स्वाभाविकता और अपेक्षित प्रभाव नहीं आ पाता है। कुछ लोग इस बात को लेखक की आजादी में हस्तक्षेप मानते हैं। ऐसे मित्रों को समझना चाहिए, लेखक की आजादी रचना के सृजन में निहित होती है, अपने ही द्वारा सृजित रचना के पात्रों को निष्क्रिय बनाने और उनके कार्य में हस्तक्षेप करने में नहीं। लेखक अन्ततः रचना का लेखक होता है, रचना के तत्वों का संयोजक, पात्रों का बॉस या मार्गदर्शक नहीं। लेखकीय प्रेवश पर डॉ. बलराम अग्रवाल द्वारा प्रेरित बहस को इस सन्दर्भ में देखा जा सकता है।

      तीसरी बात, पात्रों की रचना भी कथा की आवश्यकतानुसार लघुकथा के तमाम तत्वों के संयुग्मन से जनित कथा-शक्ति द्वारा हो न कि कथाकार द्वारा अपनी सुविधा और इच्छानुसार। यह स्थिति अधिक उपयुक्त और स्वाभाविक होगी। 

 संवाद

      लघुकथा में प्रभाव पैदा करने वाले महत्वपूर्ण अवयव होते हैं संवाद। संवाद, यानी वार्तालाप, जो कथा के विभिन्न पात्रों के मध्य कथा-विषय के सम्बन्ध में होता है। संवादों को कथा की आवश्यकता एवं विषय तक सीमित और कथा को उसके चरम की ओर ले जाने के साथ कथ्य के रूपाकार लेने और प्रकटीकरण के साथ उसको ऊर्जावान बनाने में सहायक होना चाहिए। उन्हें अनावश्यक चीजों में नहीं उलझाना चाहिए।

      संवादों में प्रयुक्त भाषा पात्रों के साथ, स्थान और समय के भी अनुरूप हो। सहज, सरल किन्तु मारक/व्यंजनात्मक प्रभाव वाले संवाद लघुकथा के प्रभाव को गुणित करते हैं। समीक्षा की दृष्टि से संवादों की उद्देश्यपरकता के साथ स्वाभाविकता, संगतता और प्रभावशीलता की पड़ताल होनी चाहिए।

 03. भाषा : संगतता, सामयिकता और प्रभाव

      भाषा में दो चीजें होती हैं- प्रकार और प्रकृति। भाषा का प्रकार अभिव्यक्ति का सामान्य माध्यम होता है, उसका महत्व भी उतना ही सीमित होता है। भाषा की प्रकृति रचनात्मक स्तर पर व्यापक महत्व की होती है। प्रकृति की दृष्टि से अपने प्रभाव के साथ शब्दों और संकेतों के ध्वनित और ग्राह्य अर्थ ही भाषा का वास्तविक रूप होते हैं। 

      भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होती है, स्वाभाविक है कि अभिव्यक्ति के प्रकटीकरण एवं सम्प्रेषण में उसकी भूमिका के साथ उसका अभिव्यक्ति की प्रकृति और उद्देश्य के अनुरूप होना भी आवश्यक है। इसी के साथ उसे रचना के वातावरण और पात्रों के अनुरूप भी होना चाहिए। 

      लघुकथा में भाषा या तो पात्रों के संवादों व मनन-चिंतन के माध्यम से सामने आती है या फिर प्रस्तुतकर्ता (नरेटर) की व्याख्या में प्रयुक्त शब्दावली के रूप में। कभी-कभी रचना में ऐसा भी हो सकता है कि कोई पात्र उपस्थित होकर भी न तो बोले और न ही किसी गतिविधि में प्रत्यक्षतः सहभागी बने। इसके बावजूद बहुत कुछ कह जाये। यह भी भाषा का एक रूप होता है, जो मौन या चुप में से या पात्र की स्थिति से प्रस्फुटित होता है और रचना में अपने प्रभाव को प्रदर्शित कर जाता है।

      लघुकथा में स्वाभाविकता, जो अन्ततः उसके प्रभाव को बढ़ाती है, बनाये रखने के लिए भाषा को रचना की प्रकृति, उद्देश्य एवं वातावरण की आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। पात्रों द्वारा प्रयुक्त भाषा का पात्रों के चरित्र, परिवेश एवं योग्यतानुरूप होना भी आवश्यक है। एक अनपढ़ व्यक्ति की भाषा शिक्षित व्यक्ति से अलग होगी। प्रेम लघुकथा की भाषा विसंगतियों की अभिव्यक्ति एवं शोषण से जनित आक्रोश की भाषा से अलग होगी। हिन्दी में लघुकथा सृजन करते हुए भारत के पंजाब प्रान्त की भाषा बिहार प्रान्त की भाषा से अलग होगी।   

      यहाँ एक बात मुझे बहुत जरूरी लगती है कि यदि हम लघुकथा का वातावरण और पात्र हिन्दीतर क्षेत्रों (जहाँ हिन्दी को बहुत कम समझा जाता है) से सम्बन्धित हैं और रचना को हम पूरी तरह हिन्दी की ही बनाए रखना चाहते हैं तो मूल हिन्दी के प्रयोग की बजाय अनूदित (उस भाषा से) जैसी हिन्दी (एक्सप्रैशंस आदि को ग्रहण करके चलने वाली) अथवा हिन्दी में समझे जाने योग्य उस भाषा के शब्दों का हिन्दी में मिश्रण करके प्रयोग करें, तो अधिक उचित होगा। इससे एक ओर पाठक रचना-पाठ के समय रचना की स्थानीयता से जुड़ा रहेगा, दूसरी ओर रचना की विश्वसनीयता के खण्डित होने का अवसर नहीं रहेगा।

 04. शैली : संगतता, सामयिकता और प्रभाव

      कथात्मक रचनाओं में शैली कथा के प्रस्तुतीकरण की कला होती है। शैली कथाकार कीे कलात्मकता का संकेत भी होती है और रचना की आवश्यकता भी। एक लेखक जिस तरह की लघुकथा के लिए वर्णनात्मक या व्याख्यात्मक शैली का उपयोग कर सकता है, दूसरा उसी तरह की रचना के लिए संवाद शैली का। कुछ लघुकथाओं या कुछ दृश्यों के कन्टेंट ऐसे होते हैं, जिनके लिए कोई विशेष शैली ही उपयुक्त हो सकती है। सामान्यतः संवाद शैली को लघुकथा के लिए अधिक प्रभावशाली माना जाता है। संवाद शैली में लघुकथा का विषय, उद्देश्य, वातावरण, कथ्य - सबकुछ संवादों के माध्यम से ही प्रकट होता है, अतः इस शैली में लघुकथा के कन्टेंट के साथ पात्रों के व्यवहार और गतिविधियों में भी लेखक के हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं रहती। इससे लघुकथा में स्वाभाविकता अधिक आती है और उसका प्रभाव भी बढ़ता है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि हर लघुकथा संवाद शैली में नहीं लिखी जा सकती। संवाद शैली के दूसरे रूप चैट शैली में भी आजकल सफल लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं।

      सामान्यतः अन्य शैलियों के साथ संवाद का मिश्रण ही देखने को मिलता है। विशुद्धतः वर्णनात्मक शैली में लिखी लघुकथाएँ बहुत अधिक प्रभाव नहीं छोड़ पाती हैं। प्रतीकों व बिम्बों के माध्यम से रचना में अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव आ जाता है, वशर्ते प्रतीक/बिम्ब क्लिष्ट न हों। पत्र शैली में लघुकथा-सृजन कम हुआ है लेकिन इसमें प्रभावशाली सृजन हो सकता है।

      कथा में काव्यात्मक शैली का प्रयोग भी उसके प्रभाव को बढ़ाता है, लेकिन कथा पर काव्यात्मकता के हावी हो जाने पर क्लिष्टता आने का खतरा बढ़ जाता है। 

      पाठकों से तारतम्य बनाने के लिए लघुकथा में उन्हें सीधे सम्बोधित करने की शैली भी अपनाई गई है, यद्यपि उसका अपेक्षित प्रभाव नहीं आ पाया है। वास्तविकता यह है कि लघुकथा की प्रकृति पाठकों से सीधे संवाद के लिए बहुत उपयुक्त नहीं है। हाँ, कोई ऐसी रचना सृजित हो, जिसमें नरेटर और पाठक- दो प्रमुख पात्रों के रूप में आमने-सामने हों अथवा नरेटर (‘मैं’ पात्र) द्वारा पूरी कथा पाठक को एक सम्बोधन के रूप में प्रस्तुत की जाये तो संभवतः कुछ सफलता मिल सकती है। 

      लघुकथा में कई बार दृश्य/दृश्यों की स्थिति काफी महत्वपूर्ण हो जाती है और लेखक को अपनी शैली उसी के अनुरूप तय करनी पड़ सकती है। 

      समीक्षक को विभिन्न शैलियों की पड़ताल रचनात्मकता पर उनके प्रभाव, कथा-सौंदर्य में उसके योगदान के साथ पाठकों को कथा से जोड़ने में सफलता की दृष्टि से करनी चाहिए।

                                                                   शेष आगामी अंक में जारी…

Friday, 18 September 2020

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में…6 / डॉ॰ उमेश महादोषी

दिनांक 17-9-2020 से आगे

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में आत्मिक और दैहिक अस्तित्व का तात्विक विवेचन

छठी कड़ी

ख. लघुकथा के दैहिक तत्वों की पड़ताल

      किसी भी विधा के आत्मिक अस्तित्व, जो उसे स्वनामधन्य बनाता है, को समझने के लिए उसके वैचारिक तत्वों को समझना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है उसकी भौतिक पहचान को समझने के लिए उसके दैहिक तत्वों को समझना। दैहिक तत्व केवल उसकी भौतिक पहचान ही निर्धारित नहीं करते हैं, उसके प्रति आकर्षण में वृद्धि का कारण भी बनते हैं। उसके रचनात्मक सौंदर्य एवं आत्मिक अस्तित्व से जनित प्रभाव को बढ़ाने में सहायक होते हैं। निराकार को साकार बनाते हैं।

      कथा साहित्य की तीनों विधाओं- उपन्यास, कहानी और लघुकथा के दैहिक तत्व दृश्यतः लगभग एक जैसे होते हैं। अन्तर उनके चरित्र में होता है जिसका निर्धारण उनके विधागत स्वभाव से होता है। दैहिक तत्वों के लगभग एक जैसा दिखने के बावजूद उपन्यास का संक्षिप्तीकरण कहानी या लघुकथा में और कहानी का संक्षिप्तीकरण लघुकथा में स्वाभाविक नहीं हो सकता। इसी प्रकार लघुकथा का विस्तार कहानी या उपन्यास को तथा कहानी का विस्तार उपन्यास को स्वाभाविकता और पूर्णता नहीं दे सकता। यद्यपि कई लोग परोक्ष-अपरोक्ष कहते सुने-पढ़े जाते हैं कि अमुक लघुकथा को थोड़ा विस्तार देकर कहानी बनाया जा सकता है या अमुक कहानी को विस्तार देकर उपन्यास बनाया जा सकता है। मेरा प्रश्न है कि यदि ऐसा है तो मूल विधागत तत्वों और विधागत स्वभाव का क्या होगा? और यदि आप ऐसी चीजों को मान्यता नहीं देते हैं तो विधाओं की अलग चर्चा और पहचान क्यों? तीनों विधाओं के मध्य जिन चीजों में आन्तरिक और बाह्य अन्तर दिखाई देते हैं, उनकी चर्चा के स्थान पर उपेक्षा क्यों नहीं की जाती? अस्वाभाविक कुछ भी हो सकता हैे, लेकिन जो स्वाभाविक है, उसे तो पहचानना ही होगा। यदि कोई रचना तात्विक दृष्टि से लघुकथा है तो लघुकथा ही रहेगी, उसे जबरन कहानी नहीं बनाया जा सकता। यदि किसी लघुकथा को कहानी बनाया जा सकता है तो वह या तो लघुकथा नहीं हो सकती या फिर उसको लघुकथा के मूल तत्वों से मुक्त करना होगा। किसी भी रचना में तत्वों की प्रभावी सक्रियता/उपस्थिति यह सुनिश्चित करने में सक्षम होती है कि वह रचना लघुकथा है या नहीं।

      लघुकथा के प्रमुख दैहिक तत्वों में अन्य कथा विधाओं के सापेक्ष कुछ चारित्रिक भिन्नताएँ होती हैं, जो उसके प्रभाव और सौंदर्य में वृद्धि का कारण बनती हैं। समीक्षा की दृष्टि से इन भिन्नताओं के सन्दर्भ में लघुकथा के दैहिक तत्वों को समझना आवश्यक है। 

01. कथानक: आकार और प्रकृति

     चूँकि कथानक कथा में शामिल घटनाओं के अनुक्रम और उन्हें जोड़ने वाले सूत्र की तरह होता है, इसलिए पूरी कथा की प्रकृति और उसके प्रभाव को निर्धारित करने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लघुकथा में घटनाओं की संख्या सीमित होती है, कभी-कभी तो घटनाएँ भाव-विचार के अन्दर समाहित होकर अदृश्य हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में भी कथानक भावों-विचारों को सूत्रबद्ध करता है। किसी विचार या भावपूर्ण लघुकथा को खारिज करने से पूर्व इस बात पर विचार किया जाना चाहिए। दूसरी बात, अपनी विशिष्ट प्रकृति और रचना-प्रक्रिया के कारण लघुकथा कथ्य प्रधान रचना होती है और कथानक कथ्य का वाहक होता है। यह चीज लघुकथा के कथानक में आकार और प्रकृति के सन्दर्भ में विशिष्टीकरण की ओर संकेत करती है। स्वभाविक रूप से लघुकथा के कथानक छोटे और विशिष्ट होते हैं। बहुत लम्बे और शिथिल कथानक ऊर्जावान/प्रभावशाली कथ्य के वाहक नहीं हो सकते। कथानक को यदि अनावश्यक विस्तार दिया जायेगा तो उसमें समय और कथावस्तु से संबन्धित तत्वों का उतना ही अधिक प्रवेश होगा, जिससे कथ्य की ऊर्जा का क्षरण होगा। इसका सीधा आशय यह है कि कथ्य को रूपाकार लेने एवं प्रकटीकरण में समय और कथावस्तु से संबन्धित तत्वों को अवसर अनावश्यक और अनपेक्षित मात्रा/रूप में नहीं दिया जाना चाहिए। कथानक को आकार और प्रभाव की दृष्टि से यथावश्यक विशिष्टता के साथ समापन की ओर जाने देना चाहिए। अनावश्यक चीजों को ठूँसने का अवसर तलाशने से लेखक को बचना चाहिए। बिम्ब, नेपथ्य आदि जैसे तत्व कथावस्तु के विभिन्न अवयवों का भार सीमित करके कथानक को प्रभावशाली बनाने में सहायक होते हैं।

02. कथावस्तु (विषय, घटना, दृश्य, वातावरण, पात्र, चरित्र एवं संवाद): सामयिकता और संगतता 

      लघुकथा में दैहिक रूप से समस्यात्मक स्थिति यानी विषय (लेखन के प्रेरणा बिन्दु के रूप में) और उद्देश्य (लेखन/चिंतन के परिणामी बिन्दु के रूप में, जोकि अन्ततः कथ्य के रूप में अभिव्यक्त होता है) अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। विषय से इतर कथावस्तु के दूसरे अवयव या तो विषय को स्पष्ट करने और आगे बढ़ाने में सहायक होते हैं या फिर कथ्य के रूपाकार लेने और प्रकट होने में। इसलिए रचनात्मक आवश्यकताओं के सन्दर्भ में इन अवयवों में विषय और कथ्य की सानुरूपता (सामयिकता और संगतता) आवश्यक है। 

 विषय

      जीवन से जुड़ी रचना होने के कारण लघुकथा में मानवीय जीवन से जुड़ी सामयिक समस्याओं और परिवर्तनों तथा संवेदनात्मक अनुभूतियों को प्रतिबिम्बित करने वाला कोई भी विषय सृजन का बिन्दु बन सकता है। लघुकथा के विषय का जीवन के सन्दर्भ में व्यावहारिक और मानवीय महत्व होना चाहिए। उसे जीवन से जुड़े किसी सन्दर्भ विशेष पर व्यापक चिंतन एवं विमर्श को आकर्षित करने में सक्षम होना चाहिए। ऐसे विषयों, जिन पर सार्वजनिक धारणाएँ स्थिर हो चुकी हैं, पर लिखी कोई रचना तब तक सार्थक और प्रभावशाली नहीं हो सकती, जब तक किसी नए कोंण से उस पर चिंतन नहीं किया गया हो। जब यह कहा जाता है कि घिसे-पिटे विषयों पर लेखन अधिक हो रहा है तो उसका यही अर्थ होता है कि चिंतन के लिए उन विषयों पर नए कोंणों की खोज संभव नहीं हो पा रही है।

घटना

      लघुकथा में घटनाओं की संख्या नहीं, कथ्य और उसे स्पष्ट करने और उसका प्रभाव बढ़ाने वाले तत्वों/कारकों की रचनागत उद्देश्य के साथ एकरूपता और अन्तरंगता में, उनकी भूमिका आवश्यक है। कई घटनाओं वाली लघुकथाओं में भी इसका निर्वाह करते हुए कथ्य के प्रभाव और सघनता को बढ़ाया जा सकता है। घटनाएँ विषय और कथानक के संगत होनी चाहिए। सामान्यतः लघुकथा में सरल-सहज घटनाओं  की अपेक्षा की जाती है। घटनाओं की जटिलता को लघुकथा की सीमा मान लिया जाता है। लेकिन मुझे लगता है जटिल घटनाओं को लेकर लघुकथा-लेखन हो सकता है और होना चाहिए। इससे लघुकथा के फलक को विस्तार मिलेगा। डॉ. बलराम अग्रवाल की लघुकथा ‘कन्धे पर बैताल’ को इस सन्दर्भ में देखा जा सकता है। घटना की सपाट प्रस्तुति के सापेक्ष उसका दृश्यांकन अधिक प्रभावकारी होता है।

       समीक्षा की दृष्टि से घटना की आन्तरिक सक्रियता की मात्रा और प्रकृति को आवश्यकता और तार्किकता के आधार पर परखा जाना चाहिए। घटना में सक्रियता का रिद्म टूटना लघुकथा को कमजोर बनायेगा।

दृश्य 

      वातावरण सम्बन्धी चीजों के उद्देश्यपूर्ण संयोग के साथ घटना को प्रस्तुत करना लघुकथा में उसका दृश्य रूप होता है। लघुकथा में घटनाओं को जब दृश्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो उसका प्रभाव कहीं अधिक, स्पष्ट और अनुभूतिपरक होता है। इसलिए कुछ अतिरिक्त शब्दों के व्यय के बावजूद रचना का प्रभाव गुणित होता है। लघुकथा के स्वभाव के दृष्टिगत दृश्यों को विषयानुरूप एवं कथ्य के प्रभाव व सम्प्रेषण की तीव्रता में सहायक होना चाहिए। ऐसा तभी हो सकेगा, जब दृश्य का रचाव तार्किक और सौंन्दर्यबोधक दृष्टियों के (उद्देश्यपूर्ण) समन्वय से किया जाये। ऐसे दृश्य अनावश्यक चीजों से बचने के साथ पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करने और उनके अन्तर्मन में अपने प्रति रुचि जगाने में समर्थ होते हैं। दृश्य में अनावश्यक चीजें रचना की तार्किकता का क्षरण तो करती ही हैं, उसके गठन को शिथिल भी बनाती हैं। इसके साथ हमें यह भी समझना आवश्यक है कि प्रत्येक घटना का दृश्य रूप में प्रस्तुत करना सदैव आवश्यक नहीं होता। यदि कोई घटना सांयोगिक किन्तु किसी कारण से आवश्यक रूप में आ रही है, तो सपाट रूप में उसकी यथावश्यक चर्चा पर्याप्त हो सकती है। 

वातावरण

      वातावरण में स्थान, समय, सजीव-निर्जीव वस्तुओं/पिण्डों की उपस्थिति व क्रियाशीलता, भौगोलिक, राष्ट्रीय व सामाजिक परिस्थितियाँ, रिश्तों और उनके प्रभाव से जनित स्थितियाँ आदि जैसे तत्व शामिल होते हैं। ये तत्व कथा की आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ उसकी स्वाभाविकता, प्रामाणिकता एवं जीवंतता को सुनिश्चित करने में सहायक होते हैं। स्वाभाविक है इनकी उपस्थिति, प्रकृति और रूपाकार लघुकथा के दूसरे वैचारिक और दैहिक तत्वों के सानुरूप एवं संगत हों। वातावरण की निर्मिति अत्यंत सजगता और सावधानी के साथ प्रामाणिकता और चिंतन-मनन के उपयोग की अपेक्षा करती है। इसमें होने वाली असावधानी या चूक लघुकथा रचना को हास्यास्पद एवं अविश्वसनीय भी बना सकती है। स्थानीय संस्कृति का प्रभाव वातावरण में परिलक्षित होने से रचना में स्वाभाविकता बढ़ती है और रचनाकार की सामर्थ्य प्रतिबिम्बित होती है। वातावरण की प्रामाणिकता रचना की प्रामाणिकता भी सुनिश्चित करती है। 

      इस सन्दर्भ में मैं अपनी एक रचना से जुड़ा प्रसंग सामने रखना चाहूँगा। मेरी रचना ‘उस खतरनाक मोड़ पर’ में प्रधानमंत्री को पात्र बनाया गया है। एक दिन सुबह उठते ही किसी मंदिर में हो रहे पाठ से दुर्गा चालीसा की पंक्तियों का स्वर उनके कानों में पड़ता है। यह रचना अग्रज डॉ. बलराम बग्रवाल जी को दिखाई तो उन्होंने इस दृश्य से असहमति जताई। चूँकि प्रधानमंत्री जैसे बड़े पदाधिकारियों के आवास भारी सुरक्षा-व्यवस्था और ध्वनि-प्रदूषण आदि जैसी चीजों से मुक्त क्षेत्र में होते हैं, इसलिएं यह दृश्य अविश्वसनीय-सा था। यद्यपि लघुकथा में न तो यह दर्शाया गया था कि प्रधानमंत्री उस दिन कहाँ ठहरे हैं, न ही किसी अन्य कारण से (उस स्थिति तक) लघुकथा की ऐसी कोई माँग थी, तदापि दुर्गा चालीसा की पंक्तियों का स्वर प्रधानमंत्री के कानों तक पहुँचना रचना की माँग अवश्य थी। इसलिए अविश्सनीयता एवं अप्रामाणिकता की गुंजाइश समाप्त करने के लिए मैंने लघुकथा को संशोधित करते हुए उस दिन प्रधानमंत्री का प्रवास एक कस्बे में दर्शा दिया। चूँकि विशेष परिस्थितियों में ऐसा होना संभव है, इसलिए आपत्ति का यथोचित निस्तारण हो गया।

                                                     शेष आगामी अंक में जारी…

Thursday, 17 September 2020

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में…5 / डॉ॰ उमेश महादोषी

दिनांक 17-9-2020 से आगे

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में आत्मिक और दैहिक अस्तित्व का तात्विक विवेचन

पाँचवीं कड़ी

05. विधागत स्वभाव

प्रत्येक विधा का एक (विधागत) स्वभाव होता है, जो उसके रूपाकार और परिणामी प्रभाव को निर्धारित करता है। विशेषतः लघ्वाकारीय विधाओं का स्वभाव एक बड़ी सीमा तक अनुभूति की प्रकृति (तीक्ष्णता) और अभिव्यक्ति व सम्प्रेषण की गति (त्वरित) के संयुक्त प्रभाव से निर्धारित होता है और अन्ततः उस विधा के लघ्वाकार, अर्थ-व्यापकता जैसी विशेषताओं का कारण बनता है। क्षणिका की तरह लघुकथा के लघ्वाकार के बारे में भी ‘समय की कमी’ जैसे जुमले को उछाला जाता रहा है। इस बात को न तो क्षणिका के सन्दर्भ में स्वीकार किया जा सकता है और न ही लघुकथा के सन्दर्भ में। वास्तविकता यह है कि लघुकथा का (और क्षणिका का भी) लघ्वाकार किसी भौतिक प्रयास अथवा आवश्यकता का परिणाम नहीं, उसके स्वभाव से जनित और पूर्णतः स्वाभाविक है। सूक्ष्म रचनात्मक तथ्य की पूर्ण अनुभूति की तीक्ष्णता सदैव अभिव्यक्ति और सम्प्रेषण की त्वरित गति (सतत रूप से गुणित होने वाली) की माँग करती है। यदि रचनाकार की सृजन-क्षमता और हृदयस्थ ऊर्जा का प्रवाह इसके अनुरूप है तो इसका परिणाम रचना के लघ्वाकार के रूप में ही सामने आयेगा। क्षणिका के विपरीत लघुकथा का रूपाकार कुछ बड़ा इसलिए होता है कि यहाँ भाव-विचार का वाहक रूप कथा होती है, जिसके कई दूसरे तत्व भी होते हैं। फिर भी मुझे लगता है कि लघुकथा में हम जिस ‘कथ्य’ नामक प्रमुख तत्व की बात करते हैं, वह क्षणिका के समकक्ष ही होता है। ‘कथ्य’ की शक्ति भी काव्यात्मक होती है, इसीलिए उसका अस्तित्व ‘तीव्र प्रवाह’ के रूप में होता है, जो कभी शाब्दिक अभिव्यक्ति पा जाता है तो कभी लघुकथा के समापन तक पहुँचते-पहुँचते अप्रकट भाव की तरह सम्प्रेषित हो जाता है। 

     जब लघुकथाकार से अपेक्षा की जाती है कि वह किसी कहानी के सार-संक्षेप की तरह लघुकथा को प्रस्तुत न करे तो इसका यही अर्थ है कि वह समस्यात्मक स्थिति से ग्रहीत अनुभूति की तीक्ष्णता को उसकी सम्पूर्णता में अनुभूत करे और उसे परिपक्वता तक पहुँचने दे।  

      एक बात और। लघुकथा का विधागत स्वभाव शिल्प में भी कुछ विशेष अपेक्षा करता है। यह अपेक्षा होती है ‘आवश्यक का स्वीकार, अनावश्यक का अस्वीकार।’ लघुकथा का सम्प्रेष्य कथ्य और पूरा सौन्दर्य उसके स्वभाव और ‘स्वीकार्य आवश्यक’ से ऊर्जा ग्रहण करता है। एक तरह से स्वाभाविक और स्वभावगत अभिव्यक्ति ही लघुकथा के यथार्थ और मर्म की वास्तविक वाहक है। इसके परीक्षण के बिना लघुकथा की समीक्षा अपूर्ण ही होगी और उसका आकार अनपेक्षित होगा।

 06. रचनागत और रचनात्मक चिंतन की पड़ताल

      देखे, सुने और जाने की प्रस्तुति तब तक साहित्यिक नहीं होती, जब तक उसे समझ न लिया जाये। यह जो ‘समझना’ तत्व है, यह चिंतन और विमर्श को निमंत्रण देता है और उचित-अनुचित के निर्धारण को तय करता है। चिंतन में दार्शनिकता और रचनात्मकता- दोनों तत्व शामिल होते है। दार्शनिकता का सैद्धान्तिक महत्व होता है और रचनात्मकता का व्यावहारिक। विमर्श दोनों के परीक्षण के साथ उनके मध्य समन्वय का रास्ता भी दिखाता है। विमर्श एकाधिक लोगों के मध्य होने वाली भौतिक चर्चा ही नहीं होती है, अपितु चिंतनशील व्यक्ति (लेखक) के अन्दर होने वाले अन्तर्द्वन्द्व के रूप में भी विमर्श की प्रक्रिया चलती है। एक सजग रचनाकार अपने अन्तर्मन में चीजों को अपनी दृष्टि के साथ दूसरों की दृष्टि से भी देखता-परखता है, उनमें तुलना करता है, बहस करता है। बहुत बार वह विभिन्न भौतिक रूपों में दूसरों के विचार जानने का प्रयास भी करता है। तब कहीं अपनी बात (रचना) को अंतिम रूप देता है। समीक्षक के लिए यह देखना जरूरी है कि रचनाकार ने ‘देखे, सुने और जाने’ को ‘समझने’ की प्रक्रिया से कितना (और किस तरह) गुजरने दिया है। अनेक ऐसे लघुकथा संग्रह और संकलन प्रकाश में आते रहे हैं, जिनमें 5-10 प्रतिशत रचनाएँ भी वास्तव में लघुकथा नहीं होतीं, तो इसका कारण यही है कि उनमें से बहुसंख्यक रचनाओं में ‘देखे, सुने और जाने’ को लिखा गया है, उसे ‘समझने’ का प्रयास नहीं हुआ है।

      चूँकि सृजनात्मक रचनाएँ (लघुकथा भी) व्यावहारिक सत्य के अधिक निकट होती है, इसलिए यहाँ रचनात्मक चिंतन का महत्व सापेक्षिक रूप से अधिक होता है। दार्शनिकता तथ्यों के सही-गलत और उचित-अनुचित की पड़ताल करती है जबकि रचनात्मकता पाठक के सन्दर्भ में सृजन को ग्राह्यता और स्वीकार्यता, दोनों के निकट ले जाती है। लघुकथा में रचनागत और रचनात्मक चिंतन का अभाव प्रायः उसे दृश्य यथार्थ की रिपोर्टिंग तक सीमित कर देता है।

      एक घटना को देखने वाले सामान्य दर्शक, मीडिया रिपोर्टर और राजनेता- सभी अपनी-अपनी तरह से देखते हैं। घटना के सम्बन्ध में इन सबकी अपनी-अपनी दृष्टि होती है। उनकी प्रतिक्रिया भी अपने-अपने दृष्टिकोंण तक सीमित होती है। लेकिन एक साहित्यकार/लघुकथाकार को सामान्य दर्शक, मीडिया रिपोर्टर और राजनेता- सभी से अलग भूमिका का निर्वाह करना होता है। उससे अपेक्षा की जाती है कि मानवीय और सामाजिक सन्दर्भ में वह घटना को समदृष्टा की तरह देखे, संवेदनात्मक यथार्थ सत्य की तरह समझे और मनुष्यता और सामाजिकता के हित में रचनात्मक सृजन करे। विशेष उद्देश्यों के साथ नियोजित और संगठित विचारधाराओं को पुष्ट करने वाली दृष्टि प्रायः रचनात्मक सृजन में सफल नहीं हो पाती है। क्योंकि तब रचनाकार अपने रचनात्मक दायित्व का नहीं, संगठनात्मक दायित्व का निर्वाह (यहाँ तक कि संगठन के निर्देशों का पालन) कर रहा होता है। रचनात्मक सृजन के लिए विचारधारा के स्तर पर रचनाकार का स्वतंत्र और पूर्वाग्रह से रहित होना आवश्यक है। 

      समीक्षा के स्तर पर इस तथ्य के साथ लेखन के उद्देश्य को उसके वास्तविक मूल में समझने का प्रयास होना चाहिए। अभिव्यक्तिगत तथ्यों एवं निष्कर्षों को अपने विश्वास वाली विचारधारा को जबरन सम्पुष्ट करने वाले अस्त्र की तरह उपयोग करने से समीक्षक को भी बचना चाहिए। 

     इस प्रकार लघुकथा-सृजन की प्रेरणाओं, परिवेश की सानुरूपता, समकालीन प्रवृत्ति, सामाजिक दायित्वबद्धता, सामयिक परिवर्तनों को आत्मसात करने की क्षमता एवं अनुकूलता, विधागत कसौटी और रचनात्मक चिंतन की उपस्थिति के संयुक्त प्रभाव समकालीन लघुकथा को परिपक्व रचना के रूप में स्थापित करते हैं। इसलिए इन बिन्दुओं के आधार पर समकालीन लघुकथा की पड़ताल आवश्यक हो जाती है। यद्यपि कई विद्वान इनमें से कई तत्वों का ऐतिहासिकता के सन्दर्भो में भी परीक्षण करने एवं परम्पराओं को खोजने और रेखांकित करने पर भी जोर देते हैं। इसके लिए वे प्रायः बहुत पीछे तक चले जाते हैं। मुझे लगता है इस कार्य में ऊर्जा का आवश्यकता से अधिक और अनपेक्षित व्यय हो रहा है। इससे कोई बड़ी उपलब्धि हासिल होने वाली नहीं है। लघुकथा समकालीन परिस्थितियों और उनसे जनित समस्याओं एवं संवेदनात्मक अनुभूतियों को रेखांकित करने के लिए जन्मी है। लघुकथा के सन्दर्भ में ऐतिहासिकता और परम्परा से अधिक समकालीनता को समझने की आवश्यकता है। यदि तलाशना है तो समकालीनता के सूत्रों को तलाशिए। महान कहानीकारों/उपन्यासकारों के बस्ते टटोलने की बजाय समकालीनता के सन्दर्भ में अपने समय की लघुकथा को समझना ही हमारे लिए वास्तविक महत्व का कार्य होगा। समकालीन लघुकथा की संपूर्ण उर्वरता यहीं मिलेगी। जो रचनाएँ लघुकथा नहीं हैं, उन्हें किसी की महानता या वरिष्ठता का सम्मान या उनके नाम का उपयोग करने के लिए जबरन लघुकथा बनाने की प्रवृत्ति का मैं समर्थन नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए मंटो की ‘सियाह हाशिये’ की सभी रचनाएँ लघुकथा नहीं हैं। उसमें शामिल अनेक रचनाओं को प्रभावी टिप्पणी तो माना जा सकता है, लघुकथा नहीं। 

                                                                        शेष आगामी अंक में जारी…