Saturday, 13 June 2015

राजेश उत्‍साही की लघुकथाएँ



समकालीन हिन्दी लघुकथा के इतिहास का एक स्वर्णिम चित्र : राजेश उत्साही के सौजन्य से 
(बाएं से पहले शंकर पुणतांबेकर हैं , दूसरे का नाम याद नहीं।तीसरे संभवत: सतीश दुबे हैं। चौथे वेद हिमांशु,पांचवे,छठवें का नाम भी याद नहीं। सातवें सनत कुमार हैं। आठवें बलराम,नौवें का नाम भी याद नहीं, दसवें हर‍ि जोशी । ग्‍यारहवें कन्‍हैयालाल नंदन,बारहवीं संभवत: मालती महावर हैं। तेरहवें शकील,चौदहवें संतोष रावत और पंद्रहवें कैलाश परसाई( कैलाश जी लघुकथाकार नहीं हैं) । बाएं से बैठे हुए अखिल पगारे, राजेश उत्‍साही और ब्रजेश परसाई। होशंगाबाद,मप्र में 22 एवं 23 नवम्‍बर,1980 को आयोजित इस कार्यक्रम के आयोजन का श्रेय ब्रजेश परसाई को जाता है। इस कार्यक्रम की विस्‍तृत रपट 'रंग चकल्‍लस' के एक अंक में प्रकाशित हुई। श्रीयुत भगीरथ के अनुसार, 'इस कार्यक्रम में वह भी सम्मिलित हुए थे, लेकिन फोटो में नहीं हैं।--विवरण राजेश उत्साही द्वारा फेसबुक के 'लघुकथा साहित्य' समूह पर। लिंक:https://www.facebook.com/groups/171401019700719/465524473621704/?comment_id=466655210175297&notif_t=group_comment)
 ॥1॥ नुमाइंदे
शहर के लगभग बाहर पत्‍थर तोड़ने वालों की बस्‍ती में मजदूरों की दयनीय स्थिति देखकर उनके बीच कुछ काम करने की इच्‍छा हुई।
 *
     बस्‍ती के हमउम्र लड़के और उनसे छोटे बच्‍चे मेरी बातें रुचि और ध्‍यान से सुन रहे थे। शायद कुछ कल्‍पनाओं में अपने आपको फुटबाल,व्‍हालीबॉल खेलते हुए,पढ़ते हुए भी देखने लगे थे। उनकी सपनीली आंखों में मुझे भी वह सब नजर आ रहा था।
     तभी पीछे वाले झोपड़े से एक अधेड़ निकल आया।
     ‘सबरा शहर मर गवा है का। यिहां आये हो फिटबाल, बिलीबाल खिलान। इन मोड़ा-मोडि़न का पढ़इएके का कलीक्‍टर बनाई दोगे। कछु नहीं हुइए यिहां। ... भैया से पूछों हे तुमने? बस घुस आए।’
     मैं हतप्रभ रह गया। मैंने कहा, ‘मैं जो कुछ करना चाहता हूं, उसके लिए......भैया मना नहीं करेंगे।’
     ‘कछ़ु नहीं। पेलें.....भैया से पूंछ के आओ।’
     सामने बैठे युवक से रहा नहीं गया। बोला, ‘हलकू दादा,ये यहां हमें पढ़ाएंगे। अच्‍छी बातें बताएंगे। एकाध घंटा कुछ खेल खिलाकर मन बहला दिया करेंगे। कोई चकलाघर तो खोलेंगे नहीं।’
उसके पास शायद इससे बेहतर तुलनात्‍मक उदाहरण नहीं था।
     ‘ ...भैया कहियें तो चकलाघर भी खुलिहे।’ यह हलकू दादा का स्‍वर था।
  *
      भैया उस बस्‍ती के वार्ड मेम्‍बर हैं।
 ॥2॥ भ्रष्‍टाचार
अन्‍ना ने बहुत बुरा किया।
    -हां यार सचमुच।
    -अब कैसे मिटेगा भ्रष्‍टाचार इस देश से।
    -उनसे ही कुछ उम्‍मीद थी।
    दोनों राज्‍य परिवहन की बस में सवार थे। टिकट टिकट.... कंडक्‍टर ने आवाज लगाई।
    -दो टिकट कोदंडराम नगर।
    -चौदह रूपए।
    पहले ने बीस का नोट आगे किया।
    कंडक्‍टर ने दस का नोट वापस किया और आगे बढ़ गया।
    -भाई साहब टिकट..।
    -अरे छोड़ो न यार,क्‍या करोगे।...कंडक्‍टर मुस्‍कराया।
    और दोनों फिर से चर्चा में डूब गए।
    -बहुत भ्रष्‍टाचार है इस देश में।...पहला बड़बड़ाया।
    -कैसे जाएगा ये।...दूसरे ने फिर चिंता जताई।
॥3॥ अहसान
पठानकोट एक्‍सप्रेस का साधारण कम्‍पार्टमेंट। दरवाजे पर खड़े दो नौजवान। एक-दूसरे से अपरिचित। लेकिन एक, दूसरे की अपेक्षाकृत अधिक ताकतवर।
    ‘टिकट दिखाइए।’ एक आवाज गूंजी।
    दूसरे ही क्षण रामपुरी सामने था। यह पहले का टिकट था। वह आगे कुछ करता, इससे पहले ही दूसरे ने तुरंत चाकू छीनकर जेब के हवाले किया और रसीद किए दो हाथ।
टिकट चेकर की आंखों में कृतज्ञता झलक आई। दूसरे ने एक नजर पहले को देखा और फिर टिकट चेकर को दूसरे दरवाजे की ओर ले जाकर धीरे से कहा, ‘बाबूजी,टिकट तो मेरे पास भी नहीं है।’
   (बम्‍बई यानी आज की मुम्‍बई से रामवतार चेतन के संपादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका रंग-चकल्‍लस के नवम्‍बर-दिसम्‍बर,1981 अंक में प्रकाशित।)

॥4॥ इंतजाम
वह बूढ़ी अम्मां जब भी अपना लकडि़यों का गट्ठर बेचती,दो चार लकडि़यां बचा लेती।
एक दिन मैंने जिज्ञासावश पूछ ही लिया, ‘अम्‍मां अपने चूल्‍हे के लिए तो तुम एकाध गट्ठा ही घर पटक लेती होगी?’
अपने गट्ठर के पैसे धोती के छोर में बांधती हुई बोली, ‘हां बेटा।’
‘तो फिर ये हर बार गट्ठर में से दो-चार लकडि़यां  क्‍यों बचा लेती हो?’ मैंने फिर पूछा।
          बचाई हुई लकडि़यों को उठाती हुई वह बोली, ‘अरे बेटा,जिसे अपनी दो रोटियों की चिंता खुद करनी पड़ती हो,उसकी चिता में दो-तीन मन लकडि़यां कौन लगाएगा?’

(कमलेश्‍वर द्वारा संपादित पत्रिका ‘कथायात्रा’ के जून 1980 अंक में प्रकाशित।)
 
॥5॥ विकल्‍प
‘डॉक्‍टर साहब!’
‘हूं।’
‘क्‍या आपको ऐसा कोई अधिकार नहीं है ?’
‘कैसा? ’ डॉक्‍टर ने इंजेक्‍शन लगाते हुए पूछा।
‘कि आप मुझे दिसम्‍बर के पहले मार डालें।’
            डॉक्‍टर ने अचकचा कर रामलाल की ओर देखा। वह रोज-रोज ऐसे उल्‍टे-सीधे सवालों से डॉक्‍टर को उलझन में डाल देता है। आजकल उसका मानसिक संतुलन ठीक नहीं है। पर आज दिसम्‍बर शब्‍द जोड़कर रामलाल ने बात को रहस्‍यमय बना दिया है।
झल्‍लाकर डॉक्‍टर ने पूछा, ‘आखिर रामलाल तुम जीना क्‍यों नहीं चाहते हो ?’
‘जीना।’ रामलाल ने एक फीकी हंसी हंसते हुए कहा-‘डाक्‍टर साहब कैंसर का रोगी भी कभी बचता है। आठ महीने हो गए,यहां पड़े-पड़े। घर किस तरह चलता होगा,भगवान ही जाने। बड़ा लड़का एमए पास करके मारा-मारा घूम रहा है, आप जानते हैं न? ’
‘जानता हूं।’
‘दो लड़कियों की शादी होना है।’
‘वह भी जानता हूं।’ डॉक्‍टर ने कहा, ‘पर क्‍या दिसम्‍बर के पहले मर जाने से तुम्‍हारे लड़के की नौकरी लग जाएगी या लड़कियों की शादी हो जाएगी? ’
‘हां,डॉक्‍टर साहब।’
            डॉक्‍टर चौंक गया। उसे स्‍वीकारात्‍मक उत्‍तर की आशा नहीं थी। वह रामलाल के अगले वाक्‍य का इंतजार करने लगा।
‘डॉक्‍टर साहब मुझे दिसम्‍बर में रिटायर होना है। अगर दिसम्‍बर के पहले मर गया तो मेरे बदले मेरे बेटे को नौकरी....।’
(कमलेश्‍वर द्वारा संपादित पत्रिका ‘कथायात्रा’ के जून 1980 अंक में प्रकाशित।)
॥6॥ चमत्‍कार

गली के मुहाने पर खाली प्‍लाट था।
       मोहल्‍ले के ज्‍यादातर लोगों के लिए कचरा डालने का एक ठिकाना। प्‍लाट मालिक कहीं और रहता था। बेचना चाहता था। मुहाने पर था सो अच्‍छी कीमत का इंतजार कर रहा था। कहते हैं न कि घूरे के भी दिन फिरते हैं। सो वह दिन आ ही गया। प्‍लाट बिक गया। जल्‍दी ही उस पर एक नया घर भी बनने लगा। कहते हैं कि आदत आसानी से नहीं जाती। कुछ लोग अब भी वहीं कचरा डाल रहे थे।
       मकान मालिक परेशान-हैरान थे। सब उपाय करके देख लिए थे। वहां लिख दिया था अंग्रेजी में भी और स्‍थानीय भाषा में भी कि, ‘यहां कचरा डालना मना है।’ पर हर जगह की तरह वहां भी पढ़े-लिखे गंवारों की संख्‍या अधिक थी। लोग थे कि बाज ही नहीं आ रहे थे।
       एक सुबह चमत्‍कार हो गया। कचरे की बजबजाती दुंर्गध की जगह चंदन की सुगंध ने ले ली थी। अब लोग घर का नहीं मन का कचरा डालने वहां आ रहे थे।
       मकान मालिक ने रातों-रात अपने किसी आराध्‍य को पहरेदारी के लिए एक छोटी-सी मडि़या में वहां बिठा दिया था।
॥7॥ अनुयायी
वह आकर्षक व्‍यक्तित्‍व का मालिक था। बहुत सारे अनुयायी थे उसके। कुछ पक्‍के सिद्धांतवादी और कुछ कोरे अंध-भक्‍त। वे सब उसकी एक आवाज पर मर मिटने को तैयार रहते।
वह कहता,‘.......।।.........।।’ सब हा‍थ उठाकर उसका समर्थन करते।
***
उन सबकी यानी उसकी प्रगति में की राह में एक खाई थी। मंजिल पर पहुंचने के लिए उस खाई  को पाटना जरूरी था।
उसने अपने अनुयायीयों से कहा, ‘यह खाई हमारी प्रगति में बाधा नहीं बन सकती। हमारी हिम्‍मत और दृढ़ निश्‍चय के आगे यह टिक नहीं सकेगी। साथियो, देखते क्‍या हो आगे बढ़ो।’
देखते ही देखते वे सब उस खाई में समा गए।
उसने मुस्‍कराकर एक नजर लाशों से पटी खाई पर डाली और फिर उन पर चलते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ गया। 
(प्रज्ञा,साहित्‍यिक संस्‍था, रोहतक द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता 1980-81 में पुरस्‍कृत। प्रज्ञा द्वारा प्रकाशित लघुकथा संग्रह ‘स्‍वरों का आक्रोश’ में संकलित।)

राजेश उत्‍साही

Ø मध्‍यप्रदेश की अग्रणी शैक्षिक संस्था एकलव्य में 1982 से 2008 तक कार्य। संस्‍था की बाल विज्ञान पत्रिका चकमक का 17 साल तक संपादन। संस्‍था की अन्‍य पत्रिकाओं में संपादन तथा प्रबंधन सहयोग। एकलव्‍य के प्रकाशन कार्यक्रम में योगदान।
Ø मप्र शिक्षा विभाग की पत्रिका गुल्‍लक तथा पलाश का संपादन। नालंदा,रुम टू रीड तथा मप्रशिक्षा विभाग के लिए बच्‍चों के लिए साहित्‍य निमार्ण कार्यशालाओं में स्रोतव्‍यक्ति। कविताएं, कहानी, व्‍यंग्‍य लेखन खासकर बच्‍चों के लिए साहित्‍य निमार्ण, संपादन तथा समीक्षा में गहरी रुचि। रूम टू रीड से पांच बाल कविता पोस्‍टर तथा अन्‍य किताबें प्रकाशित। एक कविता संग्रह ‘वह, जो शेष है..’ प्रका‍शित।
Ø आजकल बंगलौर में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के शिक्षक पोर्टल टीचर्स ऑफ इंडिया में हिन्‍दी संपादक। लर्निंग कर्व के हिन्‍दी संस्‍करण का संपादन। विद्याभवन सोसायटी,उदयपुर तथा अज़ीमप्रेमजी विश्‍वविद्यालय की संयुक्‍त शैक्षिक पत्रिका ‘खोजें और जानें’ की संपादकीय टीम के सदस्‍य।
सम्‍पर्क :
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Saturday, 2 May 2015

फ़ज़ल इमाम मल्लिक की लघुकथाएँ

फ़ज़ल इमाम मल्लिक
बिहार के शेख़पुरा जिले के चेवारा के निवासी फ़ज़ल इमाम मल्लिक हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ से जुड़े हैं। साहित्यिक पत्रिका ‘सनद’ और ‘ऋंखला’ का संपादन भी  कर रहे हैं। काव्य संग्रह ‘नवपलव’ और लघुकथा संग्रह  ‘मुखौटों से परे’ का संपादन भी कर चुके हैं। दूरदर्शन के उर्दू चैनल से उन पर एक ख़ास कार्यक्रम ‘सिपाही सहाफत के’ भी प्रसारित  हुआ है।  उन्हें दिल्ली में ही आयोजित एक समारोह में 'रोशनी दर्शन ' पत्रिका  अपने दस साल पूरे करने के मौके पर  ‘चित्रगुप्त सम्मान’ से नवाज चुकी है। हिन्दी लघुकथा आंदोलन से वे नवें दशक से ही जुड़े रहे हैं। यहाँ प्रस्तुत हैं  अभी-अभी मेल से प्राप्त उनकी तीन  लघुकथाएँ:
पाबंदी
उस मोहल्ले में वह अकेली रह रहीं थीं। उनका इस तरह अकेले रहना लोगों को रास नहीं आ रहा था। खासकर जिस तरीके से वे रहती थीं। लोगों को उनका बेपरदा रहना...मर्दों के साथ घूमना-फिरना अच्छा नहीं लगता था। आख़िर मज़हब भी कोई चीज़ होती है; और इस्लाम ने औरतों को परदे की हिदायत की है। मोहल्ले के लोगों ने इसकी शिकायत इमाम से की। लोगों का मानना था कि उनके रहन-सहन के तरीक़े से मोहल्ले की औरतों व लड़कियों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा.......।
          लोगों की शिकायत की वजह से उन्हें एक दिन इमाम की अदालत में पेश होना ही पड़ा। इमाम ने एक नज़र उन पर डाली और फिर बताया कि लोगों को उनके रहन-सहन के तरीक़े पर एतराज़ है। इसके बाद इमाम साहब ने उन्हें इस्लाम में औरतों के परदे को लेकर एक लंबा भाषण दे डाला। वे सारी बातें धैर्य से सुनती रहीं। इमाम साहब ने अंत में जब उन्हें नसीहत देने लगे तो उन्होंने सवाल किया.....‘इस्लाम क्या सिर्फ औरतों को ही परदा के लिए कहता है....?’
          इमाम साहब ने 'हां' में जवाब दिया।
          उन्होंने इमाम साहब से फिर पूछा.....‘इस्लाम में महरम और नामहरम की बात भी कही गई है’।
          इमाम साहब ने कहा...‘हां कही गई है’।
         ‘मैं आपके लिए महरम हूं या नामहरम?’  इमाम साहब से उनका अगला सवाल था।
         इमाम साहब तिलमिला उठे; पर धीरे से कहा....‘नामहरम’।
        ‘और यहां जो लोग खड़े हैं उनके लिए मैं महरम हूं या नामहरम?’
         इमाम साहब ने उसी तरह तिलमिलाते हुए जवाब दिया....‘नामहरम’
        ‘जब मैं आपके लिए नामहरम हूं तो आपको और इन तमाम लोगों को मुझसे परदा करना चाहिए था। इस्लाम ने यह भी साफ़ कहा है कि मरदों को उन औरतों से परदा करना चाहिए जो महरम नहीं हैं। क्या आप और इन तमाम लोगों ने ऐसा किया? जिस मज़हब की बुनियाद पर आप मुझे कठघरे में खड़ा कर रहे हैं उसी मजहब ने मरदों को भी परदा करने की हिदायत दे रखी है। इसलिए मुझसे सवाल-जवाब करने से पहले ख़ुद से और इन तमाम लोगों से सवाल करें तो बेहतर होगा।’
          फिर वे अपनी जगह से उठीं और बिना किसी से कुछ कहे वहां से निकल पड़ीं। इमाम साहब ख़ामोश थे और मजमा शर्मिंदा।

अवाम
सत्ता के शीर्ष पर जब वह पहुंचा तो हैरान रह गया...क़दम-क़दम पर बेईमानी...भ्रष्टाचार....।
आदर्श और मूल्य बस अब सिर्फ किताबों में सिमट कर रह गए हैं...उसे पहले डर भी लगा। किस-किस के खिलाफ़ वह हल्ला बोले....ऊपर से नीचे तक सब एक ही रंग में रंगे थे....लेकिन फिर उसने हिम्मत जुटाई...धीरे-धीरे सत्ता पर पकड़ बनाई। लोगों की आंखों से आंसू पोंछने के लिए वह लगातार कोशिश करता रहा....भ्रष्ट और बेईमानों की परेशानी बढ़ी....सत्ता में उसके सहयोगी उसके ख़िलाफ़ होने लगे तो पार्टी में उसके कामकाज के तरीक़े को लेकर फुसपुसाहट शुरू हो गई। लेकिन इन सबसे बेपरवाह लोगों के पक्ष में खड़ा होना उसने नहीं छोड़ा।
धीरे-धीरे विरोध बढ़ता गया। पार्टी और उसके सहयोगी उसे सत्ता से बेदखल करने के लिए लामबंद हुए...और फिर सबने एक सुर में उसे हटाने की मांग करने लगे....।
सारे विरोध के बावजूद वह अब भी सत्ता के शिखर पर बैठा हुआ है.....अवाम उसके साथ हैं....।

चुनाव
सत्ता के लिए पार्टी चाहिए और पार्टी चलाने के लिए पैसा...।
उसने पहले पार्टी बनाई....फिर पैसा और उसके बाद सत्ता हासिल की.....।
सब कुछ ठीक चल रहा था....सत्ता उसके पास थी और पैसा उस पर बरस रहा था....पैसा अब उसकी मजबूरी नहीं कमज़ोरी बन गई थी.....इस कमज़ोरी की वजह से उसकी परेशानी बढ़ती गई....उसके अपने साथी-संगी उसका साथ छोड़ने लगे....और एक दिन ऐसा आया कि उसे पैसा और लोगों में से किसी एक को चुनना था.....
उसने पैसे को चुना....अगले दिन लोगों ने उसे सत्ता से बेदख़ल कर दिया....।

Wednesday, 22 April 2015

कथाकार पृथ्वीराज अरोड़ा से मुलाकात




'बेटी तो बेटी होती है', 'दया', 'कथा नहीं', 'रक्षा' जैसी कथ्य, भाषा, शैली, सामाजिक सरोकारों से ओतप्रोत लघुकथाओं का संग्रह 'तीन न तेरह' हर लघुकथा  प्रेमी के खजाने में होना चाहिए। उसके लेखक, कथाकार पृथ्वीराज अरोड़ा पिछले कुछ सालों से बेहद अस्वस्थ चल रहे हैं। मस्तिष्क संबंधी किसी रोग के कारण उनके सिर का ऑपरेशन हुआ है और उनको स्मृति-भृंश हुआ है। यह सूचना फरवरी 2010 में सबसे पहले अशोक भाटिया ने मुझे दी थी। उसके बाद यह महसूस करके कि अब वे स्वस्थ हो चुके होंगे, 'अविराम साहित्यिकी' के लघुकथा विशेषांक 2012 का संपादन करने के क्रम में उनसे 'मेरी लघुकथा यात्रा' स्तम्भ के लिए उनकी अपनी लघुकथा यात्रा के उन कुछ बिन्दुओं पर प्रकाश डालने का अनुरोध किया था, जिन्हें सिर्फ वही जानते हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि डॉक्टर ने  ऐसा हर काम करने की मनाही की है जिसमें मस्तिष्क पर दबाव पड़ने की सम्भावना हो, इसलिए मैं अब कुछ नहीं लिख सकता। मैंने तभी उनसे वादा किया था कि लिखने की जरूरत नहीं है, मैं स्वयं इस विषय पर आपसे बातचीत को रिकॉर्ड करने आऊँगा। उन्होंने इस पर भी असमर्थता जताई थी इसलिए स्वयं मैंने भी उनके मानसिक स्वास्थ्य के मद्देनजर उनसे बातचीत करना उचित नहीं समझा। आज मैं करनाल गया था--अशोक भाटिया के पास। बातचीत के दौरान भाई पृथ्वीराज अरोड़ा के निवास भी जाना निश्चित हुआ। हम यानी अशोक भाटिया, मैं और मेरा बेटा आदित्य उनके घर गये। अरोड़ा जी जब तक सेवा में रहे, यूनियनिस्ट रहे। अपने किसी लिपिक अथवा सेवादार साथी पर किसी अधिकारी का अत्याचार देखा या सुना नहीं कि भिड़ जाते थे। अपनी शेर-जैसी दहाड़ से जालिम अधिकारियों को दहलाए रखने वाला वह जाँबाज आज अपने मुख के रास्ते भोजन खाने-पीने में असमर्थ है। भोजन के रूप में तरल पदार्थों को पेट तक पहुँचाने के लिए उनकी नाक के रास्ते एक लम्बी नली स्थाई रूप से लगी है। कमजोरी और स्मृति-भृंश के कारण कुछ बोल पाने में भी वे असमर्थ हैं। भाभी जी (श्रीमती कान्ता अरोड़ा) उनकी सेवा में लगी हैं।  पुत्र वधू घर का बाकी काम सँभाल रही थी। अरोड़ा जी के निकट पहुँचकर अशोक भाटिया ने पहले मेरा नाम उन्हें बताया, फिर अपना। हम दोनों को पहचान लेने के प्रमाण स्वरूप उनके गले से 'हाँ' जैसी ध्वनि आई। इससे अधिक वे कुछ न बोल सके, मात्र देखते रहे।  मन कुछ प्रसन्न हुआ यह देखकर कि स्मृति पूरी तरह क्षीण नहीं हुई है, मित्रों-परिचितों को पहचानते हैं; लेकिन अपने-आप को वे अब अभिव्यक्त नहीं कर सकते हैं, यह देखकर अपार दु:ख हुआ।  भाभी जी से अनुमति लेकर हमने उनके फोटो लिए। देखिए--पहले फोटो में वह अपने निकट खड़े अशोक भाटिया को ताक रहे हैं। दूसरे फोटो में, कैमरा हाथ में लिए सामने खड़े मुझको और तीसरे में, हम सबका सामूहिक फोटो खींच रहे आदित्य की ओर देख रहे हैं। मैं और भाटिया अधिक समय उनके समीप खड़े रह सकने की हिम्मत न जुटा सके। वहाँ से निकलकर बाहर वाले कमरे में आ खड़े हुए। भाटिया ने तो कुछ पल तक अपना सिर ही दोनों हाथों में थाम लिया। उदास-मन मैं चुपचाप उनकी उस दशा को देखता खड़ा रहा। ‘जनगाथा’ के 28-2-2010 तथा 20-3-2010 अंक में उनकी लघुकथाएँ ‘नागरिक’, ‘भ्रष्ट’, ‘पति’, ‘प्रश्न’, ‘शिकार’ और ‘बुनियाद’ प्रकाशित की थीं। उनमें से ‘बुनियाद’ पाठकों के लिए यहाँ पुन: प्रकाशित है :

बुनियाद
उसे दुख हुआ कि पढ़ी-लिखी, समझदार पुत्रवधू ने झूठ बोला था। वह सोचता रहा—क्यों झूठ बोला था उसने? क्या विवशता थी जो उसे झूठ का सहारा लेना पड़ा?
जब उसका बेटा कार्यालय के लिए चला गया और पत्नी स्नान करने के लिए, तब उपयुक्त समय समझते हुए उसने पुत्रवधू को बुलाया।
वह आई,“जी, पापा!”
उसने पुत्रवधू को कुर्सी पर बैठ जाने का इशारा किया। वह बैठ गई। उसने कहा,“तुमसे एक बात पूछनी थी।”
“पूछिए पापा।”
“झिझकना नहीं।”
“पहले कभी झिझकी हूँ! आपने मुझे पूरे अधिकार दे रखे हैं, बेटी से भी बढ़कर।”
“थोड़ी देर पहले तुमने झूठ क्यों बोला? मैंने तो अभी नाश्ता करना है! तुमने मेरे नाश्ता कर लेने की बात कैसे कही?” उसने बिना कोई भूमिका बाँधे पूछा।
उसका झूठ पकड़ा गया है, उसने अपना सिर झुका लिया। फिर गंभीर-सी बोली,“पापा, हम बेटियाँ झूठ बोलने के लिए अभिशप्त हैं। माँएँ भी, गृहस्थी में दरार न पड़े इसलिए हमें ऐसी ही सीख देती हैं।” वह थोड़ा रुकी। भूत को दोहराया,“भाई के लिए नाश्ता बनाने में देर हो रही है, वह नाराज न हो, कोई बहाना बना डालो। पापा का कोई काम वक्त पर न हो पाया हो तो झूठ का सहारा लो। आज भी ऐसा ही हुआ। नाश्ता बनाने में देर हो रही थी। इनके ऑफिस का वक्त हो गया था। ये नाराज होने को थे कि मैंने आपको नाश्ता करवाने की वजह से देर हो जाने की बात कह डाली। आपका जिक्र आते ही ये चुप हो गये।” उसने विराम लिया। फिर निगाह उठाकर ससुर को देखा और कहा,“सुबह-सुबह कलह होने से बच गई।…और मैं क्या करती पापा?”
ससुर मुस्कुराए। उसके सिर पर हाथ फेरकर बोले,“अच्छा किया। जा, मेरे लिए नाश्ता ला। बहुत भूख लगी है।”
वह भी किंचित मुस्कराई,“आभी लायी।”
पुत्रवधू नाश्ता लेने चली गई। ससुर ने एक दीर्घ साँस ली।
पृथ्वीराज अरोड़ा :
जन्म: 10 अक्टूबर, 1939 को बुचेकी(ननकाना साहिब, पाकिस्तान में)
प्रकाशित कृतियाँ:तीन न तेरह(लघुकथा संग्रह), प्यासे पंछी(उपन्यास), पूजा(कहानी संग्रह), आओ इंसान बनाएँ(कहानी संग्रह)
मोबाइल नं:09255921912