Saturday, 4 November 2017

पंचकुला-2017 : हिन्दी लघुकथाएँ… दूसरी कड़ी

सावन की झड़ी / कान्ता रॉय

"भाभी, निबंध लिखवा दो!" चीनू ने उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।
"किस विषय पर?" चीनू की स्कूल डायरी उठा कर हाथ में लेते हुए बोली, लेकिन नजर बरामदे पर टिकी थी।
इधर सुषमा बरामदे में खड़ी थी और उधर वो गुजराती
लड़का। बहुत बार मना कर चुकी थी सुषमा को
, लेकिन.....!
बाऊजी नजीराबाद वाले से रिश्ता जोड़ना चाहतें हैं और यह है कि इस गुजराती में अटकी है!
ननद के चेहरे की मायूसी उसे बार-बार हिमाकत करने को उकसा जाती थी, इसलिये कल रात उसने भी हिम्मत की थी, "बाऊजी, वो पड़ोस में गुजराती लड़का है ना....!"
"हाँ, तो?"
"अपनी सुषमा को पसंद करता है। उसकी नौकरी भी पक्की है, वेयर हाऊस में।"
"वो....? शक्ल देखी है उसकी, काला-कलूटा, जानवर है पूरे का पूरा! उपर से दूसरी जात!" बाऊजी की आवाज़ इतनी सर्द लगी कि उसकी हड्डियों तक सिहर उठी थीं।
पतिदेव ने उसकी ओर खा जाने वाली नजरों से देखा था।
चीनू ने हाथ से डायरी छीन ली और  आँचल खींच फिर से पूछा, "भाभी, बताओ न, जानवरों की क्रिया-कलापों पर क्या लिखूँ?"
सुषमा और चीनू के लिए वह भाभी कम माँ अधिक थी। "भाभी, मोर क्यों नाचता है?" चीनू ने इस बार सबसे सरल प्रश्न पूछा था। वैसे चीनू के प्रश्नों के जबाब उसे  कई जगह से खोजने पड़ते थे। आज कल के बच्चे कम्पयूटर से भी तेज, और चीनू उन सबमें भी अव्वल।
"मोरनी को रिझाने के लिए ही मोर नाचता है।" उसने स्नेहिल स्वर में कहा।
"और जुगनू क्यों चमकता है?”
"अपने साथी को आकर्षित करने के लिए।"
सुनते ही क्षण भर को वह चुप हो गया।
"आप हमारे भैया की साथी हो?"
"हाँ!" मैं उसकी ओर आँखें तरेरती हुई बोली।
"भैया ने कल रात आपको मारा क्यों?"
"चीनू!" वह एकदम से सकपका गयी, "क्योंकि मैं उन पर ध्यान नहीं देती हूँ।" भर्राये स्वर में धीरे से बोली।
"तो उनको भी आपको रिझाने के लिए जुगनू की तरह चमकना चाहिये, मोर की तरह नाचना चाहिये ना?"
"धत्! वे क्यों रिझायेंगे मुझे, वे जानवर थोड़ी ना हैं!"
"भैया जानवर नहीं हैं, लेकिन वह गुजराती तो जानवर है ना, इसलिये तो सुषमा जीजी को  रिझाता रहता है।" कह कर चीनू जोर-जोर से हँसने लगा। लेकिन वह सुन्न पड़ गयी।
"ये क्या ऊटपटाँग बातें कर रहा है तू?"
"भाभी, निबंध तो मैं खुद ही लिख लूँगा, आप तो बस सुषमा जीजी को उसका मोर दिला दो! फिर वो कभी आपकी तरह छुप-छुपकर रोयेंगी नहीं ।" और चीनू की नजर भी बरामदे पर जाकर टिक गयी।
                                 
राग-अनुराग / नीता सैनी

नानी को बैठक में से नाना के छड़ी टिकाने की आवाज आई तो उसने बैठे-बैठे ही आवाज लगाई, "आ गए सरदार जी ?"
“हूँ...आ गया।" नानाजी ने जबाब दिया। फिर बैठक में ही बनी अँगीठी (कार्निस) पर अपनी पगड़ी उतारकर रखी।
इतने में नानी ने फिर आवाज लगाई, "जरा इधर ताँ आयो सरदार जी।"
"आँदा हाँ।" कहकर नानाजी ने अपना कुर्ता उतार अँगीठी के साथ ही दीवार पर लगी खूँटी पर टाँग दिया।
आँगन में लगे नल से पानी चलाने की आवाज आई। फिर नाना के पैरों की आहट बैठक से आई तो नानी ने फिर आवाज लगाई, "सरदार जी, जे एक वार आ जांदे, मैं कद दी बाट जोह रही हाँ।" नानी को दिखता बहुत कम था। फिर भी वह टोह-टोह कर घर के सभी काम कर लेती थी। उस वक़्त वह बरामदे में बैठी सब्जी काट रही थी।
"ओये सबर वी करया कर, बस इक गल्ल दे पिछे ही पै जांदी है।" नानाजी की आवाज में झुँझलाहट थी।
नानी को मीठा खाने का बहुत शौक था। नानाजी जब भी शहर जाते तो वहाँ से नानी की पसंद की मीठी गोलियों का डिब्बा लेकर आते थे। डिब्बा हाथ मे पकड़े वे नानी की तरफ बढ़े और मुस्कराते हुए शिकायत के लहजे में बोले, "मेरे घर विच वड़दे ही बेसबरी हो जांदी है। इन्ना वी सबर नहीं के बंदा बाहरों आया है। कपड़े बदल लैण देवे ते हथ-पैर धो लेण देवे।"
नानी की सब्जी काटने की रफ्तार तेज हो गई थी, झल्लाकर बोली, "नहीं आना ताँ मर परे। मैं  केहड़ा तेरे तों कोई कम्म करवाना सी, बस तेरे पैर ही छूने सी।"
                                       
यात्रा के बीच में /  रूप देवगुण
चार साहित्यकार–अमन, आर्यन, विनय और पुनीत एक कार में बैठे यात्रा कर रहे थे। आर्यन कार चला रहा था। विनय आगे बैठा था। अमन और पुनीत पिछली सीटों पर थे। सबसे पहले पुनीत बोला, “हम कार में बैठे यात्रा कर रहे हैं, पर यात्रा का अर्थ क्या है, यह हम नहीं समझते। बस हमारा ध्यान, जिधर हमने पहुँचना है, वहाँ लगा रहता है। पर यात्रा का अर्थ होता है कहीं बीच में किसी रैस्टोरैण्ट या ढाबे पर कुछ देर के लिए रुकना और आराम से चाय पीना।” इतने में अमन बोला, “यह तो ठीक है पर कई बार लघुशंका की मजबूरी भी हो जाती है इसलिए एक आध हाल्ट इसके लिए भी होना चाहिए।” आगे बैठा विनय बोला, “अन्दर बैठे-2 क्या कर रहे हो, बाहर देखो, कितने हरे-भरे खेत हैं, खेतों में पानी लगा हुआ है, आकाश में बादल छाए हुए हैं, इनका भी यात्रा में आनन्द लेना चाहिए।” अब आर्यन की बारी थी, वह बोला, “हालांकि ड्राइव करने वाले को बोलना नहीं चाहिए पर फिर भी रास्ते में चुप्पी साधना ठीक नहीं होता, हमें गप्प-शप्प, हँसी-मजाक भी करना चाहिए।” इतने में विनय बोला, “वो देखो, सामने कितना बड़ा अच्छा ढाबा दिखाई दे रहा है।” इसपर अमन ने कहा, “इस ढाबे पर कार को रोकना, हम यहाँ चाय पीएँगे, लघुशंका का समाधान करेंगे, इसके साथ लगे खेतों को निकट से देखेंगे। आकाश में बादलों को खुल कर देखेंगे और चाय पीते-पीते गप्प-शप्प भी करेंगे।”
अभी उसने बात खत्म ही की थी कि कार ढाबे के पास जाकर एक साइड पर खड़ी हो गई।
                                  
दो जून की रोटी / देवराज डडवाल
“आप भी न बाबू जी, पता नही कहाँ रह जाते हैं खाने के समय!"  वृद्ध ससुर काम निपटाकर थोड़ा बिलम्ब से खाने को आये तो बहू रजनी बुरी तरह से बिफर पड़ी।
"तो क्या मैं स्वयं ले लूँ खाना बहू?" थरथराती आवाज मे उसने पूछा।
"पता नही आपके हाथ कैसे हैं," कहते हुए रजनी तपाक से उठी, " अभी पहुँची ही थी सोफे तक…बच्चे तो आपके हाथों से कुछ भी खाना  नही चाहते।" वह निरन्तर बड़बड़ाए जा रही थी।
एक थाली मे तीन चपातियाँ, थोड़े चावल व तरकारी डालकर लाई और उसे वृद्ध ससुर के समक्ष रख दिया। काँपते हाथों से वृद्ध ने खाना खाया। लड़खड़ाते हाथों से खाते समय चावल के कुछ दाने फर्श पर गिर गए । वे उन दानों को फर्श से उठाकर थाली मे डाल ही रहे थे कि बहू की नजर पड़ गई, "आप कोई बच्चे हैं बाबू जी! क्या कर रहे हैं आप यह?"
“कुछ नही बहू, बस चार दाने फर्श पर गिर गए।"
"अच्छा, ये चार दाने हैं? कमाने जाओ तब पता चले आटे-दाल का भाव," रजनी ने ससुर को बुरी तरह लताड़ लगाई।
रजनी की लताड़ खाये वृद्ध ने दराती उठाई व पशुओं का चारा लेने चल दिये
 "अरी रजनी,  तुम्हारे ससुर जी इतनी धूप मे दराती उठाकर कहाँ जा रहे हैं?" पड़ोसन रीना ने बुज़ुर्ग की अनदेखी पर उसे चेताते हुए पूछा।
"पता नही दी...मानते किसकी है ये?…क्या जरूरत पड़ी है इन्हें अब इस उम्र मे काम करने की। दो जून की रोटी ही तो खानी है, परन्तु माने तब न।"
रजनी का यह जबाब सुन रीना मुँह बिचकाकर अंदर चली गई, जबकि पलपल बदलती बहू की बात सुनकर वृद्ध की कमजोर टाँगें लम्बे डग भरने लगी थीं।
                                 
निक्कू नाच उठी / नीरज सुधांशु
नींद में भी कसमसा रही थी निक्कू, ठीक से सो नहीं पा रही थी। माँ समझ गई, उसने तेल मालिश की व थोड़ी देर पैर दबाए तब जाकर उसे नींद आ पाई। ‘सारा दिन उछलती कूदती रहती है, एक मिनट भी चैन से नहीं बैठती, खाने में चोर और नाचने में मोर है, पैर तो दुखेंगे ही ना!’ कहते हुए माँ ने उसका माथा प्यार से चूम लिया व चादर ओढ़ा दी।
सच ही तो था। जब से निक्कू के दादा-दादी आए थे। सारा दिन उन्हें अपने खिलौने, किताबें दिखाने में लगी रही, उनके साथ खेलती रही। शाम को उन्हें लैपटॉप पर अपनी पसंद के गाने लगवा कर डांस भी करके दिखाया। सबने रोका कि अब बस करो, पर वह कहाँ रुकने वाली थी, घंटे-भर तक डांस करती रही।
“मम्मा, आज चाचू बी आएँगे न?” सुबह उठते ही उसने माँ से पूछा।
“हाँ बेटा।”
“मम्मा, मैं उनको बी डांस करके दिखाऊँगी।”
“नहीं बेटा, इस बार खिलौने दिखा देना, डांस अगली बार दिखा देना।” माँ ने समझाने की कोशिश की।
“नईंईंईं..., मम्मा, मुझे डांस करके दिखाना है।” उसने ज़िद की।
“कल आपके पैर दुख रहे थे न! आप फिर थक जाओगे।”
“ऊंऊंऊं...।”
“अच्छे बच्चे मम्मा का कहना मानते हैं न!” माँ ने उसका चेहरा अपनी हथेलियों में लेकर कहा।
उसने उदास मन से सहमति में गरदन हिलाई और दौड़कर दादाजी के कमरे में गई, “दादू, दादू, आज मैं डांस नईं करूँगी।”
“क्यों बेटा?”
“मम्मा ने मना किया है। कल रात को मेरे पैर में दुखु हो रा था न इसलिए।”
“ठीक कह रही है मम्मा, हम बैठकर गेम खेलेंगे, ओके...!”
उसने अच्छे बच्चे की तरह सहमति जताई।
शाम को जब चाचू आए तो उन्होंने निक्कू को आवाज़ लगाई, “हमें नहीं नाच के दिखाओगी?”
“मम्मा ने मना किया है।” उसने मायूसी से कहा। उसने गुस्से में खिलौने भी नहीं दिखाए व अनमनी-सी घूमती रही।
चाचू ने उसका मूड ठीक करने की कोशिश की, “अच्छा चलो हम यहाँ बैठकर मोटू-पतलू देखेंगे।”
“मुझे नी देखना।” कहकर वो रूसकर जाने लगी। आखिरकार चाचू टी वी के सामने बैठकर चैनल बदलने लगे।
पर ये क्या!! निक्कू तो नाचने लगी।
टीवी से धीमे स्वर में आती मधुर संगीत की आवाज़ और किसी ने नहीं पर निक्कू के पाँवों ने सुन ली थी। और वे थिरक उठे।                             

स्वर्ग की ओर / शील कौशिक
प्रदीप की 82 वर्षीय माँ का हृदयगति रुकने के कारण स्वर्गवास हो गया l उनके अंतिम प्रस्थान की तैयारियाँ चल रहीं थी l वहाँ खड़े एकत्रित लोग आपस में बतियाने लगे–
“भाइयो ! ऐसी मौत तो परमात्मा भाग्यवान को ही देता है... वह न तो स्वयं कष्ट पाई और न ही किसी को दुःख–तकलीफ दी... झट से चली गई ... ये हार्ट फेल भी क्या गज़ब की बीमारी है... बन्दा एक सैकिंड में पूरा हो जाता है l”
तभी अंतिम संस्कार हेतु आये पंडित और अन्य लोगों के बीच खुसर–पुसर हुई–
“अरे भाई सोने की सीढ़ी भी तो चाहिए, इनके पड़पोता भी तो होगा?”
“पड़पोता तो नहीं, पड़पोती है l” प्रदीप ने बताया l
एकदम सबको साँप सूँघ गया हो जैसे।
“फिर तो बिमला देवी सोने की सीढ़ी नहीं चढ़ेगी l” पंडित ने आदेशात्मक स्वर में कहा l
प्रदीप की पत्नी सुधा खड़ी चुपचाप सुन रही थी, यकायक बोली, “ पड़पोती तो है न बिमला देवी की, माँ को सोने की सीढ़ी चढ़ाओ l ”
सुधा को चारों ओर विरोध के स्वर सुनाई पड़े l
“पता है क्या तुम्हें, यही बिमला देवी थी, जिसने जब पड़पोती हुई थी तो थाली बजवाई थी...कुआँ पुजवाया था और मोहल्ले भर में लड्डू बाँटे थे l वो हमेशा कहा करतीं–क्या बेटा और क्या बेटी, दोनों पैदा तो एक ही माँ की कोख से होते हैं और एक ही माँ–बाप की औलाद हैं l दोनों को लाड़-प्यार से पालो, एक बराबर शिक्षा और संस्कार दो और अपने पैरों पर खड़ा करो l माँ तो अपनी पड़पोती को हमेशा सीने से लगाये फिरती थी l सबको कहती थी–अब तो मैं मरने पर सोने की सीढ़ी चढ़ सकूंगी, पड़पोती का मुँह जो देख लिया है l फिर उनकी भावनाओं की कद्र करते हुए आप लोग उन्हें सीढ़ी क्यों नहीं चढ़ाते हो ?” सुधा ने तैश में आकर कहा l
कुछ देर सन्नाटा छाया रहा, परन्तु स्वयं प्रदीप व कोई भी रिश्तेदार इंकार न कर सका l धीरे–धीरे वहाँ खड़े लोगों के सिर भी आगे की ओर हिलने लगे l सुधा को लगा सहमति के स्वरों के साथ –साथ अम्मा जैसे पड़पोती का हाथ पकड़ कर सुनहरी सीढ़ियाँ चढ़ती स्वर्ग की ओर जा रही है और चारों तरफ दुधिया प्रकाश फैला हैl
                                 
सीमा / सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ 
"माँ ऐसे गुमसुम बाहर क्यों बैठी हैं? चलिए अंदर टीवी पर आपका पसंदीदा नाटक आ रहा है|"
"क्या नाटक देखूं बहू, घर में ही नाटक होता देख रही हूँ|"
"कहना क्या चाह रही हो माँ?"
"बहू जरा नजर रख अंशुल पर। कहीं मेरी तरह, तेरी तक़दीर में भी अकेलापन न लिख दिया जाए।"
"माँ, आप भी अपने बेटे पर शक कर रहीं हैं और कल सब्जी लेते समय सुमन भी कुछ ऐसा ही संकेत कर रही थी|"
"ठीक कह रही हूँ बहू, छूट देने का खामियाज़ा खुद भुगती हूँ| अब वही दुःख तुझे भी भुगतते नहीं देख सकूंगी|"
"जी माँ आप चिंता न करें|" सामने से अंशुल को आता देख मुस्कराहट की चादर ओढ़ ली।
अंशुल के कमरे में आते ही कुसुम ने प्रश्नों की बौझार उस पर शुरू कर दी। अंशुल बड़ी चालाकी से हर प्रश्न का उत्तर साफगोई से देकर बचता रह। कुसुम के सिर की कसम खाकर अंशुल ने बोला- "तुम्हें धोखा देने की तो मैं सपने में भी नहीं सोच सकता।"
कुसुम को विश्वास हो गया अंशुल ऐसा कुछ नहीं कर सकता। फिर भी माँ की बात उसके दिल में खटक रही थी। बच्चे का क्रंदन भी ना सुन पाई। अंशुल ने कहा–"अब तो सब क्लियर हो गया, फिर भी क्या सोच रही हो?"
वह चुपचाप अपने बच्चे को दूध पिलाने के लिए दरवाजे की तरफ पीठ कर बैठ गयी। उसने पीठ की ही थी कि कामवाली की पायल की आवाज गूंजी| अंशुल भी दबे कदम कमरे से बाहर चला गया, उसने रसोई में जाकर कामवाली का हाथ पकड़ा ही था कि दरवाजे पर छड़ी लिए खड़ी कुसुम को देख घबरा गया।
कुछ समय बाद माँ अंशुल के घावों पर हल्दी लगाते हुए बोली – "कहा था न बाप की राह  पर मत चलना। मैं कमजोर थी, पर बहू नहीं।"                                                                                                                                                                                                          पढ़ी गयी सभी लघुकथाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी डॉ॰ अशोक भाटिया तथा डॉ॰ बलराम अग्रवाल द्वारा की गयी। उन्हें इन लिंक्स पर देख-सुन सकते हैं :                                                https://www.youtube.com/watch?v=mUv_WAdGIZs&app=desktop                                                      https://www.youtube.com/watch?v=Lb6k0h8Nc9s

पंचकुला-2017 : हिन्दी लघुकथाएँ… पहली कड़ी

हार-जीत / कपिल शास्त्री
9406543770
सर के पीछे पड़ी हलकी-सी चपत से ही इस युद्ध का शंखनाद हो चुका था। तकियों को अस्त्र-शस्त्र की तरह इस्तेमाल करने के बाद बात मल्लयुद्ध तक आ पहुँची थी।
"आज तो तेरी ईंट से ईंट बजा दूँगा," विकास उसकी आँखों में देखकर गुर्राया।
"मैं भी पापा, आज आपको नहीं छोडूंगी।"
पलंग के ऊपर बाप-बेटी साँड की तरह भिड़े हुए थे। इस युद्ध के लिए पापा ने ही अपनी पाँच वर्षीय बेटी अंजलि को ललकारा था और घुटनो के बल आकर बेटी की  ऊँचाई की बराबरी कर ली थी।
किसी मिटटी-पकड़ पहलवान की तरह दोनों के पंजे और सर आपस में भिड़े हुए थे। फिर पापा ने एहतियात से बेटी को उठाकर नरम गद्दे पर पटक दिया। इससे वो और उग्र हो गयी और उठकर ताबड़तोड़ मुक्के बरसाने लगी। उसके मुक्कों से बचते हुए पापा ने भी पुरानी मारधाड़ से भरपूर महान पारिवारिक चित्रों के नायकों की तरह मुँह से ढिशुम-ढिशुम की आवाज़ निकाली और तीन-चार मुक्के उसकी बगल से निकाले। बच्ची भी कहाँ हार मानने वाली थी, उसने तीन-चार असली के जड़ दिए और वो पापा के सीने पर चढ़ गयी और उन्हें चित कर के ही दम लिया।
इतने  में ही पत्नी शालिनी ने आकर जब देखा कि करीने से चढ़ाए गए गिलाफ तकियों से विमुख हो अचेतावस्था में पड़े हैं तो तमतमा गयी। दोनों को अलग किया और बिफर कर बोली "ये क्या पागलपन मचा कर रखा है बाप-बेटी ने घर में!" फिर बेटी को  बाहर जाकर खेलने की हिदायत दी।
बेटी ने मम्मी को गर्व से बताया, "मैंने पापा  को हरा दिया" और विजयी मुद्रा में प्रस्थान किया।
"इस पागलपंती में दुनियादारी के सारे टेंशन भूल जाता हूँ।" विकास ने गहरी साँस छोड़ते हुए कहा।
"ये छटाँक भर की, तुम्हे पीट-पाट कर चली जाती है और तुम कुछ नहीं कर पाते!" पत्नी ने आश्चर्य व्यक्त किया।
विकास ने भी उसकी ठुड्डी पकड़कर कहा "ये तुम्हारी शक्ल की है न, इसलिए बच जाती है।"
यह सुनकर शालिनी मुस्करा उठी और पूछा, "क्या तुम भी अपने पापा से इतने ही फ्रेंडली थे?"
इस बात पर उसके चहरे पर उदासी छा गयी और बोला, "नहीं था। वो मुझसे मन से प्यार तो करते थे, पर कभी इज़हार नहीं किया। मैं भी उनके गुस्से के डर से दूर-दूर छिटका-छिटका  ही रहता। पर मैं भी चाहता था कि मेरे पिता मेरे दोस्त जैसे होते।" कहकर विकास ने एक ठंडी सांस छोड़ी।
                                            
अपने-अपने / कुणाल शर्मा
9728077749
माँ के स्वर्ग सिधार जाने के बाद जेठानी-देवरानी में तनातनी और बढ़ गई थी। पिताजी तो काफी बरस पहले शांत हो चुके थे और घर की जिम्मेदारी बड़े बेटे गोपाल के कंधों पर आ टिकी थी। परिवार को एक डोर मे बांधे रखने की उसकी चाहत जितनी बड़ी थी,  उससे कहीं बड़ी थी अपनी पत्नी के सामने उसकी चुप्पी। आये दिन घर में किसी ना किसी बात को लेकर जंग छिड़ी रहती। रिश्तों मे बढ़ते कसैलेपन के साथ-साथ छोटे भाई के बीवी-बच्चों के साथ होते सौतेले व्यवहार को देख वह तड़प उठता। परंतु पत्नी के इमोशनल ड्रामे के आगे थूक गले में ही निगल लेता। अंततः घर के आँगन में एक ऊंची दीवार उठ गई। उसने होंठ सी लिए। बच्चे स्कूल या गली-मोहल्ले में तो आपस में मिल लेते, लेकिन घर में तो उनके लिए भी लक्षमण रेखा खींच दी गईhथी।
एक दिन जेठानी ने बेटी पिंकी को मुट्ठी में कुछ छुपाये दबे पाँव घर से निकलते देखा। वह कमरे में गई तो बेड पर गुल्लक औंधे मुंह पड़ी थी। वह तेजी से उसके पीछे गई। पिंकी हाथ में पैसे दबाए आगे बढ़ रही थी। उसने उसे बाजू से खींचते हुए गली मे ही दो-चार थप्पड़ जड़ दिए।  “अब चोरी करना भी सीख गई!" वह उसे घुड़क रही थी। पिंकी जोर-जोर से रोने लगी। गोपाल ने बीच में पड़कर उसकी बाजू छुड़ाई।
"अब आपकी लाडली ने चोरी करना भी सीख लिया है।" उसकी आवाज में और तल्खी आ गई थी।
गोपाल ने पिंकी को पुचकारते हुए कहा,  " बेटी, तुमने पैसे चोरी क्यों किये? अगर कोई जरूरत थी तो मम्मी से मांग लेती।"
पिंकी का रोना सिसकियों में बदल गया था। " मम्मी...मम्मी मुझे मारती।" वह सुबकते हुए आँखों से टपकते गर्म पानी को पोंछते हुए बोली।
"मारती क्यों?…अच्छा मुझे ये बता तुमने पैसे क्यों लिये?"
"पापा...पापा, चाचू पिछले महीने से बीमार हैं, मैम रिया को कह रही थी कि अगर उसने दो महीने की फीस जमा नही कराई तो स्कूल से उसका नाम काट देंगी। इसलिए मैंने..." आगे के शब्द उसके गले में ही अटक गए।
पिंकी की बात सुनकर गोपाल ने उसे छाती से लगा लिया। उसे लगा, उसकी नसों में दौड़ता खून सफेद हो गया है।
                                       
चन्द्रग्रहण / सुरेन्द्र गुप्त
9416250279
"अरे… उठो… उठो, चलो जल्दी करो… बस पन्द्रह मिनट ही तो रह गये हैं ग्रहण लगने में, दो तो बज ही चुके हैं।'' पापा की एक ही आवाज में पिंटू, चिंटू तथा टिंकू आँखें मलते-मलते उठे तथा खाद के बोरे को काट-काट कर बनाए गये थैलों को अपने-अपने बाजुओं में टांगकर खड़े हो गये।  सभी ने एक-एक थाली भी अपने-अपने हाथों में ले ली।  बस, कुछ ही पलों में वे अपने मम्मी-पापा के साथ बाहर हो लिए।                                                                                       रात्रि में बाहर निकलते ही नजदीक की कालोनी में पहुँचकर उनके मम्मी-पापा ने जोर-जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया--''दान करो… दान करो… ग्रहण लग गया… चन्द्रग्रहण लग गया।''                                                                                                जैसे ही बच्चों ने अपने मम्मी-पापा को बोलते सुना तो उनके भी मुखों से उसी प्रकार यन्त्रचालित-सा निकल पड़ा--''दान करो… दान करो… ग्रहण लग गया… दान करो।''                             लोग अपने-अपने घरों से निकलकर एक रुपए का या दो का सिक्का उनकी थालियों में डालने लगे। कोई-कोई गेहूँ लाकर उनके थैलों में डालने लगा। बच्चे क्या करते, जैसे ही कोई उनकी थाली में रुपया-दो रुपया डालता, वह थाली में से उठाकर झट-से अपनी फटी-पुरानी निकर की जेब में बहुत सँभालकर डाल लेते। सर्दी की शुरुआत तो थी, किन्तु वातावरण में अभी ठिठुरन पैदा नहीं हुई थी। सो बच्चे, जो क्रमश चार-पाँच-छ वर्षों के रहे होंगे, नंगे पैर भाग-भाग कर एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे उछल-कूद करते हुए, खुशी-खुशी अनाज व पैसे एकत्र कर रहे थे। थोड़ी-थोड़ी देर के उपरांत अपने मम्मी-पापा की नकल करते हुए बोलते जाते--''दान करो… दान करो… ग्रहण लग गया… ग्रहण लग गया।''                                                                                                                    ग्रहण अढाई घंटे तक रहा। गलियों-कूचों एवं कालोनियों में अढाई घंटे घूमने के बाद जब वे अपने घर पहुँचे तो उनके मुख-मण्डल पर तनिक भी थकान नाम की कोई भी चीज नजर नहीं आ रही थी।                                                                                                                               तीनों बच्चे अपने मम्मी-पापा के इर्द-गिर्द बैठ गये थे और अपनी-अपनी जेबें खाली करने लगे थे। जब सबसे छोटे ने अपनी निकर तथा कुर्ते की जेब से चिल्लर निकाली तो उसकी आँखों में सिक्कों की तेज चमक थी। जेबें खाली करता-करता वह पापा से बोल उठा--''पापा… पापा, ये चन्द्रग्रहण रोज-रोज क्यों नहीं लगता!" 

सुबह की चाय / नीलिमा शर्मा ‘निविया’
"अरे, तू बहुत जल्दी जग गई बेटा!" पापा के कमरे में चाय के दो प्याले लेकर जब वो पहुँची थी तो पिता ने उदासी में भी मुस्करा कर स्वागत किया था।
माँ की मृत्यु के बाद पहली बार मायके गई थी वह।
"आपको जल्दी चाय पीने की आदत है न।" 
"ये आदत भी तेरी माँ के साथ ही चली गई, अब न कोई जल्दी उठता है और न चाय बनती है।" पापा के चेहरे पर अजीब सी उदासी फ़ैल गई थी।
"अरे!"
"हाँ, दोनों बहुएँ आपस में झगड़ती थीं आए दिन। मैंने खुद ही कह दिया, सुबह चाय न बनाया करो, मैं भी बाई के आने पर ही पी लिया करूँगा।"
    "सर्दी बहुत है, लो चाय पकड़ो।" पति की आवाज़ के साथ वर्तमान में वापस आई नित्या की आँखों से दो आँसू टपक गए।
ड्राइविंग सीट पर बैठे पति ने उसके हाथ थाम लिए, "प्लीज़, अब और परेशान मत हो, बस इतने ही दिन का साथ था पापा  का। ईश्वर की इच्छा के आगे हम कुछ नही कर सकते।"
"शिरीष! पापा कब गुज़रे किसी को पता ही नही चला। वो तो कामवाली बाई जब चाय लेकर गई, तब पता चला।" उसने  हाथ में पकड़े चाय के प्याले को देखते हुए द्रवित स्वर में कहा।
"चाय पी लो फिर चलते हैं।" पति ने अपना प्याला खाली कर डस्टबिन में फेंकते हुए कहा।
चाय के प्याले में हिलती हुई चाय उसको पिता की डबडबाती आँखों जैसी लगी। उसने बिना चखे ही चाय का प्याला किनारे कर दिया।
                               
हिचकी /  कुमार गौरव
9718805056
नौ से सात की नौकरी करनेवाला आदमी रविवार को सुबह दस बजे सोकर उठा। रूटीन कामों से निवृत्त होकर नाते रिश्तेदारों को फोन किया। कुछ दोस्तों वाले व्हाटस्-अप ग्रूप में कुछ जोक्स डाले। दोस्तों की डीपी ढूंढकर नाइस डीपी लिखते हुए खाना खाने लगा तो हिचकियाँ शुरू हो गईं। दो तीन गिलास पानी पीने के बाद भी जब ठीक न हुआ तो दादी माँ का नुस्खा याद आया। मन ही मन सोचने लगा, सब को तो फोन कर ही लिया। दोस्तों को भी मैसेज से याद कर ही लिया। अब कौन रह गया जो याद कर रहा है। 
उधेड़बुन में खाना छोड़ कमरे में टहलते हुए फोन के कॉन्टेक्ट लिस्ट में ढूँढ़ने लगा कि कौन रह गया याद करने को। 
टहलते टहलते आईने के सामने जाकर रुक गया। खुद के चेहरे को उसने ध्यान से देखा। कुछ तो है जो ठीक नहीं है। अचानक उसे आश्चर्य हुआ, हिचकियां बंद हो गई थीं।
                       
नई कमीज / पंकज शर्मा

भीखू आज सुबह अपने काम पर जाने के लिए नयी कमीज पहन कर निकला तो सभी देखने वालों को अपनी आँखों पर मानो विश्वास ही नही हुआ, ‘भीखू और नई कमीज? ये कैसे हो गया? इसके पास इतने रुपये कहाँ से आ गए? लगता है कहीं कोई अच्छा हाथ मारा है, या फिर कहीं से उठा कर लाया है?’ गन्दी बस्ती की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले सभी लोगों के दिमाग में कुछ न कुछ कुलबुला रहा था।
          भीखू भी थोड़ा शरमा रहा था। आज तक उसने भी साफ़ कपड़े कहाँ पहने थे? और फिर यह तो एकदम नई कमीज थी, हालाँकि पैंट नई नहीं थी, मगर धुली हुई थी। आखिर मंगू ने पूछ ही लिया, “क्यों बे, यह नई कमीज कहाँ से लाया है रे?”
सभी आसपास खड़े लोग हंसने लगे।
“नहीं-नहीं”, भीखू बोला, “मैंने अपने खुद के पैसों से ली है, कसम से।”
“अरे कहाँ से आए इतने पैसे, तेरे पास तो फूटी कौड़ी नहीं होती”, जगन बोल उठा।
“सच कहता हूँ जगन भाई”, भीखू बोला।
“तो फिर यह नई कमीज?” पूछने वाले के साथ-साथ सभी के चेहरे सवालिया थे।
          भीखू ने सकुचाते हुए भेद खोला, “वो मैंने..., मैंने बीड़ी-सिगरेट और पान मसाला वगैरा खाना-पीना छोड़ दिया था न, बस उसी के..., उसी के पैसे बचा-बचा कर यह नई कमीज़ लाया हूँ अपने लिए। वो मुझे एक बाबू ने बोला था एक दिन कि अगर मैं नए और साफ सुथरे कपड़े पहनूंगा तो लोग मुझे अच्छा समझेंगे, मुझे पसंद करेंगे, और उन पर अच्छा..., वो क्या बोला था? ...हाँ, अच्छा ‘इम्प्रैसन” पड़ेगा। ...और मुझे अच्छा काम और अच्छे पैसे भी मिल सकते हैं।“
फिर कुछ याद करता हुआ बोला, “...और उसने यह भी कहा था कि इन चीजों से तो तुम्हारी सेहत ही खराब होगी, ...कल को कोई भयंकर बीमारी भी लग सकती है, फिर क्या करोगे? ...उसने तो बहुत कुछ समझाया था परन्तु मेरी समझ में बस इतना ही आया था।...और मैंने पैसे जोड़ कर यह नई कमीज खरीद ली...।”
       
उपयोग / अशोक दर्द
9418248262
सोहनलाल का तबादला दूर गाँव के हाई स्कूल में हो गया। शहर की आबो–हवा छूटने लगी। पत्नी ने सुझाव दिया, “कल प्रधान जी के यहाँ शिक्षा मंत्री आ रहे हैं। क्यों न माताजी से तबादला रोकने की प्रार्थना करवाई जाये। हो सकता है बूढ़ी माँ को देख मंत्री जी पिघल जाएँ और काम हो जाए।”
सोहनलाल को सुझाव अच्छा लगा। वह शाम को ही गाँव रवाना हो गया। सुबह बूढ़ी माँ को लेकर मंत्री जी के पहुँचने से पहले ही प्रधान के घर पहुँच गया।
मंत्री जी अपने लाव–लश्कर के साथ ठीक समय पर पहुँच गये। लोगों ने अपनी–अपनी समस्याओं को लेकर कई प्रार्थना–पत्र मंत्री महोदय को दिए। समय पाकर सोहन ने भी अपनी बूढ़ी माँ को प्रार्थना–पत्र थमा मंत्री जी के सम्मुख खड़ा कर दिया। काँपती हुई माँ के प्रार्थना–पत्र को मंत्री जी ने स्वयं पकड़ते हुए कहा, “बोलो माई, क्या सेवा कर सकता हूँ?”
बूढ़ी माँ ने रटाये गये शब्द बोल दिये, “साहब, मेरे खातिर मेरे बेटे की बदली मत करो, इसके चले जाने से इस बूढ़ी की देखभाल कौन करेगा?”
बूढी माँ के शब्द इतने कातर थे कि मंत्री जी अंदर तक पिघल गये। बोले, “ठीक है माई, आपके बेटे की बदली अभी रद्द कर देता हूँ।”
  मंत्री जी ने साथ आये अधिकारी को कैंप आदेश बनाने को कहा। कुछ ही देर में तबादला रद्द होने के आदेश सोहनलाल के हाथ में थे।
सोहनलाल ने शाम को ही बूढ़ी माँ गाँव भेज दी।                                                                                                                                                                                      पढ़ी गयी सभी लघुकथाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी डॉ॰ अशोक भाटिया तथा डॉ॰ बलराम अग्रवाल द्वारा की गयी। उन्हें इन लिंक्स पर देख-सुन सकते हैं :                                                https://www.youtube.com/watch?v=mUv_WAdGIZs&app=desktop                                                      https://www.youtube.com/watch?v=Lb6k0h8Nc9s